दक्ष-यज्ञ-विध्वंस
एक बार पूर्वकालमें प्रयागराजमें मुनियोंका एक महान् सत्र हुआ, जिसमें देवतालोग भी सम्मिलित हुए। पीछेसे प्रजापतियोंके पति महान् तेजस्वी दक्षप्रजापति भी वहाँ आये। उन्हें देखकर सारी सभा उनके सम्मानार्थ उठ खड़ी हुई। केवल आत्माराम शंकरजी अपने आसनपर ज्यों-के-त्यों बैठे रहे। दामादको अभिवादन न करते देख दक्षको बड़ा क्रोध आया। उन्होंने शंकरजीको सबके सामने अनेक दुर्वचन कहे और यह शाप दिया कि भविष्यमें उन्हें यज्ञमें भाग नहीं मिलेगा। शिवजीने अपने श्वशुरके वाग्बाणोंपर कुछ भी ध्यान नहीं दिया और थोड़ी देरके बाद वे चुपचाप वहाँसे उठकर चल दिये। दक्ष भी क्रोधमें भरकर उनके साथ ही उठ खड़े हुए और अपनी नगरी कनखलमें आकर शिवके अपमानका बदला लेनेके उद्देश्यसे एक महान् यज्ञका आयोजन किया, जिसमें उन्होंने शिवजीको छोड़कर अन्य सभी देवताओं तथा मुनियोंको निमन्त्रित किया।
शिवपत्नी दाक्षायणीने जब इस यज्ञका वृत्तान्त सुना, तब उन्होंने बिना बुलाये ही अपने पिताके घर जानेके लिये भगवान् शिवसे अनुमति चाही और शिवके समझानेपर भी अपना हठ न छोड़ा। तब शंकरने लाचार हो उन्हें राजोचित ठाट-बाटके साथ उनके नैहर भिजवा दिया। इस प्रकार सती अपने पिताके यहाँ पहुँच तो गयीं, किंतु वहाँ जाकर उन्होंने जो कुछ देखा उससे उन्हें बड़ी मर्मवेदना हुई। वहाँ वे क्या देखती हैं कि यज्ञमें सारे देवताओंका भाग मौजूद है; किंतु शंकरजीका भाग जान-बूझकर नहीं रखा गया है। केवल इतना ही नहीं, उनके पिता दक्षने उनसे प्रेमपूर्वक सम्भाषणतक नहीं किया, उन्हें न बुलानेपर खेद प्रकट करना तो दूर रहा। उन्हें इस दुर्व्यवहारपर इतना दु:ख हुआ कि उन्होंने क्रोधमें भरकर अपने पिताको बहुत कुछ खोटी-खरी सुनायी और यज्ञमें उपस्थित सभी लोगोंकी भर्त्सना की। यही नहीं, उन्होंने अपने शिवद्रोही पिताके अंशसे उत्पन्न हुए शरीरको रखना भी पाप समझा और वहीं सबके देखते-देखते शंकरका स्मरण करते हुए योगानलसे अपना शरीर भस्म कर दिया। यह करुणाजनक दृश्य देखकर सब लोग सन्न रह गये और दक्षको बुरा-भला कहने लगे।
इधर जब शंकरजीको यह दु:खपूर्ण संवाद मिला, तब उन्हें बड़ा क्रोध आया। उन्होंने तत्काल अपनी एक जटा उखाड़कर पत्थरपर दे मारी, जिससे उसके दो टुकड़े हो गये। एक टुकड़ेसे प्रलयाग्निके समान महाबली वीरभद्र उत्पन्न हुआ और दूसरेसे महाकाली। ये दोनों अपने स्वामीकी आज्ञा पाकर अपने-अपने परिकरोंके साथ दक्षके यज्ञमण्डपमें पहुँचे। वहाँ जाते ही इन्होंने बड़ी निर्दयतापूर्वक यज्ञका विध्वंस प्रारम्भ कर दिया और बात-की-बातमें सब कुछ तहस-नहस कर डाला। इनके सामने देवता-मुनि कोई भी नहीं ठहर सके। कुछको अंग-भंगकर छोड़ दिया और शेष अपने प्राण बचाकर भागे। दक्षका सिर इन्होंने धड़से अलग कर दिया और उसे महाकालीको सौंप दिया। महाकाली उसे हाथमें लेकर गेंदके समान उससे खेलने लगीं और पीछे उसे अग्निकुण्डमें डाल दिया। इस प्रकार सब कुछ नष्ट-भ्रष्टकर ये लोग वापस शिवजीके पास चले आये। शिवजी इनके इस कार्यपर बड़े प्रसन्न हुए और इन्हें साधुवाद देकर विदा किया। पीछेसे देवतालोग शंकरजीका क्रोध शान्त करने तथा उनसे अपने तथा दक्षके अपराधोंके लिये क्षमा माँगने ब्रह्माजीको साथ लेकर कैलासपर गये और शंकरजीकी स्तुति करने लगे। शंकरजीने उन सबका बड़ा आदर-सत्कार किया और आगमनका कारण पूछा। सारा हाल मालूम होनेपर वे बोले—‘मैं किसीके अपराधका चिन्तन नहीं करता, केवल दक्षको शिक्षा देनेके हेतु मैंने यह सब लीला की है। अत: आपलोग जाइये और यज्ञको सम्पूर्ण कीजिये, मैं भी पीछे-पीछे आकर दक्षको जिलाता हूँ।’
देवतालोग उनके इन अनुग्रहपूर्ण वचनोंको सुनकर मनमें फूले न समाये और शंकरकी अनेक प्रकार स्तुति करते हुए दक्षपुरी जा पहुँचे। पीछेसे शंकरजीने आकर दक्षकी धड़में यज्ञीय पशु (बकरे)-का सिर जोड़ दिया और उन्हें फिरसे जीवित कर दिया। दक्ष अत्यन्त कृतज्ञतापूर्ण शब्दोंसे उनकी स्तुति करने लगे और अन्य देवतालोग भी उनकी स्तुतिमें शामिल हो गये। शिवजी बोले—‘मैं, ब्रह्मा और विष्णु तीनों एक ही हैं। हममें जो भेदबुद्धि करता है वह निश्चय ही घोर नरकमें गिरता है। बिना ब्रह्माजीको प्रसन्न किये विष्णुकी भक्ति नहीं मिलती और विष्णुकी भक्ति किये बिना मेरी भक्ति किसी प्रकार प्राप्त नहीं हो सकती। हरिभक्त होकर जो मेरी निन्दा करता है और शैव होकर जो विष्णुकी निन्दा करता है, उन दोनोंको ही हमारे शापके कारण तत्त्वकी प्राप्ति नहीं हो सकती।’ यह कहकर शिवजी अन्तर्धान हो गये और अन्य सब देवतालोग भी उनका गुणगान करते हुए अपने-अपने लोकको चले गये। इस प्रकार शंकरजीकी कृपासे दक्षका यज्ञ समाप्त हुआ। (शिवपुराण)