अवतार-तत्त्व
प्रश्न—अवतारका क्या अर्थ है? मैंने सुना है कि जो महात्मा पुरुष दैवी सम्पत्तिको प्राप्तकर उच्च स्थितिपर पहुँच जाते हैं, वही आगे चलकर भगवान्के अवतार माने जाते हैं, क्या यह ठीक है?
उत्तर—नहीं, उच्च स्थितिपर पहुँचना तो आरोहण कहाता है, वह तो ऊपर चढ़ना है। अवतारका अर्थ तो है उच्च स्थानसे नीचेकी ओर उतरना—अवतरण। जो लोग चढ़नेको उतरना कहते हैं, वे तो अवतारका अर्थ ही नहीं समझते।
प्र०—अच्छा, इस उच्च और नीचका क्या अर्थ है, जबकि यह कहा जाता है कि सभी लोक उस एकमात्र जगत्प्रसविनी प्रकृति माताकी गोदके बच्चे हैं, तब उनमें ऊर्ध्व और अध: यानी उच्च और नीच लोकका मानना क्या अर्थ रखता है?
उ०—अवश्य ही सभी लोक प्रकृति माताकी गोदके बच्चे हैं, परंतु उसमें जबतक विषमता नहीं होती, जबतक परमात्माके संकल्पसे चेतनका संयोग प्राप्तकर वह गर्भधारिणी नहीं होती, तबतक एक भी बच्चा नहीं हो सकता। प्रकृतिके परम साम्यभावमें ऊँच-नीचका कोई भी विभाग नहीं है, परंतु जैसे माताके बहुत-से बच्चोंमें छोटे-बड़े, बुद्धिमान्-मूर्ख, धनी-निर्धन होते हैं, इसी प्रकार प्रकृतिकी गोदमें खेलनेवाले इन लोकोंमें भी उच्च-नीचका विभाग स्वाभाविक है। अवश्य ही यह परमार्थदृष्टिसे ऐसा ही नहीं है ‘न रूपमस्येह तथोपलभ्यते।’ पर सृष्टि होती ही है विषमतामें। विषमतामें उच्च-नीच है ही। अतएव कारणजगत्के अन्तर्गत जो सत्त्वप्रधान लोक हैं, साधारणतया उन्हीं लोकोंसे नीचेकी ओर अवतरण होता है।
प्र०—क्या इस मर्त्यलोकमें ही अवतार होता है और किसीमें नहीं होता?
उ०—होता क्यों नहीं! स्वर्गादि लोकोंमें भी अवतार होता है, परंतु इतना याद रखना चाहिये कि वह होगा अपने लोककी अपेक्षा निम्नस्तरके लोकमें ही। तभी उसका ‘अवतार’ नाम सार्थक है।
प्र०—अवतार भगवान्का होता है या अन्य किसी देवताका भी होता है?
उ०—कारणजगत्के सत्त्वमय लोकोंमें निवास करनेवाली किसी भी शक्तिका अवतार हो सकता है। महापुरुषगण भी, जो कारणजगत्में पहुँचे हुए हैं, भगवदिच्छासे समय-समयपर अवतरण करते हैं।
प्र०—यह तो सब मायिक लोकोंसे होनेवाले अवतार हुए; क्योंकि कारणजगत् भी तो मायामें ही है। क्या कोई नित्य मायातीत भगवद्धाम भी है और क्या वहाँसे भी अवतार होते हैं?
उ०—भगवान्के दिव्यधाम भी हैं, जिनमें मायिक सूर्य-चन्द्रमाका प्रकाश नहीं है। वहाँ सब कुछ भगवत्स्वरूप है, भगवत्प्रकाशसे ही वे प्रकाशित हैं, वहाँसे भी भगवान्का और भगवत्स्वरूप कारक पुरुषोंके अवतार होते हैं।
प्र०—भगवान् तो नित्य-शुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव हैं, वे विज्ञानानन्दघन नित्य-निर्विकार निराकार हैं, उनमें धाम और देहकी कल्पना क्यों कर हो सकती है?
उ०—ऐसी बात नहीं है। नित्य-शुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव विज्ञानानन्दघन नित्य-निर्विकार निराकार ब्रह्म भी भगवान्का स्वरूप ही है। उसमें धाम या देहकी कोई कल्पना नहीं हो सकती। उस आलोचनातीत अव्यक्त निरंजन निर्विकारका अवतार नहीं होता। अवतार होता है उस आनन्दमय विज्ञानानन्दघन निर्विकार समग्र भगवान्का, जिसका एक स्वरूप निराकार ब्रह्म है। इसीसे गीतामें स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने अपनेको ब्रह्मकी प्रतिष्ठा बतलाया है। ‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्।’ (१४। २७) ये सर्वमय और सर्वातीत समग्ररूप भगवान् सगुण साकार भी हैं और सगुण निराकार भी हैं तथा दोनोंसे अतीत भी।
प्र०—जो अवतार होता है, उसे तो जन्म लेना पड़ता है, उसका देहपात भी होता है, उसे सुख-दु:ख भी होते हैं तथा कर्म भी करने ही पड़ते हैं, उनका फल भी उसे भोगना ही पड़ता है। भगवान्में यदि ये सारी बातें होती हैं तो हम अविद्याग्रस्त जीवोंमें और उन सच्चिदानन्दघन भगवान्में अन्तर ही क्या रह गया?
उ०—यदि ऐसी ही बात होती तो जीवोंमें और भगवान्में कोई अन्तर नहीं रहता। आत्मदृष्टि या भगवद्दृष्टिसे कोई अन्तर है भी नहीं, परंतु वह विषय दूसरा है, इसलिये यहाँ उसकी आलोचना नहीं की जाती। बात यह है कि हमारे जन्ममें हमारे पूर्वकृत कर्म कारण हैं, अदृष्टकी प्रेरणासे जगन्नियन्ताके नियमानुसार हमें बाध्य होकर निश्चित योनिमें जन्म धारण करना पड़ता है। हम अदृष्टके अनुसार कर्मफलरूप सुख-दु:ख भोगते हैं, आसक्ति और अहंकारसे युक्त हुए नवीन कर्म करते हैं, पांचभौतिक देह छोड़कर—मरकर सूक्ष्म शरीरके साथ अन्य गतिमें चले जाते हैं, परंतु भगवान्के अवतारमें ऐसी बात एक भी नहीं है। उनके अदृष्ट नहीं हैं, वे किसी अदृष्टकी प्रेरणासे बाध्य होकर जन्म नहीं लेते। कर्तृत्वाभिमान न होनेसे वे कोई नया कर्म नहीं करते। हमलोगोंकी तरह उनके जन्म और मृत्यु भी नहीं होते। जीवोंके कल्याणार्थ वे संसारमें उसी भाँति अवतीर्ण होते हैं, जैसे कोई चक्रवर्ती सम्राट् अपने सम्राट्-पदपर प्रतिष्ठित रहता हुआ ही छोटे बच्चोंके साथ खेलने और खेल-ही-खेलमें उनके दु:खोंको मिटाकर उन्हें सुख पहुँचाने तथा सन्मार्ग बतलानेके लिये उन बच्चोंके साथ जमीनपर आकर बैठ जाता है और उन्हींकी भाषामें उनसे बातचीत, हास्य-विनोद, खेल-कूद करता है। बच्चोंकी भाँति सब कुछ कहते हुए भी वह जैसे अपने महान् सम्राट्-पदपर कायम रहता है, इसी प्रकार भगवान् भी अपनी स्व-महिमामें पूर्णतया प्रतिष्ठित रहते हुए ही हमलोगोंमें अवतीर्ण होते हैं। स्वयं उनका कथन है—
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥
(गीता ४।६)
‘अज, अविनाशी और समस्त प्राणियोंका ईश्वर रहता हुआ ही मैं अपनी प्रकृतिको अधीन करके, ‘अपनी माया’ (योगमाया—ह्लादिनीशक्ति) के साथ प्रकट होता हूँ।’ इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान् जन्म-मृत्युरहित हैं, कर्मरहित हैं और वे अपनी महिमामें सुप्रतिष्ठित रहते हुए ही प्रकट होते हैं, इसीसे उन्होंने अपने जन्म-कर्मको दिव्य कहा है—‘जन्म कर्म च मे दिव्यम्।’ वास्तवमें भगवान्में जन्म-कर्म है ही नहीं, यह तो उनकी लीला है और बात भी ठीक ही है; जब मुक्त पुरुष भी जन्म-कर्म-रहित होते हैं, तब भगवान्के जन्म-कर्म-रहित होनेमें क्या आश्चर्य है? परंतु प्राकृत लोगोंको उनके जन्म-कर्म प्रतीत होते हैं, इसलिये उन्हें ‘दिव्य’ कहते हैं। उनका प्राकट्य और तिरोधान होता है तथा कर्मके रूपमें उनकी अनिर्वचनीय दिव्य लीलाएँ होती हैं। भगवान्के इस दिव्य जन्म-कर्मको जो तत्त्वत: जान लेता है, उसके लिये भगवान् स्वयं कहते हैं—
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
(गीता ४।९)
हे अर्जुन! मेरा जन्म-कर्म दिव्य है, इस बातको जो पुरुष तत्त्वत: जान लेता है, वह शरीर छोड़नेके बाद फिर जन्म ग्रहण नहीं करता, वह मुझको प्राप्त हो जाता है।
भगवान्में न आसक्ति है, न फलकामना है, न अहंकार है, न इनके आवासस्थान प्राकृत मन-बुद्धि ही है। वे सर्वात्मरूपमें सच्चिदानन्दमय भगवान् हैं।
उनका जन्म भी साधारण जीवोंकी भाँति नहीं होता। भगवान् श्रीकृष्ण कंसके कारागारमें परम भक्त देवकी और वसुदेवके सामने चतुर्भुज विष्णुके रूपमें सहसा प्रकट हुए। उनके कमलके समान सुन्दर नेत्र थे, वे चारों हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए थे। उनके वक्ष:स्थलमें श्रीवत्सका चिह्न तथा कण्ठमें शोभायमान कौस्तुभमणि थी। वे पीताम्बर पहने हुए थे, नवनील नीरदके समान उनका मनोहर श्यामवर्ण था। उनके मस्तकपर वैदूर्य मणियोंसे जड़ा हुआ किरीट और कानोंमें मकराकृत कुण्डल शोभा पा रहे थे। अंगोंपर सुन्दर करधनी, बाजूबंद और कंकणादिकी शोभा अपूर्व थी।* ऐसे अद्भुत विष्णुरूप बालकको देखकर वसुदेव-देवकी चकित हो गये और वसुदेवजीने स्तुति करना शुरू कर दिया। उन्होंने पहले ही कहा—
विदितोऽसि भवान् साक्षात् पुरुष: प्रकृते: पर:।
केवलानुभवानन्दस्वरूप: सर्वबुद्धिदृक्॥
(श्रीमद्भा० १०। ३। १३)
हे परमात्मन्! मैंने आपको जान लिया, आप प्रकृतिसे पर साक्षात् परम पुरुष हैं, केवल अनुभवानन्दस्वरूप हैं और सम्पूर्ण प्राणियोंके बुद्धिके साक्षी हैं।
इसके बाद देवकीके स्तुति करनेपर वे लोकनयनाभिराम द्विभुज बालरूपमें बदल गये। इसी प्रकार श्रीरामावतारमें भी श्रीकौसल्याजीके यहाँ भी उन सनातन परमात्मा जगन्नाथका आविर्भाव हुआ।
आविरासीज्जगन्नाथ: परमात्मा सनातन:।
उन्होंने देखा ‘भगवान् नील कमलके समान श्यामवर्ण हैं, पीताम्बर पहने हुए हैं, चार भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये हैं, नेत्रोंके भीतरका भाग सुन्दर अरुण कमलके समान शोभायमान है, कानोंमें कान्तिमान् कुण्डल शोभित हैं, हजारों सूर्योंके समान प्रकाश है, मस्तकपर प्रकाशमान मुकुट और गलेमें वैजयन्ती माला है। मुखकमलपर हृदयस्थ अनुग्रहरूप चन्द्रमाकी सूचक मुसकानरूपी चाँदनी छिटक रही है, करुणारसपूर्ण नेत्र कमलदलके समान विशाल हैं एवं श्रीवत्स, हार, केयूर और नूपुर आदि आभूषणोंसे विभूषित हैं।’*
फिर कौसल्याजीके स्तुति करनेपर आप बालकरूप बन गये। इसी प्रकार श्रीकृष्ण और श्रीरामके अन्तर्धानकी कथाएँ भी हैं। भगवान् श्रीकृष्णके सम्बन्धमें आता है—
लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमंगलम्।
योगधारणयाऽऽग्नेय्यादग्ध्वा धामाविशत् स्वकम्॥
(श्रीमद्भा० ११। ३१। ६)
भगवान् श्रीकृष्ण योगधारणाजनित अग्निके द्वारा धारणाध्यानमें मंगलकारक लोकाभिराम मनोहर स्वतनु (दिव्य भगवद्देह)-को दग्ध किये बिना ही उसी भगवद्देहसे अपने परमधाम पधार गये। भगवान् श्रीरामके सम्बन्धमें भी ऐसी कथा आती है कि वे विष्णुरूप होकर स्वधामको पधार गये।
हमलोगोंकी भाँति उनका देहपात नहीं हुआ, न हो सकता है। जब एक योगी भी चाहे जहाँ चाहे जब चाहे जिस रूपमें प्रकट और अन्तर्धान हो सकता है, तब भगवान्के स्वरूपभूत अप्राकृत भगवद्देहके प्रकट और अन्तर्धान होनेमें क्या आश्चर्य है? परंतु वास्तवमें उनका यह प्राकट्य और अन्तर्धान देहधारण और देहत्याग नहीं है। लीलाभूमिमें प्रकट होना ‘जन्म’ और अन्तर्धान करना ही ‘देहत्याग’ कहलाता है। भगवान्को सुख-दु:ख भी नहीं होते और न उन्हें हमलोगोंकी भाँति कर्म करना और उसका फल ही भोगना पड़ता है। स्वमहिमामें स्थित भगवान् लोककल्याणार्थ लीला करते हैं; जैसे बालकोंके साथ उनके कल्याणार्थ खेलनेवाला वृद्ध पितामह सम्राट् उनके खेलमें हारता-जीतता और बच्चोंकी दृष्टिमें अपने ही सदृश शोक-विषादको प्राप्त होता हुआ-सा दीखता है, इसी प्रकार हम अज्ञोंकी दृष्टिमें भगवान्में सुख-दु:ख भासते हैं, हम अज्ञानियोंकी दृष्टिमें ही वे कर्म करते और कर्मोंका फल भोगते हैं। और अज्ञानियोंकी दृष्टिमें ही वे जन्म और मृत्युको प्राप्त होते प्रतीत होते हैं। वस्तुत: वे सदा ही अज, अविनाशी, निष्क्रिय, स्वमहिमामें स्थित और आनन्दमय हैं। और लीलावश अपनी इच्छासे ही अवतीर्ण होते हैं। कोई भी बाहरी कारण उन्हें अवतीर्ण होनेके लिये बाध्य नहीं कर सकता।
प्र०—फिर भगवान्के अवतारमें प्रयोजन क्या है? वे किस उद्देश्यसे अवतार लेते हैं?
उ०—भगवान्ने स्वयं ही इसका उत्तर दिया है—
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
(गीता ४। ८)
साधुओंके परित्राण, दुष्कृतोंके विनाश और धर्मकी स्थापनाके लिये मैं युग-युगमें प्रकट होता हूँ।
प्र०—साधुओंका परित्राण, पापियोंका विनाश और धर्मकी स्थापना तो भगवान् अपने साधारण-से संकल्पसे ही कर सकते हैं, अधिक करें तो अपनी संनिधिमें रहनेवाले किसी मुक्त कारक पुरुषको भी भेज सकते हैं। भला, जिन भगवान्के भ्रूसंकेतमात्रसे अखिल ब्रह्माण्डोंका सृजन और प्रलय हो सकता है, वे स्वयं इस मामूली कार्यके लिये अवतीर्ण क्यों होंगे?
उ०—भगवान्की कौन-सी लीला क्यों होती है, इस बातको हमलोग नहीं समझ सकते। भगवान्को जानना, पहचानना और उनकी लीलाका रहस्य समझना केवल उनकी कृपासे ही सम्भव है। कोई भी निश्चितरूपसे नहीं कह सकता कि यह बात यों ही है। तथापि इस श्लोकका रहस्यार्थ महात्मालोग इस प्रकार करते हैं कि यहाँ ‘साधु’ शब्दसे ‘गोपांगना’-जैसे साधु समझने चाहिये, जिनका परित्राण साक्षात् भगवान्के दर्शन बिना हो ही नहीं सकता था तथा दुष्कृति भी भगवान्के परम अन्तरंग भक्त ‘जय-विजय’-जैसे समझने चाहिये, जिनका दुष्कृत भगवान्की लीलाविशेषके विकासके लिये ही था, अन्य दुष्कृतियोंको तो उनका दुष्कर्म ही नष्ट कर देगा; और धर्म-संस्थापनसे यहाँ ‘भक्ति-प्रेम-योगरूप धर्म’की स्थापना समझनी चाहिये, जो ऐसे कोटि-कोटि कामकमनीय मधुर-मनोहर भजनीय भगवान्के बिना हो नहीं सकती। यही अर्थ युक्तियुक्त भी मालूम होता है। हाँ, अवान्तर प्रयोजन सन्मार्गस्थ साधुओंकी रक्षा, भाग्यवान् दुष्कृतियोंका शरीर-विनाशरूपसे उद्धार और पवित्र सनातन धर्मकी स्थापना भी है ही। कुन्तीदेवी स्तुति करती हुई भगवान्के अवतारका हेतु बतलाती हैं—
तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम्।
भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रिय:॥
(श्रीमद्भा० १। ८। २०)
जिनके अन्त:करण सर्वथा मलरहित—पवित्र हैं, उन परमहंस मुनियोंकी भक्तियोगमें प्रवृत्ति करानेके लिये अवतार धारण करनेवाले आपको हम अबलाएँ कैसे देख (जान) सकती हैं?
इससे मालूम होता है कि परमहंस मुनियोंको प्रेमदान देनेके लिये भगवान् स्वयं अवतीर्ण होते हैं। आगे चलकर कुन्तीदेवी श्रीकृष्णावतारके प्रयोजनमें मतभेद दिखलाती हुई कहती हैं—
केचिदाहुरजं जातं पुण्यश्लोकस्य कीर्तये।
यदो: प्रियस्यान्ववाये मलयस्येव चन्दनम्॥
अपरे वसुदेवस्य देवक्यां याचितोऽभ्यगात् ।
अजस्त्वमस्य क्षेमाय वधाय च सुरद्विषाम्॥
भारावतारणायान्ये भुवो नाव इवोदधौ।
सीदन्त्या भूरिभारेण जातो ह्यात्मभुवार्थित:॥
भवेऽस्मिन् क्लिश्यमानानामविद्याकामकर्मभि:।
श्रवणस्मरणार्हाणि करिष्यन्निति केचन॥
शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णश:
स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जना:।
त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं
भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम्॥
(श्रीमद्भा० १। ८। ३२—३६)
कोई कहते हैं कि आपने पुण्यश्लोक राजा युधिष्ठिरका यश बढ़ानेके लिये ही यदुवंशमें अवतार लिया है अथवा चन्दन जिस प्रकार मलयाचलमें पैदा होकर उसकी कीर्ति बढ़ाता है, उसी प्रकार आपने महाराज यदुका यश बढ़ानेके लिये यदुवंशमें अवतार लिया है। किसीका कथन है कि श्रीवसुदेव-देवकीने अपने पूर्वजन्ममें आपसे पुत्ररूपसे प्रकट होनेकी प्रार्थना की थी, उनकी प्रार्थनासे अजन्मा होते हुए भी आप जगत्के कल्याण और देवद्रोही दानवोंका वध करनेके लिये ही उनके पुत्ररूपसे अवतीर्ण हुए हैं। कोई कहता है कि समुद्रमें डूबती हुई नौकाके समान पृथ्वी भारी भारसे डूबी जा रही थी, उसके भारको उतारनेके लिये आपने ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे अवतार धारण किया है। अब कुन्तीजी अपना मत प्रकट करती हैं कि इस संसारमें अज्ञान, कामना और कामनायुक्त कर्मोंके कुचक्रमें पड़े हुए जो जीव विभिन्न प्रकारके क्लेश भोग रहे हैं, उन संतप्त जीवोंको क्लेशसे मुक्त करनेके लिये उनके सुनने और मनन करनेयोग्य सुन्दर दिव्य लीलाओंको करनेके लिये आपने अवतार लिया है। जो लोग आपकी प्रेमभरी दिव्य लीलाओंको सुनते हैं, गाते हैं, कीर्तन करते हैं, बार-बार स्मरण करके आनन्दित होते हैं, वे शीघ्र ही जन्म-मरणरूपी संसार-प्रवाहको शान्त करनेवाले आपके मंगलमय चरणकमलोंके दर्शन पा जाते हैं।
उपर्युक्त सभी प्रयोजन उचित और सत्य हैं, परंतु कुन्तीजीका बतलाया हुआ अन्तिम प्रयोजन बहुत ही हृदयग्राही है। भगवच्चरित्र ही वस्तुत: भवसागरसे तरनेके लिये दृढ़ नौका है। कलियुगी जीवोंका तो यही आधार है। इसीसे गोसाईं तुलसीदासजीने कहा है—
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास।
गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास॥
अमलात्मा मुनियोंको भक्तियोग प्रदान करनेवाला प्रयोजन भी बहुत ही युक्तियुक्त है। इसीसे तो पवित्र भागवतधर्मकी स्थापना होती है। इन्हीं हेतुओंसे सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र इच्छाशून्य भगवान् अवतीर्ण होनेकी इच्छा करते हैं।
प्र०—जय-विजयादि-सरीखे दुष्कृतियोंकी और प्रेमधर्म-स्थापनकी बात तो समझमें आ गयी, परंतु गोपांगनाओंके परित्राणकी बात कुछ समझमें नहीं आयी। उनको क्या दु:ख था, जिससे भगवान्के साक्षात् अवतीर्ण हुए बिना वे उससे नहीं छूट सकती थीं?
उ०—सौन्दर्यमाधुर्यसुधासागर नटनागर भगवान्के दिव्यातिदिव्य मंगल-स्वरूपके दर्शनकी लालसा ही उनका महान् दु:ख था। वे इसी घोर विरहतापसे संतप्त थीं, उनका यह ताप बिना श्रीभगवान्के साक्षात् मिलनके मिट ही नहीं सकता था। इस दु:खसे परित्राण करनेके लिये ही भगवान् स्वयं प्रकट हुए।
परंतु यहाँ यह नहीं समझना चाहिये कि प्रयोजनका यही एकमात्र स्वरूप है। विभिन्न युगोंमें प्रयोजनोंके विभिन्न स्वरूप होते हैं, परंतु उनमें वह बातें तीन ही होती हैं—साधुपरित्राण, दुष्टविनाश और धर्मसंस्थापन।
प्र०—अच्छी बात है, यह बतलाइये कि भगवान्के अवतारोंमें क्या छोटे-बड़े भी होते हैं? अंशावतार, कलावतार, आवेशावतार और पूर्णावतार आदि अनेकों नाम मिलते हैं, इनका क्या रहस्य है?
उ०—भगवान्का पूर्णावतार भी होता है और अंश-कलावतारादि भी होते हैं। यद्यपि भगवत्तत्त्व एक ही है और किसी भी समय उनकी शक्तिमें कोई न्यूनाधिकता नहीं होती; क्योंकि उनकी शक्ति भी साक्षात् भगवत्स्वरूप ही है। अतएव वह सदा ही समरस है तथापि उनके प्राकट्यके अनेक भेद माने गये हैं। जहाँ जिस प्रयोजनसे उनका अवतार होता है, वहाँ उसीके अनुसार उनकी शक्तिका प्रकाश होता है। जैसे सम्पूर्ण वेदका कण्ठस्थ पाठ करनेवाला वेदज्ञ पुरुष जहाँ जिस मन्त्रके उच्चारणकी और जितने वेदार्थप्रकाशकी आवश्यकता होती है, उतना ही करता है, इसी प्रकार नित्य-पूर्ण असीम शक्तिसे सम्पन्न भगवान् भी लीला-प्रयोजनके अनुसार ही शक्तिका प्रकाश करते हैं। अग्निके जरा-से कणमें भी जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको दाह करनेकी शक्ति है, क्योंकि वह साक्षात् अग्नि ही है, इसी प्रकार भगवान्का किसी भी प्रयोजनसे अवतीर्ण लोकदृष्टिमें अत्यन्त छोटा-सा स्वरूप भी पूर्ण-शक्तिसम्पन्न ही है। भगवान्की पूर्णतामें कभी विकार नहीं होता। श्रुतिका यह सिद्धान्त सदा सत्य है—
ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
विशाल अग्निमेंसे चाहे जितनी अग्नि चाहे जितने स्थानोंमें प्रकट हो जाय, सबमें सब जगह समान ही दाहिका शक्ति होती है। इसी प्रकार भगवान्के चाहे एक ही समय कितने ही विभिन्न अवतार हो जायँ, सबमें शक्ति समान रहती है। यद्यपि अग्निका उदाहरण भगवत्-शक्तिकी पूर्णताके लिये लागू नहीं होता। अग्नि मायाका कार्य है, ससीम है, देशकालावच्छिन्न और सान्त है। भगवान्की शक्ति भगवत्स्वरूप है, असीम है, देशकालातीत है, सर्वमय है और नित्य है, तथापि शाखाचन्द्रन्यायकी भाँति केवल समझनेके लिये यह बात कही जाती है।
उपर्युक्त विवेचनके अनुसार पूर्ण शक्ति होते हुए ही भगवान् नाना रूपोंमें प्रकाशित होते हैं। भगवान्के स्वयंरूप और व्यूहरूप आदि अनेकों रूप हैं। इसी प्रकार विभवावतार, कलावतार, अंशावतार, आवेशावतार, अर्चावतार आदि अनेकों अवतार हैं। इनमें स्वयंरूपके दर्शन तो मुक्त पुरुषोंको ही होते हैं। या तो नित्य नित्य धाममें रहनेवाले अनादिकालीन मुक्त पुरुष ही उनके दर्शन करते हैं या भगवान् अनुग्रह करके जिन्हें दर्शन देते हैं, वे कर सकते हैं। स्वरूपावतार अथवा भगवान्के स्वयं अवतीर्ण होनेके समय वे जिनको दर्शन देनेके लिये योगमायाका परदा हटाकर दिव्य दृष्टि दे देते हैं, वे भी दर्शन कर सकते हैं। अन्य लोगोंको इस परम रूपके दर्शन नहीं हो सकते। योगमायाका आवरण हटाते ही वहाँ भगवान्की दिव्यताके संस्पर्शसे तमाम प्रकृति दिव्य बन जाती है। इसीसे जिस पुरुषके सामने आवरण हटता है, वही दिव्यदृष्टिसम्पन्न हो जाता है। अवश्य ही आवरणमुक्तिकी क्षेत्रसीमा भगवान्के इच्छानुसार होती है। इसके सिवा अन्य प्रकारसे भी दिव्यदृष्टि प्राप्त की जा सकती है। दिव्यदृष्टिके भी अनेकों उच्च-नीच स्तर हैं, अर्जुन और संजय दोनोंको दिव्यदृष्टि प्राप्त थी, परंतु दोनों एक ही प्रकारकी नहीं थीं। एकमें प्रत्यक्ष दर्शन था, दूसरेमें छाया-दर्शन! परंतु यह यहाँका आलोच्य विषय नहीं है, इसलिये इसपर आलोचना नहीं की जाती।
भगवान्का व्यूहरूप नित्य विभूतिके बाहर लीला-विभूतिमें है। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये चार व्यूह हैं। असलमें तो संकर्षणादि तीन ही व्यूह हैं। वासुदेव तो व्यूहमण्डलमें आनेसे व्यूहरूप माने जाते हैं। भगवान्के जिस लीलास्वरूपमें ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, शक्ति और तेज पूर्णरूपसे सदा ही प्रकाशित हैं, उस षडैश्वर्यसम्पन्न स्वरूपका नाम वासुदेव है। संकर्षणमें प्रधानतासे ज्ञान और बल, प्रद्युम्नमें ऐश्वर्य और वीर्य तथा अनिरुद्धमें शक्ति और तेज रहता है। एक वासुदेवरूप ही इस त्रिविध रूपमें व्यूहमय बन रहा है। इसलिये तत्त्वत: संकर्षणादि प्रत्येक स्वरूप ही षडैश्वर्य-सम्पन्न है, परंतु उनके लीलाप्रयोजनके लिये उनमें प्रधानतासे दो-दो गुणोंका आधिक्य भासता है। संकर्षण जीवके अधिष्ठाता हैं,प्रद्युम्न मनके और अनिरुद्ध अनन्त जगत्के रक्षक, पोषक और विधाता हैं।
अब अवतारोंके सम्बन्धमें कुछ जानना है। यद्यपि अवतार अनेकविध हैं और उनका प्रकृत रहस्य संसारमें कोई भी नहीं जान सकता, तथापि महात्मा पुरुषोंके सुने और पढ़े हुए वचनोंके आधारपर किंचित् वर्णन करनेकी चेष्टा की जाती है। स्वयं भगवान्के प्रादुर्भावको विम्बावतार कहते हैं। इसके दो भेद हैं—मुख्य और गौण। मुख्य विभव साक्षात् अवतार है और गौण विभव आवेशावतार। आवेशावतारके भी दो भेद हैं। शक्त्यावेश और स्वरूपावेश। शक्त्यावेशमें आवेशकालमें केवल शक्तिका विकास होता है और स्वरूपावेशमें भगवान् अपने अप्राकृत विग्रहसमेत किसी चेतन शरीरमें आविष्ट होते हैं। मुख्य या साक्षात् अवतारका विग्रह नित्य दिव्य और अप्राकृत होता है और गौणका विग्रह केवल आवेशकालमें दिव्य होता है। मुख्य या साक्षात् अवतारका प्रयोजन ऊपर बतलाया जा चुका है। गौणका प्रकाश सृष्टिरचना या रक्षा आदि प्रयोजनोंके लिये होता है। गौणावतारोंमें भी अनेकों भेद हैं।
जो अवतार कलारूपसे होता है, उसे कलावतार कहते हैं। जो भगवत्-शक्ति हमारे जगत्की केन्द्रस्था है, वह षोडश कलाकी समष्टि है। इस कलारूपा शक्तिमेंसे जितनी कलाओंके विकासको लेकर अवतार होता है, उसे कलावतार कहते हैं। एक या अनेक कलाओंके विभिन्न अवतार हो सकते हैं।
कलाकी अपेक्षा अर्थात् सोलह कलायुक्त शक्तिके सोलहवें हिस्सेसे भी जो न्यून शक्तिका आविर्भाव होता है, उसे अंशावतार कहते हैं। अंशकी अपेक्षा न्यून शक्तिके अवतारको विभूत्यवतार कहते हैं। यह याद रखना चाहिये कि परमब्रह्म परमेश्वर नपी-तुली सोलह कलावाले ही नहीं हैं। हमारे इस जगत्में सोलह कलायुक्त शक्तिके विकाससे ही काम चल जाता है। इससे हम भगवान्को षोडशकला कहते हैं, वस्तुत: भगवान् अनन्त कलायुक्त हैं। उन नित्य निष्कलकी अनन्त अकल कलाओंका पार नहीं है।
करोड़ों कलाओंकी विविधमुखी अनन्त धाराएँ निरन्तर उनकी समष्टि-कलासे बह रही हैं। सारी कलाओंका मूल कारण वह समष्टि-कलारूप भगवान्की निज शक्ति ही है। उस शक्तिका अवतार भी साक्षात् भगवान्के आविर्भावके समय भगवान्के साथ ही होता है, परंतु यह आवश्यक नहीं कि सब कलाओंका विकास हो ही। ऐसा होना न तो आवश्यक है और न सहज ही सम्भव है।
इसके अतिरिक्त जिस कल्प, युग या मन्वन्तरमें जैसे अवतारका प्रयोजन होता है तदनुसार अनेकों अवतार हुआ करते हैं। वे ही कल्पावतार, युगावतार या मन्वन्तरावतार कहलाते हैं।
इसी तरह भगवान्का अर्चावतार भी है। जिस अर्चामूर्तिमें विश्वासी श्रद्धासम्पन्न भक्त भगवान्का आविर्भाव चाहता है, उसी अर्चा-विग्रहमें दयामय भगवान् अपने भक्तकी प्रसन्नताके लिये उसपर अनुग्रह करके आविर्भूत हो जाते हैं, इसमें देश, कालका कोई नियम नहीं है। न अधिकारीका नियम है। अधिकारी वही है, जो पूर्ण श्रद्धासम्पन्न प्रेमी हो और अर्चामूर्तिमें भगवान्का पूर्ण स्वरूप समझता हो। इसमें अवतारका स्वरूप वही होता है, जैसा भक्त चाहता है। यहाँ भगवान् अपने भक्तके अधीन होते हैं, वह जिस विधिसे जिस समय उनके स्नान, भोजन, शयन, पूजन, शृंगार आदिकी व्यवस्था करता है, उसी रूपमें भगवान् स्वीकार करते हैं।
प्र०—क्या साक्षात् भगवान्का ही अवतार होता है और किसीका नहीं होता? यदि होता है तो क्या उन सब अवतारोंमें भी शक्तिका तारतम्य नहीं रहता?
उ०—यह तो पहले ही कहा जा चुका है कि कारणजगत्की किसी भी शक्तिका अवतार हो सकता है। वस्तुत: साक्षात् समग्र भगवान्के अवतार बहुत कम होते हैं। अन्य शक्तियोंके अवतार ही अधिक होते हैं। अंश और गौणावतारोंके भी समय-समयपर अवतार होते हैं। आयुध और आभूषणोंके भी अवतार होते हैं। नित्य भगवत्-कैंकर्यको प्राप्त महाभाग मुक्त पुरुषोंके भी भगवदिच्छासे अवतार होते हैं। कभी-कभी वे भगवत्-सेवाके लिये भी अवतार धारण करते हैं। यही भगवान्के भक्तों और परिकरोंके अवतार होते हैं—श्रीमच्छंकराचार्य नृसिंहतापनीय-उपनिषद्के भाष्यमें कहते हैं—‘मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा त्वां भजन्ते।’ मुक्त पुरुष भी लीलासे देह धारण करके आपका भजन किया करते हैं।
कारणजगत्में ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति, प्रेमशक्ति, दयाशक्ति, निरोधशक्ति, ऐश्वर्यशक्ति आदि जो अनन्त प्रकारकी शक्तियाँ हैं, उन सभीके प्रयोजनानुसार विविध अवतार होते हैं; इन्हीं शक्तियोंके नामानुसार उनके ज्ञानावतार, क्रियावतार, प्रेमावतार आदि विभिन्न नाम और कार्य होते हैं। इनकी शक्तिमें बहुत तारतम्यता रहती है। अतएव इन सबमें न एक-सी शक्ति होती है और न इनकी एक-सी क्रिया ही होती है। इनमें बहुतेरे अवतार शक्त्यवतार, गौणावतारोंकी श्रेणीमें भी आ जाते हैं। अवतार मनुष्यरूपमें ही नहीं, पशु-पक्षी आदि रूपोंमें भी होते हैं।
दुष्ट शक्तियोंके भी अवतार होते हैं, परंतु उनका अवतीर्ण होना जगत्के अमंगलके लिये होता है, अतएव जगत्के कल्याणार्थ उनके विनाशके लिये भी समय-समयपर शक्त्यवतार होते हैं। अवश्य ही इन सभीमें भगवत्-शक्तिके द्वारा संचालित एक अखण्ड नियम सतत काम करता है।
भगवान्का एक अन्तर्यामी अवतार भी है, जो जीवके हृदयमें रहकर उसकी प्रवृत्ति और चेष्टाओंका नियमन करता है। इस अन्तर्यामी स्वरूपके दो भेद हैं। एक, जो अपने श्रद्धामय भक्त जीवके हृदय-कमलमें सुहृद्रूपसे उसके योगक्षेमके वहन करनेके लिये निवास करता है। यह भक्तकी इष्टमूर्तिके रूपमें ही भक्तको हृदयमें दर्शन देता है। दूसरा स्वरूप अन्तरात्मारूपसे है, जो सभी जीवोंके हृदयमें भली-बुरी सभी अवस्थाओंमें सदा निवास करता है। जीवके हृदयमें जबतक इस अन्तर्यामीका निवास है, तभीतक वह जीव है।
इसके सिवा प्रत्येक युगमें अनन्त अवसरोंपर अनन्त भक्तोंके सम्मुख एकान्तमें उन्हें कृतार्थ करनेके लिये भगवान्का जो प्राकट्य होता है, वह भी अवतार ही है। उसमें भी साक्षात् भगवान् और गौण शक्तिका भेद भक्तकी साधनाके अनुसार रहता है।
प्र०—साक्षात् भगवान्के अवतारका शरीर क्या भौतिक नहीं होता? और भौतिक नहीं होता तो वह कैसा होता है?
उ०—भगवान् चाहें तो मायिक शरीर भी धारण कर सकते हैं, क्योंकि वे सर्वभवनसमर्थ हैं और समय-समयपर लोककल्याणार्थ करते भी हैं। परंतु उनका साक्षात् अवतार-शरीर भगवत्स्वरूप ही होता है। वह भौतिक न होकर चिदानन्दमय होता है। स्थूल पांचभौतिक शरीरकी तो बात ही दूर रही, उनका सूक्ष्म तथा कारणशरीर भी नहीं होता, वे इन त्रिविध मायिक शरीरोंसे परे हैं। मायिक शरीर तो उनका भी नहीं होता, जो कारणमण्डलको लाँघकर भगवान्के नित्य परम धाममें पहुँच जाते हैं। फिर स्वयं भगवान्की तो बात ही क्या है? भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए ब्रह्माजी कहते हैं—
अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य
स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि।
नेशे महि त्ववसितुं मनसाऽऽन्तरेण
साक्षात्तवैव किमुतात्मसुखानुभूते:॥
(श्रीमद्भा० १०।१४।२)
हे देव! भक्तोंके इच्छानुसार प्रकट हुए मुझपर अनुग्रह करनेवाले आपके इस अवतारविग्रहकी, जो पांचभौतिक नहीं, अपितु अचिन्त्य शुद्ध सत्त्वमय है, महिमाको मनसे भी जाननेके लिये मैं ब्रह्मा समर्थ नहीं हूँ अथवा कोई भी समर्थ नहीं है, तब आपके साक्षात् स्वरूपकी महिमाको तो एकाग्र किये हुए मनसे भी कौन जान सकता है?
भगवान् श्रीरामको महर्षि वाल्मीकिजी कहते हैं—
चिदानंदमय देह तुम्हारी।
बिगत बिकार जान अधिकारी॥
इसीसे आत्माराम मुनिगण भी भगवान्के दिव्य स्वरूपका दर्शन पाते ही मुग्ध हो जाते हैं। जनक-से राजर्षि, व्यास-से महर्षि और भीष्म-से ज्ञानवृद्ध भगवान्को देखते ही पलकें मारना भूलकर एकटक दृष्टिसे उनकी ओर देखते ही रह जाते हैं। तभी उनके भक्तोंकी चरणरजको मस्तक चढ़ानेके लिये ब्रह्मा-सरीखे देवता और उद्धव-सरीखे ज्ञानी लालायित होते हैं। वस्तुत: भगवान्का देह ‘दिव्य देह’ भी नहीं है, वह भगवत्स्वरूपसे सर्वथा अभिन्न है। वह देहातीत साक्षात् भगवत्स्वरूप ही है। वह दिव्यातिदिव्य आनन्दका आनन्दमय आनन्दनिर्झर है; क्योंकि वह आह्लादिनी शक्तिके निमित्तसे ही नित्य प्रकट रहता है। वह सर्वत्र मधुर-ही-मधुर है, सब कुछ मधुर-ही-मधुर है, वह मधुरिमामय है। इसीसे उसको ‘आनन्दमात्रपादमुखोदरादि’ या ‘आनन्दैकरसमूर्तय:’ कहते हैं। जिनके पादारविन्द-मकरन्दसे निकली हुई तुलसीमिश्रित सुगन्ध जन्मसे ही ब्रह्मविद्-शिरोमणि सनकादिकोंके मनमें क्षोभ उत्पन्न कर देती है, उन भगवान्के स्वरूपभूत भगवद्देहकी महिमा कौन गा सकता है?
प्र०—अच्छा, अब भगवान्के सौन्दर्यका कुछ वर्णन कीजिये।
उ०—विश्वब्रह्माण्डमें ऐसा कौन है, जो भगवान्के दिव्य भगवद्देहके सौन्दर्यके करोड़वें भागका भी वर्णन कर सके। वह अनिर्वचनीय तत्त्व है। जिस किसी परम सौभाग्यशाली महानुभावने भगवान्के उस योगमायासे अनावृत सौन्दर्य-माधुर्य-सागर महान् सुन्दर स्वरूपके दर्शन किये हैं, वही उनके सौन्दर्यका किंचित् रहस्य जानता है। परंतु वह जो कुछ जानता है, उसके वर्णनकी सामर्थ्य उसमें कदापि नहीं है।
भगवान्के सौन्दर्यकी तो बात ही क्या है, विशुद्ध लिंगशरीरके सौन्दर्यका भी वर्णन नहीं हो सकता। वह भी बहुत ही ज्योतिर्मय, मनमोहन, नयनाभिराम, माधुर्यमय और लावण्ययुक्त होता है, उसकी भी कोई तुलना नहीं होती। सारी देवभूमिकाएँ उस विशुद्ध लिंगकी ही विभिन्न अवस्थाएँ हैं। फिर जब वही लिंग ‘कारणरूप’ में जा पहुँचता है, तब तो उसका सौन्दर्य सर्वथा वर्णनातीत हो जाता है। कामदेवके मनोहर स्वरूपकी उपमा इस कारणशरीरसे ही दी जाती है, परंतु यह कारणदेह भी जड़ भौतिक ही होता है; क्योंकि कारण, सूक्ष्म और स्थूल जगत् सब मायामें ही है। इनकी स्थितिका कारण जीवोंका अनादि कर्मप्रवाह है। अस्तु! जब परमोत्कृष्ट भौतिक देहकी ऐसी महिमा है, तब भगवद्देहका सौन्दर्य कौन कह सकता है? भक्त कवि इतना कहकर चुप हो जाते हैं—
अंग अंगपर वारिये कोटि कोटि सत काम।
—न उसकी कोई उपमा है, न उसका कोई नमूना है। जो देखता है, वही जानता है, परंतु कह कोई भी नहीं सकता!
प्र०—जब भगवान्का ऐसा मधुर आनन्दमय स्वरूप है, तब तो अवतारकालमें उसको देखकर सभी लोगोंको मोहित होना चाहिये। उनके स्वरूपका दर्शन करनेवाले सभी लोगोंको उनकी पहचान भी होनी चाहिये, परंतु श्रीराम, श्रीकृष्णादि साक्षात् भगवत्स्वरूपोंके जीवनको पढ़नेसे ऐसा पता लगता है कि ऐसा नहीं हुआ। बहुत-से लोगोंने तो उन्हें पहचाना ही नहीं।
उ०—भगवान्के दिव्यातिदिव्य भगवद्देहके दर्शनके लिये दिव्य-दृष्टि चाहिये। प्राकृत जगत् तो उनके उस रूपके तेजको भी सहन नहीं कर सकता। इसीसे अवतारकालमें भगवान् अपने स्वरूपको योगमायासे समावृत रखते हैं—
नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत:।
(गीता ७।२५)
और इसीसे सब लोग उन्हें नहीं पहचान सकते। वे कृपा करके जिनको अपना परिचय प्रदान करना चाहते हैं, उन्हींके लिये योगमायाका आवरण हटाते हैं, इस आवरणके हटानेमें भी अधिकारी-भेदसे बड़ी भारी तारतम्यता रहती है। इसका हटाना पूर्णरूपसे तो वहीं होता है, जहाँ भगवान्की केवल अन्तरंगा ही नहीं, स्वरूपा शक्तियोंका आकर्षण रहता है। वहीं भगवदिच्छासे वह योगमाया अपने आवरणरूपको त्यागकर—भगवान्को आवरणमुक्त कर स्वरूपभूता आनन्द-शक्तिके रूपमें बदलकर भगवान्के रमणका आधार बन जाती है; क्योंकि वस्तुत: वह आह्लादिनी शक्तिसे अभिन्न ही है। इसीसे श्रीशुकदेव मुनिने कहा है—
भगवानपि ता रात्री: शरदोत्फुल्लमल्लिका:।
वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रित:॥
(श्रीमद्भा० १०।२९।१)
याद रखना चाहिये भगवान्की यह योगमाया वह माया नहीं है जो सृष्टिकर्ता ईश्वरके साथ रहती है, न वह अविद्या है जो समस्त जगत्को मोहित किये हुए है। वे तो निम्नस्तरकी शक्तियाँ हैं, यह योगमाया तो भगवान्की साक्षात् स्वरूपाशक्ति ही है। इसी शक्तिको साथ लेकर भगवान् अवतीर्ण होते हैं—‘सम्भवामि आत्ममायया!’
इस योगमायासे समावृत होनेके कारण ही लोगोंको भगवान्का देह मायिक या भौतिक-सा प्रतीत होता है और ऐसा होना ठीक ही है; क्योंकि उनकी मायामयी दृष्टि अमायिकका प्रत्यक्ष कर ही नहीं सकती। हमारी इन्द्रियाँ तो अतीन्द्रिय मायिक पदार्थको भी ग्रहण नहीं कर सकतीं, फिर मन-वचन-बुद्धिसे और इनकी मूल प्रकृतिसे परेके परमात्मस्वरूपको तो कैसे ग्रहण कर सकती हैं। अतएव भगवान्का स्वरूप न्यूनाधिकरूपमें उन्हींके सामने प्रकट होता है, जिनको न्यूनाधिकरूपमें दिव्यदृष्टि मिल जाती है। भगवान्की बात तो दूर रही, मोहदृष्टिसे तो हम भौतिक देहधारी महात्मा पुरुषको भी नहीं पहचान सकते। उसके लिये भी अन्तर्दृष्टि तो चाहिये ही; परंतु यह दिव्यदृष्टि कोई ज्ञानदृष्टि या अन्तर्दृष्टि नहीं है, यह भगवद्दत्त एक भगवदीय शक्ति है। ज्ञानदृष्टिसम्पन्न पुरुष उन्हें ब्रह्म देखते थे; शत्रु-भाववाले उन्हें साक्षात् कालरूपमें देखते थे; वसुदेव-देवकी, नन्द-यशोदा या दशरथ-कौसल्या उन्हें पुत्ररूपमें देखते थे। यह सब भगवान्की इच्छापर ही निर्भर था। इतना होनेपर भी भगवान्के स्वरूपको जो कोई भी देखता था, वह कुछ क्षणोंके लिये तो मुग्ध हो ही जाता था। हाँ, उनकी बात दूसरी है जिनको जान-बूझकर ही भगवान्ने अपना भयंकररूप ही दिखलाया। मोहनरूप दिखलाया ही नहीं। अन्तर्दृष्टिसम्पन्न ऋषि-मुनि, महात्मा और प्रेममना आत्मीय स्वजनोंकी तो बात ही निराली है, सेनासहित खर-दूषण जो शत्रुरूपमें भगवान्से युद्ध करनेको आये थे—उनके दिव्य स्वरूपको देखकर क्षणभरके लिये मुग्ध हो गये और अपने मन्त्रीसे कहने लगे—
नाग असुर सुर नर मुनि जेते।
देखे जिते हते हम केते॥
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई ।
देखी नहिं असि सुंदरताई॥
जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा।
बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥
यह उन राक्षसोंकी दशा है जो बहिनके नाक-कान कट जानेपर मारनेके लिये आते हैं और जिनके सामनेसे योगमायाका पर्दा नहीं हटा है।
प्र०—भगवान् श्रीरामचन्द्र और भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र इन दोनोंमें किनका रूप अधिक सुन्दर था?
उ०—दोनों एक-दूसरेसे बढ़कर सुन्दर हैं। इनके सौन्दर्यमें न्यूनाधिकताकी कल्पना करना ही अपराध है। हाँ, वर्णमें कुछ भेद अवश्य है। भगवान् श्रीरामचन्द्रके श्रीअंगका वर्ण नील-हरिताभ है और भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका नील-कृष्णाभ। दोनोंमें ही सीमाके परेका सौन्दर्य है। एक सज्जनका कथन है—
कोमल, सरस, सु-ज्योतिमय,
अलख अचिन्त्य अनूप।
नीलकमल, घन, मनि सदृश,
चिदानन्दमय रूप॥
उनका श्रीअंग नील कमलके समान कोमल है, नील श्याम मेघके समान सरस है और नीलमणिके समान सुचिक्कण तथा ज्योतिर्मय है, वह है इन नेत्रोंसे अलक्ष्य, इस चित्तसे अचिन्त्य, किसी भी लोककी किसी भी वस्तुसे उपमाके अतीत और चिन्मय तथा आनन्दमय।
उसमें प्रधानतया पाँच विशेषताएँ हैं—
(१) वह पांचभौतिक नहीं है, बनने-बिगड़नेवाला नहीं है, भगवत्स्वरूप, नित्य है।
(२) जिसको देखते-देखते कभी अरुचि तो होती ही नहीं, कभी तृप्ति भी नहीं होती। जितना देखा जाय, उतना ही देखनेकी लालसा बढ़ती है, चाहे युगोंतक देखा जाय।
(३) जिसको देखकर मनमें किसी प्रकारका विकार तो उत्पन्न होता ही नहीं, वरं जिसे देखते ही चित्त सर्वथा पवित्र हो जाता है, वह दिव्य प्रकाशसे भर जाता है; जिसकी स्मृति होते ही, धारणा या भावना होते ही चित्तमें विकारशून्यता आ जाती है।
(४) जिसकी तुलनामें त्रिलोक और त्रिकालमें भी अन्य कोई वस्तु कभी नहीं आ सकती।
(५) जिसकी स्मृति सब कुछको भुला देनेवाली होती है, जिसके सामने आते ही भोग-मोक्ष—सबसे सहज विराग हो जाता है; जिसके देखते ही बरबस प्रेमानन्दका प्राकट्य हो जाता है; जिसके सामने आते ही समस्त वस्तुओंकी सत्ता उसकी सत्तामें समा जाती है।
जब अन्य वस्तु ही नहीं हो, तब किसी भी वस्तुमें आकर्षण तो रहता ही कहाँसे।
जिनका मन किसी भी सांसारिक सौन्दर्यकी ओर आकर्षित होता है, उनको भगवान्के सौन्दर्यकी कल्पना ही नहीं है। ऐसा मानना चाहिये।
जो कुछ भी हो, हमें तो बस आकुल हृदयसे, उत्कण्ठित नेत्रोंसे लीलाशुकके शब्दोंमें उनकी रूपमाधुरीके दर्शनार्थ यह प्रार्थना ही करते रहना चाहिये—
कारुण्यकर्बुरकटाक्षनिरीक्षणेन
तारुण्यसंवलितशैशववैभवेन।
आपुष्णता भुवनमद्भुतविभ्रमेण
श्रीकृष्णचन्द्र शिशिरीकुरु लोचनं मे॥
हे देव! हे दयित! हे भुवनैकबन्धो!
हे कृष्ण! हे चपल! हे करुणैकसिन्धो।
हे नाथ! हे रमण! हे नयनाभिराम!
हा हा कदा नु भवितासि पदं दृशोर्मे॥
अमून्यधन्यानि दिनान्तराणि
हरे त्वदालोकनमन्तरेण।
अनाथबन्धो! करुणैकसिन्धो!
हा हन्त हा हन्त कथं नयामि॥