भजनकी आवश्यकता
जो सबसे बढ़कर प्रियतम हो, जो प्राणोंका आधार हो, जो जीवनका एकमात्र अवलम्बन हो, जिसकी स्मृति और मिलनकी आशा ही जीवनमें प्रतिपल चेतना प्रदान करती हो, उसे क्षणभरके लिये भी कैसे भुलाया जा सकता है? कोई कहे कि ‘दिन-रातमें दो घंटे भले ही उसे स्मरण कर लिया करो, शेष बाईस घंटे घरके दूसरे आवश्यक कामोंमें खर्च किया करो’ पर ऐसा करना उस प्रेमीके लिये कैसे सम्भव हो सकता है? उसे कितने ही घंटे कुछ भी काम क्यों न करना पड़े, वह करेगा अपने प्रियतमका स्मरण करते हुए ही। उसे वह क्षणभरके लिये भी अपने हृदय-मन्दिरसे अलग नहीं कर सकता। हृदयमें उसकी झाँकी सदा खुली रहेगी, वह उसके दर्शन करता हुआ ही यन्त्रकी भाँति शरीरसे कार्य करता रहेगा। ऐसे अनन्यचेता सतत और नित्य चिन्तनमें लगे रहनेवाले प्रेमीको भगवान् नित्यप्राप्त ही रहते हैं, वे उसकी अन्तर्दृष्टिसे कभी ओझल हो ही नहीं सकते। इसी स्थितिको प्राप्त भक्त सूरदासने कहा था—
हाथ छुड़ाये जात हौ निबल जानिकै मोहिं।
हिरदै तें जब जाहुगे सबल बदौंगो तोहिं॥
इसी तन्मयतामें लीन गोपियाँ प्रतिक्षण प्रत्येक कार्य करते समय प्रियतम श्यामसुन्दरके गुणगान करती हुई आँसू बहाया करती थीं। भाग्यशालिनी व्रजांगनाओंकी बड़ाई करते हुए भागवतकार भगवान् व्यास कहते हैं—
या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप-
प्रेंखेंखनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ ।
गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो
धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयाना:॥
(श्रीमद्भा० १०। ४४। १५)
‘उन श्रीकृष्णमें चित्तको अनुरक्त रखनेवाली व्रजवनिताओंको धन्य है, जो गौ दूहते, दही मथन करते, घर लीपते, झूला झूलते, रोते हुए बालकोंको लोरी देते, झाड़ू देते, चौका लगाते तथा विश्राम करते सब समय सर्वदा पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णको अपने सामने देखकर नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहाती हुई गद्गद स्वरसे उनका गुण गाया करती हैं।’
भगवान्को याद रखनेका उपदेश, घंटे-दो-घंटे या अधिक नियमित कालके लिये नाम-जपकी आज्ञा, इतनी संख्या पूरी करनेपर सिद्धि हो जायगी, इस लोभसे संख्यायुक्त जप या संख्याकी गणनासे जप हो जाता है, यों भूल रह जाना सम्भव है, इसलिये संख्याकी अवधि बाँधकर जप करना चाहिये, यह आदेश तो उन आरम्भिक साधकोंके लिये है, जो भगवान्के प्रेमी नहीं हैं। न करनेकी अपेक्षा ऐसा करना बहुत उत्तम है। प्रेम प्राप्त होनेपर यह कहना नहीं पड़ता कि अमुक समयतक अमुक संख्यासे उन्हें याद किया करो। संख्या या समयका हिसाब कौन रखे? जब एक क्षणभरके लिये स्मृति चित्तसे नहीं हटती, तब हिसाब-किताबकी बात ही कहाँ रह जाती है? श्रीरामचरितमानसमें भगवान् श्रीरामको सीताका संदेश सुनाते हुए श्रीहनूमान्जी कहते हैं कि ‘प्रभो! सीता प्राण-त्याग करना चाहती हैं; परंतु प्राण निकल नहीं पाते, सीताजीने कहा है—
नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
× × × × × जाहिं प्रान केहिं बाट॥
प्राण कैद हो गये। आठों पहर आपके ध्यानके किंवाड़ लगे रहते हैं। आपका ध्यान कभी छूटता नहीं, आपकी श्याम-तमाल माधुरी मूर्ति कभी मनके नेत्रोंसे परे होती ही नहीं। यदि कभी किंवाड़ खोले भी जायँ तो बाहर रात-दिन पहरा लगता है। पहरेदार कौन है? राम-नाम, क्षणभरके लिये राम-नाम लेनेसे जिह्वा विराम नहीं लेती। प्राण कैसे निकलें? ऐसी स्थितिमें क्या सीताको इस उपदेशकी अपेक्षा थी कि तुम अशोकवाटिकामें अकेली रहती हो, समय बहुत मिलता है, इसके सिवा राक्षसियोंका डर रहता है, इसलिये कुछ देर रामको याद कर लिया करो। यह उपदेश या तो अभक्तोंके लिये है या प्रेमहीन रँगरूटोंके लिये।
प्रेमीजनोंको तो अपने प्रेमास्पदका नाम इतना प्यारा होता है कि स्वयं तो वे उसे कभी भूल ही नहीं सकते; दूसरेको कभी भूले-भटके उच्चारण करते सुन लेते हैं, तो उसकी चरण-धूलि लेने दौड़ते हैं। प्रियतमका नाम लेनेवाला, प्रियतमका गुण गानेवाला, प्रियतमका प्रेमी हृदयसे आदरका पात्र—प्रेमका पात्र न हो तो कौन होगा? प्रियतमका चिह्न ही हृदयमें हर्ष पैदा कर देता है। गोपियाँ श्याम मेघोंको देखकर श्रीकृष्णका स्मरण करती हुई मेघोंका दीर्घजीवन मनाती हैं।१ भरतजी श्रीरामके पदचिह्न और कुशशय्याके तृणोंको देखकर वहाँकी धूलिको और तृणोंको सिर-माथेपर चढ़ाने लगते हैं,२ श्रीराम सीताके वस्त्रको हृदयसे लगाते हैं,३ महामुनि वसिष्ठ४ और भरतजी५ गुहको अपने रामका प्रिय सखा समझकर उसपर रामके सदृश स्नेह और प्रेम दिखलाते हैं। सीता-संदेश सुनानेवाले हनूमान्के प्रति श्रीभरत ऐसी कृतज्ञता प्रकट करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता। दोनों ही अपनेको हनूमान्का चिरऋणी घोषित करते हैं—
श्रीरामके वचन—
सुनु कपि तोहि समान उपकारी।
नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
प्रति उपकार करौं का तोरा।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं।
देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
श्रीभरतके वचन—
एहि संदेस सरिस जग माहीं।
करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं॥
नाहिन तात उरिन मैं तोही।
अब प्रभु चरित सुनावहु मोही॥
भगवान् श्रीकृष्णका संदेश लेकर जब उद्धवजी व्रजको पधारे, तब श्रीकृष्णके-से वेषमें देखकर गोपियोंने उन्हें घेर लिया और यह जानकर कि यह भगवान् श्रीकृष्णका संदेश लेकर आये हैं, गोपियोंके हर्षका पार न रहा—
तं प्रश्रयेणावनता: सुसत्कृतं
सव्रीडहासेक्षणसूनृतादिभि: ।
रहस्यपृच्छन्नुपविष्टमासने
विज्ञाय सन्देशहरं रमापते:॥
(श्रीमद्भा० १०। ४७। ३)
—और उन्होंने विनयावनत होकर प्रेमभरी लज्जा-पूर्ण दृष्टिसे और मधुर वचनोंसे उनका सत्कार किया।
जबतक भगवान् हमारे परम प्रेमास्पद नहीं हैं, तभीतक उनके स्मरण-चिन्तनका अभ्यास करना है। जिस शुभ घड़ीमें हम अपने-आपको उनके चरणोंपर न्योछावर कर देंगे, मन उनके मनमें मिला देंगे, फिर तो हर घड़ी हमें उन्हींकी प्राणाधिक प्रिय छबि दिखलायी देगी; फिर गोपियोंकी भाँति कविवर ‘देव’ की भाषामें हम भी यह कह सकेंगे—
जौ न जीमें प्रेम तो कीजै ब्रत नेम, जब
कंजमुख भूलै तब संजम बिसेखिये।
आस नहीं पीकी, तब आसन ही बाँधियत,
सासनकै साँसनको मूँदि पति पेखिये॥
नखतें सिखालौं सब स्याममयी बाम भईं
बाहर औ भीतर न दूजो देव लेखिये।
जोग करि मिलैं जो बियोग होइ ब्रजपतिकौ,
जो न हरि होय, तौ ध्यान धरि देखिये॥
योग कहते हैं अप्राप्तकी प्राप्तिको और प्राप्तिके अभावको कहते हैं वियोग। यहाँ प्राणप्यारे नन्दनन्दनका नित्य संयोग है, फिर योग किसलिये साधें? वियोग ही नहीं, तब योग कैसा?
परंतु यह शुभ स्थिति हर एकको नसीब नहीं होती। भगवान्के प्रेमको प्राप्त करना सहज बात नहीं। प्रेम मुँहकी चीज नहीं; प्रेमकी बातें बनानेवाले बहुत मिल सकते हैं, पर प्रेमके पथपर कोई बिरला वीर ही चल सकता है। जबतक जगत्के भोगोंमें आसक्ति है, शरीरके आरामकी चिन्ता है, यश-कीर्तिका मोह है, तबतक प्रेमके पंथकी ओर निहारना भी मना है। प्रेमके मार्गपर वही वीर चल सकता है, जिसने वैराग्यके दावानलमें विषयासक्तिको सदाके लिये जला डाला हो। प्रेमिका मीराँ कहती है—
चुनरीके किये टूक ओढ़ लई लोई।
मोती मूँगे उतार बनमाला पोई॥
प्रेमके पथपर वही पग रख सकता है, जो प्रेम-मार्गके काँटोंको फूलोंकी शय्या, प्रेमास्पदके किये हुए तिरस्कारको पुरस्कार, महान् विपत्तिको सुख-सम्पत्ति, अपमानको सम्मान और अयशको यश समझता है। उसका पथ ही उलटा होता है। वह कोई ऐसा घृणित कार्य नहीं करता, जिससे उसका अपमान, तिरस्कार हो या विपत्ति आवे, तथापि वह अपमान, तिरस्कार और विपत्तिको प्रेमास्पदके मिलनका मार्ग समझकर उनका स्वागत करता है, उनसे चिपटे रहता है। प्रेम-पंथियोंको प्रेमियोंके निम्नलिखित शब्द याद रखने चाहिये—
नारायण घाटी कठिन जहाँ प्रेमको धाम।
विकल मूर्छा सिसकिबो, ये मगके विश्राम॥
सीस काटिकै भुइँ धरै, ऊपर राखे पाव।
इश्कचमनके बीचमें, ऐसा हो तो आव॥
सिर काटौ छेदौ हिया टूक-टूक करि देहु।
पै याके बदले बिहँसि वाह वाहकी लेहु॥
पीया चाहै प्रेमरस राखा चाहै मान।
एक म्यानमें दो खडग देखी सुनी न कान॥
प्रेमपंथ अति ही कठिन सबपै निबहत नाहिं।
चढ़के मोम-तुरंग पै चलिबो पावक माहिं॥
नारायण प्रीतम निकट सोई पहुँचनहार।
गेंद बनावे सीसकी खेलै बीच बजार॥
ब्रह्मादिकके भोग सब विषसम लागत ताहि।
नारायण ब्रजचंदकी लगन लगी है जाहि॥
ऐसे प्रेमी भक्त शीश उतारकर मरते नहीं। शीश उतारे फिरते हैं, परंतु प्यारेके लिये जीवन रखते हैं। मर जाय तो प्यारेको दु:ख हो। इसलिये जीते हुए ही मर जाते हैं अथवा मरकर भी जीते हैं। जिनकी ऐसी स्थिति हो गयी है, उनको धन्य है, उनके पिता-माताको धन्य है, उनके देशको धन्य है। उन्हींका जन्म सफल होता है। ऐसा करनेपर जब उन्हें प्रियतम मिल जाता है, जब प्रियतमके साथ घुल-मिलकर वे अपने-आपको खो देते हैं, तब तो वे प्रियतमका स्वरूप ही बन जाते हैं—
‘तू तू करते तू भयो मुझमें रही न हूँ’।
जब ‘मैं’ था तब ‘हरि’ नहीं, अब ‘हरि’ है ‘मैं’ नाहिं।
प्रेमगली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं॥
इसी स्थितिको प्राप्त करना मनुष्य-जीवनका ध्येय है। इसीके लिये भगवान्ने गीतामें आज्ञा दी है—
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥
इस सुखरहित और अनित्य मनुष्य-शरीरको पाकर तू निरन्तर मेरा भजन कर। भजनसे ही उपर्युक्त स्थिति प्राप्त हो सकती है। जबतक प्रेम न हो, तबतक श्रद्धाके साथ कुछ नियम बनाकर ही भगवान्का भजन अवश्य करना चाहिये। भजन करते-करते ज्यों-ज्यों अन्त:करणका मल नष्ट होगा, त्यों-ही-त्यों अन्त:करण शुद्ध होगा और भगवान्के प्रति प्रेम बढ़ता रहेगा। परंतु यह ‘अटल सिद्धान्त’ सदा स्मरण रखना चाहिये—
बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥