भाव-राज्यकी महिमा

प्रश्न—भाव-जगत‍्में मनुष्य बहुत-सी बातोंका अनुभव करता है, क्या वे वास्तविक सत्य हैं या कल्पनासे उत्पन्न होती हैं?

उत्तर—दोनों ही बातें हो सकती हैं। भावका अर्थ केवल कल्पना ही नहीं है। गीताके ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:’ में भावका अर्थ है सत् —सदा रहनेवाला। ‘सत् का कभी अभाव नहीं होता और असत् का कभी भाव नहीं होता।’ वैष्णव साहित्यमें भावका अर्थ है उच्चाति-उच्च प्रेम। भगवान‍् श्यामसुन्दर सच्चिदानन्दघन श्रीकृष्णको ‘रसराज’ और रासेश्वरी नित्यनिकुंजेश्वरी वृषभानुनन्दिनी श्रीराधाजीको ‘महाभाव’ कहा गया है।

आजकल ‘भाव’ का प्रयोग बहुत हलके अर्थमें होता है। भाव और भावनामें कोई अन्तर नहीं माना जाता। बंगालमें तो भावनाका प्रचलित अर्थ है—‘चिन्ता’। भावना करते-करते जिस वस्तुका जो रूप बन जाय उसका नाम भी ‘भाव’ कहा जाता है। भावसे भावित पुरुषमें होनेवाली मनोवृत्तिको भावुकता कहते हैं। भावुकका चलतू अर्थ है भावप्रवण—कल्पनाराज्यमें विचरण करनेवाला व्यक्ति, जो विचारशील नहीं है या विवेकहीन—मूढ है। प्रेम तथा अनुरागको भी भाव कहते हैं। प्रेम, अनुराग आदिके भाव जो अन्तस्तलमें उठते हैं, उनको भी भावुकता कहते हैं। ऐसे प्रेमी व्यक्तियोंका हृदय भावना करते-करते द्रवीभूत हो जाता है। श्रद्धालुओंको भी भावुक कहते हैं। भावुक व्यक्ति भावनाके अनुसार अनेक प्रकारकी कल्पना करके उसके राज्यमें विचरते रहते हैं। वैष्णवोंने भावको सर्वथा ‘पवित्र प्रेम’ के अर्थमें लिया है। भगवान‍्का जो आनन्दस्वरूप है, उनकी जो स्वरूपभूता ह्लादिनी शक्ति है, अन्तरंगा शक्ति है, वही आनन्द-शक्ति है, वही भाव है; वही मूर्तिमान् होकर महाभाव-स्वरूपा श्रीराधिकाजीके दिव्य विग्रहके रूपमें प्रकट है।

जहाँ-जहाँ भक्त अपनी दृष्टिसे भाव-राज्यकी बात कहता है, वहाँ वह भगवान‍्के यथार्थ प्रभावकी ही बात कहता है, कल्पना-प्रसूत भावनासे नहीं। वह सर्वथा यथार्थ है न कि कल्पना। भक्तकी दृष्टि ऐसी ही होनी भी चाहिये। भावनासे जिस प्रकार भगवान‍्के रूपका ध्यान होता है, उसी प्रकार शब्द, स्पर्श, रस और गन्ध आदिका भी ध्यान हो सकता है और होता है। ध्यानमें हम भगवान‍्की वंशीकी मधुर ध्वनि सुन सकते हैं, उनके रूपको निरख सकते हैं, उनके अधरामृतका पान कर सकते हैं, उनके स्पर्शकी पुलकमें पुलकित हो सकते हैं, यहाँतक कि उनके अंगकी गन्ध भी सूँघ सकते हैं। ध्यानमें मनुष्य यह देख सकता है कि हमने भगवान‍्के चरण पकड़ लिये, उन्होंने हमारे मस्तकपर हाथ रख दिया। साधक भक्तकी दृष्टिमें ये सारी बातें सत्य हैं, पर जबतक ये सब मनकी कल्पनासे बने हुए स्वरूप हैं, तबतक वे भावनाजनित ही हैं। जैसे स्वप्नके मनोराज्यमें किसी औरके न होते भी हम स्पर्शका अनुभव करते हैं, शब्द सुनते हैं, रूप देखते हैं, गन्ध सूँघते हैं, रसका आस्वादन करते हैं। इसी प्रकार भाव-जगत‍्में भी दृढ़ भावनाके द्वारा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदिका भलीभाँति अनुभव कर सकते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है।

यह भी ध्यानकी बहुत ऊँची और अत्यन्त कल्याणप्रद स्थिति होती है, पर इससे परे सच्चे प्रेमराज्यमें रसराज श्रीभगवान‍्के प्रत्यक्ष दर्शन भी हो सकते हैं। भगवद्दर्शनकी भावनाको किसी प्रकारके भी तर्कसे प्रमाणित करना कठिन है। अविश्वासीको भगवद्दर्शनकी बात समझा देना असम्भव-सा है। श्रद्धा और विश्वास ही तो साधनाका मूलमन्त्र है। भक्त जिस रूपमें भगवान‍्को देख रहा है, हो सकता है वह शास्त्रोंमें प्रकट न हो। साथ ही यह भी सम्भव है कि शास्त्रोंमें भगवान‍्के जिस रूपका वर्णन है उस रूपमें भगवान‍् किसी भक्तको दर्शन न दें और एक साधारण वेषमें ही प्रकट हो जायँ। भगवान‍्का रूप कैसा? जैसा भक्त चाहे वैसा। भक्तकी जैसी इच्छा होती है वैसा ही रूप लेकर भगवान‍् उपस्थित हो जाते हैं। इसके सिवा दिव्यधामोंमें लीलाविहार करनेवाले भगवान‍्के नित्यरूप भी हैं, जो हमारी कल्पनामें आवें या न आवें। इन स्वरूपोंके दर्शन भी कृपापात्र प्रेमी भक्तोंको हुए हैं और हो सकते हैं।

कभी-कभी किन्हीं-किन्हीं अभिमानी दर्शनोत्सुक भक्तोंको मार्गच्युत करनेके लिये या उनकी परीक्षा करके उनमें और भी दृढ़ता लानेके लिये उपदेवता भी विभिन्न रूपोंमें उनके सामने आ सकते हैं और अपनेको भगवान‍् बताकर उनको भ्रममें डालनेकी चेष्टा कर सकते हैं। ऐसे अनुभव भी सुननेमें आये हैं कि कोई-कोई खेचर उपदेवता सकामभावसे किसी इष्टविशेषके उपासकोंको उस रूपमें आकर ठगनेकी चेष्टा करते हैं। हमने भूतलपर जो तेज देखा है, उससे कई गुना अधिक तेज उन उपदेवताओंका ही होता है। वे आकर हमारे इष्टदेवकी मूर्तिमें उपस्थित होकर हमें ठग लेते हैं। भयके रूपमें जिस प्रकार देवताओंका विघ्न आता है, उसी प्रकार लोभके रूपमें भी आता है। ध्रुवके सामने उपदेवता उसकी माताके लोभनीय रूपमें आये—‘बेटा! मैं बहुत दु:खी हूँ—मैं जल रही हूँ, मुझे बचाओ।’ पर ध्रुव अपनी साधनासे टले नहीं। जो भगवान‍्का शरणागत भक्त होता है, उसके सारे विघ्नोंका तो नाश स्वयं प्रभु अपने अनुग्रहसे ही कर डालते हैं—

मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।

भगवान‍्में जिसका चित्त अर्पित हो गया है, ऐसे अर्पितात्मा भक्तका सारा दायित्व भगवान‍् पर आ जाता है। भगवान‍्की आज्ञा है कि ‘मेरा भक्त आँख मूँदकर मेरे राजमार्गपर चले, उसे कोई विघ्न नहीं रोक सकता।’ भगवान‍्के सम्मुख आते ही जीवका सदाके लिये उद्धार हो जाता है—

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।

जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

अनन्य और निष्कामभावसे भगवान‍्की शरणमें आते ही भक्तके समस्त योग-क्षेमका भार भगवान‍् स्वयं अपने ऊपर ले लेते हैं। इसका अभिप्राय यह नहीं कि भक्त भगवत्पथमें चलना बंद कर देता है। वह तो बड़े वेगसे भगवान‍्की ओर दौड़ता है। सोचता तब, जब सोचने चला होता। मन तो दस-बीस हैं नहीं कि एकसे सोचेगा और दूसरेसे अर्पण करेगा। मन तो एक था जिसे श्यामसुन्दरको दे दिया। उस मनको अब कहाँ दिया जाय? अर्पितात्मा व्यक्ति प्रभुके सिवा किसीकी इच्छा ही नहीं करता। गोपियोंका अर्पण सर्वतोभावेन सम्पूर्ण था, इसीलिये भगवान‍् कहते हैं—‘ता मन्मनस्का मत्प्राणा मदर्थे त्यक्तदैहिका:।’ उन्होंने मुझमें अपने मन मिला दिये हैं, प्राणोंको विलय कर दिया है और मेरे लिये ही अपने शारीरिक कर्मोंका भी उत्सर्ग कर दिया है।

भगवान‍् कहते हैं—

जननी जनक बंधु सुत दारा।

तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥

सब कै ममता ताग बटोरी।

मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥

अस सज्जन मम उर बस कैसें।

लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥

(श्रीरामचरितमानस)

ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणान् वित्तमिमं परम्।

हित्वा मां शरणं याता: कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे॥

(श्रीमद्भा० ९। ४। ६५)

‘जो भक्त स्त्री, पुत्र, घर, गुरुजन, प्राण, धन, इहलोक और परलोक—सबको छोड़कर केवल मेरी शरणमें आ गये हैं, उन्हें छोड़नेका विचार ही मैं कैसे कर सकता हूँ।’

सब पदार्थोंमेंसे ममत्व निकालकर तन, मन, धन सभी, सब कुछ सर्वभावेन भगवान‍्के चरणोंमें अर्पित कर भक्त नि:स्पृह और निरीह हो जाता है। मोक्षकी इच्छा रखनेवाला मन ही जब श्रीहरिके चरणोंमें समर्पित हो गया, तब मोक्षकी इच्छाका उदय ही कैसे हो? ऐसे सर्वथा निष्काम अर्पितात्माको उपदेवता आदिका भय ही नहीं होता कि वे आकर तंग करेंगे। उसके पथमें कोई भी बाधा नहीं डाल सकता।

साधनाका प्रारम्भ ही भावनासे होता है। भावनाके मूलमें है श्रद्धा। श्रद्धाहीन भाव मिथ्या है। भाव करते-करते भगवत्कृपासे सच्चे भावराज्यमें प्रवेश होता है, साधक स्थूलसे सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतममें प्रवेश करता है। वहाँ उस दिव्य भावनालोकमें प्रवेश करके भगवान‍्की पूजा करता है। देहके पाँच भेद माने जाते हैं—स्थूल, सूक्ष्म, कारण, भाव और चिन्मय। चिन्मय और भावदेह कुछ विलक्षण हैं। भगवान‍्का जो नित्यविग्रह है, वह चिन्मय है। वह देह देह नहीं, भगवत्स्वरूप ही है। वहाँ देह-देहीका भेद नहीं है। वहाँ योगमायाका भी पर्दा नहीं है। भगवान‍् दो तरहसे ही प्रकट होते हैं—योगमायाको लेकर और योगमायाको हटाकर। जहाँ योगमाया साथ है वहाँ आवरण है। बहिरंग प्रकृतिका नाम ‘माया’ है; भगवान‍्की अन्तरंगा शक्तिका नाम है ‘योगमाया’। मलिना माया, जिससे जगत् आच्छादित है, भगवान‍्को नहीं ठग सकती। भगवान‍् स्वयं योगमायाकी चादर ओढ़कर, उस आवरणको स्वयं धारणकर सामने आते हैं। जहाँ भगवान‍्का योगमायासे रहित चिन्मय स्वरूप है, वहाँ योगमाया आह्लादिनी शक्तिका रूपान्तर है। भगवान‍् जहाँ योगमायासे आच्छादित होकर बोलते हैं वहाँ सबके सामने प्रकट होते हैं। जहाँ योगमायाका पर्दा हटा रहता है वहाँकी अन्तरंगा लीलामें जो प्रेमीजन भगवान‍्के साथ होते हैं—वहाँ प्रेममें ज्ञान अन्तर्हित होता है—उनके देहका नाम भावदेह है। श्रीराधिकाजीका भावदेह नहीं है, वे तो चिन्मय दिव्य विग्रह हैं और सभी गोपियाँ राधाकी कायव्यूहरूपा हैं।

गोपियोंका काम है श्रीराधा-कृष्ण प्रिया-प्रियतमके मिलन-आनन्दकी व्यवस्था करना और उसे पूर्ण करके पूर्णरूपमें देखना। इसीमें उनकी चरम तृप्ति है। यह रहस्य तभी खुलता है जब भक्त इस दिव्य लीलाराज्यमें प्रवेश करते हैं। इस लीलामें प्रवेश किये बिना भी मुक्ति तो हो सकती है। भगवान‍्की प्राप्तिके अनेकों निश्चित मार्ग हैं और वे सभी मोक्षप्रद हैं। मोक्ष भी तो भगवान‍्का ही स्वरूप है। परंतु इस लीला-सन्दोहमें प्रवेश करनेके लिये तो गोपी-भावापन्न ही होना पड़ेगा। नारदको, अर्जुनको, भगवान‍् शिवजीतकको इस लीलाके आस्वादनके लिये गोपी बनना पड़ा। रासोल्लासतन्त्रमें भावदेहका वर्णन आया है। भगवान‍्के नित्यधाममें नित्यपरिकरोंके चिन्मय देहमें लीलाके लिये एक शक्ति दी गयी है। उसका नाम है ‘भाव’। भगवान‍्के नित्यपरिकर भावदेहमें होते हैं। भावदेहकी प्राप्तिसे ही उनका रासलीलामें प्रवेश होता है। इसीलिये यह परमगुह्य रहस्य है। यह रहस्य तर्कोंके द्वारा सिद्ध हो नहीं सकता। भावलीलामें योगमायाका पर्दा हटा रहता है। वहाँ लोकसंग्रह नहीं है। लोकसंग्रह वहीं है जहाँ लोक है। जहाँ जगत‍्के प्राणी हैं, जहाँ प्रजा है, लोक है, मनुष्य हैं, वहीं लोकसंग्रहकी आवश्यकता है। जहाँ लोक है ही नहीं, वहाँ लोकसंग्रह कैसा? जहाँ लोकालय नहीं है, कर्मयोग करनेवाले जीव नहीं हैं—जहाँ केवल भगवान्-ही-भगवान‍् हैं, जहाँ—

रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभि-

र्यथार्भक: स्वप्रतिबिम्बविभ्रम:।

(श्रीमद्भा० १०। ३३। १७)

—जिस प्रकार बालक अपने प्रतिबिम्बके साथ खेलते हैं, उसी प्रकार श्रीहरि गोपियोंके साथ रमण करते हैं, जहाँ एकसे भिन्न कोई लोक नहीं, कोई जगत् नहीं, कोई प्राणी नहीं, जहाँ यहाँके इन सूर्य-चन्द्रमाकी गति नहीं, न यहाँका शरीर ही है, वहाँ लोकका ध्यान ही कैसे आता? नित्य-दिव्य रासलीलाका रहस्य हम माया-मुग्ध मानव कैसे समझें? हृदयमें वासनाका जो अन्धकार है वह हमें रासके ज्ञानसे आलोकित होने नहीं देता। जगत‍्के विषयोंसे परम उपरतिके अनन्तर ही रासका रहस्य प्रेमी महानुभावोंके निश्छल संग और प्रेमास्पद परम प्रियतम श्यामसुन्दरकी कृपासे यत्किंचित् समझमें आ सकता है।

हमारे इस लोकमें और भगवान‍्के दिव्य रासलोकमें महान् अन्तर है। हमारा हृदय वासनासे इतना ग्रस्त है कि दिव्यलोककी लोकोत्तर लीलाओंमें भी हम अपने मनके पापोंकी छाया देखा करते हैं। वहाँ इस मायिक जगत‍्की कोई वस्तु नहीं है। वहाँ योगमायाका आवरण भी नहीं है। योगमायाका आवरण हटाकर, रासमें राधा और श्रीकृष्णका व्यवधानरहित मिलन होता है। आवरण हटे बिना पूर्ण मिलन कैसे होगा? वहाँ न ये वस्त्र हैं न ये स्त्रियाँ ही। वहाँ वासनाका लेश भी नहीं है। सर्वथा व्यवधानराहित्य है। मायाका कोई व्यवधान है ही नहीं।

भगवान‍् ग्यारह वर्षके बाद व्रजमें नहीं रहे। यह तो हम मानवोंके समझनेभरके लिये है। अपने परिकरोंके लिये तो वे नित्यकिशोर हैं। कालकी कल्पना मायाके राज्यमें है। जहाँ आवरणमुक्त दिव्य जगत् है, जहाँ कालके भी महाकाल, नित्य कालातीत प्रभुकी नित्यलीलाका ही साम्राज्य है, वहाँपर किसी कालकी कैद नहीं है। वहाँ सब कुछ भगवान‍्का खेल है। हम मायामें बैठकर अमायिककी बात कैसे समझें? रास हुआ, गोपियोंका आलिंगन आदि सब कुछ हुआ, पर उस आलिंगनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। कामपर पूर्ण विजय कर लेनेपर महान् वैराग्यके अनन्तर इस राज्यमें जरा-सा प्रवेश करना सम्भव है। उसको हम मायालोकमें लेकर यहाँके मलिनभावसे मिलाकर प्रकट करें, यह ठीक नहीं है। मानवलोकमें उस लोककी कल्पना भी नहीं हो सकती। साधारण मानवसमाजमें भगवान‍्के प्राकट्यके लिये वर्णाश्रम-धर्मके संस्थापनका जो हेतु है, वही ठीक है; पर भक्तोंके संसारमें वह नहीं है। संकल्पमात्रसे भगवान‍् धर्मका अभ्युत्थान और संस्थापन तथा पापियोंका विनाश कर सकते हैं। जिनकी एक मुसकानसे सृष्टिका प्रसार हो जाता है और उस मुसकानके रुकते ही सृष्टि विलय हो जाती है, उनके लिये अवतारकी क्या आवश्यकता? भगवान‍्को तो भक्तके प्रेम-धर्मसे बाध्य होकर प्रकट होना पड़ता है। जहाँ भक्त भगवान‍्के लिये मचल उठते हैं, वहाँ उन्हें स्वयं आना ही पड़ता है। वे अपनेको रोक नहीं सकते। माता नाना प्रकारके खिलौने और मिठाइयाँ देती है, पर उन्हें फेंककर बच्चा जब माताके लिये तड़प उठता है, तब वहाँ माताको बच्चेकी व्यथा मिटानेके लिये स्वयं आना ही पड़ता है। भक्तके हृदयमें दु:ख है एकमात्र विरहतापका, उसे मिटाकर दिव्य प्रेम-धर्मकी संस्थापनाके लिये ही स्वयं भगवान‍्को आना पड़ता है।

भावलीलामें मानवी कर्मचेष्टा नहीं होती। मानवजगत‍्के आदर्शके शिखरतक भगवान‍्के कर्म हैं। वहाँ तो लोकका भाव है ही नहीं। जहाँ यह भावलीला है वहीं भावदेह भी है। गोपोंने देखा कि सभी गोपियाँ अपने-अपने पतियोंके पास सोयी हुई हैं। मानवताको मानवोंके पास छोड़कर वे भावदेहसे, चिन्मयरूपसे, आत्मारूपसे वहाँ आ गयीं और रासमें शामिल हुईं। सूक्ष्म और कारण-देहमें ये कर-चरणादि अंग नहीं होते। पर चिन्मय और भावदेहमें ये सब होते हैं। पर वे सब होते हैं दिव्य-अलौकिक। जैसे स्वयं भगवान‍् ही गोपबालक, गोवत्स और सारे सामान बन गये। उसी प्रकार उस रासलीलामें भी स्वयं भगवान‍् ही अपनी नित्य-लीलामें ‘महाभाव’ और ‘रसराज’ दोनों रूपोंमें प्रकट होते हैं। रासमण्डल तो सर्वथा इस मायासे परे है। वहाँ न इस मायाकी देह, न इस मायाके मनुष्य और न इस मायामें रमण है। मायासे विरहित योगमायाके पर्देको भी हटाकर आत्माराम श्रीकृष्णने आत्मरूपा श्रीगोपांगनाओंके साथ रमण किया—‘आत्मारामोऽप्यरीरमत् ।’ वहाँ शरीररूपसे स्वयं भगवान‍् ही हैं। गोपियाँ भी वही हैं—सब कुछ स्वयं श्रीकृष्ण ही हैं। यह कोई कल्पना नहीं है। रास सत्य है, रास नित्य है और रास चिन्मय है।

वह है क्या—यह कौन कहे? कैसे कहे? इस भावराज्यमें जो भावुक है—जिनका इसमें प्रवेश है वे ही इसका आनन्द जानते हैं, पर इस आनन्दको मायिक वाणी कैसे व्यक्त कर सकेगी? जो इस पर-आनन्दमें मग्न हैं वे फिर इसके परे क्या है उस ओर ताकतेतक नहीं। यही तो वेदान्तशिरोमणि श्रीमधुसूदन स्वामीने कहा है—

वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्

पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात् ।

पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्

कृष्णात् परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥

‘जिनके दोनों हाथ बाँसुरीसे शोभा पा रहे हैं, श्रीअंगोंकी कान्ति नूतन मेघके समान श्याम है, साँवले अंगपर पीताम्बर सुशोभित हो रहा है, लाल-लाल ओठ बिम्बफलकी सुषमा छीने लेते हैं, सुन्दर मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाको भी लज्जित कर रहा है और नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान मनोहर प्रतीत होते हैं, उन भगवान‍् श्रीकृष्णके सिवा दूसरा कोई भी परम तत्त्व है, यह मैं नहीं जानता।’

ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा

तन्निर्गुणं निष्क्रियं

ज्योति: किंचन योगिनो यदि परं

पश्यन्ति पश्यन्तु ते।

अस्माकं तु तदेव लोचनचम-

त्काराय भूयाच्चिरं

कालिन्दीपुलिनेषु यत् किमपि त-

न्नीलं महो धावति॥

‘यदि योगीलोग ध्यानके अभ्याससे वशमें किये हुए मनके द्वारा किसी निर्गुण और निष्क्रिय परम ज्योतिका साक्षात्कार करते हैं तो करते रहें; हम तो चाहते हैं, वह जो यमुनाके किनारे कोई अनिर्वचनीय साँवला-सलोना तेज दौड़ता फिरता है, वही हमारे नेत्रोंमें चिरकालतक चमत्कार (विस्मयपूर्ण उल्लास) उत्पन्न करता रहे।’

यह कल्पनाका लोक नहीं है—परात्पर सत्यका दिव्यलोक है। कोई आवश्यकता नहीं कि इसे किसीको समझाया जाय, भगवान‍्को इसकी आवश्यकता नहीं कि लोग उनके इस राज्यको मानें ही। पर तो भी इस भावराज्यमें प्रवेश होता है भगवत्कृपासे ही। इस भावराज्यमें प्रवेश करनेपर भक्त प्रभुके सिवा अन्य किसीको मानता, जानता, समझता नहीं। सारा संसार विरोध करे, लाख करे, पर उसको तो संसारकी कोई परवा ही नहीं। जगत‍्की समालोचनाका विषय यह है ही नहीं।