भगवान् श्रीकृष्ण और भगवान् शिव
प्रलयकालमें सारी सृष्टि परमात्माके अंदर लीन हो जाती है और कोटि सूर्यतुल्य प्रभाशाली, समस्त विश्वब्रह्माण्डका आदि कारण, एक अविनश्वर ज्योति:पुंज ही अवशेष रहता है। स्वेच्छामय परमात्माके उस ज्योति:स्वरूपके मध्यमें त्रिलोकी अन्तर्हित रहती है। उस त्रिलोकीके ऊपर ईश्वरके ही समान अविनश्वर ‘गोलोकधाम’ अवस्थित है। उस गोलोकके अभ्यन्तरमें एक परम आनन्दजनक एवं परम आनन्दस्वरूप ज्योति विकसित रहती है। योगिजन योगमार्गमें आरूढ़ होकर ज्ञानचक्षुके द्वारा उसी ज्योतिका ध्यान करते हैं। उस निराकार, परात्पर ज्योतिके अन्तरालमें अत्यन्त रमणीय, नवजलधर-श्याम-कलेवर, कमललोचन, शरदिन्दुसुन्दर मुखारविन्दयुक्त, कोटिकन्दर्पलावण्य, मुरलीमनोहर, पीतवसनधारी, मन्दस्मितवदन, भक्तवत्सल, रत्नाभरणभूषित, केसर-कस्तूरी एवं चन्दनादिका लेप किये हुए श्रीवत्सांकित-वक्ष:स्थल, कौस्तुभमणिरंजित, किरीटमुकुटशोभित, वनमालाविभूषित, साक्षात् परब्रह्मस्वरूप भगवान् श्यामसुन्दर नित्य विराजमान रहते हैं। वे सर्वाधार, निरीह, निर्विकार, मंगलमय, सिद्धिप्रद, सिद्धीश्वर, सत्य, अक्षय, अव्यय एवं निर्गुण हैं। उन्होंने अखिल विश्व एवं गोलोकको प्राणिशून्य निर्जन, निर्वात, वृक्ष, शैल, सरित् , समुद्रादिविहीन, सस्य-तृण-विवर्जित, शून्यमय देखकर मानसिक संकल्पके द्वारा स्वेच्छापूर्वक सृष्टिरचना प्रारम्भ की। उसी समय उनके दक्षिण पार्श्वमें श्यामकलेवर, तरुणवयस्क, पीतवसन, वनमालाधारी, चतुर्भुज, शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये साक्षात् नारायण आविर्भूत हुए। उनका मुखारविन्द मन्दस्मितयुक्त था, वे अनेक प्रकारके आभूषणों तथा कौस्तुभमणिसे विभूषित थे, शार्ङ्गधनुष कंधेपर लटकाये हुए थे, उनका मुख चन्द्रमाके समान देदीप्यमान था और वक्ष:स्थल श्रीवत्सके चिह्नसे अलंकृत था, उनका रूप-लावण्य कामदेवके तुल्य था। वे प्रकट होते ही भगवान् श्यामसुन्दरकी स्तुति करने लगे और स्तुति समाप्त होनेपर उन्हींके इशारेसे उनकी बगलमें एक रत्नजटित सिंहासनपर विराजमान हो गये।
इसके अनन्तर भगवान्के वामपार्श्वसे शुद्ध स्फटिकके समान शुभ्रवर्ण, पंचवदन, दिगम्बर महेश्वर आविर्भूत हुए। उनकी कान्ति तप्त कांचनके समान उज्ज्वल थी और मस्तकमें कपिशवर्ण जटाकलाप फहरा रहा था, उनके सुप्रसन्न वदनारविन्द मन्दहास्ययुक्त थे, प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे और ललाटमें बालचन्द्र सुशोभित था। वे योगियोंके भी परम गुरु, त्रिशूल-पट्टिश आदि अस्त्र-शस्त्र एवं जपमाला धारण किये हुए थे। उनका मनोहररूप चन्द्रमाका भी तिरस्कार करता था। उन्होंने पुलकित गात्र, साश्रु नयन एवं गद्गद स्वरसे भगवान्की स्तुति की और उनके बताये आसनपर बैठ गये। उनके बैठ जानेपर भगवान्के नाभिकमलसे एक महातपस्वी कमण्डलु हाथमें लिये वृद्ध पुरुष प्रादुर्भूत हुए। उनके चारों दिशाओंमें चार मुख थे, वे शुक्ल वसन पहने हुए थे, उनकी मनोहर दन्तावली तथा केशकलाप भी शुभ्रवर्ण थे। इनका नाम ब्रह्मा था। ये भी भगवान्की स्तुति कर अपने स्थानपर बैठ गये।
इसी प्रकार परमात्मा श्रीकृष्णके वक्ष:स्थलसे धर्म और धर्मके वामपार्श्वसे एक अत्यन्त रूपवती कन्या प्रादुर्भूत हुई। मुखारविन्दसे वीणा-पुस्तकधारिणी, शुक्लवर्णा, अत्यन्त सौन्दर्यशालिनी, सकल विद्याओं तथा कलाओंकी जननी, शुद्ध सत्त्वस्वरूपा, वागधिष्ठात्री, कवियोंकी एवं विद्वानोंकी आराध्य देवी भगवती सरस्वती प्रकट हुईं। भगवान्के मन:प्रदेशसे रत्नालंकारभूषिता, गौरवर्णा, स्मेरमुखी, नवयौवना, पीतवसना, सकल ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी प्रकट हुईं और बुद्धिसे सकल जगत्की अधिष्ठात्री, परमेश्वरी, मूल प्रकृति प्रादुर्भूत हुईं। उनका वर्ण तप्त कांचनके सदृश एवं कान्ति कोटि सूर्यके समान थी। उनके सौ भुजाएँ थीं, वे रक्तवर्णके वस्त्र पहने हुई थीं। वे क्षुधा, तृषा, निद्रा, तृष्णा, दया, श्रद्धा, एवं क्षमा आदि सारे गुणोंकी अधिष्ठात्री थीं और दुर्गा नामसे प्रसिद्ध हुईं।
यही परमात्माकी शक्ति एवं जगज्जननी हैं। हाथमें त्रिशूल, शक्ति, शार्ङ्गधनुष, खड्ग, शंख, चक्र, गदा, पद्म, अक्षमाला, कमण्डलु, वज्र, अंकुश, पाश, भुशुण्ड, दण्ड, तोमर, नारायणास्त्र, ब्रह्मास्त्र, रौद्रास्त्र, पाशुपतास्त्र, पार्जन्यास्त्र, गान्धर्वास्त्र एवं वारुणास्त्र धारण किये रहती हैं। भगवान्की रसनाके अग्रभागसे विशुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वलकान्ति, श्वेतवसना, सर्वालंकारभूषिता, जपमालाधारिणी सावित्री देवी प्रकट हुईं।
इसके अनन्तर भगवान्के मनसे मन्मथकी उत्पत्ति हुई और मन्मथके वामपार्श्वसे अनुपम रूप-लावण्यमयी रति प्रकट हुई, इसी प्रकार अग्नि, जल, वायु आदि देवता तथा उनकी स्त्रियाँ प्रकट हुईं। फिर अखिल विश्वके आधार, विराट् पुरुष उत्पन्न हुए, जिनके एक-एक रोमकूपमें एक-एक ब्रह्माण्ड अवस्थित है। उन्हींकी ‘महाविष्णु’ संज्ञा है, वे महार्णवमें पद्मपत्रकी भाँति शयन करते रहते हैं। उनके कानके मैलसे मधु-कैटभ नामक दो दैत्य उत्पन्न हुए। वे ब्रह्माजीको मारने दौड़े। भगवान् नारायणने उनका वध करके ब्रह्माजीकी रक्षा की, उन दैत्योंके मेदसे पृथिवी उत्पन्न हुई। इसीलिये उसे ‘मेदिनी’ कहते हैं। फिर भगवान्के वामपार्श्वसे श्रीराधा उत्पन्न हुईं, जो भगवान्की प्राणाधिष्ठात्री तथा उन्हें प्राणोंसे अधिक प्यारी हैं। श्रीराधाके रोम-विवरोंसे कई करोड़ स्थिरयौवना गोपांगनाएँ उत्पन्न हुईं और भगवान्के रोमकूपोंसे तीस करोड़ गोप एवं नाना वर्णकी गौएँ, बैल तथा बछड़े उत्पन्न हुए, जिनमें कई कामधेनु थीं; उनमेंसे एक मनोहर बैल, जो बलमें करोड़ सिंहोंके समान था, भगवान्ने श्रीशंकरको वाहनरूपमें प्रदान किया, इसी प्रकार भगवान्के चरणोंके नखरन्ध्रोंसे मनोहर हंसोंकी पंक्तियाँ उत्पन्न हुईं। उनमेंसे एक महान् बलशाली राजहंस भगवान्ने ब्रह्माजीको दिया, जिसपर वे सवारी करने लगे। भगवान्के बायें कर्ण-विवरसे श्वेत तुरंगोंकी एक कतार उत्पन्न हुई, जिसमेंसे एक सुन्दर घोड़ा भगवान्ने धर्मको दिया। दक्षिण कर्ण-कुहरसे अत्यन्त बलशाली मृगेन्द्रोंकी अवलि उत्पन्न हुई। उसमेंसे एक सिंह भगवान्ने श्रीदुर्गाको दिया। भगवान्के गुह्य प्रदेशसे गुह्यक यक्ष तथा उनके नेता कुबेर तथा भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस एवं वेताल आदि उत्पन्न हुए और कुबेरके वामपार्श्वसे कुबेरकी पत्नी कुबेरी उत्पन्न हुई। इसी प्रकार भगवान्के मुखकमलसे चतुर्भुज, शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी, वनमाला, पीतवसन, श्यामवर्ण, किरीट-कुण्डलविराजित, रत्नाभरणभूषित पार्षद उत्पन्न हुए। भगवान्ने नारायणको पार्षद, कुबेरको गुह्यक एवं शंकरको भूत-प्रेतादि प्रदान किये। भगवान्के दक्षिण नेत्रसे भयंकर त्रिशूल, पट्टिश, गदा आदि धारण किये, त्रिनेत्र, विशालकाय, दिगम्बर, चन्द्रशेखर, अग्निशिखाके समान तेजस्वी, शिवतुल्य रुरु, संहार, काल, असित, क्रोध, भीषण, महाभैरव एवं खट्वांग नामके अष्टभैरव उत्पन्न हुए। उनके वामनेत्रसे दिक्पालोंके अधीश्वर ईशानदेव उत्पन्न हुए। नासिकारन्ध्रसे सहस्रों डाकिनी, योगिनी एवं क्षेत्रपाल उत्पन्न हुए और पृष्ठदेशसे तीन करोड़ दिव्यमूर्तिधारी देवता उत्पन्न हुए।
इसके अनन्तर भगवान्ने महालक्ष्मी और सरस्वती नारायणको प्रदान कीं, सावित्री ब्रह्माजीको, मूर्ति कर्मको, रति कामको, मनोरमा कुबेरको और इसी प्रकार अन्य कन्याएँ अपने-अपने योग्य वरोंको प्रदान कीं। फिर शंकरजीको बुलाकर कहा कि आप श्रीदुर्गाजीको ग्रहण कीजिये। इसपर शंकरजी बोले, ‘इस समय मैं इन्हें अंगीकार करना नहीं चाहता, क्योंकि इनके परिग्रहसे आपकी भक्तिमें बाधा पहुँचेगी। आप अपने भक्तोंको इच्छित वर देनेवाले हैं और मुझे तो आपकी भक्तिके अतिरिक्त और कोई वस्तु सुहाती ही नहीं। इसलिये आप कृपा करके मुझे अपनी नवधा भक्ति प्रदान कीजिये। आपके नाम, जप और पाद-सेवनसे मेरी तृप्ति ही नहीं होती। मैं तो सोते और जागते सदा आपके नामकी ही रटन लगाये रहता हूँ। भोगकी ओर मेरी वृत्ति ही नहीं जाती। मैं तो समझता हूँ कि अणिमादि अष्टादश सिद्धियाँ; सालोक्य, सार्ष्टि, सायुज्य, सामीप्य, साम्य एवं सारूप्य—ये छ: प्रकारकी मुक्तियाँ; योग, तप, दान, व्रत, यश, कीर्ति, ब्रह्मवर्चस्, सत्य, धर्म, उपवास, तीर्थयात्रा, पुण्यशालावगाहन, अन्य देवताओंका पूजन, देवालयोंका दर्शन, सप्तद्वीपा मेदिनीकी प्रदक्षिणा, समुद्रस्नान, स्वर्गसुख, यहाँतक कि ब्रह्मा, रुद्र एवं विष्णुका परम पद अथवा इससे भी परे जो कोई अनिर्वचनीय सुख हो, वे सब आपकी भक्तिकी सोलहवीं कलाके तुल्य भी नहीं हैं।’ शंकरके इन भक्तिभावसे भरे हुए वचनोंको सुनकर भगवान् परम प्रसन्न हुए और कहने लगे—‘हे सर्वेश! आप सौ करोड़ कल्पपर्यन्त मेरी अहर्निश सेवा कीजिये। आप तपस्वियों, सिद्धों, योगियों, ज्ञानियों, देवताओं तथा वैष्णवोंमें श्रेष्ठ हैं, आपको मैं अमर, मृत्युंजय एवं सर्वज्ञ बनाता हूँ। आप असंख्य ब्रह्माओंका पतन देखेंगे। आजसे आप अपनेको ज्ञान, तेज, वय, पराक्रम, यश एवं प्रतापमें मेरे ही तुल्य समझिये। आप मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्यारे एवं मेरे परम भक्त हैं। आपसे बढ़कर मुझे और कोई प्रिय नहीं है, अधिक क्या, आप मेरे आत्मस्वरूप हैं। जो अज्ञानी मूर्ख आपकी निन्दा करते हैं, वे पापी, जबतक चन्द्र और सूर्य हैं, तबतक कालपाशमें बँधे हुए घोर दु:ख भोगते रहेंगे। सौ करोड़ वर्ष बीत जानेपर आप शिवाको अंगीकार कर लेना, जिससे मेरे वचनका उल्लंघन न हो और आपके वचनका भी पालन हो जाय, क्योंकि आपने यही कहा है कि मैं इन्हें अभी ग्रहण नहीं करूँगा। आप केवल तपस्वी ही नहीं हैं, आप तो मेरे ही समान महान् ईश्वर हैं। इसलिये आपको मेरे अनुरोधसे इस साध्वीको अवश्य अंगीकार करना होगा। जो पुरुष किसी तीर्थस्थानमें संयमपूर्वक पवित्र एवं जितेन्द्रिय रहकर तीर्थकी मृत्तिकासे आपका लिंग बनाकर पंचोपचारसे उसका सहस्र बार पूजन करेगा, वह अनेकों कल्पपर्यन्त मेरे साथ गोलोकमें आनन्दोपभोग करेगा और जो विधिपूर्वक लाख बार पूजा करेगा, वह कभी गोलोकसे भ्रष्ट नहीं होगा तथा मेरे और आपके समान हो जायगा। जो मिट्टी, भस्म, गोबर अथवा बालुकाका लिंग बनाकर एक बार भी किसी तीर्थमें उसकी पूजा करेगा, वह दस हजार कल्पतक स्वर्गमें वास करेगा। शिवलिंगका अर्चन करनेसे मनुष्यको संतान, पृथिवी, विद्या, पुत्र, धन, ज्ञान एवं मुक्तितककी प्राप्ति होती है और वह साधु बन जाता है। जिस स्थानपर शिवलिंगका पूजन होता है, वह लोकदृष्टिमें तीर्थ न होनेपर भी वास्तवमें तीर्थ ही है। उस स्थानपर मरा हुआ पुरुष, चाहे वह पापी ही क्यों न हो, शिवलोकको प्राप्त होता है। जो पुरुष ‘महादेव, महादेव, महादेव’ इस प्रकार कहता है, मैं उस नामश्रवणके लोभसे व्यग्र होकर उस पुरुषके पीछे चला करता हूँ। वह करोड़ जन्मोंके पापोंसे मुक्त होकर मुक्तिको प्राप्त होता है। जो ‘शिव’ इस शब्दका उच्चारण करके प्राणत्याग करता है, वह करोड़ जन्मोंके पापोंसे मुक्त होकर मुक्तिको प्राप्त होता है। ‘शिव’ शब्दका अर्थ कल्याण है और ‘कल्याण’ शब्द मुक्तिका वाचक है। मुक्ति शंकरसे प्राप्त होती है, इसीलिये उन्हें शिव कहते हैं। धन और बान्धवोंसे वियोग होनेके कारण जो शोकसागरमें डूब जाता है, ‘शिव’ शब्दके उच्चारणमात्रसे उसे सारे मंगलोंकी प्राप्ति होती है। ‘शि’ का अर्थ है पापनाशक और ‘व’ कहते हैं मुक्तिदाताको। पापनाशक एवं मुक्तिप्रद होनेके कारण ही महादेव ‘शिव’ कहलाते हैं। जिसकी जिह्वापर ‘शिव’ यह मंगलमय नाम रहता है, उसके करोड़ जन्मोंके पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं।’
इसके अनन्तर भगवान् दुर्गासे बोले कि ‘तुम अभी कुछ समयतक मेरे पास गोलोकमें रहो। समय आनेपर तुम्हें कल्याणदायक एवं कल्याणरूप शिव अंगीकार करेंगे। तुम समस्त देवताओंके तेज:पुंजसे आविर्भूत होकर सारे दैत्योंका संहार करोगी और सर्वपूज्य बनोगी। किसी खास कल्पके सत्ययुगमें तुम दक्षप्रजापतिके यहाँ प्रकट होकर शिवको वरण करोगी और फिर पार्वतीरूपमें पर्वतराज हिमालयके यहाँ प्रकट होकर हजार दिव्य वर्षपर्यन्त शिवपत्नी होकर रहोगी। इसके अनन्तर तुम शिवके अंदर लीन होकर उनके साथ अभेदको प्राप्त होगी। तुम्हारी सब कालमें तथा गाँव-गाँव और नगर-नगरमें पूजा होगी। जो तुम्हारा भजन करेंगे उनके यश, कीर्ति, धर्म एवं ऐश्वर्यकी वृद्धि होगी।’
(ब्रह्मवैवर्तपुराणसे)