भगवान‍् शिव

सच्चिदानन्दघन, सर्वान्तर्यामी, सर्वाधार, सर्वगुणसम्पन्न, गुणातीत, अनादि, अनन्त भगवान‍् शिवके सम्बन्धमें क्या लिखा जाय। कोई शिवतत्त्वके ज्ञाता और शिवके परम भक्त ही शिवतत्त्व और शिव-स्वरूपपर भगवान‍् शिवकी कृपासे कुछ लिख सकते हैं। तथापि अपनी लेखनी तथा वाणीको पवित्र करनेके लिये दो-चार शब्द यहाँ लिखे जा रहे हैं। गुरुजन क्षमा करेंगे।

१—भगवान‍् शिव कल्याणस्वरूप, विज्ञानानन्दघन परमात्मा हैं, वे स्वयं ही अपने ज्ञाता हैं, अनिर्वचनीय हैं, अकल हैं, मन और बुद्धिके अतीत हैं।

२—वही अपनी शक्तिद्वारा जगत‍्का सूत्रपात करते हैं, वही ब्रह्मारूपसे रचते, विष्णुरूपसे पालन करते और रुद्ररूपसे संहार करते हैं और अनन्त रुद्रोंके रूपमें जगत‍्में फैले हुए हैं। वे सब रूपोंमें भासते हैं, सब रूपोंमें प्रकट हैं। उन्हींसे सबकी उत्पत्ति है, उन्हींमें निवास है और उन्हींमें सब लय होते हैं। यह उत्पत्ति, पालन और विनाश भी उनकी लीलामात्र है। वही सब कुछ हैं और साथ ही सब कुछसे विलक्षण भी हैं।

३—शिव सर्वव्यापी, सर्वेश्वर, सर्वोपरि, सर्वरूप, सर्वज्ञ, सर्वतश्चक्षु, सर्वान्तर्यामी, सर्वमय, सर्वसमर्थ, सर्वाश्रय, शक्तिपति, नित्य, शुद्ध-बुद्ध-ज्ञानस्वरूप, ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ हैं। वे निर्गुण-सगुण, निराकार, साकार हैं, उभयातीत हैं।

४—वे माता-पिता, सुहृद्, स्वामी, सखा, न्यायकारी, पतित-पावन, दीनबन्धु, परमदयामय, भक्तवत्सल, अशरण-शरण, अति उदार, सर्वस्वदानी, आशुतोष, सम, उदासीन, पक्षपातहीन, भक्त-जनाश्रय, भक्तपक्षपाती, शुभप्रेरक, अशुभनिवारक, योगक्षेमवाहक, प्रेममय, भूतवत्सल, श्मशानविहारी, कैलासनिवासी, हिमालयवासी, योगीश्वर और महामायावी हैं।

५—वे बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं। ‘नम: शिवाय’ उनका प्रधान मन्त्र है। आबाल-वृद्ध-वनिता, ब्राह्मण, शूद्र, सभी इसका श्रद्धापूर्वक जप करके अपना मनोरथ सिद्ध कर सकते हैं।

६—शिवलिंग-पूजा अश्लील नहीं है, यह परम रहस्यमय तत्त्व है। शिवकृपासे रहस्यका ज्ञान हो सकता है। भक्ति-श्रद्धापूर्वक पूजा करनी चाहिये।

७—शिवनिन्दा करना और सुनना महापाप है, अतएव उससे सर्वथा बचना चाहिये।

८—शिवको परात्पर ब्रह्म मानते हुए भी शिव, विष्णु, ब्रह्मामें भेद मानना अमंगलका सूचक है। तीनों ही एकरूप हैं, तीनोंकी उपासना एककी ही उपासना है।

९—शिवतत्त्व जाननेके लिये पक्षपात छोड़कर शिवपुराण आदिका अध्ययन, मनन करना चाहिये।

१०—‘शिव’ नामका जप प्रेमसहित निष्कामभावसे सदा करना चाहिये।