अल्पमें सुख नहीं है
‘यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति’
(छा०उ०७।२३।१)
श्रुति कहती है ‘अल्पमें सुख नहीं है, जो भूमा—महान् निरतिशय है, वही सुख है।’ इसीलिये जीव चिरकालसे सुखकी खोजमें भटकता है, परंतु कहीं तृप्त नहीं होता। हो भी कैसे? उसने अभीतक अल्पमें ही चक्कर काटे हैं, पूर्णके दरवाजेपर पहुँचे तब न उसको सुखकी झाँकी नसीब हो, अबतक तो उसने जिस-जिस चीजको सुखका साधन समझकर अपनाया, वह अन्तमें दु:खदायी ही साबित हुई, इसीसे यह अशान्त हुआ जहाँ-तहाँ कराहता, कलपता, बिलखता दौड़ रहा है और बार-बार ठोकरें खा-खाकर गिरता और क्लेश सहता है।
यह बात नहीं कि जीव पूर्णके दरवाजेतक पहुँचनेका अधिकारी नहीं है, वह सच्चा अधिकारी है, परंतु उसने भ्रमसे पूर्णको भूलकर—अपूर्णको और अनित्यको पूर्ण और नित्य, तथा असत् और दु:खमयको ही सत् और सुखरूप मान लिया है, इसीसे वह इन्हींमें प्रीतिकर, इन्हींमें रमकर, बार-बार मृत्युकी क्लेशकारिणी कराल मूर्तिको देख-देखकर काँपता और रोता है, तो भी इन्हें छोड़ना नहीं चाहता; यही उसका अज्ञान है, यही अविद्याका जाल है जिसमें फँसकर उसने अपने स्वरूप और अधिकारको भुला ही दिया है।
इसी अविद्याके जालको काटनेकी आवश्यकता है। वेद-शास्त्र, संत-महात्मा इसीके लिये कठोर साधन करना बतलाते हैं, इसीके लिये साधक शास्त्र और संतोंका संग किया करते हैं। पर शास्त्र और संतोंके संगको तभी सफल समझना चाहिये, जब यह अविद्याका जाल कट जाय, अज्ञानका अन्धकार नष्ट हो जाय। यह अज्ञान ही हमारा परम शत्रु है, जिसने हमें एक होते हुए भी अपने स्वरूप परमात्मासे विलग कर रखा है, मिथ्यामें सत्ता और मोह उत्पन्न कराके हमें संसृतिके प्रवाहमें डाल रखा है। जैसे अन्धकारका नाश प्रकाशसे होता है, अमावास्याकी घोर काली निशा अरुणोदयकी लालिमाको देखते ही सकुचाकर दुबक जाती है, अपनेको छिपाने लगती है और सूर्यका प्रकाश होते-होते सर्वथा नष्ट ही हो जाती है। वैसे ही यह अज्ञान तम भी ज्ञानकी विमल और प्रखर ज्योतिसे ही नष्ट होता है। ज्ञानके बिना अज्ञानका नाश कभी सम्भव नहीं, इसीलिये मनुष्य-जीवनका सर्वप्रथम और सर्वोपरि कर्तव्य ज्ञानको—तत्त्व-ज्ञानको प्राप्त करना है, जिसके मिलते ही सारे दु:ख—क्लेश सदाके लिये शान्त हो जाते हैं, यह ज्ञान ही भगवत्कृपासे प्रेमके रूपमें परिणत होकर बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे, तनमें-मनमें, वाणीमें-बुद्धिमें, बैठनेमें-चलनेमें, सोनेमें-जागनेमें, दृष्टिमें-अदृष्टिमें, केवल एक दिव्य सत्य-चेतन आनन्द भर देता है। फिर सब ओर, सर्वदा, सबमें एक दिव्य परमात्म-सत्ता ही छा जाती है; छायी तो वह अब भी है, परंतु अब अज्ञानावृत जीव उसे प्रत्यक्ष नहीं करता, उसका अनुभव नहीं करता, पर जब ज्ञानालोकसे अज्ञानान्धकार मिट जाता है, जब जीव और शिवकी एकता हो जाती है, तब फिर जो कुछ रह जाता है, वही बस पूर्ण ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ है। वह दिशा, काल, मान आदिमें सर्वत्र व्याप्त है। यही नहीं, दिशा, काल, मान आदि सब उसीमें कल्पित हैं। वह एक है, अनुपम है, अपरिमेय है, अनादि है, आदि है, अनन्त है, नित्य है, सत्य है, ज्ञान है, प्रेम है, परमानन्द है, परम-रसरूप है, अटल है, असीम है, अज है, अकल है, अगम्य है, अनिर्देश्य है, अव्यक्त है और अनिर्वचनीय है। इसीलिये श्रुतियोंने ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’, ‘प्रज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ आदि कहकर भी उसे ‘नेति-नेति’ कहा है; क्योंकि किसी भी शब्दसे, किसी भी बुद्धि-वृत्तिसे उसको व्यक्त नहीं किया जा सकता, उसको बतलानेके लिये जितने नाम, भाव और उदाहरण हैं, वे सभी अपूर्ण हैं और वस्तुत: उसका स्वरूप प्रकाशित नहीं कर सकते। परंतु उसका कुछ बाहरी भाव, उसकी छाया समझमें आ जाय, इसीलिये ‘शाखा-चन्द्र-न्याय’ से इन शब्दोंकी कल्पना की गयी है। शब्द भी तो वही है, आरम्भमें वह शब्द ही बनकर सृष्टिका सूत्रपात करता है। इसलिये शब्दमेंसे होकर ही हम उसके स्वरूपतक पहुँच सकते हैं, इसीसे ‘शब्द-ब्रह्म’ की इतनी महिमा है।
उस चरम स्थितिकी प्राप्ति जिस तत्त्वज्ञानसे होती है, जो इस चरम स्थितिका पर्याय ही है, वह हमें कैसे मिल सकता है? इसके लिये अल्पसे वृत्ति हटाकर उसको अनन्त और असीममें लगाना होगा—मनमें महदाकांक्षा उत्पन्न करनी पड़ेगी, यह महदाकांक्षा ही वेदान्तकी ‘मुमुक्षुता’ है, बिना अनन्य मुमुक्षुत्वके मुक्ति नहीं मिलती, यह बात सदा स्मरण रखनी चाहिये।
जबतक हम प्राणाधार मनमोहनको सर्वोपरि सुख, प्रेम और कल्याणका अथाह असीम समुद्र मानकर उसको प्राप्त करनेकी एकमात्र इच्छापर लोक-परलोककी सारी सुखेच्छाओंको न्योछावर नहीं कर सकते, जबतक हम उस प्यारे-दुलारे साँवरेके प्यारे अरुणारे चरणोंपर इस लोक और परलोकका सारा सुख और ऐश्वर्य लुटा नहीं देते, जबतक हम उस प्राण-प्रियतमकी चरण-धूलि लाभ करनेके लिये सबका मोह छोड़कर विरहकातर प्राणोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए यमुनाकूलमें कदम्ब-वृक्षकी ओर पागल होकर नहीं दौड़ते, जबतक हमारे मनकी एक-एक वृत्ति—हमारी चित्त-सरिताकी एक-एक तरंग उछलती-कूदती सब प्रकारके बन्धन-प्रतिबन्धनोंके पहाड़ों और पर्वतोंको पददलित करती, तोड़ती और लाँघती हुई उस असीम आनन्द-समुद्र श्यामसुन्दरमें मिलकर एकत्वको प्राप्त करनेके लिये एक तारसे, एक चालसे, अनन्यभावसे और तीव्र गतिसे बहना शुरू नहीं करती तबतक हमें वह मोहन कैसे मिल सकता है? तबतक कैसे हम दावेके साथ कह सकते हैं कि हम पुकारते हैं पर वह बोलता नहीं? हम बुलाते हैं पर वह आता नहीं? हम चाहते हैं पर वह चाहता नहीं? जिस दिन उसकी प्यारी चाह जगत्की और सारी चाहोंको खो बैठेगी, जिस दिन हमारे प्राण व्याकुलतासे उसे पुकार उठेंगे—उस दिन हमसे बोले बिना, मिले बिना, हमें हृदयसे लगाये बिना उससे नहीं रहा जायगा। सच बात तो यह है कि वह तो हमसे मिलना चाहता है, परंतु हमें उसकी परवा नहीं है। उस प्यारे दिलदार मोहनकी माधुरी छबिके सामने जगत्की कौन-सी चीज है जो हमें अभिसारसे अटकाकर रख सकती है, उस रूपकी छटाका भान हो जानेपर तो तन-मन-धन और लोक-परलोक सब आप ही उसपर लुट पड़ता है, ऐसी कोई चीज ही नहीं रह जाती जो उसके चरण-रज-कणकी कीमतमें न दी जा सके, सब कुछ देकर भी वह मिल जाय तो भी उसे सस्तेमें ही मिला समझो—प्रियतमके दीदार-दीवाने कबीरजी पुकारते हैं—
इस तनका दिवला करौं बाती मेलौं जीव।
लोहू सींचौं तेल ज्यौं, कब मुख देखौं पीव॥
फिर उसे दूसरी चीज भाती ही नहीं, उसके मन और कोई बात समाती ही नहीं, उसके नेत्रोंमें और कोई छबि आती ही नहीं—
प्रीतम छबि नैनन बसी, पर-छबि कहाँ समाय।
भरी सराय ‘रहीम’ लखि पथिक आप फिर जाय॥
दूसरा कहता है—
तुझे देखें तो फिर औरोंको किन आँखोंसे हम देखें।
ये आँखें फूट जायें गर्च इन आँखोंसे हम देखें॥
संत श्रीदादूजी महाराज ऐसे विरहीकी दशाका वर्णन करते हैं—
जिस घट इश्क अलाहका तिस घट लोहि न माँस।
दादू जियमें जक नहीं, सिसकै साँसों-साँस॥
दादू इश्क अलाहका जो प्रगटै मन आय।
तो तन-मन-दिल अरवाहका सब परदा जलि जाय॥
जहँ बिरहा तहँ और क्या जप-तप साधन योग।
दादू बिरहा ले रहै, छाड़ि सकल रस-भोग॥
दादू तड़फै पीड़ सों बिरही जन तेरा।
सिसकै साँई कारणै मिलु साहेब मेरा॥
जिस घट बिरहा रामका उस नींद न आवै।
दादू तड़फै बिरहनी, उस पीड़ जगावै॥
बिरह-बियोग न सहि सकौं मोपैं सह्यो न जाय।
कोई कहो मेरे पीवकौं दरस दिखावै आय॥
बिरह-बियोग न सहि सकौं, निसदिन सालै मोहिं।
कोई कहौ मेरे पीवकौं कब मुख देखों तोहिं॥
बिरह-बियोग न सहि सकौं तन-मन धरैं न धीर।
कोई कहौ मेरे पीवकौं मेटै मेरी पीर॥
इस विरहकी दशामें जब प्राण-प्रिय तान-तानकर हृदयमें बाण मारता है, तब तो कुछ विचित्र ही अवस्था हो जाती है। अन्तमें होता यह है कि बाण मारनेवाला ही रह जाता है, जिसके बाण लगता है उसकी पृथक् सत्ता ही मिट जाती है—इसी दृश्यकी चाहना करते हुए महात्मा दादू पुकारते हैं—
दादू मारै प्रेम सौं बेधै साध सुजाण।
मारणहारे कौं मिलै, दादू बिरही-बाण॥
मारणहारा रहि गया, जेहि लागे सो नाहिं।
कबहूँ सो दिन होयगो, यह मेरे मन माहिं॥
विरह-बाण लगनेपर ‘वह दिन’ आते देर नहीं लगती, जब भक्त उस प्राणाधार विश्वाधार विश्वात्मा मुरलीमनोहरको जानकर, देखकर और उसके हृदयमें छिपकर कृतार्थ हो जाता है। बस, यह विरह-ताप—यह अनन्य प्रेम ही उस पूर्ण प्रियतमके मिलनेका सर्वोत्तम साधन है—स्वयं श्यामसुन्दर कहते हैं—
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥
(गीता ११।५४)
‘परम तपस्वी अर्जुन! अनन्य भक्तिके द्वारा ही मैं तत्त्वसे जाना जा सकता हूँ, प्रत्यक्ष दर्शन दे सकता हूँ और भक्तका मुझमें प्रवेश हो सकता है।’
बस, यह प्रभु-मिलन ही पूर्णकी प्राप्ति है, यही सुखकी पराकाष्ठा है। अल्पको छोड़कर इसी महान्—पूर्णके लिये, पूर्ण प्रयत्न करना मनुष्यका परम धर्म है।