दैवी विपत्तियाँ और उनसे बचनेका उपाय
समाचारपत्रोंको देखनेसे पता लगता है कि इस समय प्राय: सभी देशोंमें दैवी विपत्ति आयी हुई है। सर्वत्र नाना प्रकारके दैवी कष्ट आ रहे हैं। अकाल, बाढ़, तूफान आदि न मालूम कितने उत्पात हो रहे हैं। भारतमें उत्तर प्रदेशके कई जिलोंमें, बंबईमें, सौराष्ट्रमें अकाल पड़ा हुआ है। आसाम, बंगाल, बिहार, पंजाब, काश्मीर और राजपूतानामें कई नयी-नयी बीमारियाँ फैल रही हैं। इनके अतिरिक्त बिजली गिरना,नावें डूबना आदि छोटी-छोटी घटनाएँ तो प्राय: नित्य होती हैं, बेकारी तो दिनोदिन बढ़ रही है ही। सारांश यह कि चारों ओर प्राणी दु:खी हो रहे हैं। यह सब क्या है और क्यों हो रहा है? इसका यथार्थ उत्तर तो अन्तर्जगत्की स्थितिको जाननेवाले कर्मरहस्यज्ञ पुरुष ही दे सकते हैं, तथापि शास्त्र और संतोंके अनुभवके आधारपर इतना कहा जा सकता है कि यह सब हमारे अपने ही दुष्कर्मोंका फल है और हमें शुद्ध करनेके लिये भगवान्की कृपासे प्राप्त हो रहा है। भगवत्कृपाका प्रकाश विविध रूपोंमें हुआ करता है; कभी वह बड़े सौम्य स्वरूपमें अपने दर्शन देती है तो कभी बहुत ही भीषण रूपमें! जो उसे पहचानता है वह उस भीषण मूर्तिके अंदर भी उसकी त्रितापका नाश करनेवाली शान्ति-सुधामयी छविको देख पाता है, वह सभी अवस्थाओंमें भगवान्की कृपाका अनुभव करता है। प्रत्येक आघातमें वह अपने एकमात्र प्रियतमका कोमल करस्पर्श पाकर पुलकित हो उठता है और अपनेको परम सौभाग्यवान् और सुखी समझता है; परंतु जो नहीं पहचानते, वे रोते और दु:खी होते है; परंतु वे भी विपत्तिमें सम्पत्ति पाते हैं, दु:खमें भगवान्को कहीं अधिक सच्चे हृदयसे पुकारते हैं!
संसारमें कुछ भी अनियमित नहीं होता। सभी कुछ सत्य, न्याय और दयासे सनी हुई भागवती शक्तिके नियमाधीन होता है जो जीवोंके कर्मवश विविध भाँतिसे उनके शरीरोंका सृजन, पालन और संहार करती हुई उन्हें सतत कल्याणके मार्गपर अग्रसर करना चाहती है और करती रहती है। जैसे सृजन और पालनका कार्य सर्वत्र सतत नियमित चल रहा है, इसी प्रकार संहारका भी चल रहा है; परंतु किसी अज्ञात नियमके अनुसार जब एक ही जगह एक ही समयमें अधिक संहार होने लगता है, तब हम उसे कोई असाधारण घटना समझकर सिहर उठते हैं और समझते हैं मानो सर्वनाश हो गया; परंतु ऐसी बात नहीं है। जब बार-बार बिजली कौंधती है, बादल गरजते हैं, आँधी आती है और साथ ही मूसलधार वर्षा होने लगती है, तब भीगा हुआ राहका मुसाफिर जाड़ेसे काँपता हुआ सोचता है, न मालूम यह प्रलयवृष्टि बंद होगी या नहीं; परंतु थोड़ी ही देरमें बादल हट जाते हैं, आकाश निर्मल हो जाता है, सूर्यकी किरणें सब ओर अपना प्रकाश फैला देती हैं और पथिक सुखी होकर अपने गन्तव्य स्थानकी ओर चल देता है। यही तो संसारका स्वरूप है। इसमें उतराव-चढ़ाव होता ही रहता है; प्रतिक्षण परिवर्तन, रूपान्तर, मरण और सृजन हो रहा है। इस सारी लीलामें वस्तुत: एक लीलामय ही खेलता है, वह विधाता ही विधानका स्वाँग धारण करता है! उसकी कृपा उससे अभिन्न है। हम उसे पहचानते नहीं, यही हमारा मोह है। भक्त और ज्ञानी उसे पहचानते हैं; इसीलिये वे सदा सुखी रहते हैं, महान्-से-महान् दारुण दु:ख भी उनको उस सुखमयी स्थितिसे विचलित नहीं कर सकता—
यस्मिन् स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते।
तथापि जहाँपर जैसी लीला होती है, उसीके अनुसार सब पात्रोंको अभिनय करना पड़ता है और करना चाहिये भी। इसीसे ज्ञानी और भक्तगण भी दु:खियोंके दु:खको देखकर रोते हैं और उनके दु:खनाशके लिये तन-मन-धनसे जतन करते हैं। वस्तुत: ज्ञानी और भक्त ही सबका दु:ख दूर करना चाहते हैं, क्योंकि उनके अन्त:करणका स्वभाव ही ‘सर्वभूतोंके हितमें रत रहना’ और ‘सबके प्रति द्वेषरहित होकर सबके अकृत्रिम मित्र और दयालु होना’ है।
‘सर्वभूतहिते रता:।’
‘अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च।’
जिनका हृदय दु:खियोंके दु:खको देखकर द्रवित नहीं होता, जिनको पीड़ितोंकी करुण पुकार पीड़ित नहीं करती, उन मनुष्योंका ज्ञानी और भक्त बनना तो दूर रहा, मनुष्यत्वतक पहुँचना भी अभी नहीं हो सका है। जो लोग पापका फल बतलाकर किसी दु:खी जीवसे उदासीन रहते हैं, जिनको अपने धन और पदके अभिमानमें दु:खियोंके दु:खसे द्रवित होनेका अवकाश ही नहीं मिलता, वे मनुष्य अभागे हैं और उनके द्वारा प्राय: पापका ही संचय होता है। अतएव सबको यथासाध्य दु:खी प्राणियोंकी तन-मन-धनसे सेवा करनेके लिये सदा तैयार रहना चाहिये। जिसकी जैसी शक्ति है, वह अपनी शक्तिके अनुसार ही सेवा करे। सेवा करके कभी अभिमान न करे और न यह समझे कि मैंने जिनकी सेवा की है, उनपर कोई कृपा की है; वे मुझसे नीचे हैं, मैंने उनका उपकार किया है; उनको मेरा कृतज्ञ होना चाहिये या अहसान मानना चाहिये। बल्कि यह समझे कि ‘सेवाका सौभाग्य और बल प्रदान करके भगवान्ने मुझपर बड़ी कृपा की; मेरे द्वारा किसीको कुछ सुख मिला है, इसमें उसका भाग्य ही कारण है, उसीके लिये वह वस्तु आयी है और भगवान्ने मेरे द्वारा उसे वह चीज दिलवायी है; मेरा अपना कुछ भी नहीं है, मैं तो निमित्तमात्र हूँ। मेरे लिये अभिमान करनेका कोई भी कारण नहीं है।’ बात भी यही है कि हमारे पास विद्या, बुद्धि, तन, मन, धन, जो कुछ है, सब भगवान्की धरोहर है, उनकी चीज है। उनको जहाँ जिस वस्तुकी आवश्यकता हो वहाँ उस वस्तुको आदरपूर्वक प्रसन्न मनसे उनके समर्पण कर देना ही हमारा धर्म है। जहाँ अकाल है, वहाँ वे अन्न माँगते हैं; जहाँ सूखा है, वहाँ जल चाहते हैं; जहाँ बाढ़में सब कुछ बह गया, वहाँ वे अन्न-वस्त्र और आश्रय चाहते हैं। ऐसी अवस्थामें हमारे पास उनका जो कुछ भी हो, तुरंत देकर उनकी प्रसन्नता प्राप्त करनी चाहिये। उन्हींकी चीजसे उनकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार जो भगवान्की पूजाके भावसे दु:खी जीवोंकी सेवा करता है, उसे मुनिजनदुर्लभ साक्षात् भगवान्की या भगवान्के प्रेमकी प्राप्ति होती है और बुद्धिमानोंको इसी भावसे सेवा करनी चाहिये। जो अपनी क्रियाका ऊँचे-से-ऊँचा फल प्राप्त कर सके, वही तो बुद्धिमान् है।
यहाँपर एक प्रश्न होता है कि तब क्या संसारमें दैवी संकटोंका आना किसी प्रकार रुक नहीं सकता? इसका उत्तर यह है कि जबतक संसार है, तबतक इनका सर्वथा नष्ट होना तो असम्भव है, परंतु ये कम जरूर हो सकते हैं। जिस कालमें दैवी संकट कम होते हैं, उसीको सत्ययुग कहते हैं और उसका कारण है हमारे अपने कर्म। महर्षियोंने कहा है कि ‘जब देश, नगर और ग्रामोंके शासक तथा उनकी देखा-देखी प्रजाजन अधर्ममें रत हो जाते हैं, काम, क्रोध, लोभ और अभिमानके वश होकर असत्य, हिंसा, चोरी, व्यभिचार, शिष्टोंका अपमान और शास्त्रकी अवहेलना करने लगते हैं, तब देवता उनकी रक्षा न करके उन्हें त्याग देते हैं। इसीसे ठीक समयपर वर्षा नहीं होती, होती है तो कहीं अनावृष्टि और कहीं अतिवृष्टि। वायु ठीक नहीं बहता, भूमि विकारयुक्त हो जाती है, जल सूख जाता है, औषध अपना स्वभाव छोड़ देती है। लोभ और क्रोधकी वृद्धिके कारण परस्पर भयानक युद्ध छिड़ जाते हैं, लोगोंकी आजीविका नष्ट हो जाती है, भूकम्प, वज्रपात और जलप्रलय आरम्भ हो जाते हैं। धर्मविहीन मनुष्य धर्मभ्रष्ट होकर गुरु, वृद्ध, सिद्ध, ऋषि और पूज्योंका अपमान करके अहित साधन करते हैं और अन्तमें उन गुरुओंके अभिशापसे भस्म हो जाते हैं।’ सच पूछिये तो आजकल यही हो रहा है। ऐसे संकटसे बचनेके लिये शास्त्रोंमें जो उपाय बतलाये गये हैं, उनका साररूप निम्नलिखित दस बातें हैं—
०१—सत्यका पालन।
०२—दु:खी प्राणियोंपर दया।
०३—तन, मन, धनसे सात्त्विक दान।
०४—देवताओंकी यथाविधि पूजा।
०५—सदाचरण।
०६—ब्रह्मचर्यपालन।
०७—शास्त्र और जितात्मा महर्षियोंकी आज्ञाका पालन।
०८—धर्मात्मा और सात्त्विक पुरुषोंका संग।
०९—गोसेवा, गायोंके लिये गोचरभूमिकी व्यवस्था करना।
१०—भगवान्के नामरूपी मन्त्रोंके द्वारा आत्मरक्षा।