भगवत्प्राप्तिके उपाय

जीवके बन्धन और मोक्षका कारण मन ही माना गया है। जो मन विषयोंमें आसक्त होता है, वह बन्धनका हेतु होता है और जो परमात्मामें लगा रहता है, वह मोक्षप्रद होता है। जिस समय मन मैं और मेरेपनके कारण होनेवाले काम-लोभ आदि मलोंसे मुक्त हो जाता है, उस समय वह दु:ख-सुखसे छूटकर शुद्ध और सम हो जाता है। तब जीव अपने ज्ञान, वैराग्य और भक्ति-सम्पन्न अन्त:करणसे आत्माको प्रकृतिसे परे, एकमात्र, भेदरहित, स्वयंप्रकाश, सूक्ष्म, अखण्डित और उदासीन (सुख-दु:खरहित) देखता है तथा प्रकृतिको शक्तिहीना हुई अनुभव करता है। योगियोंको ब्रह्मप्राप्तिके लिये सर्वात्मा श्रीहरिके प्रति की हुई भक्तिके समान और कोई मंगलमय मार्ग नहीं है। विवेकीजन संगको ही आत्माका अच्छेद्य बन्धन मानते हैं, किंतु वही साधुपुरुषोंके साथ किया जानेपर मोक्षका खुला द्वार हो जाता है। जो लोग सहनशील, करुणामय, समस्त देहधारियोंके हित-चिन्तक, शत्रुहीन, शान्त, शास्त्रानुसार चलनेवाले और सद‍्गुणसम्पन्न होते हैं, जो भगवान‍्में अनन्यभावसे सुदृढ़ प्रेम करते हैं, भगवान‍्के लिये सम्पूर्ण कर्म तथा अपने सगे-सम्बन्धियोंको त्याग देते हैं और भगवान‍्की पवित्र कथाओंका परस्पर कीर्तन-श्रवण करते हैं, उन भगवान‍्हीमें चित्त लगानेवाले भक्तोंको संसारके विविध ताप कोई कष्ट नहीं पहुँचा सकते। ऐसे सर्वसंगपरित्यागी महापुरुष ही साधु होते हैं। उन्हींका संग करनेका प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि वे आसक्तिमूलक सम्पूर्ण दोषोंको दूर कर देनेवाले होते हैं। सत्पुरुषोंके समागमसे भगवान‍्के पराक्रमोंका यथार्थ ज्ञान करानेवाली तथा हृदय और कानोंको प्रिय लगनेवाली कथाएँ होती हैं। उनका सेवन करनेसे शीघ्र ही मोक्षमार्गमें श्रद्धा, रति और भक्तिका क्रमश: प्रादुर्भाव हो जाता है। फिर सृष्टि आदि भगवान‍्की लीलाओंका चिन्तन करनेसे प्राप्त हुई भक्तिके द्वारा लौकिक और पारलौकिक सुखोंमें वैराग्य हो जानेसे मनुष्य सावधानतापूर्वक योगके भक्तिप्रधान सरल मार्गोंसे मनोनिग्रह करनेका प्रयत्न करता है। इस प्रकार प्रकृति-[के गुणों-] से उत्पन्न हुए शब्दादि विषयोंका सेवन न करनेसे, वैराग्ययुक्त ज्ञानसे, योगसे और भगवान‍्के प्रति की हुई दृढ़ भक्तिसे मनुष्य सर्वान्तर्यामी श्रीभगवान‍्को इस देहमें ही प्राप्त कर लेता है।

(श्रीमद्भागवतके आधारपर)