भगवान्की लीला
अबतक जो कुछ भी हुआ, अब हो रहा है और आगे होगा, सभी श्रीभगवान्का रचा हुआ है। सृजन और संहार आदि सभी उन नित्य-लीलामयकी लीलाके ही अंग हैं। यह लीला अनादि है, अनन्त है, नित्य है, नियमित है और अनिवार्य है। सृजनका मधुर रूप और संहारका कराल रूप दोनों ही उन्हींके स्वरूप हैं। वही वृन्दावनके माखनप्रेमी मुरलीधर हैं और वही कुरुक्षेत्र-समरानलके प्रारम्भमें अर्जुनको भयसे कँपा देनेवाले भयंकर मूर्ति साक्षात् काल हैं। वस्तुत: लीलामें किसी भी रसका प्राकट्य हो, लीला नित्यानन्दमयी ही है। भयानक-से-भयानक लीलाके अंदर उनका नित्य-सुन्दर मनोहर मुसकराता हुआ मुखारविन्द छिपा है। लीलासे लीलाविहारीका बिलगाव कैसे हो? भगवत्कृपासे जिन भक्तोंको लीलादर्शनके योग्य नेत्र प्राप्त हो गये हैं, वे एकमात्र श्रीभगवान्को ही विविध रूपोंमें चित्र-विचित्र लीला करते देखते हैं और प्रत्येक लीलामें ही उनके मधुर दर्शन और उनके सुकोमल कर-कमलका स्पर्श पाकर अपार्थिव आनन्दलाभ करते हैं। यह भी स्मरण रखना चाहिये कि भगवान्की इस लीलामें कुछ भी अनहोनी बात नहीं होती। जो कुछ होता है, वही होता है जो होना है; और जो होना है वही ठीक है, वही मंगलमय है। भगवान्का कोई भी विधान मंगलसे रहित नहीं हो सकता। इसीलिये महात्मा पुरुष प्रत्येक घटनाको भगवान्का अवश्यम्भावी मंगलमय विधान मानकर संतुष्ट रहते हैं और विधानमें स्वयं विधाताका साक्षात्कार कर कृतकृत्य होते रहते हैं। ऐसे कृतकृत्य महात्मा इस सत्यका प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं कि उनके अन्त:करण और इन्द्रियोंसे होनेवाली प्रत्येक चेष्टा श्रीभगवान्की शक्तिद्वारा ही निर्दिष्ट और संचालित होती है। वे स्वयं कुछ भी नहीं करते-कराते, जो कुछ होता है, सब भगवान्की प्रकृति (शक्ति) ही करती है। कार्य तो सभी जगह भगवान्की प्रकृतिके द्वारा ही होते हैं; परंतु दूसरे लोग इस सत्यका अनुभव न करके स्वयं अपनेको कर्ता मानते हैं और महात्मालोग भगवत्प्रकृतिका कर्तृत्व प्रत्यक्ष ही देख पाते हैं, इसीलिये वे ऐसा अहंकार नहीं करते। अवश्य ही, वास्तवरूपमें महात्माओंका यह अकर्तृत्व और साधारण जीवोंका कर्तृत्व भी भगवान्की लीलाके ही अंग हैं; परंतु यह तत्त्व जबतक प्रत्यक्ष न हो जाय, तबतक न तो कोई इसको इस प्रकार मान सकता है और न मानना ही चाहिये। इसीलिये साधारणलोगोंकी दृष्टिमें महात्मालोग लोकहितार्थ सत्कर्म करते हुए देखे जाते हैं और उनके आदर्शके अनुसार साधारणलोग अपना कर्तव्य निश्चय करके कर्ममें लगते हैं।
यहाँ साधकोंको ऐसी धारणा करनी चाहिये कि यह जगत् भगवान्का नाट्यमंच है और हम सभी इसमें अभिनय करनेवाले अभिनेता हैं। जगन्नाटकके सूत्रधारने हमारे लिये जो खेल नियत कर दिया, उसीको ईमानदारीसे खेलना हमारा कर्तव्य है। असलमें अभिनेताके मनमें कोई स्वतन्त्र इच्छा नहीं हुआ करती। नाटकके स्वामीकी आज्ञाके अनुसार अपना पार्ट करना ही उसकी एकमात्र इच्छा और चेष्टा होती है। इसके अनुसार अपनी सारी कामनाओंका त्याग कर भगवान्के इस संसाररूपी नाट्यमंचपर भगवान्की प्रसन्नताके लिये भगवान्के संकेतानुसार कर्म करना ही अपना परम धर्म है, यही उनकी उपासना है और यही भक्ति है। स्वामीके आज्ञानुसार कर्म न करना ‘नमकहरामी’ है और स्वामीकी सम्पत्तिको अपना मानना ‘बेईमानी’। नमकहरामी और बेईमानी दोनोंसे बचकर स्वकर्मके द्वारा स्वामीकी पूजा करनी चाहिये। चतुर ऐक्टरकी न तो किसी स्वाँगविशेषमें आसक्ति होती है, न किसी कर्मविशेषमें। उसे जब जो स्वाँग मिलता है, वह उसीके अनुरूप दक्षताके साथ अभिनय करता है। इसीसे भगवान्ने कहा है—‘अर्जुन! तुम आसक्ति छोड़कर भगवान्के लिये कर्मोंका भलीभाँति सम्पादन करो।’ (‘तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंग: समाचर’) जिस साधककी प्रत्येक कर्ममें यह दृष्टि रहती है तथा बिना किसी आसक्ति और कामनाके इस प्रकार कर्तव्य-कर्म करता है, वह आगे चलकर भगवान्के हाथका सच्चा यन्त्र बन जाता है। उसकी कर्तव्य-बुद्धि भी भगवान्की विशुद्ध और स्पष्ट संचालन-क्रियाके अंदर विलुप्त हो जाती है। फिर उसमें कोई अहंकार भी नहीं रहता। वह जड कठपुतलीकी भाँति भगवान् जैसे नचाते हैं वैसे ही नाचता है। वे जो कुछ कराते हैं वही करता है। वस्तुत: तात्त्विक दृष्टिसे भगवान्से भिन्न उसका पृथक् अस्तित्व ही नहीं रह जाता। वह भगवान्में रहता है, भगवान् उसमें—‘मयि ते तेषु चाप्यहम्।’ वह इसका प्रत्यक्ष अनुभव करता है। यह तो हुई संक्षेपमें सिद्धान्तकी और साधकके भाव तथा कर्तव्यकी बात। अब संहारलीलाके सम्बन्धमें कुछ विचार करना है—
ऊपरके विवेचनसे यह तो समझमें आ ही गया होगा कि जगत्में होनेवाला संहार भी भगवान्की एक आवश्यक और अनिवार्य लीला या उनका मंगलविधान ही है। विश्वशरीरमें जब सड़न पैदा हो जाती है, तब स्वाभाविक ही उस सड़नको मिटानेके लिये विश्वस्रष्टाको एक बड़ा ऑपरेशन करना पड़ता है। ऐसे ऑपरेशन अनादि कालसे अनेक युगोंमें होते आये हैं और होते रहेंगे। ये आवश्यक हैं और अनिवार्य हैं तथा इनका परिणाम कल्याणमय ही होता है। सारी सड़ी मवाद निकलकर जब शरीर बिलकुल विषमुक्त हो जाता है, तब स्वाभाविक ही सुन्दर स्वस्थता प्राप्त होती है। हाँ, ऑपरेशन हो जानेपर जैसे घाव सूखनेमें कई दिन लग जाते हैं और इस बीचमें रोगीको घावकी वेदना सहनी पड़ती है। इसी प्रकार समष्टि-शरीरको भी संहारके बाद कुछ समयतक विषाद, निराशा, अवसन्नता और विशृंखलताकी यातना सहन करनी पड़ती है।
यूरोपका पिछला समरानल भी एक प्रकारका ऑपरेशन था, जिसका होना अनिवार्य था। अनिवार्य न होता तो वह होता ही नहीं। यूरोपके अनेकों विद्वान्, बुद्धिमान् और प्रभावशाली पुरुष बहुत समयसे लगातार युद्धविरोधी चेष्टा कर रहे हैं, परंतु किसीकी भी बुद्धि और चेष्टा सफल न हो पायी। यह जानते-मानते और कहते हुए ही कि ‘युद्धसे बड़ी हानि है, यह राक्षसीपन है और हम कदापि युद्ध नहीं चाहते’—बड़े-बड़े बुद्धिमान् लोग बड़ी तत्परताके साथ भीषण समराग्निमें सब कुछ होम देनेकी तैयारी करके रणांगणमें उतर आये और प्रतिदिन महान् विनाशका सामना करते हुए भी युद्धसे विरत नहीं होना चाहते। बल्कि अपनी सारी शक्ति लगाकर विनाशके विस्तारमें दत्तचित्त हैं, इससे सम्भव है युद्धकी यह आग अभी और भी फैले तथा पार्थिव धन और शरीरोंका और भी भीषण परिणाममें विनाश हो। जबतक पूरा मवाद निकल नहीं जायगा—शरीर बिलकुल निरामय नहीं हो सकता। अतएव किसी कारणवश अभी यदि कुछ समयतक युद्ध रुक भी गया तो वह अगले भयानक महाविनाशके नये उद्योगके लिये ही रुकेगा। युद्धके अतिरिक्त भूकम्प, रोग, बाढ़, अकाल आदि साधनोंसे भी विनाश होता रहेगा। हमारी दृष्टिमें आनेवाले इस जगत्के प्राणियोंको इसके लिये तैयार हो जाना चाहिये। युद्ध वस्तुत: तभी मिटेगा जब लोगोंका हृदय बदलेगा, जब हमारा मन शुद्ध होगा। पाप तो हमारे मनोंमें है। भ्रम, बुरे विचार, राग-द्वेष, वैर-ईर्ष्या, काम-क्रोध, लोभ-लालच, हिंसा-प्रतिहिंसा आदि दोष तो हमारे अंदर हैं, यह अंदरका रोग है। बिजलीकी तोपों, हवाई जहाजों, बमों, टैंकों और अणुबमों आदिसे इस रोगका नाश सहसा नहीं होता। इसके शीघ्र नाश होनेकी दवा तो है धर्माचरण, शुद्ध दैवी सम्पदा, सात्त्विक वृत्ति, दैवी बल और एकमात्र भगवान्के भजनसे ही प्राप्त होनेवाली श्रीभगवान्की दिव्य अमोघ कृपाशक्ति। इन दिव्य साधनोंपरसे आजके जगत्का विश्वास उठ गया है। इस प्रकारके साधन बतलानेवालोंको लोग आज पागल या मूर्ख मानते हैं। सभीके मन भौतिक साधनों, बाह्य आचारों और द्वेषभरी कुचेष्टाओंकी ओर खिंचते हैं। बात करनेमें सभी विश्वहित, लोकहित, स्वार्थहीनता और धर्मपरायणताकी ही डुग्गी पीटते हैं, परंतु कार्य सभी उलटे करते हैं। किसी भी पक्षमें वस्तुत: सच्चे दिलसे विश्वहित, स्वार्थहीनता और धर्मपरायणताके भाव नहीं हैं। सभी लोग एक-दूसरेको राक्षस बतलाकर अपनी न्यायपरायणता और स्वार्थहीनताकी घोषणा करते हैं, परंतु सभी करते हैं, वही राक्षसी कार्य। कारण स्पष्ट है, अंदर सड़न भरी है। गोदाममें जो चीज भरी होगी उसीकी गंध आयेगी। अंदर सड़ा मांस या प्याज भरा है तो केसर-गुलाबकी मीठी महक कहाँसे आयेगी। संस्कारके अनुसार वृत्ति बनती है और वृत्तियोंके अनुसार कर्म होते हैं। विश्वभरमें यही सड़न भर गयी है। इस सड़नके नाशमें ही विश्वका मंगल है। आत्मा तो अमर है—कभी मरता नहीं। शरीर विनाशी तथा नश्वर है, यह पैदा ही होता है नष्ट होनेके लिये। इसी प्रकार जगत्के पदार्थ भी सभी क्षणभंगुर और विनाशी हैं। ‘आद्यन्तवन्त’ इनका स्वभाव ही है। इस ऑपरेशनसे जब इन शरीरोंका और क्षणभंगुर पदार्थोंका भीषण विनाश होकर सारी सड़न निकल जायगी तब मन बदलेगा—वैराग्य और प्रेमकी भावना उत्पन्न होगी। जैसे घरमें अधिक लोगोंके एक साथ मर जानेपर बचे हुए लोगोंके मनमें क्षणिक वैराग्य होता है—वे ऐसा सोचते हैं जब इस प्रकार सभीको मरना है तब वैर-विरोध, पाप-प्रपंच क्यों किये जायँ। इसी प्रकार विश्वरूपी घरमें जब यादव-संहारकी भाँति परस्पर लड़कर बहुत-से आदमी मर जायँगे, भोगसामग्रियोंका प्रचुरतासे विनाश हो जायगा, तब बचे हुए लोगोंमें स्वाभाविक ही वैराग्यका भाव उत्पन्न होगा और वे बुराई छोड़कर परस्पर प्रेम करेंगे। परिणामत: जबतक नयी बुराई पैदा नहीं होगी, तबतक जगत्में अबकी अपेक्षा बहुत अधिक सुख-शान्ति रहेगी। आजकल लोग जो शीघ्र ही सत्ययुगके आनेकी बात सुनते, कहते हैं उसका इतना ही तात्पर्य है—यह क्रूर ग्रहकी विंशोत्तरीदशामें शुभ ग्रहकी अन्तर्दशाकी भाँति कुछ नियमित कालके लिये कलियुगमें सत्ययुगका अन्तर्भाव-सा होगा।
प्रकृति स्वभावत: अधोगामिनी है। यदि निरन्तर ऊँचे उठने-उठानेका प्रयत्न न किया जाय तो स्वाभाविक ही प्रकृति पतनकी ओर बढ़ती है। उसे पतनसे बचानेके लिये सदा जाग्रत् रहने और प्रयत्न करनेकी आवश्यकता होती है। समष्टि-जगत्में भी जीवोंके कर्मवश परमात्माकी प्रेरणासे ऐसा नियमित महाप्रयत्न भगवान्की प्रकृतिके द्वारा ही होता है, उसे कोई रोक नहीं सकता। अतएव संहार-कार्य इसी प्रकारका परमात्मप्रेरित प्रकृतिका एक महान् प्रयत्न है, जो समष्टिकी शुद्धिके लिये अत्यावश्यक है।
इसमें सभी लोगोंको अपने-अपने जिम्मेका कार्य स्वभावत: करना ही पड़ेगा। जो नहीं करेगा वही दण्डका भागी होगा। भगवान्ने अर्जुनसे कहा था—‘तू यदि अहंकारवश मेरी बात न सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा।’
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥
(गीता १८। ५९)
‘यदि तू अहंकारवश ऐसा समझता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है। प्रकृति तुझे बलपूर्वक युद्धमें लगा देगी।’
अब यह प्रश्न होता है कि अपनी ओरसे हमलोगोंको ऐसे समयमें क्या करना चाहिये। इसका उत्तर यह है कि ऐसे समयमें साधारणतया हमारा कर्तव्य यह है कि हम अपने हृदयसे किसी भी पक्षविशेषसे राग-द्वेष न करके भगवान्से यही प्रार्थना करें कि—‘भगवन्! जगत्में सभी सुख-शान्तिको प्राप्त हों, सभी दैवी सम्पत्तिका सेवन करें और सभी तुम्हारे भक्त बनें।’ हमें अपनी ओरसे यही प्रार्थना करनी चाहिये और सच्चे दिलसे यही प्रयत्न करना चाहिये, जिसमें व्यक्तिगत और समष्टिगत कलह और युद्ध न बढ़ें। ऐसे युद्धोंका शीघ्र अभाव हो जाय। अधर्मकी भावना सर्वथा नष्ट हो। परस्वापहरणकी कल्पना भी किसीके मनमें न उठे, सारे संसारमें प्रेमका विस्तार हो और सभी आत्मभावसे एक-दूसरेकी सेवा-सहायता करें। इसके लिये सात बातें प्रधानरूपसे करनी चाहिये—
(१) श्रद्धा-विश्वासके साथ भगवान्की प्रार्थना।
(२) दैवी-सम्पत्तियुक्त जीवन बनानेका प्रयत्न।
(३) भगवान्के भजनमें तत्परता।
(४) गीता और रामचरितमानस-जैसे आशीर्वादात्मक कल्याणप्रद ग्रन्थोंका पारायण एवं प्रचार-प्रसार।
(५) गो-सेवा, दीन-सेवा और सर्वजीव-सेवा।
(६) सर्वत्र आत्मभावका प्रचार।
(७) जगत्की नश्वरताका विचार।