भगवान् सगुण हैं या निर्गुण?
एक सज्जनने पूछा है कि ‘भगवान् या ब्रह्मका स्वरूप सगुण है या निर्गुण अथवा दोनों ही?’ इसके उत्तरमें निवेदन है कि भगवान् या ब्रह्मका वस्तुत: क्या स्वरूप है, इसको तो भगवान् या ब्रह्म ही जानते हैं। कोई भी मनुष्य यह नहीं कह सकता कि भगवान् ऐसे ही हैं, तथापि भगवान्को जो जैसा मानते हैं, जिन्होंने जिस प्रणालीसे या जिस स्वरूपकी सेवा करके उनकी उपलब्धि की है, वे उनको जैसा बतलाते हैं; वह भी ठीक ही है; क्योंकि वह स्वरूप भी भगवान्में और भगवान्का ही है। वे निर्गुण भी हैं, सगुण भी हैं, निराकार भी हैं, साकार भी हैं, निर्गुण-सगुण और निराकार-साकार दोनों साथ हैं, निर्गुण-सगुण और निराकार-साकार दोनोंसे परे भी हैं, वे अनिर्वचनीय हैं—अचिन्त्य हैं। इसीसे उपनिषदोंमें तथा शास्त्रोंमें उनके सभी तरहके वर्णन मिलते हैं। उपनिषदोंके कुछ अवतरण देखिये—
निर्गुण—
स हो वाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्व-मदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमोऽवाय्वनाकाशमसंगमरसमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कमप्राणममुखममात्रमनन्तरमबाह्यम्।
(बृह० ३। ८। ८)
‘याज्ञवल्क्यजीने कहा—हे गार्गि! इस अक्षरको ब्रह्मवादीजन स्थूलसे भिन्न, अणुसे भिन्न, ह्रस्वसे भिन्न, दीर्घसे भिन्न, लाल रंग (किसी रंगविशेष)-से भिन्न, चिकनेपनसे भिन्न, छायासे भिन्न, अन्धकारसे भिन्न, वायुसे भिन्न, आकाशसे भिन्न, असंग, रससे भिन्न, गन्धसे भिन्न, नेत्रसे भिन्न, श्रोत्रसे भिन्न, वाणीसे भिन्न, मनसे भिन्न, तेजसे भिन्न, प्राणसे भिन्न, मुखसे भिन्न, मात्रासे भिन्न, अन्तरसे भिन्न और बाहरसे भिन्न कहते हैं।’
अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपंचोपशमं शान्तं शिवमद्वैतम्।
(माण्डूक्य० ७)
‘वह अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अनिर्वचनीय, एकात्मप्रत्ययसार, प्रपंचसे रहित, शान्त, शिव और अद्वैत है।’
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
(कठ० १।३।१५)
‘जो शब्दरहित है, स्पर्शरहित है, रूपरहित है, अव्यय है, रसरहित है, नित्य है और गन्धरहित है।’
स एष नेति नेत्यात्मागृह्य:
(बृह० ४। २। ४)
‘वह यह आत्मा ‘यह भी नहीं, यह भी नहीं’ इस प्रकार अग्राह्य है।’
सगुण—
एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनि: सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्।
(माण्डूक्य० ६)
‘वह सबका ईश्वर है, वह सर्वज्ञ है, वह अन्तर्यामी है, वह सबका कारण है, उसीसे सब भूतोंकी उत्पत्ति होती है।’
सर्वकर्मा सर्वकाम: सर्वगन्ध: सर्वरस: सर्वमिदमभ्यात्त:।
(छान्दोग्य० ३।१४।४)
‘वह सब कर्म करनेवाला है, सब कामनावाला है, सब गन्धवाला है, सब रसवाला है, इससे सबमें व्याप्त है।’
एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुष:।
(प्रश्न० ४।९)
‘वही देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला, चखनेवाला, मनन करनेवाला, जाननेवाला, करनेवाला, विज्ञानात्मा पुरुष है।’
निर्गुण-सगुण—
एको देव: सर्वभूतेषु गूढ:
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्ष: सर्वभूताधिवास:
साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥
(श्वेताश्वतर० ६।११)
‘एक देव सब भूतोंमें छिपा है, सबमें व्यापक है, सब भूतोंका अन्तरात्मा है, कर्मोंका अध्यक्ष—फलदाता है, सब भूतोंका वासस्थान है, साक्षी है, चेतन है, केवल है और निर्गुण है।’
निराकार—
यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षु:श्रोत्रं तदपाणिपादम्।
(मुण्डक० १।१।६)
‘वह जो अदृश्य है, अग्राह्य है, अगोत्र है, अवर्ण है, चक्षु और श्रोत्ररहित है और हाथ तथा पैरसे रहित है।’
साकार—
सत्पुण्डरीकनयनं मेघाभं वैद्युताम्बरम्।
द्विभुजं ज्ञानमुद्राढ्यं वनमालिनमीश्वरम्॥
गोपगोपीगवावीतं सुरद्रुमतलाश्रितम्।
दिव्यालंकरणोपेतं रन्तपंकजमध्यगम्॥
कालिन्दीजलकल्लोलसंगिमारुतसेवितम् ।
चिन्तयन् चेतसा कृष्णं मुक्तो भवति संसृते:॥
एको वशी सर्वग: कृष्ण ईड्य
एकोऽपि सन् बहुधा यो विभाति।
तं पीठं येऽनुभजन्ति धीरा-
स्तेषां सिद्धि: शाश्वती नेतरेषाम्॥
(गोपालपूर्वतापिनी-उपनिषद्)
‘श्रेष्ठ कमलनेत्र, मेघद्युति, विद्युत्-सदृश पीत अम्बरधारी, द्विभुज, ज्ञानमुद्रायुक्त, वनमाली, ईश्वर, गोप-गोपी और गौओंके रक्षक, कल्पवृक्षके नीचे स्थित, दिव्य अलंकारोंसे विभूषित, रत्नकमलके बीचमें विराजित, कालिन्दीके जलकी लहरोंसहित पवनसे सुसेवित श्रीकृष्णका जो चिन्तन करता है, वह संसारसे मुक्त हो जाता है।’
‘वह एक, वश करनेवाला, सर्वव्यापी पूज्य श्रीकृष्ण, जो एक होकर भी बहुत प्रकारसे दिखायी देता है, उस आश्रयको जो भजते हैं, उन्हींको सनातन सिद्धि प्राप्त होती है, दूसरोंको नहीं होती।’
और भी अनेकों श्रुतियाँ भगवान्का विविध प्रकारसे वर्णन करती हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान् सगुण भी हैं और निर्गुण भी हैं। उनके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। दो प्रकारके परस्परविरोधी गुण, भाव और स्वरूप जिनमें एक ही साथ एक ही समय रह सकते हों, वही तो भगवान् हैं। श्रुति उन्हें निर्गुण भी बतलाती है और सगुण भी। अतएव हमें दोनों ही बातें माननी चाहिये। भगवान्के सम्बन्धमें यह आपत्ति कभी नहीं ठहरती कि वे सगुण-निर्गुण दोनों एक साथ कैसे हो सकते हैं।
कुछ लोग एक और आपत्ति करते हैं—वे कहते हैं कि ब्रह्म तो निष्कल (कला या अंशरहित) हैं। और हम यदि सगुण तथा निर्गुण दोनों मानते हैं तो उनका कुछ अंश सगुण होगा और कुछ निर्गुण। और यदि ऐसी बात है तब तो वह निष्कल—निरंश नहीं ठहरते हैं और यदि निरंश नहीं हैं तब वे ब्रह्म कैसे? श्रुतिमें स्पष्ट ही ब्रह्मको निरंश बतलाया गया है—
निष्कलं निष्क्रियॸशान्तं निरवद्यं निरंजनम्।
(श्वेताश्वतर० ६।१९)
‘ब्रह्म कला (अंश) रहित, क्रियारहित, शान्त, निर्दोष और मायारहित है।’ इसका उत्तर यह है कि ब्रह्मका कुछ अंश निर्गुण है और कुछ सगुण है, ऐसी बात नहीं है। ब्रह्ममें अंशकी कल्पना नहीं हो सकती। वह स्वरूपत: ही युगपत् निर्गुण भी है और सगुण भी। परस्परविरोधी गुणोंका उनमें नित्य निवास है; परंतु यदि ऐसा मानें कि ‘निर्गुण ब्रह्मके जितने अंशमें मायाके कारण सगुणता आती है उतना अंश सगुण है, शेष निर्गुण है’, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा माननेपर तो ब्रह्म स्वरूपत: निर्गुण ही सिद्ध होता है। सगुण तो मायाके कारण भासता है, वस्तुत: है नहीं। केवल निर्गुणवादी महानुभावोंका यही तो कथन है कि ‘मायाकी उपाधिसे ब्रह्ममें सगुणताकी प्रतीति होती है। स्वरूपत: ब्रह्म निर्गुण ही है और वही उसका यथार्थ स्वरूप है। ऐसा निर्गुण ब्रह्म कभी सगुण हो नहीं सकता।’ पर श्रुतियोंके उपर्युक्त वचनोंसे तथा महात्माओंके अनुभवसे यह सिद्ध है कि ब्रह्म या भगवान् सगुण-निर्गुण दोनों हैं। ऐसी अवस्थामें ब्रह्मके स्वरूपत: निरंश होनेपर भी उनमें अंशकी कल्पना करनी पड़ती है। अंश-कल्पनामें आपत्ति यही है कि उसमें न्यूनाधिक होना सम्भव है। परंतु ब्रह्ममें अंश-कल्पना इस प्रकार नहीं होती। जैसे ब्रह्म अनन्त और असीम है, वैसे ही उसका अंश भी अनन्त और असीम है। श्रुतिने इसी सिद्धान्तका समर्थन करते हुए स्पष्ट कहा है—
पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
(ईश०)
‘वह पूर्ण है, यह पूर्ण है, पूर्णसे पूर्ण निकलता है और पूर्णका पूर्ण लेकर पूर्ण ही बच रहता है।’ गणितके अनुसार भी यह सिद्ध है कि अनन्तमेंसे अनन्त निकालनेपर अनन्त ही बचता है।
हमारे इस दृश्य-जगत्में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसके बारेमें यह कहा जा सके कि उसमें एक ही साथ दो परस्परविरोधी गुण रहते हैं और जो अनेक रूपोंमें विभक्त होनेपर भी एक और परिपूर्ण रहती है।
जो लोग कहते हैं कि मायाकी उपाधिसे ब्रह्ममें सगुणभावकी प्रतीति होती है—उनके इस कथनपर विचार करनेसे भी पता लगता है कि वस्तुत: इसमें भी सगुण स्वरूप ब्रह्मका ही सिद्ध होता है। माया ब्रह्मकी शक्ति है। शक्ति और शक्तिमान् अग्नि और उसकी दाहिका शक्तिके समान अभिन्न हैं। इसलिये, ब्रह्म सगुण है या ब्रह्म अपनी शक्तिकी सहायतासे सगुणरूपमें रहता है। इसमें वस्तुत: कोई अन्तर नहीं है; क्योंकि किसी भी कर्मकी सम्पन्नता शक्तिसे ही होती है। पर वह कार्य है तो शक्तिमान्का ही। अतएव ब्रह्म मायाके सहयोगसे सगुण होता है, इससे यही सिद्ध होता है कि सगुण भी उसका स्वरूप ही है।
शास्त्रोंमें एक ही साथ भगवान्के सगुण-निर्गुणकी व्याख्या और तरहसे भी की गयी है, जो वस्तुत: बहुत समीचीन और युक्तियुक्त प्रतीत होती है। भगवान् प्रकृतिके गुणोंसे सर्वथा अतीत हैं। इसलिये वे निर्गुण हैं और उनमें उनके स्वरूपभूत अचिन्त्यानन्त दिव्यगुण नित्य निवास करते हैं, इसलिये वे सगुण भी हैं। यों वे ‘नित्य निर्गुण’ रहते हुए ही ‘नित्य सगुण’ हैं और ‘नित्य सगुण’ होते हुए ही ‘नित्य निर्गुण’ हैं। भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं भगवान् श्रीशंकरजीसे कहा है—
यद्यद्य मे त्वया दृष्टमिदं रूपमलौकिकम्।
घनीभूतामलप्रेम सच्चिदानन्दविग्रहम्॥
नीरूपं निर्गुणं व्यापि क्रियाहीनं परात्परम्।
वदन्त्युपनिषत्सङ्घा इदमेव ममानघ॥
प्रकृत्युत्थगुणाभावादनन्तत्वात्तथेश्वरम् ।
असिद्धत्वान्मद्गुणानां निर्गुणं मां वदन्ति हि॥
अदृश्यत्वान्ममैतस्य रूपस्य चर्मचक्षुषा।
अरूपं मां वदन्त्येते वेदा: सर्वे महेश्वर॥
व्यापकत्वाच्चिदंशेन ब्रह्मेति च विदुर्बुधा:।
अकर्तृत्वात्प्रपंचस्य निष्क्रियं मां वदन्ति हि॥
मायागुणैर्यतो मेंऽशा: कुर्वन्ति सर्जनादिकम्।
न करोमि स्वयं किंचित् सृष्ट्यादिकमहं शिव॥
(पद्मपु०,पा० ५१। ६६—७१)
‘हे शंकरजी! मेरे जिस अलौकिक (हानोपादानरहित, देह-देहि-भेदहीन स्वरूपभूत दिव्य भगवद्देह) रूपको आज आपने देखा है, वह विशुद्ध प्रेमकी घनमूर्ति है और सच्चिदानन्दस्वरूप है। उपनिषत्समुदाय मेरे इसी रूपको ‘निराकार’, ‘निर्गुण’, ‘सर्वव्यापी’, ‘निष्क्रिय’ और ‘परात्पर ब्रह्म’ कहते हैं। मुझमें प्रकृतिजन्य गुणोंका (सत्त्व-रज-तमका) अभाव होनेसे और मेरे अंदर गुणोंकी सत्ताको असिद्ध मानकर वे मुझको ‘निर्गुण’ कहते हैं और ‘अनन्त’ होनेसे मुझको ‘ईश्वर’ कहते हैं। मेरा यह रूप चर्मचक्षुओंसे देखा नहीं जाता, इसलिये हे महेश्वर! ये समस्त वेद मुझको रूपरहित—‘निराकार’ कहते हैं। अपने चैतन्यांशसे सर्वव्यापक होनेके कारण पण्डितगण मुझे ‘ब्रह्म’ कहते हैं और इस विश्वप्रपंचका कर्ता न होनेसे वे मुझको ‘निष्क्रिय’ कहते हैं; क्योंकि हे शिवजी! मैं स्वयं सृष्टि आदि कुछ भी कार्य नहीं करता। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररूप मेरे अंश ही मायाके गुणोंके द्वारा सृष्टि आदि कार्य करते हैं।’
इससे स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि भगवान्का स्वरूप ‘नित्य निर्गुण’ और ‘नित्य सगुण’ किस प्रकार है। इसी बातको बतलानेके लिये तत्त्व-निर्णय करते हुए भागवतकारने बतलाया कि ‘तत्त्व’का ही एक नाम ‘ब्रह्म’ है। तत्त्वविद् लोग इस तत्त्वको ‘अद्वयज्ञान’ कहते हैं और तीन श्रेणीके साधक इस ‘अद्वयज्ञान’को ही ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—इन तीन भावोंके द्वारा उपलब्ध करते हैं—
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥
तत्त्व एक ही है, उसकी अनुभूति तीन प्रकारसे होती है। वैष्णव महानुभाव इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि औपनिषद सम्प्रदाय उसे ‘ब्रह्म’ कहते हैं, हिरण्यगर्भ-सम्प्रदायके योगीगण ‘परमात्मा’ और वैष्णव उसे ‘भगवान्’ कहते हैं। जगत्तत्त्व ब्रह्मज्ञान है, आत्मतत्त्व परमात्मज्ञान या योग है एवं ईश्वरतत्त्व भगवत्-स्वरूप या भक्ति है। लीलाभेदसे ही भगवान् या ब्रह्मके ये तीन स्वरूप हैं, भगवान् सर्वथा-सर्वदा एक ही तत्त्व हैं और वे सगुण, निर्गुण, साकार-निराकार सब कुछ हैं तथा सब कुछसे परे हैं। यह भी केवल समझनेके लिये संकेतभर है। वस्तुत: भगवान्का स्वरूप भगवान् ही जानते हैं और किसी भी तर्कसे या पुरुषार्थसे नहीं, उनके कृपापूर्वक जनानेपर ही किसी भाग्यवान् साधकके द्वारा उनका स्वरूप किसी अंशमें जाना जा सकता है।
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य-
स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूॸस्वाम्॥
(कठ० १।२।२३)
‘यह आत्मा न प्रवचनसे प्राप्त होता है, न बुद्धिसे और न बहुत सुननेसे ही। यह स्वयं जिसपर कृपा करता है उसीके सामने अपने आनन्दात्मक स्वरूपका प्रकाश करता है।’
‘सोइ जानइ जेहि देहु जनाई’