सुगम साधन
प्रह्लादजी असुर-बालकोंको उपदेश देते हुए कहते हैं कि भगवान्की प्राप्तिमें क्या प्रयास है—‘कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका’ (श्रीमद्भागवत ७।७।३८)? विषयोंकी एक बात ध्यान देनेकी है कि संसारकी वस्तुएँ सब देशमें सब समयमें नहीं हैं। उनकी प्राप्तिके लिये विशेष परिश्रम करना पड़ता है। परन्तु परमात्मा सब देशमें हैं, सब कालमें हैं, सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें हैं, सम्पूर्ण घटनाओंमें हैं। ऐसा कोई देश, काल, व्यक्ति, वस्तु नहीं है, जहाँ परमात्मा न हों। उनकी प्राप्तिमें तो केवल तीव्र इच्छाकी ही आवश्यकता है। जैसे हमारे पास कोई चीज हो तो उस तरफ दृष्टि घुमाई और देखी! परन्तु परमात्माको देखनेके लिये दृष्टि घुमानेकी भी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि परमात्मा बाहर-भीतर सब जगह हैं। इसलिये उनकी प्राप्तिकी इच्छा करो और उनको प्राप्त कर लो!
परमात्माकी प्राप्तिमें प्रयासकी आवश्यकता नहीं है। इसमें तो केवल अभिलाषाकी आवश्यकता है। वह अभिलाषा भी कठिन नहीं है। वास्तवमें वह अभिलाषा मनुष्यमात्रमें स्वत:-स्वाभाविक है; क्योंकि मनुष्यमात्र अपनेमें कमीका अनुभव करता है। परन्तु उससे भूल यह होती है कि वह इसकी पूर्ति संसारसे करना चाहता है। संसारकी सब वस्तुएँ सभीको प्राप्त होती नहीं, हुई नहीं और होंगी भी नहीं तथा मिल भी गयीं तो रहेंगी नहीं। वस्तुएँ रह भी गयीं तो आप नहीं रहेंगे। उनसे वियोग तो अवश्य होगा। पहले भी वियोग था और बादमें भी वियोग होगा। बीचमें संयोग केवल दीखता है, वास्तवमें है नहीं। फिर भी हम उन वस्तुओंसे अपना सम्बन्ध मान लेते हैं और उनकी इच्छा करते हैं, यह बहुत बड़ी भूल है।
आपने शरीरके साथ एकता मान ली कि यह शरीर मैं हूँ और शरीर मेरा है, यह है खास गलती! आप शरीर नहीं हैं; क्योंकि यदि आप शरीर होते तो मरते ही नहीं और यदि मरते तो शरीरको साथ ले जाते। मरनेके बाद शरीर (मुर्दा) पड़ा रहता है तो उसमें भी हम होते। परन्तु न तो शरीर हमारे साथ जाता है और न शरीरके साथ हम रहते हैं। अत: अपनेको शरीर मानना भी गलत है और शरीरको अपना मानना भी गलत है। शरीरको हम जैसा रखना चाहें, वैसा रख नहीं सकते, इसपर हमारा वश नहीं चलता, फिर यह अपना कैसे? यदि शरीर अपना नहीं है तो फिर धन, सम्पत्ति, वैभव, कुटुम्ब आदि अपने कैसे? अत: संसार अपना नहीं है, अपने तो केवल भगवान् ही हैं—यह माननेमें क्या कठिनता है? संसारको अपना माननेसे ही जो वास्तवमें अपने हैं, उन परमात्माको अपना माननेमें कठिनता हो रही है।
परमात्मा अपने हैं—यह शास्त्र कहता है, और संसार अपना नहीं है—यह आपका अनुभव कहता है। यह बात भले ही आप अभी न मान सको, भले ही आपसे मानी नहीं जा रही हो; परन्तु हिम्मत मत हारो। यह मत सोचो कि हम तो इस बातको मान नहीं सकते। भले ही हमारे माननेमें न आ रही हो, पर वास्तवमें ‘मैं शरीर हूँ, शरीर मेरा है’ यह बात है नहीं—इस बातको स्थिर रखो। आपके माननेमें आये चाहे न आये, अनुभव हो चाहे न हो—इसकी चिन्ता मत करो; परन्तु इस बातको रद्दी मत करो।
शरीर ‘मैं’ नहीं है और ‘मेरा’ नहीं है—यह बात सच्ची है एवं मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरा है—यह बात भी सच्ची है। सच्ची होनेपर भी माननेमें नहीं आती तो यह हमारी एक कमजोरी है। हमारे न माननेसे सच्ची बात रद्दी (गलत) कैसे हो सकती है?
श्रोता—हम इस बातको रद्दी कैसे करते हैं?
स्वामीजी—इन्द्रियोंके द्वारा, बुद्धिके द्वारा हम जिन वस्तुओंको देखते हैं, उनको सच्ची और अपनी मान लेते हैं; इससे वह बात रद्दी हो जाती है। उन वस्तुओंमें अपनेपनका त्याग नहीं होता तो कोई बात नहीं; परन्तु ‘शरीर-संसार मेरे नहीं हैं’ यही बात सच्ची है—इतना आदर तो आपको करना ही चाहिये! भगवान् न दीखें तो न सही, पर ‘भगवान् हमारे हैं, हम भगवान्के हैं’—यह बात सच्ची है। ब्रह्माजी भी इस विषयमें कह दें कि ‘देखो, तुम संसारके हो और संसार तुम्हारा है, तुम भगवान्के नहीं हो और भगवान् तुम्हारे नहीं हैं’, तो भी साफ कह दो कि ‘महाराज! आपकी यह बात हम नहीं मानेंगे।’ भले ही यह बात हमारे अनुभवमें न आयी हो, हमें पूरी न जँची हो; परन्तु बात यह सच्ची है! भगवान् स्वयं कहते हैं—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७) ‘यह जीव मेरा ही अंश है।’ सन्त-महात्मा भी यही कहते हैं—‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी’ (मानस, उत्तर० ११७। २)। इसलिये मैं हाथ जोड़कर आपसे प्रार्थना करता हूँ, मेरेपर आप इतनी कृपा करो कि आप मेरी बात आज मान लो। माननेसे भले ही आपमें कोई परिवर्तन न आये, पहलेकी तरह ही भूख-प्यास लगे, वैसे ही राग-द्वेष हों, पर कृपा करके इस बातको रद्दी मत करो। हम तो भगवान्के ही हैं—ऐसा मान लो, फिर अनुभव हो अथवा न हो, बोध हो अथवा न हो, इसकी परवाह मत करो। अन्तमें यह बात स्थिर हो जायगी; क्योंकि यह बात सच्ची है।
बिलकुल सच्ची बात है कि ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’। इसे माननेमें क्या जोर आता है? मानना तो आपको आता ही है; जैसे—आप किसीको अपना मित्र, गुरु आदि मान लेते हैं। इसी प्रकार न मानना भी आपको आता है; जैसे—पहले आप अपनेको कुँआरा मानते थे, पर विवाह हो जानेपर अपनेको कुँआरा न मानकर विवाहित मानने लग जाते हैं। यदि आप गृहस्थ छोड़कर साधु बन जाते हैं तो घर, परिवारको अपना मानना छोड़ देते हैं और गुरु महाराजको अपना मान लेते हैं। इसलिये मानना और न मानना—दोनों आपको आते हैं। मानने और न माननेकी विद्या सभीको आती है। अब इस विद्याको केवल भगवान्में लगाना है, संसारमें नहीं।
हमारेसे गलती यह होती है कि सुनते समय तो मान लेते हैं, पर फिर उसे उड़ा देते हैं और जो बात सच्ची नहीं है, उसे सच्ची मानने लग जाते हैं। एक और गलतीकी बात यह है कि भाई-बहन कहते हैं कि इस बातको हम भूल जाते हैं। वास्तवमें यदि आपने इस बातको दृढ़तासे मान लिया है, तो फिर भले ही यह याद न रहे। बिना याद किये भी यह स्वत: याद रहेगी। कैसे याद रहेगी? जैसे अभी आप मानते हैं कि हम वृन्दावनमें हैं, तो किसी भाई-बहनने ‘मैं वृन्दावनमें हूँ’—इसकी एक भी माला फेरी है क्या? एक बार आपने इसे मान लिया, फिर इसे बार-बार याद रखते हो क्या? इसमें सन्देह होता है क्या? जब कभी कोई पूछे तो तुरन्त कह देते हो कि हम तो वृन्दावनमें हैं। इस तरह बिना याद किये भी आपके भीतर बात रहती है। इसकी भूल तो तब मानी जायगी, जब आप यह मानने लग जायँ कि मैं तो हरिद्वारमें हूँ! अत: याद न रहनेको मैं भूल नहीं मानता हूँ। ‘मैं भगवान्का हूँ’—यह याद न रहे तो यह भूल नहीं है; परन्तु ‘मैं भगवान्का नहीं हूँ, मैं तो संसारका हूँ’—यह मान लेना भूल है।
एक बार सच्चे हृदयसे अपनेको भगवान्का मान लेनेके बाद फिर चाहे बिलकुल याद मत रखो। अब तो याद रखना है भगवान्का नाम। भगवान्के नामका जप करो, स्मरण करो, कीर्तन करो, उनकी लीलाओंका ध्यान करो, उनके स्वरूपका चिन्तन करो—ये बातें करनेकी हैं। भगवान्को तो एक बार अपना मानकर छोड़ दो। हम भगवान्के हैं—इसमें सन्देह मत करो, चाहे हमारे माननेमें आये या नहीं आये, उसका अनुभव हो चाहे नहीं हो, कोई परवाह नहीं।
बहुत-से लोग कह देते हैं कि तुम्हारे जीवनमें क्या फर्क पड़ा? फर्क चाहे कुछ न पड़े। न नापमें, न तौलमें, न रंगमें, न ढंगमें, कुछ फर्क न पड़े तो कोई बात नहीं! परन्तु ‘हम तो मान नहीं सकते, हमें तो याद नहीं रहता, हम तो योग्य नहीं हैं, हम तो अधिकारी नहीं हैं, हम तो पात्र नहीं हैं, हमें तो गुरु नहीं मिले, हमें तो सन्त नहीं मिले; समय ठीक नहीं है, कलियुगका समय है, वायुमण्डल ठीक नहीं है, संग अच्छा नहीं है’—इन बातोंको लेकर इस बातको रद्दी मत करो। तरह-तरहकी युक्ति लगाकर आप इस बातको रद्दी करते रहोगे तो सिद्धि नहीं होगी। परन्तु इस बातको रद्दी नहीं करोगे तो सिद्धि हो ही जायगी। यह सिद्धि कुछ दिनोंमें भी हो सकती है, महीनोंमें भी हो सकती है, वर्ष भी लग सकते हैं। संसारका सुख लेते रहोगे तो बहुत समय लगेगा, पर अन्तमें सिद्धि होकर रहेगी।
खेती करनेवाला खेतमें बीज बोकर निश्चिन्त हो जाता है। वह बीज अपने-आप ही अंकुर देता है। यदि वह बार-बार बीजको बाहर निकालकर देखेगा तो अंकुर कभी नहीं आयेगा। एक कहानी आती है। एक आमका बगीचा था। उसमें बन्दर आम खाने लगे तो बागमें रखवाली करनेवालोंने उनको पत्थर मारकर भगा दिया। जाते-जाते बन्दरोंने एक-एक आम मुँहमें और एक-एक आम हाथमें ले लिया और भाग गये। उन सबने मीटिंग की कि ये दुष्ट हमें आम खाने नहीं देते! उनमेंसे कुछ समझदार बन्दर बोले कि वे अपने बगीचेमें आम कैसे खाने देंगे? यदि हम भी एक बगीचा लगा लें तो फिर हमें आम खानेसे कोई मना नहीं करेगा। उन्होंने सोचा कि गुठली तो है ही, इनका बगीचा लगा लें। गुठली गाड़ दें और पानी दे दें तो बगीचा तैयार हो जायगा, फिर खूब आम खायेंगे! सर्वसम्मतिसे प्रस्ताव पास हो गया। एक नदी बह रही थी, उसके किनारे गुठलियाँ गाड़ दीं। अब वे बार-बार गुठलियोंको निकालकर देखते हैं कि अभी आम हुआ कि नहीं और उनको पुन: गाड़ देते हैं! शामतक वे इसी प्रकार गुठलियोंको निकालते तथा गाड़ते रहे! क्या इस प्रकार आमकी खेती हो जायगी? खेती करनी हो तो बीज बोकर पानी दे दो और निश्चिन्त हो जाओ। जो अभी नहीं है, वह भी निश्चिन्त होनेसे पैदा हो जायगा, फिर जो सच्ची बात है, वह सिद्ध क्यों नहीं होगी? हम भगवान्के हैं और भगवान् हमारे हैं—यह बात सच्ची और स्वत:सिद्ध है। इसको माननेमें क्या परिश्रम आता है? क्या जोर पड़ता है? क्या किसी विद्याकी आवश्यकता है? कोई योग्यता चाहिये? सीधी बात है कि हम भगवान्के हैं, भगवान् हमारे हैं; हम संसारके नहीं हैं, संसार हमारा नहीं है। अब आप इसे आमकी गुठलीकी तरह उखाड़ें नहीं अर्थात् कभी परीक्षा न करें कि हमारेमें कुछ फर्क पड़ा कि नहीं? अंकुर फूटा कि नहीं? फिर वृक्ष उग जायगा, आम भी लग जायँगे, सब बढ़िया हो जायगा! परन्तु कृपा करो कि इस बातको हटाओ मत। यह भगवत्प्राप्तिका बहुत सुगम उपाय है और कुछ नहीं करना है। बस, ‘मैं भगवान्का और भगवान् मेरे’ इस निश्चयको अपनी तरफसे हटाना नहीं है।
ये भाई बैठे हैं; पहले ये अपनेको कुँआरा मानते थे। परन्तु विवाह हो गया तो कहने लगे कि हम तो कुँआरे नहीं हैं। अब कोई पूछे कि तुम्हारा विवाह हो गया क्या? तो क्या यह कहोगे कि ठहरो, सोचने दो; इस साल तो नहीं हुआ, गये साल भी नहीं हुआ, बीस साल पहले हुआ था, हाँ-हाँ, याद आ गया, हो गया विवाह! ऐसा क्यों नहीं कहते? क्योंकि विवाह हो गया तो हो गया। यह मान्यता है। यदि स्वप्नमें भी कोई पूछे तो यही कहोगे कि विवाह हो गया। ऐसे ही ‘मैं परमात्माका हूँ और परमात्मा मेरे हैं’ यह बिना याद किये याद रहेगा। इसमें भूल नहीं होगी। भूल तब होगी, जब आप सोचेंगे कि मैं परमात्माका नहीं हूँ और परमात्मा मेरे नहीं हैं; क्योंकि मेरे आचरण अच्छे नहीं हैं, मेरे लक्षण अच्छे नहीं हैं, भगवान् पर विश्वास नहीं है, श्रद्धा नहीं है। यह बाधाएँ मत लगाओ। विश्वास नहीं हो, श्रद्धा नहीं हो, स्मरण नहीं हो, हमारेमें परिवर्तन नहीं हुआ हो, जीवन न सुधरा हो, कुछ भी न हुआ हो, फिर भी इस मान्यताको रद्दी मत करो कि मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं।
जो मेरी दृष्टिमें महापुरुष हैं, उनसे भी मैंने पूछा है। उन्होंने कहा है कि जो मनुष्य परमात्माको अपना मान लेता है, उसे जाननेकी जिम्मेवारी परमात्मापर आ जाती है; क्योंकि परमात्मा ही जना सकते हैं, हम नहीं जान सकते। जहाँ हम असमर्थ होते हैं, वहाँ भगवान्की सामर्थ्य काम करती है। कितनी बढ़िया बात है कि ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं, मैं संसारका नहीं और संसार मेरा नहीं—यह माननेकी योग्यता आपमें है! आपमें जितनी योग्यता है, उतनी आप लगा दें। जो नहीं है, उसकी पूर्ति भगवान् करेंगे—‘सुने री मैंने निरबलके बल राम।’ जितने अंशमें आप निर्बल हैं, उतने अंशमें भगवान्का बल काम करता है। परन्तु जितने अंशमें आप सबल हैं, उतना बल आप नहीं लगाते तो इसमें दोष आपका है, इसकी जिम्मेवारी भगवान् पर नहीं है। किसीको तो आप अपना मान लेते हैं और किसीको अपना नहीं मानते—इस योग्यताको आप भगवान्में क्यों नहीं लगाते? आप जितना कर सकते, उतनेकी ही आशा भगवान् आपसे करते हैं। जो आप नहीं कर सकते हैं, उसकी आशा भगवान् आपसे नहीं करते। एक छोटे बच्चेसे क्या आप आशा करते हैं कि वह एक गेहूँका बोरा उठा लाये? आप उतनी ही आशा करते हैं, जितना बच्चा कर सकता है। फिर भगवान् इतने भी ईमानदार नहीं हैं क्या? जो आप नहीं मान सकते, उसे आप मान लो—ऐसा भगवान् कहेंगे क्या? जो आप नहीं मान सकते, उतना मान लो, बस। यह जो साधन आज आपको बताया है, यह इतना सुगम और सरल है कि हरेक कर सकता है। पढ़ा-लिखा हो या अपढ़ हो, भाई हो या बहन हो, सदाचारी हो या दुराचारी हो, सद्गुणी हो या दुर्गुणी हो, सज्जन हो या दुष्ट हो, कैसा ही क्यों न हो, इसको मान सकता है।
पतिव्रताके लिये कहा गया है—
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा।
कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥
(मानस, अरण्य० ५। १०)
ये मेरे पति हैं—यह मान्यता दृढ़ होनेसे पति चाहे जैसा हो, वह पतिव्रता हो जायगी। रावण एक विशेष महात्मा था क्या? परन्तु मन्दोदरीने अपने पातिव्रतधर्मका ठीक पालन किया, जिसके प्रभावसे वह रामजीकी महिमा जानती थी, जबकि रावण कहनेपर भी नहीं मानता था! उसमें इतना ज्ञान कहाँसे आया? यह ज्ञान आया पातिव्रतधर्मसे। क्या भगवान् कह सकते हैं कि तुम्हारा पति सदाचारी नहीं है; अत: तुम्हारा कल्याण नहीं होगा? नहीं कह सकते। वह सदाचारी नहीं है तो हम क्या करें? हमने अपने पातिव्रतधर्मका ठीक पालन किया है तो उसका पूरा माहात्म्य भगवान् देंगे—‘बिनु श्रम नारि परम गति लहई’ (मानस, अरण्य० ५। १८)। परमगति पानेकी जिम्मेवारी उसपर नहीं है। इसकी जिम्मेवारी है—शास्त्रोंपर, सन्तोंपर, भगवान् पर। वह पातिव्रतधर्मका पालन करती है तो वह ऋषि-मुनियोंकी, सन्त-महात्माओंकी, भगवान्की आज्ञाका पालन कर रही है; अत: उनको उसका कल्याण करना पड़ेगा। पतिमें योग्यता नहीं है तो उसका क्या दोष? माता-पिताने विवाह कर दिया तो वह उसका पति हो गया। उसका दोष तो तब होगा, जब वह अपने पातिव्रतधर्मका पालन न करे। ऐसे ही ‘मैं भगवान्का हूँ, भगवान् मेरे हैं’ इस बातको आप न मानें तो यह आपका दोष है। परन्तु यदि आप भीतरसे मानना चाहते हों और माना जाये नहीं, तो कोई परवाह नहीं। अपनी शक्ति पूरी लगा दें। कम-से-कम उलटी मान्यता मत करें, इस बातको रद्दी मत करें। यह आपको मार्मिक बात बतायी है।
‘मैं भगवान्का हूँ, भगवान् मेरे हैं’—इतना मान लो, फिर आगे जो होना चाहिये, वह स्वत: होगा। इसको माननेके बाद निर्विकल्प हो जाओ। अब जितना उद्योग है, वह करो; नाम-जप करो, कीर्तन करो, सत्संग करो, स्वाध्याय करो, मन्दिरोंमें जाओ, श्रीविग्रहके दर्शन करो। जो कार्य भगवान् के, शास्त्रोंके विरुद्ध है, वह काम मत करो। जहाँतक अपना वश चले, जितना कर सकते हो, उतना करो। इस बातको हिलने-डुलने मत दो, चाहे विपत्ति आये, चाहे सम्पत्ति आये; कोई अनुमोदन करे या विरोध करे। यह बात सच्ची है; अत: हमने तो मान ली, मान ली। शेष सब सच्ची हैं।
अब प्रश्न हो सकता है कि हम ऐसा करें, पर भगवान्की प्राप्ति न हो तो? इसका उत्तर है कि इतने दिनोंमें आपने कौन-सा बढ़िया काम कर लिया, जिसमें घाटा पड़ जायगा? होगा तो लाभ ही होगा। आपमेंसे कोई बताये कि हानि क्या होगी? हानि कुछ होगी नहीं और धोखा मैं देता नहीं! इससे लाभ ही होगा; क्योंकि यह सच्ची बात है और सच्ची बात सिद्ध होकर ही रहेगी। झूठी बात कबतक रहेगी? शरीर-संसारको अपना माननेसे क्या ये अपने बन जायँगे? ये कभी अपने बने नहीं और बनेंगे नहीं; परन्तु इनको अपना मानोगे तो दु:ख पाना पड़ेगा और रोना पड़ेगा! इनसे धोखा खाकर फिर सच्ची बात मानो तो इससे अच्छा यही है कि अभी मेरे कहनेसे मान लो। बताओ, इसमें क्या धोखा हो जायगा? और यदि धोखा हो भी जाय, तो इतनी बार धोखा खाया, एक बार मेरे कहनेसे भी खा लो! परन्तु यदि आपमेंसे किसीको भी धोखा दीखता हो तो कह दो भाई! इसमें धोखा बिलकुल है ही नहीं। इसमें लाभके सिवा किंचिन्मात्र भी नुकसान नहीं है। यह केवल मैं ही नहीं कहता, स्वयं भगवान् भी कहते हैं—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७) और सन्त-महात्मा भी कहते हैं—‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी’(मानस, उत्तर० ११७।२)। अत: इस बातको खूब दृढ़तासे पकड़ लो। यह सन्तोंका निर्णय किया हुआ सिद्धान्त है। सन्तोंने, महात्माओंने इसे करके देखा है और हम लोगोंपर कृपा करके इसे लिख दिया है, बता दिया है। जैसे कोई पिता धन कमाकर लड़केको दे दे तो लड़केको क्या जोर आया? ऐसे ही सन्त-महात्माओंने यह कमाई हुई पूँजी हमें दे दी है। अब हमारा कर्तव्य है कि इसे सुरक्षित रखें, रद्दी न करें। रद्दी होता है देखनेसे और करनेसे। इन्द्रियोंसे, बुद्धिसे देखने और करनेको तो मानते हो सच्चा और भगवान् के, सन्त-महात्माओंके वचनोंको मानते हो कच्चा, यह गलती है। जो दीखता है, वह है नहीं। क्रिया भी नित्य नहीं है और उसका फल भी नित्य नहीं है। अत: इनके भरोसे सत्यका निरादर करके सत्यका गला मत घोटो, सत्यकी हिंसा मत करो। सत्यकी हिंसा करनेसे सत्यकी हिंसा नहीं होती, प्रत्युत अपनी ही हिंसा होती है, अपना ही पतन होता है। सत्य तो सत्य ही रहेगा। वह तो कभी मिटेगा नहीं—‘नाभावो विद्यते सत:’ (गीता २। १६)। आप उसको नहीं मानेंगे तो आपको लाभ नहीं होगा। इसलिये ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’—इस बातको मान लो। यह बहुत सरल और ऊँचे दर्जेकी बात है। इससे सब कुछ हो जायगा!