भक्तके लक्षण
भगवान्के भक्तोंका बड़ा महत्त्व है। वे जगत्के लिये आदर्श होते हैं; क्योंकि भगवद्भक्तिके प्रतापसे उनमें दुर्लभ दैवी गुण अनिवार्यरूपसे प्रकट हो जाते हैं, जो उनके स्वाभाविक लक्षण होते हैं। भक्तका स्वरूप जाननेके लिये उन लक्षणोंका जानना आवश्यक है। उनमेंसे कुछ ये हैं—
१—भक्त अज्ञानी नहीं होता, वह भगवान्के प्रभाव, गुण और रहस्यको तत्त्वसे जाननेवाला होता है। प्रेमके लिये ज्ञानकी बड़ी आवश्यकता है। किसीको किसी अंशमें भी जाने बिना उससे प्रेम नहीं हो सकता और प्रेम होनेपर ही उसका गुह्यतम यथार्थ रहस्य जाना जाता है। भक्त भगवान्के गुह्यतम रहस्यको जानता है, इसीलिये भगवान्के प्रति उसका प्रेम उत्तरोत्तर बढ़ता ही रहता है। भगवान् रससार हैं। उपनिषद् भगवान्को ‘रसो वै स:’ कहते हैं। इस प्रेममें भी द्वैत नहीं भासता! प्रेमकी प्रबलतासे ही राधाजी श्रीकृष्ण बन जाती हैं और श्रीकृष्ण श्रीराधाजी। कबीर साहब कहते हैं—
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नायँ।
प्रेम-गली अति साँकरी, यामें दो न समायँ॥
वस्तुत: ज्ञानी और भक्तकी स्थितिमें कोई अन्तर नहीं होता। भेद इतना ही है, ज्ञानी ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ कहता है और भक्त ‘वासुदेव: सर्वमिति’ अथवा गोसाईंजीकी भाषामें वह कहता है—
सीय राममय सब जग जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
२—भगवान्का भक्त निर्भय होता है। वह जानता है कि समस्त विश्वके स्वामी, यमराजका भी शासन करनेवाले भगवान् श्यामसुन्दर हर घड़ी मेरे साथ हैं, मेरे रक्षक हैं। फिर उसे डर किस बातका हो? भगवान्की शरण जिसने ले ली, वही निर्भय हो गया। लंकामें रावणके द्वारा अपमानित होकर जब विभीषण नाना प्रकारके मनोरथ करते हुए भगवान्की शरणमें आये, तब उन्हें द्वारपर खड़े रखकर सुग्रीव इस बातकी सूचना देने भगवान् श्रीरामके पास गये। श्रीरामने सेनापति सुग्रीवसे पूछा—‘क्या करना चाहिये?’ राजनीतिकुशल सुग्रीवने उत्तर दिया—
जानि न जाइ निसाचर माया।
कामरूप केहि कारन आया॥
भेद हमार लेन सठ आवा।
राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
समीप ही बैठे हुए भक्तराज हनूमान्ने मन-ही-मन सोचा, ‘सुग्रीव क्या कह गये। अरे, जिसका नाम भूलसे निकल जानेपर मनुष्य संसारके बन्धनसे छूट जाता है, उस मेरे रामके चरणोंमें आनेवालेके लिये बन्धनकी बात कैसी!’ परंतु स्वामी और सेनापतिके बीचमें बोलना अनुचित समझकर हनूमान् चुप रहे।
शरणागतवत्सल भगवान् श्रीरामने सुग्रीवकी प्रशंसा करते हुए अपना व्रत बतलाया—
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी।
मम पन सरनागत भय हारी॥
हनूमान्का मन खिल उठा। वाल्मीकिरामायणमें भी भगवान् श्रीरामने ऐसी ही बात कही है—
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम॥
(६।१८।३३)
‘जो एक बार भी मेरी शरण होकर यह कह देता है कि ‘मैं तेरा हूँ’ मैं उसको सम्पूर्ण भूतोंसे अभय कर देता हूँ, यह मेरा व्रत है।’ भला ऐसी हालतमें भगवान्का सच्चा भक्त निर्भय क्यों न होगा?
३—भक्तका किसी विषयमें ममत्व नहीं होता। उसका सारा ममत्व एकमात्र अपने प्राणाराध्य भगवान्में हो जाता है। फिर जगत्के पदार्थोंमें कहीं उसका ममत्व यदि रहता है तो उनको भगवान्के पूजनकी सामग्री या भगवान्की वस्तु समझकर ही रहता है। अपने या अपने भोगके सम्बन्धसे नहीं। रामचरितमानसमें भगवान्ने कहा है—
जननी जनक बंधु सुत दारा।
तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥
सब कै ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
अस सज्जन मम उर बस कैसें।
लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
संसारमें मनुष्य चारों ओर ममताके बन्धनसे जकड़ा हुआ है। उसका एक-एक रोम ममत्वके धागेसे बँधा है। भगवान् कहते हैं—‘मनुष्य माता-पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, मकान, सुहृद्, परिवार आदि सबमेंसे ममताके सूत्रोंको अलग करके उनकी एक ही मजबूत डोरी बट ले और उस डोरीके द्वारा अपने मनको मेरे चरणोंसे बाँध दे, तो वह सज्जन मेरे मन-मन्दिरमें उसी प्रकार निवास करता है जिस प्रकार लोभीके मनमें धन।’ यह ममताका बन्धन इसीलिये कच्चे धागेका बतलाया गया है कि इसके टूटते देर नहीं लगती। जहाँ कहीं स्वार्थमें बाधा आयी कि ममताका धागा टूटा, विषयजनित सारा प्रेम अपने लिये होता है न कि प्रेमास्पदके लिये। इसीलिये वह टूटता भी बहुत शीघ्र है; परंतु जैसे धागोंकी मजबूत रस्सी बट लेनेपर वह नहीं टूटती, इसी प्रकार जगत्की सारी ममता सब जगहसे बटोरकर एक भगवान्के चरणोंमें लगा दी जाय तो फिर उसके नष्ट होनेकी कोई सम्भावना नहीं रहती। इसीलिये यह कहा गया है कि भगवान्के प्रति होनेवाला सच्चा प्रेम सदा बढ़ता ही रहता है, कभी हटता नहीं।
संसारमें दु:खोंका एक प्रधान कारण ममता है, न मालूम कितने लोग रोज मरते हैं और कितने लोगोंके धनका नित्य नाश होता है, पर हम किसीके लिये नहीं रोते! लेकिन यदि हमारे घरका कोई आदमी मर जाय तो या कुछ धन नष्ट हो जाय तो शोक होता है। इसका कारण ममता ही है। मान लीजिये, हमारा एक मकान है, अगर कोई आदमी उसकी एक ईंट निकाल देता है तो हमें बहुत बुरा मालूम होता है। हमने उस मकानको बेच दिया और उसकी कीमतका चेक ले लिया। अब उस मकानकी एक-एक ईंटसे ममता निकलकर हमारी जेबमें रखे हुए कागजके टुकड़ेमें आ गयी। अब चाहे मकानमें आग लग जाय, हमें कोई चिन्ता नहीं। चिन्ता है उस कागजके चेककी। बैंकमें गये, चेकके रुपये हमारे खातेमें जमा हो गये। अब भले ही बैंकका क्लर्क उस कागजके टुकड़ेको फाड़ डाले, हमें कोई चिन्ता नहीं। अब उस बैंककी चिन्ता है कि वह कहीं फेल न हो जाय; क्योंकि उसमें हमारे रुपये जमा हैं। इस प्रकार जहाँ ममता है, वहीं शोक है। यदि हमारी सारी ममता भगवान्में अर्पित हो जाय, फिर शोकका जरा-सा भी कारण न रहे। भक्त तो सर्वस्व अपने प्रभुके अर्पण कर उनको अपना बना लेता है और आप उनका बन जाता है। उसमें कहीं दूसरेके लिये ममता रहती ही नहीं, इसीलिये शोकरहित होकर सर्वदा आनन्दमें मग्न रहता है।
४—भक्तमें अभिमान नहीं होता, वह तो सारे जगत्में अपने स्वामीको व्याप्त देखता है और अपनेको उनका सेवक समझता है। सेवकके लिये अभिमानको स्थान कहाँ? उसके द्वारा जो कुछ होता है सो सब उसके भगवान्की शक्ति और प्रेरणासे होता है। ऐसा विनम्र भक्त सदा सावधानीसे इस बातको देखता रहता है कि कहीं मेरे किसी कार्यद्वारा या चेष्टाद्वारा मेरे विश्वव्याप्त स्वामीका तिरस्कार न हो जाय। मेरे द्वारा सदा-सर्वदा उनकी आज्ञाका पालन होता रहे, मैं सदा उनकी रुचिके अनुकूल चलता रहूँ। वह अपनेको उस सूत्रधारके हाथकी कठपुतली समझता है। सूत्रधार जैसे नचाता है, पुतली वैसे ही नाचती है, वह इसमें अभिमान क्या करे? अथवा यों समझिये कि यह सारा संसार स्वामीका नाट्यमंच है, इसमें हम सभी लोग नट हैं, जिसको स्वामीने जो स्वाँग दिया है, उसीके अनुसार सांगोपांग खेल खेलना, अपना पार्ट करना हमारा कर्तव्य है। जो आदमी मालिककी रुचिके अनुसार उसका काम नहीं करता वह नमकहराम है और जो मालिककी सम्पत्तिको अपनी मान लेता है वह बेईमान है। नट पार्ट करता है, स्टेजपर किसीके साथ पुत्रका-सा, किसीके साथ पिताका-सा, किसीके साथ मित्रका-सा यथायोग्य बर्ताव करता है, परंतु वस्तुत: किसी भी वस्तुको—अपनी पोशाकतकको भी वह अपनी नहीं समझता। इसी प्रकार भगवान्का भक्त उनकी नाट्यशाला इस दुनियामें उनके संकेतानुसार उन्हींके दिये हुए स्वाँगको लेकर आलस्यरहित हो उन्हींकी शक्तिसे कर्म किया करता है। इसमें वह अभिमान किस बातका करे? वह मालिकका विधान किया हुआ—बताया हुआ अभिनय करता है, न कि अपनी ओरसे कुछ। पार्ट करनेमें चूकता नहीं, क्योंकि इसमें मालिकका खेल बिगड़ता है; और अपना कुछ मानता नहीं, क्योंकि वह जानता है कि सब मालिकका है, मेरा कुछ भी नहीं। वह मालिकको ही सबका नियन्त्रण करनेवाला और सर्वत्र व्याप्त देखता है और अपनेको उनका अनन्य सेवक समझता है।
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥
५—भक्त किसीसे द्वेष नहीं करता या किसीपर क्रोध नहीं करता। किससे करे? किसपर करे? सारा जगत् तो उसे स्वामीका स्वरूप दीखता है। शिवजी महाराज कहते हैं—
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥
भक्त विनय, नम्रता और प्रेमकी मूर्ति होता है।
६—भक्त किसी वस्तुकी कामना नहीं करता, उसे वह वस्तु प्राप्त है जिसके सामने सब कुछ तुच्छ है, तब वह किसकी कामना करे और क्यों करे? वस्तुत: प्रेममें कोई कामना रहती ही नहीं। प्रेममें देना है, वहाँ लेनेका तो कोई नाम ही नहीं है। यही काम और प्रेमका बड़ा भारी भेद है। काममें प्रेमास्पदके द्वारा अपने सुखकी चाह है और प्रेममें अपने द्वारा प्रेमास्पदको सुखी बनानेकी उत्कट इच्छा है। उसके लिये वही सबसे बड़ा सुख है, जिससे उसके प्रेमास्पदको सुख मिले, चाहे वह अपने लिये कितने ही भयानक कष्टका कारण हो। प्रेमास्पदके सुखको देखकर प्रेमीकी भयानक पीड़ा तुरंत महान् सुखके रूपमें परिणत हो जाती है। अतएव भगवान्का प्रेमी भक्त कभी कामी नहीं होता, वह तो चातककी भाँति मेघरूप भगवान्की ओर सदा एकटक दृष्टिसे निहारा करता है। बादल यदि न बरसे या जलके बदले ओले बरसावे, तो भी वह प्रेमके नेमका पक्का पपीहा उधरसे मुँह नहीं मोड़ता।
रटत रटत रसना लटी तृषा सूखि गए अंग।
‘तुलसी’ चातक प्रेमको, नित नूतन रुचि रंग॥
बरषि परुष पाहन पयद, पंख करै टुक टूक।
‘तुलसी’ परी न चाहिये, चतुर चातकहि चूक॥
यही दशा भक्तकी है।
फिर वह चाहे भी क्या? जगत्का सारा ऐश्वर्य जिसके ऐश्वर्यका एक कण भी नहीं है, वह सर्वलोकमहेश्वर श्यामसुन्दर उसका प्रियतम स्वामी है, उसकी सेवाको छोड़कर वह क्या चाहे? इसीलिये ललितकिशोरीजीने गाया है—
अष्टसिद्धि नवनिद्धि हमारी
मुट्ठीमें हरदम रहतीं।
नहीं जवाहिर सोना चाँदी
त्रिभुवनकी संपति चहतीं॥
भावैं ना दुनियाँकी बातें
दिलवरकी चरचा सहती।
‘ललितकिसोरी’ पार लगावें
मायाकी सरिता बहती॥
भक्त तो केवल अपने प्रियतम स्वामीकी सेवामें ही रहना चाहता है, वह सेवाको छोड़कर मुक्ति भी नहीं ग्रहण करता। करे भी कैसे? भगवान्के उस अनन्य सेवकके लिये मायाका बन्धन तो है नहीं, जिससे वह मुक्त होना चाहे। उसके तो केवल भगवत्-सेवाका बन्धन है, भक्त इस प्यारे बन्धनसे मुक्ति क्यों चाहेगा? श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं—
सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत ।
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जना:॥
(३।२९।१३)
‘मेरी सेवाको छोड़कर मेरे भक्त सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य, एकत्व—इन मुक्तियोंको देनेपर भी नहीं लेते हैं।’
भक्त जानता है, मेरे प्रभु समस्त ब्रह्माण्डोंके एकमात्र स्वामी हैं, मुक्ति उनके चरणोंकी दासी है। वह कहता है—
अब तो बंध मोक्षकी इच्छा
ब्याकुल कभी न करती है।
मुखड़ा ही नित नव बंधन है
मुक्ति चरणसे झरती है॥
मुक्तिदायिनी गंगाजी श्रीभगवान्के चरणोंका ही तो धोवन हैं।
एक समय ब्रह्माजी भगवान्के द्वारपर पहुँचे, भगवान्ने द्वारपालके द्वारा उन्हें पुछवाया कि ‘आप कौनसे ब्रह्मा हैं?’ ब्रह्माको इस बातपर बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सोचने लगे कि ‘कहीं ब्रह्मा भी दस-बीस थोड़े ही हैं।’ उन्होंने कहा, ‘जाओ, कह दो चतुर्मुख ब्रह्मा आये हैं।’ भगवान्ने उनको अंदर बुलवाया। ब्रह्माजीका कौतूहल शान्त नहीं हुआ, उन्होंने पूछा ‘भगवन्! आपने यह कैसे पूछा कि कौन-से ब्रह्मा हैं? क्या मेरे अतिरिक्त और भी कोई ब्रह्मा हैं?’ भगवान् हँसे, उन्होंने विभिन्न ब्रह्माण्डके ब्रह्माओंका आवाहन किया। तत्काल वहाँपर चारसे लेकर हजार मुखतकके अनेकों ब्रह्मा आ पहुँचे। भगवान्ने कहा, ‘देखो, ये सभी ब्रह्मा हैं, अपने-अपने ब्रह्माण्डके ब्रह्मा हैं।’ तब ब्रह्माजीका संदेह दूर हुआ। ऐसे ब्रह्माओंके एकमात्र स्वामी जिसके प्राणप्रिय हों, वह भक्त किस वस्तुकी कामना करे।
पाँच सखियाँ थीं, पाँचों श्रीकृष्णकी भक्त थीं। एक समय वे वनमें बैठी फूलोंकी माला गूँथ रही थीं। उधरसे एक साधु आ निकले। साधुको रोककर बालाओंने कहा—‘महात्मन्! हमारे प्राणनाथ श्रीकृष्ण वनमें कहीं खो गये हैं, उन्हें आपने देखा हो तो बतलाइये।’ इसपर साधुने कहा—‘अरी पगलियो! कहीं श्रीकृष्ण यों मिलते हैं। उनके लिये घोर तप करना चाहिये। वे राजराजेश्वर हैं, नाराज होते हैं तो दण्ड देते हैं और प्रसन्न होते हैं तो पुरस्कार।’ सखियोंने कहा—‘महात्मन्! आपके वे श्रीकृष्ण दूसरे होंगे, हमारे श्रीकृष्ण तो राजराजेश्वर नहीं हैं, वे तो हमारे प्राणपति हैं, वे हमें पुरस्कार क्या देते? उनके खजानेकी कुंजी तो हमारे ही पास रहती है। दण्ड तो वे कभी देते ही नहीं, यदि हम कभी कुपथ्य कर लें और वे हमें कड़वी दवा पिलावें तो यह तो दण्ड नहीं है, प्रेम है।’ साधु उनकी बात सुनकर मस्त हो गये। वे अपने श्रीकृष्णको याद करके नाचने लगीं और साथ ही साधु भी तन्मय होकर नाचने लगे। यह कथा बहुत लंबी है, मैंने बहुत संक्षेपमें कही है। सारांश यह है कि ऐसा भक्त प्रभुसे क्या माँगे? ऐसा भक्त तो निष्कामभावसे नित्य-निरन्तर अति प्रेमके साथ उनका चिन्तन ही करता रहता है। तुलसीदासजीने कहा है—
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥
भक्त निरन्तर अपने भगवान्के लिये कामी और लोभीकी इस दशाको प्राप्त रहता है। वह कैसे उनको भुलावे? और कैसे दूसरे विषयके लिये कामना या लोभ करे?
अतएव भक्त सदा-सर्वदा भगवान्के चिन्तनमें ही चित्तको लगाये रखता है। भगवान्ने भी गीतामें स्थान-स्थानपर नित्य-निरन्तर चिन्तन करनेकी आज्ञा दी है। आठवें अध्यायमें कहा है—
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:॥ ५॥
‘जो मनुष्य मृत्युके समय मुझको स्मरण करता हुआ शरीरको त्यागकर जाता है, वह मेरे साक्षात् स्वरूपको ही प्राप्त होता है, इसमें संदेह नहीं।’ इसपर लोग सोचते हैं कि फिर जीवनभर भगवान्का स्मरण करनेकी क्या जरूरत है। मरनेके समय भगवान्को याद कर लेंगे। याद करके मरनेपर भगवत्प्राप्तिका वचन भगवान्ने दे ही दिया। इसी भ्रान्त धारणाको दूर करनेके लिये भगवान्ने फिर कहा—
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:॥ ६॥
यह नियम है कि ‘मनुष्य अन्तकालमें जिस-जिस भावको स्मरण करता हुआ शरीर छोड़कर जाता है, उसी-उसीको प्राप्त होता है; परंतु अन्तकालमें भाव वही याद आता है, जिसका जीवनभर चिन्तन किया गया हो।’
यह नहीं कि जीवनभर तो मनसे धन, मानकी रटन लगाते रहें और अन्तकालमें भगवान्की स्मृति अपने-आप ही हो जाय। इसीलिये श्रीभगवान्ने फिर आज्ञा की—
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७॥
‘अतएव हे अर्जुन! तू सब समय (निरन्तर) मेरा स्मरण करता हुआ ही युद्ध कर। इस प्रकार मुझमें अर्पित मन-बुद्धि होनेसे तू नि:संदेह मुझको ही प्राप्त होगा।’ निरन्तर स्मरणका महत्त्व तो देखिये, भगवान्ने यही कहकर संतोष नहीं कर लिया कि ‘मुझको प्राप्त होगा’ ‘नि:संदेह’ (असंशयम्) और ‘ही’ (एव) ये दो निश्चय दृढ़ करानेवाले शब्द और जोड़े। इतनेपर भी हम भगवान्का स्मरण न करें तो हमारे समान मूर्ख और कौन होगा! अन्तमें भगवान् सर्वगुह्यतम आज्ञा देते हैं—‘तू चिन्ता न कर, एकमात्र मेरी शरण आ जा, मैं तुझे सारे पापोंसे बचा लूँगा।’
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥
(गीता १८। ६५-६६)
‘तू मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरी पूजा कर, मुझे नमस्कार कर, तू मेरा प्रिय है, इससे मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि ऐसा करनेसे तू मुझको ही प्राप्त होगा। सारे धर्मोंके आश्रयोंको छोड़कर तू केवल एक मेरी ही शरणमें आ जा। मैं तुझको सब पापोंसे छुड़ा दूँगा। तू चिन्ता न कर।’ इसलिये हमलोगोंको नित्य-निरन्तर श्रीभगवान्का चिन्तन करना चाहिये। भक्तोंके और भी अनेकों गुण हैं, कहाँतक बखाने जायँ।
अन्तमें दो-एक बातें कीर्तनके सम्बन्धमें निवेदन करता हूँ। याद रखें, ‘कीर्तन बाजारी वस्तु नहीं है।’ यह भक्तकी परम आदरणीय प्राण-प्रिय वस्तु है। इसलिये कीर्तन करनेवाले इतना ध्यान रखें कि यह कहीं बाजारू लोकरंजनकी चीज न बन जाय। इसमें कहीं दिखलानेका भाव न आ जाय। कीर्तन करनेवाला भक्त यह समझे कि ‘बस, मैं केवल अपने भगवान्के सामने ही कीर्तन कर रहा हूँ, यहाँ और कोई दूसरा है, इस बातकी स्मृति भी उसे न रहे। दो बातें कभी नहीं भूलनी चाहिये। मनमें भगवान्के स्वरूपका ध्यान और प्रेमभरी वाणीके द्वारा मुखसे अपने प्रभुके पवित्र नामकी ध्वनि। ऐसा करते-करते वास्तविक प्रेमकी दशाएँ प्रकट होंगी और भगवान् कहते हैं कि फिर मेरा वह भक्त त्रिभुवनको तार देगा।
वाग् गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं
रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च
मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥
(श्रीमद्भा० ११। १४। २४)
‘प्रेमसे उसकी वाणी गद्गद हो जाती है, चित्त द्रवीभूत हो जाता है, वह कभी जोर-जोरसे रोता है, कभी हँसता है, कभी लाज छोड़कर गाता है, कभी नाचने लगता है, ऐसा मेरा परम भक्त त्रिभुवनको पवित्र कर देता है।’