देवीका विराट् स्वरूप
एक बार गिरिराज हिमालयकी प्रार्थनासे श्रीभगवतीजीने अपना विराट् रूप उन्हें दिखाया। उस समय विष्णु आदि सभी देवता वहाँ उपस्थित थे। उस विराट् रूपका स्वर्गलोक मस्तक और चन्द्रमा तथा सूर्य नेत्र थे। दिशाएँ कान, वेद वाणी और पवन प्राण थे। हृदय विश्व था और जंघा पृथिवी। व्योममण्डल उसकी नाभि तथा नक्षत्र-वृन्द वक्ष:स्थल थे। महर्लोक कण्ठ और जनलोक मुख था। इन्द्र आदि देवता उस महेश्वरीके बाहु थे और शब्द ही श्रवण। दोनों अश्विनीकुमार उसकी नासिका थे, गन्ध घ्राणेन्द्रियाँ थीं। मुख अग्नि और पलकें दिवारात्रि थीं। ब्रह्मधाम भ्रूविलास था और जल तालु। रस ही रसना तथा यम ही द्रंष्ट्रा थे। स्नेहकला दाँत थी और माया थी हँसी। सृष्टि ही कटाक्ष-विक्षेप तथा लज्जा ही होठ थी। लोभ अधर थे और धर्मपथ था पीठ। इस जगतीतलमें जो सृष्टिकर्ताके रूपसे विख्यात हैं, वे प्रजापति ही उस देवीके मेढ थे। समुद्र उदर, पर्वत अस्थि, नदी नाड़ी तथा वृक्ष ही उसके केश थे। कौमार, यौवन और जरावस्था उसकी उत्तम गति थी। मेघ ही केश और दोनों संध्याएँ वस्त्र थीं। चन्द्रमा ही जगदम्बाके मन थे, विज्ञानशक्ति विष्णु और अन्त:करण रुद्र थे। अश्व आदि जातियाँ उस व्यापक परमेश्वरीके नितम्बके निम्न भागमें स्थित थीं। अतल आदि महीलोक उसकी कटिके अधोभाग थे। देवताओंने देवीके ऐसे महान् रूपका दर्शन किया, जो सहस्रों ज्वाला-मालाओंसे पूर्ण था और लपलपाती हुई जीभसे अपना ही बदन चाट रहा था। उसकी दाढ़ोंसे कट-कट शब्द होते थे और आँखें आग उगल रही थीं। नाना शस्त्रोंको धारण करनेवाला वीर-वेष था; उसके सहस्रों मस्तक, नेत्र तथा चरण थे। करोड़ों सूर्य और कोटि विद्युन्मालाओंके समान उसकी देदीप्यमान कान्ति थी। वह महाघोर भीषण रूप हृदय तथा नेत्रोंको आतंक पहुँचानेवाला था।
उसे देखते ही सभी देवता हाहाकार मचाने लगे, सबके हृदय कम्पित हो गये और बेसुध हो गये। उन्हें इतना भी स्मरण न रहा कि ये जगज्जननी देवी हैं।
महेश्वरीके चारों ओर जो वेद मूर्तिमान् होकर खड़े थे, उन्होंने ही देवताओंको मूर्च्छासे जगाया। होशमें आनेपर वे नेत्रोंमें प्रेमाश्रु भरकर गद्गद कण्ठसे स्तवन करने लगे।
स्तुति समाप्त होनेपर उन्हें भयभीत जानकर देवीने परम सुन्दर रूप धारण करके सान्त्वना दी।
(देवीभागवतके आधारपर)