ध्यानयोग

‘भगवत्प्राप्तिके साधन’ और ‘भगवत्प्राप्ति’ दोनोंका ही नाम ‘योग’ है। पहलेमें प्रभुसे मिलनेके उपाय होते हैं और दूसरेमें प्राप्ति—मिलन हो जाता है। उपाय वे ही लोग करते हैं, जो भगवान‍्को मानते हैं और जीव-जीवनकी चरम सिद्धिके लिये उनको प्राप्त करना परम आवश्यक समझते हैं। भगवान‍्को न माननेवाले लोग तो ऐसे योगको अनावश्यक और माननेवालोंको मूर्ख ही बतलाते हैं। अतएव भगवत्प्राप्तिके जितने साधन हैं; वे सब भगवान‍्के माननेवालोंके लिये ही हैं; परंतु माननेवालोंमें भी लाभ वे ही उठा सकते हैं, जो श्रद्धालु, सतत प्रयत्नशील और संयतेन्द्रिय होते हैं—जो सच्ची लगनसे बिना उकताये सदा सावधान और आलस्यरहित रहकर नियमपूर्वक साधन करते हैं। आज किसीकी बात सुनकर उत्साह हुआ, कुछ करने लगे, दो-चार दिनोंके बाद जी ऊब गया, नियमोंको ढीला कर दिया और कुछ दिनों बाद साधन छोड़ बैठे, ऐसे लोगोंको लाभ नहीं होता, और इस प्रकार बिना कुछ किये ही सब कुछ चाहनेवाले ऐसे लोग ही निष्फल होकर विद्रोही भी बन जाते हैं। अतएव साधकोंको चाहिये कि वे जिस ध्येयको प्राप्त करना चाहते हैं, उसीमें सच्ची लगनसे लग जायँ। दूसरी ओर ताकने-झाँकनेकी आवश्यकता ही न समझें। तभी उनको पद-पदपर सफलता होगी और ज्यों-ज्यों सफलता होगी, त्यों-ही-त्यों उनका उत्साह भी अधिक-से-अधिक बढ़ता जायगा। शीघ्रता करनी चाहिये; क्योंकि जीवन बहुत ही थोड़ा है।

सबसे पहली बात है मन लगनेकी। जो जिस वस्तुको परम आवश्यक मानकर उसे प्राप्त करना चाहता है, उसके चित्तसे उस वस्तुका चिन्तन स्वाभाविक ही बार-बार होता है। उसके चित्तमें अपने ध्येय पदार्थकी धारणा दृढ़ हो जाती है और आगे चलकर वही धारणा—चित्तवृत्तियोंके सर्वथा ध्येयाकार बन जानेपर ‘ध्यान’के रूपमें परिणत हो जाती है। जितने कालतक वृत्तियाँ ध्येयाकार रहती हैं, उतने कालकी स्थितिको ध्यान कहा जाता है। ध्यानकी बड़ी महिमा है। भगवान‍्ने श्रीमद्भागवतमें कहा है कि ‘जो पुरुष निरन्तर विषयोंका ध्यान करता है, उसका चित्त विषयोंमें फँस जाता है और जो मेरा ध्यान करता है, वह मुझमें लीन हो जाता है।’ भक्तियोग, ज्ञानयोग, राजयोग, लययोग, मन्त्रयोग, हठयोग और निष्काम कर्मयोग, किसी-न-किसी रूपमें सभी योगोंमें ध्यानकी आवश्यकता और उपयोगिता है। इस ध्यानसे ही भगवान‍्के स्वरूपमें समाधि और ध्यानसे ही भगवान‍्की प्राप्ति भी होती है।

योगदर्शनमें ध्यान अष्टांगयोगमें सातवाँ है। पहले छहों साधन ध्यानमें सहायक हैं, बल्कि उनके करते-करते ही ध्यानकी योग्यता साधकको प्राप्त होती है, ऐसा भी कहा जा सकता है। अतएव सहायक साधनोंका अवश्य ही सम्पादन करना चाहिये। यहाँ संक्षेपमें ध्यानके सहायक कुछ भावों और कार्योंको लिखा जाता है।

गुरु और शास्त्रवचनोंमें प्रत्यक्षवत् विश्वास, साधनमें तत्परता, इन्द्रियों तथा मनको उनके इच्छित सांसारिक विषयोंसे हटाना, तन-मनसे अहिंसा, सत्य, चोरीका अभाव, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, भगवत्स्तुति-प्रार्थना, एकान्तवास, विषयोंसे विरक्ति, अनावश्यक वस्तुओंका सर्वथा त्याग,अन्न-वस्त्र-स्थान आदि आवश्यक वस्तुओंका भी यथासाध्य कम-से-कम संग्रह, अपने ध्येय-सम्बन्धी ग्रन्थोंके सिवा अन्य ग्रन्थोंका न सुनना, न पढ़ना; ध्येयके गुण, प्रभाव और रहस्यकी बातें सुनना; ध्येयके विरुद्ध कुछ भी न सुनना, न देखना और न करना; घर-परिवारमें ममताका त्याग करना, दुराग्रह न करना; अखबार न पढ़ना, सभा-समितियोंसे अलग रहना, प्रसिद्धिसे बचनेकी प्राणपणसे निर्दोष चेष्टा करना, परचर्चा न करना, परदोष न देखना, न चिन्तन करना, न कहना, मधुर-प्रिय बोलना, अनावश्यक न बोलना, यथासाध्य मौन रहना, चित्तको विषाद, अहंकार, ईर्ष्या-द्वेष, आसक्ति, वैर, अभिमान, व्यर्थ चिन्तन आदि दुष्ट भावोंसे बचाना, मान-सम्मान तथा बड़ाई न चाहना, धन और स्त्रीके संगसे और इनके संगियोंसे भी यथासाध्य अलग रहना (इसी प्रकार स्त्री साधकोंको पुरुष-संसर्गसे अलग रहना चाहिये); ध्येयमें प्रीति उत्पन्न करनेवाले सद‍्ग्रन्थोंका स्वाध्याय करना, अपने इष्टके नाम और मन्त्रका निरन्तर विधिपूर्वक सप्रेम जप करना, बार-बार इष्टके गुण, प्रभाव और रहस्यका चिन्तन करना, उनकी दयालुतापर विश्वास रखना, ध्येयकी प्राप्तिमें दृढ़ निश्चय रखना; साधनके स्थान, वस्त्र, आसन, माला, मूर्ति आदि सामग्रियोंको बिना नहाये न स्वयं स्पर्श करना और न दूसरेको—अपने घरके लोगोंतकको किसी भी हालतमें—नहानेपर—भी स्पर्श करने देना, अपनेको किसीसे ऊँचा न समझना, अभिमान या क्रोधका कभी अंकुर भी न आने देना, किसीके स्पर्शसे वे सामग्रियाँ अपवित्र होंगी, ऐसा न मानकर, साधनके वातावरणमें विकृति होगी ऐसा मानना और दूसरोंको नम्रता, प्रेम-आदर और विनयके साथ अपनी कमजोरी तथा साधनके नियम समझाकर साधनसम्बन्धी स्थान और सामग्री आदिसे उनको पृथक् रखना;* न अधिक जागना, न ज्यादा सोना, न अधिक खाना, न निराहार रहना, नशीली चीजें बिलकुल न खाना, मांस-मद्यका सर्वथा त्याग करना, तम्बाकू-गाँजा आदि न पीना, उत्तेजक तथा गरम चीजें न खाना, खट्टी चीजें और अधिक मीठा न खाना, उड़द, लाल मिर्च, सरसों, राई, लहसुन, प्याज और गरम मसाले नहीं खाना, कटहल, गाजर आदि फल न खाना, बेल, संतरा, हर्रे आदिका नियमित सेवन करना, हर किसीके हाथका और हर किसीका अन्न भी न खाना चाहिये। उपर्युक्त बातोंके सिवा नियत स्थानपर, नियत समय, नियत कालतक, नियत आसनपर, नियत आसनसे बैठकर, नियत संख्यामें, नियत इष्ट मन्त्रका जप करते हुए, नियत इष्ट स्वरूपके ध्यानका प्रयत्न करना साधकके लिये परम आवश्यक है।

अवस्थाविशेषमें इन सब बातोंमें कुछ परिवर्तन या न्यूनाधिक करनेमें भी आपत्ति नहीं है, परंतु इनकी ओर खयाल जरूर रहे। ऐसा करनेसे ध्यान सुगमतासे और फलप्रद होता है।

ध्यानके अनेक प्रकार हैं, साधकको अपने-अपने अधिकार, रुचि और अभ्यासकी सुगमता देखकर किसी भी एक प्रकारसे अभ्यास करना चाहिये, परंतु मनमें इतना निश्चय रखना चाहिये कि सत्य तत्त्व परमात्मा एक ही हैं। वह एक ही अनेक रूपोंसे अपनेको धृत करवाते हैं। भक्त जिस रूपमें उन्हें पकड़ना चाहे, वह उसी रूपमें पकड़में आ जाते हैं। निर्गुण, निराकार, सगुण, साकार सभी उन्हींके रूप हैं। श्रीविष्णु, शिव, ब्रह्मा, सूर्य, गणेश, शक्ति, श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि सभी वे एक ही हैं। मार्गके अनुभव भिन्न-भिन्न होते हुए भी सबके अन्तमें प्राप्त होनेवाला सत्य एक ही है। इसी सत्यके कोटिश: विविध प्रकाश हैं, हम किसी भी प्रकाशका अवलम्बन करके उस मूल प्रकाशको पा सकते हैं; क्योंकि ये सभी प्रकाश न्यूनाधिक शक्तिवाले दीखनेपर भी वस्तुत: उस मूल सत्यसे सर्वथा अभिन्न और सर्वथा पूर्ण ही हैं। वे स्वयं ही विभिन्न प्रकाशोंमें अवतीर्ण होकर अपनेको अपने ही सामने प्रकाशित कर रहे हैं। अतएव विभिन्न साधक उन एक अचिन्त्यशक्ति, अनन्तमहिम, अनन्तकल्याण-गुणगणसमन्वित सच्चिदानन्दघन, सर्वव्यापी, सर्वरूप, स्वप्रकाश, सर्वात्मा, सर्वद्रष्टा, अज, अविनाशी, सर्वज्ञ, सर्वसुहृद्, देशकालातीत, गुणातीत, सर्वसद्लक्षणसम्पन्न, सदसत्सर्वगुणसम्पन्न, सर्वातीत, सर्वलोकमय और सर्वलोकमहेश्वर भगवान‍्के इस समग्र रूपको या परमभावको समझकर किसी भी भावसे उनका ध्यान करें, अन्तमें सबको वह एक ही नारायण प्राप्त होंगे, जिनकी प्राप्तिका और स्वरूपका वर्णन बुद्धि और मन-वाणीसे सर्वथा अगम्य है। अतएव साधकोंको न तो अपना इष्टरूप छोड़ना चाहिये और न दूसरेके इष्टको नीचा या अल्प मानना चाहिये। इस प्रकारकी एकत्वबुद्धिसे ध्यानका अभ्यास करनेपर बहुत-से विघ्न सहज ही टल जाते हैं और शीघ्र ही परम सफलता प्राप्त हो सकती है।

ध्यान अभेद या भेद, अथवा अद्वैत या द्वैत इन दोनों भावोंसे किया जाता है। अभेदमें भगवान‍्के ध्यानके निर्गुण निराकार,सगुण निराकार, निर्गुण साकार और सगुण साकार—ये चार भेद हैं। इसी प्रकार भेदमें भी भगवान‍्के ध्यानके निर्गुण निराकार, सगुण निराकार, निर्गुण साकार और सगुण साकार—ये चार भेद हैं।

अद्वैत या अभेद

निर्गुण निराकार—अनिर्वचनीय अचिन्त्य अवाङ्मनसगोचर निष्क्रिय शुद्ध ब्रह्म या शुद्ध आत्मा।

सगुण निराकार—अज अविनाशी सर्वलोकमहेश्वर मायापति सृष्टिकर्ता।

निर्गुण साकार—अज अविनाशी गुणातीत मायातीत दिव्य-विग्रह भगवान्।

सगुण साकार—अज अविनाशी लीलाविहारी अपनी दिव्य प्रकृतिके साथ खेल करते हुए दिव्य-विग्रह भगवान‍् या विराट् विश्वरूप परमात्मा।

अद्वैत या भेद

निर्गुण निराकार—जीवोंपर दया करनेवाले सर्वशक्तिमान् न्यायकारी निर्गुण परमात्मा।

सगुण निराकार—जीवजगत‍्का संचालन करनेवाले सर्वलोकमहेश्वर, विश्वरूप, विश्वकर्ता, विश्वभर्ता और विश्वसंचालक प्रभु।

निर्गुण साकार—भक्तोंकी सुधि लेनेके लिये मायामनुष्यरूपधारी वस्तुत: स्वस्वरूपसे सर्वदा निर्गुण ईश्वर।

सगुण साकार—भक्तोंके साथ लीला करनेवाले समस्त गुणनिधि लीलामय स्वयं भगवान्।

इनके फिर एक-एकके अनेक रूप हैं। इन सब रूपोंमें एक ही सत्य तत्त्व अनुस्यूत है और वह सबमें सब जगह सब ओरसे सब ही भाँति परिपूर्ण है। बुद्धिमान् भगवत्कृपापात्र साधक अपने-अपने भावोंके अनुसार सब रूपोंको किसी एक रूपमें पर्यवसित कर उसका ध्यान करता है। कोई-कोई अल्पमेधस् साधक अपने इष्टको भिन्न मानकर भी ध्यान करते हैं, परन्तु उनका वह ध्येयतत्त्व अल्प और सीमित होनेके कारण उन्हें तात्कालिक फल भी अल्प और सीमित ही मिलता है। जो अल्प और सीमित है वही नाशवान् है, अतएव ऐसे साधक अविनाशी नित्यतत्त्वकी प्राप्तिसे दीर्घकालतक प्राय: वंचित ही रह जाते हैं। अवश्य ही यदि उनका इष्ट सात्त्विक हुआ तो उसकी कृपासे कालान्तरमें पुन: साधनमें प्रवृत्त होकर वे चरमतत्त्वकी प्राप्तिके अधिकारी हो जाते हैं, अतएव न करनेवालोंसे तो वे अल्पकी उपासना करनेवाले भी अच्छे ही हैं।

वास्तवमें भगवान‍्के स्वरूपके सम्बन्धमें कुछ भी लिखना अपनी अल्पज्ञताका परिचय देनामात्र ही है। भगवान‍्के तत्त्वको स्वयं भगवान‍् ही जानते हैं। यह कोई भी नहीं कह सकता कि भगवान‍् ऐसे ही हैं। बहुत दूरकी बात कहनेवाले महान् दार्शनिक भी बहुत इधरकी ही कहते हैं। अतएव किसीकी भी निन्दा न कर भगवान‍्के शास्त्रवर्णित और संतजनसेवित सभी स्वरूपोंको सम्मानकी दृष्टिसे देखना चाहिये। साधकका भाव ऊँचा होगा तो सर्वान्तर्यामी सर्वद्रष्टा सर्वेश्वर परिपूर्णतम भगवान‍् उसे अपना ही ध्यान समझेंगे और उसके फलस्वरूप अपने स्वरूपकी प्राप्ति ही उसे करा देंगे। अस्तु।

अब ध्यानके कुछ प्रकार या विधियाँ जाननेके पहले यह जान लेना आवश्यक है कि ध्यानयोगी साधकके लिये उपयुक्त स्थान, काल और आसन कौन-सा उत्तम है एवं उसे किस आसनसे बैठकर कितने समयतक ध्यानका अभ्यास करना चाहिये।

स्थान—एकान्त हो, पवित्र हो (जहाँ हिंसा, चोरी, मैथुन, छल आदि न होते हों और जहाँ यज्ञ, जप, पूजन, भजन, स्वाध्याय, भगवच्चर्चा आदि होते हों, परंतु ध्यानके समय जहाँ कोई न हो, एकान्त नदी-तट, देवमन्दिर हो, जहाँ शब्दादि न होते हों या उत्तम और सूक्ष्म शब्द होते हों, जो मनोरम और सुन्दर वायुसे सेवित हो, गीला या गरम न हो, जहाँ कंकड़ और गरम बालू न हो, सुपुष्प और धूपादिसे सुगन्धित हो, जहाँ भगवान‍्के सुन्दर चित्र लगे हों)। ऐसा निर्जन स्थान न मिले तो अपने घरमें ही अलग स्वच्छ एकान्त-सा स्थान चुन लेना चाहिये।

काल—ध्यानके लिये सर्वोत्तम समय उषाकाल अथवा रात्रिका अन्तिम प्रहर है, उस समय स्वाभाविक ही बुद्धि सात्त्विक और संस्कारशून्य-सी रहती है। परंतु अन्य समय भी ध्यान किया जा सकता है। हाँ, भोजनके बाद तुरंत ही ध्यान करनेसे प्राय: ध्यान नहीं होता। भूखे पेट ध्यान अच्छा होता है।

आसन—आसन न अधिक ऊँचा हो, न अधिक नीचा हो, पहले कुशासन, उसपर मृगाजिन और उसपर शुद्ध वस्त्र बिछाना चाहिये। ऊनका या केवल नरम कुशोंका आसन भी बिछाया जा सकता है। ऐसे आसनपर पूर्व या उत्तरकी ओर मुख करके बैठना चाहिये।

आसन—स्वस्तिक और पद्मासन सबसे उत्तम हैं। इन आसनोंमें कष्ट भी नहीं है और चित्त भी जल्दी समाहित होता है। बार-बार आसन बदलना ठीक नहीं, एक ही आसनसे निश्चल होकर बैठना चाहिये।

समय—प्रतिदिन तीन घंटे ध्यान किया जा सके तो बहुत उत्तम है, नहीं तो, कम-से-कम एक घंटे तो ध्यानका अभ्यास जरूर करना चाहिये। हो सके तो तीन बारमें तीन घंटे कर ले—प्रात:काल, सन्ध्यासमय और रातको।

ध्यानके समय शरीर, मस्तक और गलेको सीधा रखना चाहिये, रीढ़की हड्डी सीधी रहे। कुबड़ाकर न बैठे। जबतक वृत्ति सर्वथा ध्येयके आकारकी न बने, शरीरका बोध बना रहे और सांसारिक स्फुरणाएँ मनमें उठती रहें, तबतक इष्टमन्त्रका जप करता रहे और बारंबार चित्तको ध्येयमें लगानेकी चेष्टा करता रहे। लय (नींद), विक्षेप, कषाय, रसास्वाद, आलस्य, प्रमाद, दम्भ आदि दोषोंसे बचे रहनेके लिये भी प्रयत्नशील रहे। यह विधि नियमित ध्यानके लिये है। यों साधकको तो सभी समय, सभी क्रियाओंमें खाते-पीते-सोते, उठते-बैठते, सुनते-बोलते, चलते-फिरते चित्तको संसारकी व्यर्थ स्फुरणाओंसे रहित करके अपने इष्टका चिन्तन और ध्यान करना चाहिये। ध्यानके समय आँखें मूँद लेनी चाहिये अथवा नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर रखनी चाहिये।

अब अद्वैत-द्वैत दोनों प्रकारके ध्यानोंके कुछ प्रकारोंका संक्षेपमें दिग्दर्शन कराया जाता है। विशेष बातें अपने-अपने पथप्रदर्शकसे सीखनी और जाननी चाहिये।

अभेद-ध्यान

१—आँखें मूँदकर या नासिकाके अग्रभागपर दृष्टिको स्थिररूपसे जमाकर साधक चित्तकी ओर देखे और उसमें जो कुछ भी वस्तु प्रतीत हो, उसीको कल्पनामात्र जानकर उसका त्याग कर दे। इस प्रकार चित्तमें स्फुरित प्रत्येक वस्तुका त्याग करते-करते शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी भी सत्ता न रहने दे। सबका अभाव करते-करते कुछ कालमें जब सारे दृश्य पदार्थ चित्तवृत्तिसे निकल जाते हैं, तब सबके अभावका निश्चय करनेवाली वह एकमात्र वृत्ति रह जाती है, यही शुभ और शुद्ध वृत्ति है। और सब दृश्य-प्रपंचका अभाव करनेके बाद यह स्वयं भी शान्त हो जाती है। फिर त्याग, त्यागी या त्याज्य वस्तु कुछ भी नहीं रह जाता। इसके बाद जो कुछ बच रहता है, वही चेतनघन परमात्मा है। वह असीम है, अनन्त है और उसीने सब द्रष्टा और भोक्तावृत्तियोंको ग्रस लिया है। और अब वह उपाधिहीन अकेला ही सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है। यह ‘सर्वत्र’ भाव भी उसीमें कल्पित है। वह तो वही है, उसका न कोई वर्णन कर सकता है और न चिन्तन! इस प्रकार विचारपूर्वक दृश्यप्रपंचका अभाव करके अभाव करनेवाली वृत्तिका भी परमात्मामें लय कर देना चाहिये।

२—आँखें मूँदकर दसों इन्द्रियोंके कार्योंको रोककर साधक मनके द्वारा पुन:-पुन: परमात्माके स्वरूपका मनन करे। जो कुछ भी स्फुरणा मनमें आवे, उसीमें परमात्माका भाव करे, यों करते-करते स्फुरणाएँ बंद हो जायँगी; परंतु सावधान, एक भी स्फुरणा परमात्माके भावसे अछूती न रह जाय। फिर केवल एक परमात्मा ही बच रहेंगे, तब उन परमात्माके साथ अपनी एकता कर दे। यदि चित्तमें यह वृत्ति जाग्रत् रहे कि मैं परमात्माका ध्यान कर रहा हूँ तो इस वृत्तिको भी छोड़ दे। यह वृत्ति जब एक परमात्माकी सर्वव्यापक सत्तामें मिल जायगी, तब केवल एक परमात्माका ही बोध रह जायगा।

३—आँखें मूँदकर या नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर ऐसा विचार करे कि जैसे कमरेमें रखे हुए घड़ेका आकाश कमरेसे भिन्न नहीं है और कमरेका आकाश जिस खुले महान् आकाशमें मकान बना है उससे अलग नहीं है, उस खुले आकाशमें ही सब कमरे बने हैं, उन्हींमेंके एक कमरेमें घड़ा है। अतएव सब जगह केवल वही एक महान् आकाश है, कमरे और घड़ेकी उपाधिसे छोटे-बड़े अनेक आकाश दिखायी देते हैं। घड़ेका आकाश अपनी अल्प सीमाको त्यागकर महान् आकाशमें स्थित होकर, जो उसका वास्तविक नित्य स्वरूप है, यदि उस महान‍्की दृष्टिसे देखे तो उसको पता लगेगा कि सब कुछ उसीमें ही कल्पित है और सब कुछमें सत्यस्वरूपसे वही स्थित है। साथ ही कमरे या घड़ेका निर्माण जिस उपादान और निमित्त कारणसे हुआ है, उस उपादान और निमित्त कारणका भी कारण वही आकाश है; क्योंकि पंचभूतोंमें सबसे पहला आकाश ही है। इसी प्रकार व्यष्टि शरीरमेंसे अपने मैंपनको निकालकर विश्वरूप भगवान‍्की समष्टिमें स्थिर करे और समष्टिके नेत्रोंसे समस्त विश्वको अपने शरीरसहित उसीमें कल्पित देखे। जैसे यशोदाजीने भगवान‍्के मुखके अंदर विश्व और उस विश्वमें व्रजके एक ग्राममें नन्दजीका घर और उसमें श्रीबालकृष्णको और हाथमें लकुटिया लिये अपनेको देखा था। इस प्रकार व्यष्टि अहंकारको समष्टिमें लय करके फिर उस समष्टिको भी अचिन्त्य परमात्मामें लय कर दे।

वस्तुत: जड, अनित्य, परिणामी, शून्य, विकारी और सीमित आकाशके साथ चेतन, नित्य, सदा एकरस सच्चिदानन्दघन निर्विकार और असीम पूर्ण परमात्माकी तुलना नहीं हो सकती। यह दृष्टान्त तो केवल समझनेके लिये ही है।

४—आँखें मूँदकर इस प्रकार विचार करे कि इस पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्गादि समस्त भुवनोंमें जो कुछ देखने-सुनने या जाननेमें आता है, वह सब एकमात्र परमात्मा ही हैं। वही विश्वरूपमें प्रकाशित हो रहे हैं। यह समस्त जगत् उन्हींसे निकला है, उन्हींमें स्थित है और उन्हींमें लय हो जायगा। यह सृष्टि, स्थिति और संहारकी लीला उनके अपने ही अंदर उन्हींके द्वारा हो रही है। मैं भी उसी लीलाका एक खिलौनामात्र हूँ और जैसे सारी लीला वही हैं, वैसे ही यह खिलौना भी उनसे भिन्न नहीं है। इस प्रकार विचार करते-करते अपने सहित संसार और संसारके पदार्थोंको एकमात्र परमात्माके स्वरूपमें लीन करके फिर ऐसा निश्चय करनेवाली बुद्धिको भी परमात्मामें विलीन कर दे।

५—आँखें मूँदकर या नासिकाग्रपर स्थिर दृष्टि रखकर ऐसा निश्चय करे कि सत्, चित् और आनन्दसे परिपूर्ण एक महान् समुद्र लहराता हुआ चला आ रहा है और मैं बैठा देख रहा हूँ। इतनेमें ही उसने आकर मुझको अपने अंदर ले लिया और मैं उसकी गहराईमें डूब गया और डूबते ही गलकर उसमें घुल-मिल गया। अब मेरा अलग अस्तित्व ही नहीं रहा। बस, अब केवल वह चेतन आनन्दका अथाह समुद्र ही रह गया। इस प्रकार अपनेको परमात्मामें विलीन करे।

६—आँखें मूँदकर या नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर ऐसा निश्चय करे कि मैं जो कुछ भी देख, सुन और जान रहा था यह सब स्वप्न है। यह चन्द्र, सूर्य, दिशा, काल, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, दिन-रात, देश-वेश—सब कुछ स्वप्नमें मेरे ही अंदर, मेरे ही संकल्पके आधारपर स्थित थे। सब केवल मेरी ही कल्पना थी। अब मैं जग गया हूँ तब वे सब कुछ नहीं रहे, मैं-ही-मैं बच रहा हूँ। वह मैं परमात्मासे भिन्न नहीं हूँ, परमात्मा ही अपने संकल्पसे यह ‘मैं’ बन रहे हैं। उनके सिवा मैं और मेरा स्वप्न यह कुछ भी नहीं है। इस प्रकार विचारद्वारा परमात्मामें चित्तको विलीन कर दे।

७—एकमात्र विज्ञान-आनन्दघन परमात्मा ब्रह्म ही हैं। उनके सिवा न कोई वस्तु है और न कोई स्थान ही है, जिसमें कोई वस्तु रह सके। केवल एक वही परिपूर्ण हैं। उनका यह ज्ञान भी उन्हींको है, क्योंकि वे ज्ञानस्वरूप ही हैं। वे सनातन, निर्विकार, असीम, अपार, अनन्त, अकल और अनवेद्य हैं। सब कुछ उन्हींमें कल्पित है या वही सब कुछ हैं। वे ही सत् हैं, वे ही असत् हैं, वे सत् भी नहीं हैं, असत् भी नहीं हैं। वे आनन्दमय हैं, अवर्णनीय हैं, अचिन्त्य हैं, उनका यह अवर्णनीय आनन्दमय स्वरूप भी आनन्दमय है। यह आनन्दस्वरूप पूर्ण है, नित्य है, सनातन है, अज है, अविनाशी है, परम है, चरम है, सत् है, चेतन है, ज्ञानमय है, कूटस्थ है, अचल है, अमल है, अकल है, अनामय है, अनन्त है, शान्त है और आनन्दमय है। बस, वह आनन्द-ही-आनन्द है। आनन्दके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, है सो आनन्द ही है। इस प्रकार ब्रह्मके आनन्दमयत्वकी मूर्ति चित्तमें प्रकट करके अपनेको उसमें विलीन कर दे।

८—शरीरके सभी मर्मस्थानोंकी भिन्न-भिन्न नाड़ियोंके पृथक्-पृथक् स्थान और कौन-सा वायु कहाँ रहता है तथा क्या करता है, इस शरीरविज्ञानको क्रियारूपमें भलीभाँति जानकर तब आँखें मूँदकर ध्यानके लिये बैठे और ज्योतिर्मय, निर्मल, आकाशवत् सर्वव्यापी, दृढ़, अत्यन्त अचल, नित्य, आदि-मध्य और अन्तरहित, स्थूल होते हुए ही सूक्ष्म, अवकाशरहित, स्पर्शरहित, चक्षुसे अगोचर, रस और गन्धहीन, अप्रमेय, अनुपम, आनन्दरूप, अजर, सत्य, सदसद्‍‍रूप, सर्वकारण, सर्वाधार,विश्वमूर्ति, अमूर्त, अज, अविनाशी, अप्रत्यक्ष और नित्य प्रत्यक्ष, अन्त:स्थ और बहि:स्थ, सब ओर मुख, सब ओर आँखें, सब ओर पैर, सब ओर सिर, सब ओर स्पर्शवाले, सर्वव्यापी ब्रह्मका ध्यान करे और वह ब्रह्म मुझसे अभिन्न है, ऐसा अनुभव करे।

९—आँखें मूँदकर अपने अंदर इस प्रकार देखे कि कन्दसे निकले हुए बारह अंगुल नलीवाले चार अंगुल चौड़े, ऊर्ध्वमुख, केशरयुक्त, कर्णिकासमन्वित, प्राणायामद्वारा विकसित आठ दलवाले हृदयकमलपर सब प्राणियोंके हृदयमें रहनेवाले पुरुषोत्तम, देवपति, अच्युत, अजन्मा, अविनाशी, सृष्टिकर्ता, विभु लक्ष्मीपति भगवान‍् विराजमान हैं। उनकी चारों भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं, भगवान‍्के अंग केयूर और कुण्डल तथा अन्य आभूषणोंसे सुशोभित हैं, उनके वक्ष:स्थलमें श्रीवत्सका चिह्न है। पद्मोदर-सदृश ओष्ठ हैं, प्रसन्नवदन हैं, मन्द-मन्द निर्मल हँसी हँस रहे हैं, विशुद्ध स्फटिकके समान वर्ण है, पीताम्बर पहने हुए हैं और अपने दिव्य प्रकाशसे प्रकाशित हो रहे हैं। इस प्रकार ध्यान करके यह देखे कि मैं उन्हींमें विलीन हो गया। वह परमात्मा मुझसे भिन्न नहीं रहे।

१०—आँखें मूँदकर भीतर इस प्रकार देखे कि प्रकृतिरूपी कर्णिकासे युक्त, अष्ट ऐश्वर्यरूपी दलोंसे शोभित, विद्यारूपी केशर और ज्ञानरूपी नलिकासे समन्वित, बृहत् कन्दसे संलग्न और प्राणायामद्वारा खिला हुआ हृदयमें एक कमल है। उस कमलमें सर्वत्र तेजोमय, सर्वतोमुखी शिखाओंसे सुशोभित, जगत‍्के कारण ईश्वररूपी हव्यवाहन वैश्वानर महा-अग्नि देहको चरणोंसे लेकर मस्तकतक तप्त करते हुए निर्वात दीपकी तरह निश्चल ज्योतिरूपसे विराजित हैं, उनकी उन ज्योतिर्मय लपटोंमें नीलपद्मके अंदर विद्युत् की लताकी भाँति दीप्तिमान् पीतवर्ण, विश्वचराचरके कारणरूप वैश्वानररूपी अक्षर देवता परमात्मा स्थित हैं। वह परमात्मा ही मैं हूँ। इस प्रकार निश्चय करे और अपनेको उनमें विलीन कर दे।

११—आँखें मूँदकर अथवा अभ्यास हो जानेपर प्रत्यक्ष सूर्य-मण्डलमें देखे कि दिव्य रथके अंदर पद्मासनपर विश्वात्मा चतुर्मुख परम सुन्दर प्रफुल्ल कमलसदृश मुखमण्डलवाले हिरण्यवर्ण पुरुष विराजित हैं, उनके केश, मूँछें और नख भी हिरण्यमय हैं। उनका दर्शन पापोंको नाश करनेवाला है, वे सब लोगोंको अभय देनेवाले हैं। उनके ललाटकी आभा पद्मके गर्भपत्रके समान लाल है। वे समस्त जगत‍्के प्रकाशक और सब लोगोंके अद्वितीय साक्षी हैं। मुनिजन उनका दर्शन और स्तवन कर रहे हैं। ऐसे भगवान‍् आदित्यका दर्शन करके यह निश्चय करे कि वह आदित्य मुझसे अभिन्न है और इस निश्चयके साथ ही अपनेको उनमें चित्तवृत्तिके द्वारा विलीन कर दे।

१२—कर्णिका और केशरसे युक्त अष्टदल हृदयकमलमें चन्द्र-मण्डलके मध्य विराजित गर्भाकार भोक्तारूप अक्षर आत्माको देखे और ऐसा निश्चय करे कि उस आत्मामें मैं ही हूँ और वह आत्मारूप मैं अमृतवर्षा करनेवाली चन्द्रकिरणोंसे घिरा हुआ हूँ, सिरमें स्थित अधोमुखी षोडशदल कमलसे गल-गलकर अमृतकी धाराएँ हजारों प्रकारसे मेरे चारों ओर बह रही हैं। वह अव्यय परमात्मा परब्रह्म मैं ही हूँ।

भेद-ध्यान

१३—योगीश्वर शिवका ध्यान

हिमालयके गौरीशंकर शिखरपर एकान्तमें भगवान‍् शिव ध्यानस्थ पद्मासनसे विराजित हैं। उनके शरीरके ऊपरका भाग निश्चल, सीधा और समुन्नत है। दोनों कंधे बराबर हैं। वे दोनों हाथ अपनी गोदमें रखे हुए हैं, जान पड़ता है मानो कमल खिल गया है। जटाजूट चूड़ाके समान ऊँचा करके सर्पके द्वारा बाँधा हुआ है, दोनों कानोंमें रुद्राक्षमाला है, ओढ़ी हुई काली मृगछालाकी श्यामता नीलकण्ठकी प्रभासे और भी घनीभूत हो रही है। उनके तीनों नेत्र नासिकाके अग्रभागपर स्थिर हैं। नासिकाग्रपर स्थित नीचेकी ओर झुके हुए स्थिर और नि:स्पन्द उनके नेत्रोंसे उज्ज्वल ज्योति निकलकर इधर-उधर छिटक रही है। उन्होंने समाधि-अवस्थामें देहके अंदर रहनेवाले वायुसमूहको निरुद्ध कर रखा है, जिसे देखकर जान पड़ता है मानो वे जलपूर्ण और आडम्बररहित बरसनेवाले बादल हैं अथवा तरंगहीन प्रशान्त महासागर हैं या निर्वातदेशमें स्थित निष्कल ज्योतिर्मय दीपक हैं। ऐसे समाधिस्थित योगीश्वर भगवान‍् शंकरका ध्यान करे।

१४—पंचमुख महेश्वरका ध्यान

आँखें मूँदकर देखे कि सामने एक सुन्दर कमल है, उस कमलपर भगवान‍् महेश्वर विराजमान हैं। उनके शरीरकी कान्ति चाँदीके पहाड़के समान श्वेत और सुन्दर है; मस्तकपर चन्द्रमा विराजमान है, रत्नोंके समान उज्ज्वल सब अंग हैं, एक हाथमें कुठार है और शेष तीन हाथोंमें मृगमुद्रा, वरमुद्रा और अभयमुद्रा धारण किये हैं। प्रसन्न पाँच मुख हैं और तीन नेत्र हैं। व्याघ्रका चर्म पहने हुए हैं, चारों ओर देवता स्तुति कर रहे हैं। यही भगवान‍् महेश जगत‍्के आदि, बीजस्वरूप और सब भयोंका नाश करनेवाले हैं।

१५—श्रीभुवनेश्वरी देवीका ध्यान

जिनकी प्रात:कालीन सूर्यकिरणके सदृश देहकान्ति है, जिनके ललाटपर अर्धचन्द्र-मुकुट सुशोभित है, जिनका विशाल वक्ष:स्थल है, जिनके तीन नेत्र हैं और जो मन्द-मन्द मुसकरा रही हैं, जिनके चारों हाथ वरमुद्रा, अंकुश, पाश और अभयमुद्रासे शोभित हो रहे हैं, उन श्रीभुवनेश्वरी देवीका ध्यान करना चाहिये।

१६—श्रीजगज्जननी उमाका ध्यान

जिनकी देहकान्ति स्वर्णके समान सुन्दर है, जिनके बायें हाथमें नीलपद्म है और दाहिने हाथमें अत्यन्त श्वेतवर्ण चामर है, उन उमा देवीका ध्यान करना चाहिये।

१७—श्रीविष्णुभगवान‍्का ध्यान

आँखें मूँदकर देखे कि हृदयकमलपर या अपने सामने जमीनसे कुछ ऊँचेपर स्थित एक सहस्रदल कमलपर भगवान‍् श्रीविष्णु सुशोभित हैं। आप सब अनुरूप अंगोंसे समन्वित हैं, अति शान्त, सुन्दर मुखारविन्द है, आपके विशाल और मनोहर चार लंबी भुजाएँ हैं, ग्रीवा अत्यन्त रमणीय और सुन्दर है, परम सुन्दर कपोल हैं, मुखमण्डल मनोहर मन्द मुसकानसे सुशोभित है। लाल-लाल होंठ और मनोहर नुकीली नासिका है। दोनों कानोंमें मकराकृति कुण्डल चमक रहे हैं। मनोहर सुन्दर चिबुक है। नेत्र कमलके समान विशाल और प्रफुल्लित हैं। मेघश्याम शरीरपर सुवर्णवर्ण पीताम्बर शोभायमान है। लक्ष्मीजीके निवासस्थान वक्ष:स्थलमें श्रीवत्सका चिह्न है। हाथोंमें शंख, चक्र, गदा, पद्म, हृदयमें सुन्दर तुलसीयुक्त वनमाला, रत्नहार, वैजयन्तीमाला और कौस्तुभमणि विभूषित हैं। चरणोंमें रत्नजटित बजनेवाले नूपुर हैं और मस्तकपर किरीट-मुकुट देदीप्यमान है। ललाटपर मनोहर तिलक है। हाथोंमें रत्नोंके कड़े, कमरमें रत्नजटित करधनी, भुजाओंमें बाजूबंद और हाथकी अंगुलियोंमें रत्नकी अँगूठियाँ सुशोभित हैं। आपके घुँघराले केश बड़े ही मनोहर हैं। चारों ओर प्रकाश छा रहा है और उसमेंसे आनन्दका अपार सागर उमड़ रहा है।

१८—शेषशायी विष्णुभगवान‍्का ध्यान

आँखें मूँदकर देखे कि हृदयदेशमें मानो क्षीरसमुद्र है और उसमें भगवान‍् अनन्त शेषजीकी कोमल शय्यापर शान्तस्वरूप भगवान‍् श्रीविष्णु लेटे हुए हैं। अत्यन्त सौम्य और प्रसन्न मुखमण्डल है। नीले मेघके समान मनोहर नीलवर्ण है। सभी अंग परम सुन्दर हैं और विविध आभूषणोंसे विभूषित हैं। श्रीअंगसे दिव्य गन्ध निकल रही है, नाभिमेंसे कमल निकला है, उस कमलपर चतुर्मुख ब्रह्माजी विराजमान हैं। जगज्जननी लक्ष्मीजी बैठी हुई भगवान‍्की चरणसेवा कर रही हैं। ऐसे सम्पूर्ण लोकोंके स्वामीके चरणोंमें मैं प्रणाम करता हूँ और भगवान‍् प्रसन्न होकर मेरे मस्तकपर अपना वरद हस्त रखते हैं। असंख्य सूर्योंसे बढ़कर आपका प्रकाश, असंख्य चन्द्रमाओंसे बढ़कर शीतलता, असंख्य कामदेवोंको मोहित करनेवाला आपका सौन्दर्य, असंख्य अग्नियोंसे बढ़कर आपका तेज, असंख्य इन्द्र और कुबेरोंसे बढ़कर आपका ऐश्वर्य, असंख्य समुद्रोंसे बढ़कर आपका गाम्भीर्य, असंख्य हरिश्चन्द्र और कर्णसे बढ़कर आपका औदार्य, असंख्य पृथ्वीमण्डलोंसे बढ़कर आपकी क्षमाशीलता, असंख्य जननियोंसे बढ़कर आपका वात्सल्य और असंख्य प्रियतमोंसे बढ़कर आपका माधुर्य है।

१९—श्रीसीतारामका ध्यान

कालाम्भोधरकान्तिकान्तमनिशं

वीरासनाध्यासिनं।

मुद्रां ज्ञानमयीं दधानमपरं

हस्ताम्बुजं जानुनि।

सीतां पार्श्वगतां सरोरुहकरां

विद्युन्निभां राघवं

पश्यन्तं मुकुटांगदादिविविधा-

कल्पोज्ज्वलांगं भजे॥

भगवान‍् श्रीरामकी देहकान्ति मेघके समान श्याम वर्ण है, वे बड़े ही कोमलांग हैं और वीरासनसे बैठे हुए हैं, उनके एक हाथमें ज्ञानमुद्रा है और दूसरा हाथ जानुपर रखा हुआ है, उनके वाम पार्श्वमें पद्महस्ता विद्युत् की भाँति तेजोमयी सीता देवी विराजित हैं और श्रीराम उनकी ओर देख रहे हैं। श्रीरामचन्द्रके मस्तकपर रत्नमुकुट है और बाजूबंद आदि विविध रत्नमण्डित आभूषणोंसे शरीर प्रकाशित हो रहा है; ऐसे श्रीराघवका हम ध्यान करते हैं।

२०—श्रीरामके बालरूपका ध्यान

काम कोटि छबि स्याम सरीरा।

नील कंज बारिद गंभीरा॥

अरुन चरन पंकज नख जोती।

कमल दलन्हि बैठे जनु मोती॥

रेख कुलिस ध्वज अंकुस सोहे।

नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे॥

कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा।

नाभि गभीर जान जेहिं देखा॥

भुज बिसाल भूषन जुत भूरी।

हियँ हरि नख अति सोभा रूरी॥

उर मनिहार पदिक की सोभा।

बिप्र चरन देखत मन लोभा॥

कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई।

आनन अमित मदन छबि छाई॥

दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे।

नासा तिलक को बरनै पारे॥

सुंदर श्रवन सुचारु कपोला।

अति प्रिय मधुर तोतरे बोला॥

चिक्‍कन कच कुंचित गभुआरे।

बहु प्रकार रचि मातु सँवारे॥

पीत झगुलिआ तनु पहिराई।

जानु पानि बिचरनि मोहि भाई॥

(श्रीरामचरितमानस)

उनके नील कमल और गम्भीर (जलसे भरे हुए) मेघके समान श्यामशरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी शोभा है। लाल-लाल चरण-कमलोंके नखोंकी [शुभ्र] ज्योति ऐसी मालूम होती है जैसे [लाल] कमलके पत्तोंपर मोती स्थिर हो गये हों। [चरणतलोंमें] वज्र, ध्वजा और अंकुशके चिह्न शोभित हैं। (नूपुर पैंजनी)-की ध्वनि सुनकर मुनियोंका भी मन मोहित हो जाता है। कमरमें करधनी और पेटपर तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं। नाभिकी गम्भीरताको तो वही जानते हैं जिन्होंने उसे देखा है। बहुत-से आभूषणोंसे सुशोभित विशाल भुजाएँ हैं। हृदयपर बाघके नखकी बहुत ही निराली छटा है। छातीपर रत्नोंसे युक्त मणियोंके हारकी शोभा और ब्राह्मण (भृगु)-के चरण-चिह्नको देखते ही मन लुभा जाता है। कण्ठ शंखके समान (उतार-चढ़ाववाला, तीन रेखाओंसे सुशोभित) है और ठोड़ी बहुत ही सुन्दर है। मुखपर असंख्य कामदेवोंकी छटा छा रही है। दो-दो सुन्दर दँतुलियाँ हैं, लाल-लाल होठ हैं। नासिका और तिलक [के सौन्दर्य]-का तो वर्णन ही कौन कर सकता है। सुन्दर कान और बहुत ही सुन्दर गाल हैं, मधुर तोतले शब्द बहुत ही प्यारे लगते हैं। जन्मके समयसे रखे हुए चिकने और घुँघराले बाल हैं, जिनको माताने बहुत प्रकारसे बनाकर सँवार दिया है। शरीरपर पीली झँगुली पहनायी हुई है। उनका घुटना और हाथोंके बल चलना मुझे बहुत ही प्यारा लगता है।

२१—श्रीराम-लक्ष्मणके किशोररूपका ध्यान

पीत बसन परिकर कटि भाथा।

चारु चाप सर सोहत हाथा॥

तन अनुहरत सुचंदन खोरी।

स्यामल गौर मनोहर जोरी॥

केहरि कंधर बाहु बिसाला।

उर अति रुचिर नागमनि माला॥

सुभग सोन सरसीरुह लोचन।

बदन मयंक तापत्रय मोचन॥

कानन्हि कनक फूल छबि देहीं।

चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं॥

चितवनि चारु भृकुटिबर बाँकी।

तिलक रेख सोभा जनु चाँकी॥

रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस।

नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस॥

(श्रीरामचरितमानस)

[दोनों भाइयोंके] पीले रंगके वस्त्र हैं, कमरके [पीले] दुपट्टोंमें तरकस बँधे हैं। हाथोंमें सुन्दर धनुष-बाण सुशोभित हैं। [श्याम और गौर वर्णके] शरीरोंके अनुकूल (अर्थात् जिसपर जिस रंगका चन्दन अधिक फबे उसपर उसी रंगके) सुन्दर चन्दनकी खौर लगी है। साँवरे और गोरे [रंग]-की मनोहर जोड़ी है। सिंहके समान (पुष्ट) गर्दन (गलेका पिछला भाग) है; विशाल भुजाएँ हैं। [चौड़ी] छातीपर अत्यन्त सुन्दर गजमुक्ताकी माला है। सुन्दर लाल कमलके समान नेत्र हैं। तीनों पापोंसे छुड़ानेवाला चन्द्रमाके समान मुख है। कानोंमें सोनेके कर्णफूल [अत्यन्त] शोभा दे रहे हैं और देखते ही [देखनेवालेके] चित्तको मानो चुरा लेते हैं। उनकी चितवन (दृष्टि) बड़ी मनोहर है और भौंहें तिरछी एवं सुन्दर हैं। [माथेपर] तिलककी रेखाएँ ऐसी सुन्दर हैं मानो [मूर्तिमती] शोभापर मुहर लगा दी गयी है। सिरपर सुन्दर चौकोनी टोपियाँ [दिये] हैं, काले और घुँघराले बाल हैं। दोनों भाई नखसे लेकर शिखातक (एड़ीसे चोटीतक) सुन्दर हैं और सारी शोभा जहाँ जैसी चाहिये, वैसी ही है।

२२—जनकपुरकी फुलवारीमें श्रीराम-लक्ष्मणका ध्यान

सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा।

नील पीत जलजाभ सरीरा॥

मोरपंख सिर सोहत नीके।

गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के॥

भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए।

श्रवन सुभग भूषन छबि छाए॥

बिकट भृकुटि कच घूघरवारे।

नव सरोज लोचन रतनारे॥

चारु चिबुक नासिका कपोला।

हास बिलास लेत मनु मोला॥

मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं।

जो बिलोकि बहु काम लजाहीं॥

उर मनि माल कंबु कल गीवा।

काम कलभ कर भुज बलसींवा॥

सुमन समेत बाम कर दोना।

सावँर कुअँर सखी सुठि लोना॥

केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान।

देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान॥

(श्रीरामचरितमानस)

दोनों सुन्दर भाई शोभाकी सीमा हैं। उनके शरीरकी आभा नीले और पीले कमलकी-सी है। सिरपर सुन्दर मोरपंख सुशोभित हैं। उनके बीच-बीचमें फूलोंकी कलियोंके गुच्छे लगे हैं। माथेपर तिलक और पसीनेकी बूँदें शोभायमान हैं। कानोंमें सुन्दर भूषणोंकी छबि छायी है। टेढ़ी भौंहें और घुँघराले बाल हैं। नये लाल कमलके समान रतनारे (लाल) नेत्र हैं। ठोड़ी, नाक और गाल बड़े सुन्दर हैं और हँसीकी शोभा मनको मोल लिये लेती है। मुखकी छबि तो मुझसे कही ही नहीं जाती, जिसे देखकर बहुत-से कामदेव लजा जाते हैं। वक्ष:स्थलपर मणियोंकी माला है, शंखके सदृश सुन्दर गला है। कामदेवके हाथीके बच्चेकी सूँड़के समान (उतार-चढ़ाववाली एवं कोमल) भुजाएँ हैं, जो बलकी सीमा हैं। जिसके बायें हाथमें फूलोंसहित दोना है, हे सखि! वह साँवला कुँवर तो बहुत ही सलोना है। सिंहकी-सी (पतली-लचीली) कमरवाले, पीताम्बर धारण किये हुए, शोभा और शीलके भण्डार, सूर्यकुलके भूषण श्रीरामचन्द्रजीको देखकर सखियाँ अपने-आपको भूल गयीं।

२३—धनुषयज्ञमें श्रीराम-लक्ष्मणका ध्यान

राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर।

सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर॥

सहज मनोहर मूरति दोऊ।

कोटि काम उपमा लघु सोऊ॥

सरद चंद निंदक मुख नीके।

नीरज नयन भावते जी के॥

चितवनि चारु मार मनु हरनी।

भावति हृदय जाति नहीं बरनी॥

कल कपोल श्रुति कुंडल लोला।

चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला॥

कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा।

भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥

भाल बिसाल तिलक झलकाहीं।

कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं॥

पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाईं।

कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं॥

रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ।

जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ॥

कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल।

बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल॥

कटि तूनीर पीत पट बाँधें।

कर सर धनुष बाम बर काँधें॥

पीत जग्य उपबीत सुहाए।

नख सिख मंजु महाछबि छाए॥

(श्रीरामचरितमानस)

सुन्दर, साँवले और गौर शरीरवाले तथा विश्वभरके नेत्रोंको चुरानेवाले कोसलाधीशके कुमार राजसमाजमें [इस प्रकार] सुशोभित हो रहे हैं। दोनों मूर्तियाँ स्वभावसे ही (बिना किसी बनाव-शृंगारके) मनको हरनेवाली हैं। करोड़ों कामदेवोंकी उपमा भी उनके लिये तुच्छ है। उनके सुन्दर मुख शरद् [पूर्णिमा]-के चन्द्रमाकी भी निन्दा करनेवाले (उसे नीचा दिखानेवाले) हैं और कमलके समान नेत्र मनको बहुत ही भाते हैं। सुन्दर चितवन [सारे संसारके मनको हरनेवाले] कामदेवके मनको भी हरनेवाली है। वह हृदयको बहुत ही प्यारी लगती है। पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुन्दर गाल हैं, कानोंमें चंचल (झूमते हुए) कुण्डल हैं। ठोड़ी और अधर (ओठ) सुन्दर हैं, कोमल वाणी है। हँसी चन्द्रमाकी किरणोंका तिरस्कार करनेवाली है। भौंहें टेढ़ी और नासिका मनोहर है। [ऊँचे] चौड़े ललाटपर तिलक झलक रहे हैं (दीप्तिमान् हो रहे हैं)। [काले घुँघराले] बालोंको देखकर भौंरोंकी पंक्तियाँ भी लजा जाती हैं। पीली चौकोनी टोपियाँ सिरोंपर सुशोभित हैं, जिनके बीच-बीचमें फूलोंकी कलियाँ बनायी (काढ़ी) हुई हैं। शंखके समान सुन्दर (गोल) गलेमें मनोहर तीन रेखाएँ हैं, जो मानो तीनों लोकोंकी सुन्दरताकी सीमा [को बता रही] हैं। हृदयोंपर गजमुक्ताओंके सुन्दर कंठे और तुलसीकी मालाएँ सुशोभित हैं। उनके कंधे बैलोंके कंधेकी तरह [ऊँचे तथा पुष्ट] हैं, ऐंड (खड़े होनेकी शान) सिंहकी-सी है और भुजाएँ विशाल एवं बलकी भण्डार हैं। कमरमें तरकस और पीताम्बर बाँधे हैं। [दाहिने] हाथोंमें बाण और बायें सुन्दर कंधोंपर धनुष तथा पीले यज्ञोपवीत (जनेऊ) सुशोभित हैं। नखसे लेकर शिखातक सब अंग सुन्दर हैं, उनपर महान् शोभा छायी हुई है।

२४—श्रीरामका वरवेशमें ध्यान

स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन।

सोभा कोटि मनोज लजावन॥

जावक जुत पद कमल सुहाए।

मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए॥

पीत पुनीत मनोहर धोती।

हरति बाल रबि दामिनि जोती॥

कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर ।

बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥

पीत जनेउ महाछबि देई।

कर मुद्रिका चोरि चितु लेई॥

सोहत ब्याह साज सब साजे।

उर आयत उरभूषन राजे॥

पिअर उपरना काखासोती।

दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती॥

नयन कमल कल कुंडल काना।

बदनु सकल सौंदर्ज निधाना॥

सुंदर भृकुटि मनोहर नासा।

भाल तिलकु रुचिरता निवासा॥

सोहत मौरु मनोहर माथे।

मंगलमय मुकुता मनि गाथे॥

(श्रीरामचरितमानस)

श्रीरामचन्द्रजीका साँवला शरीर स्वभावसे ही सुन्दर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवोंको लजानेवाली है। महावरसे युक्त चरणकमल बड़े सुहावने लगते हैं। जिनपर मुनियोंके मनरूपी भौंरे सदा छाये रहते हैं। पवित्र और मनोहर पीली धोती प्रात:कालके सूर्य और बिजलीकी ज्योतिको हरे लेती है। कमरमें सुन्दर किंकिणी और कटिसूत्र हैं। विशाल भुजाओंमें सुन्दर आभूषण सुशोभित हैं। पीला जनेऊ महान् शोभा दे रहा है। हाथकी अँगूठी चित्तको चुरा लेती है। ब्याहके सब साज सजे हुए वे शोभा पा रहे हैं। चौड़ी छातीपर—हृदयपर पहननेके सुन्दर आभूषण सुशोभित हैं। पीला दुपट्टा काँखासोती (जनेऊकी तरह) शोभित है, जिसके दोनों छोरोंपर मणि और मोती लगे हैं। कमलके समान सुन्दर नेत्र हैं। कानोंमें सुन्दर कुण्डल हैं और मुख तो सारी सुन्दरताका खजाना ही है। सुन्दर भौंहें और मनोहर नासिका है। ललाटपर तिलक तो सुन्दरताका घर ही है। जिसमें मंगलमय मोती और मणि गूँथे हुए हैं, ऐसा मनोहर मौर माथेपर सोह रहा है।

२५—वनवेशमें श्रीराम-लक्ष्मणका ध्यान

मुदित नारि नर देखहिं सोभा।

रूप अनूप नयन मनु लोभा॥

एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा।

रामचंद्र मुख चंद चकोरा॥

तरुन तमाल बरन तनु सोहा।

देखत कोटि मदन मनु मोहा॥

दामिनि बरन लखन सुठि नीके।

नख सिख सुभग भावते जी के॥

मुनिपट कटिन्ह कसें तू नीरा।

सोहहिं कर कमलनि धनु तीरा॥

जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।

सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल॥

(श्रीरामचरितमानस)

स्त्री-पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं। अनुपम रूपने उनके नेत्र और मनोंको लुभा लिया है। सब लोग टकटकी लगाये श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रको चकोरकी तरह (तन्मय होकर) देखते हुए चारों ओर सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजीका नवीन तमालके वृक्षके रंगका (श्याम) शरीर अत्यन्त शोभा दे रहा है, जिसे देखते ही करोड़ों कामदेवोंके मन मोहित हो जाते हैं। बिजलीके-से रंगके लक्ष्मणजी बहुत ही भले मालूम होते हैं। वे नखसे शिखातक सुन्दर हैं और मनको बहुत भाते हैं। दोनों मुनियोंके (वल्कल आदि) वस्त्र पहने हैं और कमरमें तरकस कसे हुए हैं। कमलके समान हाथोंमें धनुष-बाण शोभित हो रहे हैं। उनके सिरोंपर सुन्दर जटाओंके मुकुट हैं; वक्ष:स्थल, भुजा और नेत्र विशाल हैं और शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखोंपर पसीनेकी बूँदोंका समूह शोभित हो रहा है।

२६—वनवेशमें श्रीसीता-राम-लक्ष्मणका ध्यान

सजनी! हैं कोउ राजकुमार।

पंथ चलत मृदु पद-कमलनि दोउ

सील-रूप आगार॥ १॥

आगे राजिवनैन स्याम-तनु,

सोभा अमित अपार।

डारौं वारि अंग-अंगनि पर,

कोटि कोटि सत मार॥ २॥

पाछें गौर किसोर मनोहर,

लोचन-बदन उदार।

कटि तूनीर कसे, कर सर धनु,

चले हरन छिति-भार॥ ३॥

जुगुल बीच सुकुमारि नारि इक

राजति बिनहि सिंगार।

इन्द्रनील, हाटक, मुकुतामनि

जनु पहिरे महि हार॥ ४॥

अवलोकहु भरि नैन, बिकल जनि

होहु, करहु सुबिचार।

पुनि कहँ यह सोभा, कहँ लोचन

देह-गेह संसार?॥ ५॥

सुनि प्रिय-बचन चितै हित कै

रघुनाथ कृपा-सुखसार।

तुलसिदास प्रभु हरे सबन्हिके

मन, तन रही न सँभार॥ ६॥

(गीतावली)

‘अरी सजनी! ये कोई राजकुमार हैं। ये दोनों ही शील और रूपके भण्डार हैं तथा मार्गमें अपने मृदुल चरणकमलोंसे पैदल ही चल रहे हैं। आगे तो कमलनयन और श्याम शरीरवाले कुँवर हैं, जिनकी शोभा अतुलित और अपार है। उनके एक-एक अंगपर मैं सैकड़ों करोड़ कामदेव निछावर करती हूँ और पीछे गौर वर्ण, मनोहर किशोरावस्थावाले लाल हैं। उनके नेत्र और मुख भी बड़े ही सुन्दर हैं। वे कमरमें तरकस कसकर और हाथोंमें धनुष-बाण लेकर मानो पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही जा रहे हैं। दोनोंके बीचमें एक सुकुमारी नारी बिना ही शृंगार किये सुशोभित हो रही है। ये तीनों मिलकर ऐसे जान पड़ते हैं मानो पृथ्वी इन्द्रनील, सुवर्ण और मुक्तामणिका हार पहने हुए हो। इन्हें तनिक नेत्र भरकर देख लो, व्याकुल मत होओ, तनिक विचार लो, फिर कहाँ यह शोभा मिलेगी? कहाँ हमारे नेत्र होंगे और कहाँ इस संसारमें ये घर और शरीर रहेंगे। ये प्रिय वचन सुनकर कृपा और सुखके सारस्वरूप भगवान‍् रामने उनकी ओर प्रीतिपूर्वक देखा। तुलसीदास कहते हैं, ऐसा करके प्रभुने उन सबके चित्त चुरा लिये और उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि न रही।

२७—सुबेल पर्वतपर श्रीरामका ध्यान

सिखर एक उतंग अति देखी।

परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी॥

तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए।

लछिमन रचि निज हाथ डसाए॥

ता पर रुचिर मृदुल मृगछाला।

तेहिं आसन आसीन कृपाला॥

प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा ।

बाम दहिन दिसि चाप निषंगा॥

दुहुँ कर कमल सुधारत बाना।

कह लंकेस मंत्र लगि काना॥

बड़भागी अंगद हनुमाना।

चरन कमल चापत बिधि नाना॥

प्रभु पाछें लछिमन बीरासन।

कटि निषंग कर बान सरासन॥

(श्रीरामचरितमानस)

पर्वतका एक बहुत ऊँचा, परम रमणीय, समतल और विशेषरूपसे उज्ज्वल शिखर देखकर—वहाँ लक्ष्मणजीने वृक्षोंके कोमल पत्ते और सुन्दर फूल अपने हाथोंसे सजाकर बिछा दिये। उसपर सुन्दर और कोमल मृगछाला बिछा दी। उसी आसनपर कृपालु श्रीरामजी विराजमान थे। प्रभु श्रीरामजी वानरराज सुग्रीवकी गोदमें अपना सिर रखे हैं। उनके बायीं ओर धनुष तथा दाहिनी ओर तरकस [रखा] है। वे अपने दोनों कर-कमलोंसे बाण सुधार रहे हैं। विभीषणजी कानोंसे लगकर सलाह कर रहे हैं। परम भाग्यशाली अंगद और हनुमान‍् अनेकों प्रकारसे प्रभुके चरणकमलोंको दबा रहे हैं। लक्ष्मणजी कमरमें तरकस कसे और हाथोंमें धनुष-बाण लिये वीरासनसे प्रभुके पीछे सुशोभित हैं।

२८—रणविजयी श्रीरामका ध्यान

राजत राम काम-सत-सुंदर।

रिपु रन जीति अनुज सँग सोभित,

फेरत चाप-बिसिष बनरुह-कर॥ १॥

स्याम सरीर रुचिर श्रम-सीकर,

सोनित-कन बिच बीच मनोहर।

जनु खद्योत-निकर, हरिहित-गन,

भ्राजत मरकत-सैल-सिखरपर॥ २॥

घायल बीर बिराजत चहुँ दिसि,

हरषित सकल रिच्छ अरु बनचर।

कुसुमित किंसुक-तरु-समूह महँ,

तरुन तमाल बिसाल बिटप बर॥ ३॥

राजिव-नयन बिलोकि कृपा करि,

किए अभय मुनि-नाग, बिबुध-नर।

‘तुलसिदास’ यह रूप अनूपम

हिय-सरोज बसि दुसह बिपतिहर॥ ४॥

(गीतावली)

अपने शत्रु रावणको युद्धस्थलमें जीतकर भगवान‍् राम भाईके साथ विराजमान हैं। इस समय वे सैकड़ों कामदेवोंसे भी सुन्दर जान पड़ते हैं और अपना करकमल धनुष और बाणपर फेर रहे हैं। उनके श्याम शरीरपर पसीनेकी सुन्दर बूँदें और बीच-बीचमें मनोहर रुधिरकण शोभायमान हैं; मानो किसी मरकतमणिके पर्वतशिखरपर पटबीजनोंके समूहमें वीर बहूटियाँ शोभा पा रही हों। उनके चारों ओर घायल वीर बैठे हुए हैं। वे सम्पूर्ण रीछ-वानर बड़े ही प्रसन्न हैं। उस समय प्रभु ऐसे जान पड़ते हैं मानो फूले हुए किंशुक-वृक्षोंके बीचमें एक अति विशाल और तरुण तमाल-वृक्ष हो। उस समय कमलनयन भगवान‍् रामने कृपादृष्टिसे देखकर सब मुनि, नाग, देवता और मनुष्योंको निर्भय कर दिया। तुलसीदासजी कहते हैं, यह दु:सह विपत्तिको दूर करनेवाला अनुपम रूप हमारे हृदय-कमलमें विराजमान रहे।

२९—सिंहासनारूढ श्रीरामका ध्यान

नवदूर्वादलश्यामं पद्मपत्रायतेक्षणम्॥

रविकोटिप्रभायुक्तकिरीटेन विराजितम्।

कोटिकन्दर्पलावण्यं पीताम्बरसमावृतम्॥

दिव्याभरणसम्पन्नं दिव्यचन्दनलेपनम्।

अयुतादित्यसंकाशं द्विभुजं रघुनन्दनम्॥

वामभागे समासीनां सीतां कांचनसन्निभाम्।

सर्वाभरणसम्पन्नां वामांके समुपस्थिताम्॥

रक्तोत्पलकराम्भोजां वामेनालिङ्गॺ संस्थितम्।

सर्वातिशयशोभाढ्यं दृष्ट्वा भक्तिसमन्वित:॥

(अ० रामायण)

पार्वतीसहित श्रीशिवजीने देखा कि ‘नवीन दूर्वादलके समान श्यामवर्ण, कमलदलके समान विशाल नेत्र, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशयुक्त मुकुटसे सुशोभित, करोड़ों कामदेवोंके समान लावण्ययुक्त पीताम्बरसे समावृत, दिव्याभूषणोंसे समन्वित, दिव्य चन्दनचर्चित, हजारों सूर्योंके समान तेजसम्पन्न, सबसे अधिक शोभायमान द्विभुज भगवान‍् श्रीरघुनाथजी अपनी बायीं ओर करकमलमें रक्तकमल धारण किये विराजिता सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषिता सुवर्णवर्णा श्रीसीताजीके गलेमें अपनी बायीं भुजा रखे हुए सुशोभित हो रहे हैं।’

३०—सिंहासनासीन श्रीरामका ध्यान

आजु रघुबीर-छबि जात नहिं कछु कही।

सुभग-सिंहासनासीन सीतारवन,

भुवन-अभिराम बहु काम सोभा सही॥ १॥

चारु चामर-ब्यजन, छत्र-मनिगन बिपुल,

दाम-मुकुतावली-जोति जगमगि रही।

मनहुँ राकेस सँग हंस-उड्डगन-बरहि,

मिलन आए हृदय जानि निज नाथ ही॥ २॥

मुकुट सुंदर सिरसि, भालबर, तिलक-भ्रू,

कुटिल कच, कुंडलनि परम आभा लही।

मनहुँ हरडर जुगल मारध्वजके मकर,

लागि स्रवननि करत मेरुकी बतकही॥ ३॥

अरुन-राजीव-दल-नयन करुना-अयन,

बदन सुषमा-सदन, हासत्रय-ताप ही।

बिबिध कंकन, हार, उरसि गजमनि-माल,

मनहुँ बग-पाँतिजुग मिलि चली जलदही॥ ४॥

पीत निरमल चैल, मनहुँ मरकत सैल,

पृथुल दामिनि रही छाइ तजि सहज ही।

ललित सायक-चाप, पीन भुज बल अतुल,

मनुज तनु दनुज बन-दहन, मंडन-मही॥ ५॥

जासु गुन-रूप नहि कलित, निरगुन सगुन,

संभु, सनकादि, सुक भगति दृढ़ करि गही।

‘दास तुलसी’ राम-चरन-पंकज सदा,

बचन मन करम चहैं प्रीति नित निरबही॥ ६॥

(गीतावली)

आज रघुनाथजीकी छबिका कुछ वर्णन नहीं किया जाता। आज त्रिभुवन-सुन्दर सीतारमण भगवान‍् राम सुन्दर सिंहासनपर विराजमान हैं। वे सचमुच अनेकों कामदेवोंके समान शोभासम्पन्न हैं। सुन्दर चँवर, व्यजन, छत्र, अनेकों मणिगण तथा मुक्ता-मालाओंकी लड़ियोंकी ज्योति जगमगा रही है, मानो अपने प्रभुको हृदयमें पहचानकर [छत्ररूप] चन्द्रमाके सहित [चँवररूप] हंस, [मणिगणरूप] तारे और [व्यजनरूप] मोर श्रीरघुनाथजीसे मिलनेके लिये आये हैं। प्रभुके सिरपर सुन्दर मुकुट है, ललित ललाटपर तिलक और भृकुटियाँ शोभायमान हैं तथा घुँघराली अलकोंके पास कुण्डलोंकी बड़ी शोभा हो रही है। वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो कामदेवकी भुजाके दो मकर भगवान‍् शंकरके भयसे [प्रभुको उनके स्वामी जान] कानोंसे लगकर मेलकी बातचीत कर रहे हैं। भगवान‍्के अरुण कमलदलके समान नेत्र करुणाके भण्डार हैं। उनका मुख सुषमाका आश्रय तथा हास तीनों तापोंको नष्ट करनेवाला है। वे हाथोंमें तरह-तरहके कंकण तथा हृदयमें हार तथा गजमुक्ताओंकी माला धारण किये हैं। मानो दो बगुलोंकी पंक्तियाँ मिलकर मेघकी ओर जा रही हों। वे अति स्वच्छ पीताम्बर धारण किये हैं, मानो मरकतमणिके पर्वतपर बहुत-सी बिजली अपने स्वभावको छोड़कर छायी हुई हों। उनके हाथोंमें सुन्दर धनुष-बाण हैं तथा पुष्ट भुजाओंमें अतुलित बल है। उनका यह मनुष्य-शरीर दैत्यवनको जलानेवाला तथा पृथ्वीका आभूषण है। जो निर्गुण होते हुए भी सगुण हैं तथा जिनके गुण और रूपोंकी कोई गणना नहीं कर सकता, अत: शिव, सनकादि तथा शुकदेवजीने भी जिनके भक्ति-भावको ही दृढ़ करके पकड़ा है, उन भगवान‍् रामके चरणकमलोंमें तुलसीदास मन, वचन और कर्मसे सदा प्रीतिका ही निर्वाह चाहता है।

३१—श्रीकृष्णके शिशुरूपका ध्यान

किलकत कान्ह घुटुरुअनि आवत।

मनिमय कनक नंदके आँगन

मुख प्रतिबिम्ब पकरिबै धावत॥

कबहूँ निरखि आप छाहींको

करसों पकरन चाहत।

किलकि हँसत राजत द्वै दँतुली

पुनि पुनि तेहि अवगाहत॥

कनकभूमिपर कर-पग-छाया

यह उपमा इक राजत।

कर कर प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा

कमल बैठकी साजत॥

बालदसा सुख निरखि जसोदा

पुनि पुनि नंद बुलावत।

अँचरातर लै ढाँकि सूरके

प्रभुको दूध पिआवत॥

(श्रीसूरदासजी)

कन्हैया किलकारियाँ भरता हुआ घुटनोंके बल आ रहा है। वह नन्दरायजीके मणिमय तथा सुवर्णमय आँगनमें अपना प्रतिबिम्ब पकड़नेके लिये दौड़ रहा है। कभी अपनी छायाको देखकर उसे हाथसे पकड़ना चाहता है। किलककर हँसता है। दो दँतुलियाँ चमक रही हैं और वह बार-बार उन्हींकी परछाईं पकड़नेकी चेष्टा करता है। स्वर्णमयी भूमिपर हाथ और पैरोंकी छाया देखकर यह एक उपमा (उत्प्रेक्षा) स्फुरित हो रही है। मानो पृथ्वी प्रत्येक मणिपर, जहाँ-जहाँ कन्हैयाका एक-एक हाथ और पैर पड़ता है, कमलका आसन सजा देती है! (जिससे उन कोमल हाथों और चरणोंको कठोरताका स्पर्श न हो।) बालकृष्णकी यह सुखदायिनी अवस्था देखकर यशोदामैया बार-बार नन्दरायजीको बुलाती हैं और सूरदासके प्रभुको गोदमें ले अंचलके नीचे छिपाकर दूध पिलाती हैं।

३२—श्रीकृष्णके बालरूपका ध्यान

(१)

धूरि भरे अति सोभित स्याम जू,

तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।

खेलत-खात फिरैं अँगना,

पग पैजनियाँ, कटि पीरि कछोटी॥

वा छबिको ‘रसखानि’ बिलोकत,

वारत काम-कलानिधि कोटी।

कागको भाग कहा कहिये हरि-

हाथसों लै गयो माखन रोटी॥

(२)

पायन नूपुर मंजु बजैं,

कटि किंकिनकी धुनिकी मधुराई।

साँवरे अंग लसै पटपीत,

हिये हुलसै बनमाल सुहाई॥

माथे किरीट, बड़े दृग चंचल,

मंद हँसी मुखचंद जुन्हाई।

जै जग-मंदिर दीपक सुंदर,

श्री-ब्रज-दूलह ‘देव’ सहाई॥

श्यामसुन्दर धूलभरे अंगोंसे बड़ी शोभा पा रहे हैं; वैसी ही शोभामयी उनके सिरपर सुन्दर चोटी बनी है। वे आँगनमें खेलते-खाते फिर रहे हैं। उनके पाँवोंमें पैंजनी और कटिभागमें पीली काछनी है। ‘रसखानि’ उस छबिको निहारता है और उसपर कोटि-कोटि काम तथा कलानिधि—चन्द्रमाको भी न्योछावर करता है। अहा! उस कौएके भाग्यको क्या कहा जाय, वह श्यामसुन्दरके हाथसे रोटी लेकर उड़ गया!

पैरोंमें मधुर स्वरसे नूपुर बज रहे हैं। कमरमें पहनी हुई क्षुद्र घण्टिकाओंकी ध्वनिका माधुर्य सब ओर फैल रहा है। श्याम अंगमें पीताम्बर सुशोभित है। वक्ष:स्थलमें सुन्दर वनमाला कितनी भली मालूम होती है। माथेपर मोरमुकुट है, नेत्र बड़े-बड़े और चंचल हैं, मुखचन्द्रसे मन्द-मन्द हँसीकी चाँदनी-सी छिटक रही है। विश्वरूपी मन्दिरके सुन्दर दीपक तथा देवके सहायक व्रजवल्लभ श्रीकृष्णकी जय हो।

३३—बालगोपाल श्रीकृष्णका ध्यान

अव्याद्‍‍व्याकोशनीलाम्बुजरुचिररुणा-

म्भोजनेत्रोऽम्बुजस्थो

बालो जङ्घाकटीरस्थलकलितरणत्

किंकिणीको मुकुन्द:।

दोर्भ्यां हैयंगवीनं दधदतिविमलं

पायसं विश्ववन्द्यो

गोगोपीगोपवीतो रुरुनखविलसत्

कण्ठभूषश्चिरं व:॥

विकसित नीलकमलके समान देहकान्ति है, रक्तकमलके समान नयनयुगल हैं, पद्मपर विराजित हैं, चरणोंमें नूपुर और कटिमें किंकिणी बज रही है। जिसके एक हाथमें मक्खन और दूसरेमें खीर है। जिसके कण्ठमें बाघके नख शोभित हैं ऐसा जगद्वन्द्य बालकरूपी गोपाल, जो गौ, गोपी और गोपोंसे घिरा है, भक्तोंकी रक्षा करे।

३४—वन-भोजनमें श्रीकृष्णका ध्यान

भगवान‍् श्रीकृष्ण अपने साथी बालकोंको हँसाते-हँसाते उनके साथ वनमें भोजन कर रहे हैं—

बिभ्रद्वेणुं जठरपटयो:

शृंगवेत्रे च कक्षे

वामे पाणौ मसृणकवलं

तत्फलान्यंगुलीषु।

तिष्ठन्मध्ये स्वपरिसुहृदो

हासयन्नर्मभि: स्वै:

स्वर्गे लोके मिषति बुभुजे

यज्ञभुग्बालकेलि:॥

(श्रीमद्भा० १०। १३। ११)

कमरमें बँधे हुए वस्त्रमें बाँसुरीको खोंसे, बायीं बगलमें सींग और दाहिनी बगलमें बेंत दबाये, बायें हाथमें माखन-भातका ग्रास लिये और अंगुलियोंकी सन्धियोंमें खेलनेकी गोलियाँ दबाये श्यामसुन्दर अपने सखा बालकोंके बीच कर्णिकाकी भाँति स्थित हुए उनसे मजाक करके स्वयं हँसते और उन्हें हँसाते हुए भोग लगा रहे हैं। इस लीलाको स्वर्गके देवता बड़े ही आश्चर्यके साथ देख रहे हैं।

३५—विश्व-विमोहन श्रीकृष्णका ध्यान

अंसालम्बितवामकुण्डलधरं

मन्दोन्नतभ्रूलतं

किंचित्कुंचितकोमलाधरपुटं

साचिप्रसारीक्षणम्।

आलोलांगुलिपल्लवैर्मुरलिका-

मापूरयन्तं मुदा

मूले कल्पतरोस्त्रिभंगललितं

ध्यायेज्जगन्मोहनम्॥

जो कंधेतक लटकते हुए मनोहर कुण्डल धारण किये हैं, जिनकी भ्रूलता धनुषकी भाँति खिंची हुई है, जिनके अधरपल्लव अति कोमल, सुन्दर और किंचित् कुंचित हैं, जिनके नेत्र बाँके और विशाल हैं और जो कल्पतरु (या कदम्ब) के नीचे मनहरण त्रिभंगरूपसे खड़े आनन्दके साथ चंचल कोमल अंगुलियोंको वंशीके छिद्रोंपर फिराते हुए उसे बजा रहे हैं, ऐसे जगन्मोहन मनमोहन श्यामसुन्दरका ध्यान करना चाहिये।

३६—नटनागर श्रीगोपाललालका ध्यान

सुमिरौ नटनागर बर

सुंदर गोपाललाल।

सब दुख मिट जैहैं वे

चिंतत लोचन बिसाल॥ १॥

अलकनकी झलकन लखि

पलकन गति भूल जात।

भ्रूबिलास मंद हास

रदनछदन अति रसाल॥

निंदत रबि कुंडल छबि

गंड मुकुर झलमलात।

पिच्छ गुच्छ कृतवतंस

इंदु बिमल बिन्दुभाल॥ २॥

अंग अंग जित अनंग

माधुरी तरंग रंग।

बिमद मद गयंद होत

देखत लटकीली चाल॥

हसन लसन पीत बसन

चारु हार बर सिंगार।

तुलसिरचित कुसुमखचित

पीन उर नवीन माल॥ ३॥

ब्रजनरेस बंसदीप

बृंदाबन बर महीप।

वृषभान मानपात्र

सहज दीनजन दयाल॥

रसिकभूप रूपरास

गुननिधान जानराय।

गदाधर प्रभु जुवतीजन

मुनिजन-मानस-मराल॥ ४॥

श्रेष्ठ, सुन्दर नटवर नागर गोपाललालका स्मरण करो। उनके उन विशाल नेत्रोंका चिन्तन करते ही सारे दु:ख मिट जायँगे। उनके केशोंकी झलक देखकर पलकोंकी गति भूल जाती है—नेत्र उनकी ओर एकटक देखते रह जाते हैं। भौंहोंकी विलासपूर्ण भंगिमा, मन्द-मन्द हास्य तथा अत्यन्त रसीले लाल-लाल होठ, सभी अनुपम हैं। कानोंके कुण्डल सूर्यकी प्रभाको भी तिरस्कृत कर रहे हैं, वे कपोलरूपी दर्पणमें झिलमिला रहे हैं। उन्होंने अपने मस्तकको मोर-पंख तथा फूलोंके गुच्छोंसे सजा रखा है। स्वच्छ ललाटमें तिलक सुशोभित है। उनका एक-एक अंग कामदेवको पराजित करनेवाला है। उसमें माधुर्य-रसकी तरंगोंका रंग है। उनकी लटकीली चाल देखकर गजराजका भी मद चूर-चूर हो जाता है। हँसनेसे उनकी शोभा और बढ़ जाती है। पीताम्बर तथा सुन्दर हारसे उनका सुन्दर शृंगार किया गया है। श्यामसुन्दरके विशाल वक्षपर नूतन माला सुशोभित है, जो तुलसीदलसे बनायी गयी है और उसमें सुन्दर-सुन्दर फूल भी गुँथे हुए हैं। वे व्रजराजके वंशको प्रकाशित करनेवाले दीपक हैं। वृन्दावनके सर्वश्रेष्ठ भूपति हैं। श्रीवृषभानु गोपके सम्मानके पात्र हैं। दीनजनोंपर स्वभावत: दया करनेवाले हैं। गदाधर कहते हैं, वे रसिकोंके सम्राट्, रूपकी राशि, गुणोंके भण्डार, ज्ञानके अधीश्वर, व्रजांगनाओंके प्राणवल्लभ तथा मुनिजनोंके मानस-सरोवरमें विहार करनेवाले राजहंस हैं।

३७—श्रीकृष्णके किशोररूपका ध्यान

गुच्छनिके अवतंस लसैं

सिखि पच्छनि अच्छ किरीट बनायो।

पल्लव लाल समेत छरी

करपल्लवमें ‘मतिराम’ सुहायो॥

गुंजनिके उर मंजुल हार

निकुंजनिते कढ़ि बाहर आयो।

आजको रूप लखे ब्रजराजको

आज ही आँखिनको फल पायो॥

श्यामसुन्दर वृन्दावनके निकुंजोंसे निकलकर बाहर आये हैं। उनके कानोंमें फूलके गुच्छोंका आभूषण शोभा पाता है। उन्होंने मस्तकपर मोरके पंखोंका बना हुआ सुन्दर किरीट धारण कर रखा है। ‘मतिराम’ कहते हैं, उनके पल्लवके सदृश कोमल हाथोंमें लाल पल्लव और लकुटी सुशोभित है। वक्षपर गुंजाकी मंजुल माला लहरा रही है। व्रजराज श्रीकृष्णका यह आजका रूप देखकर आज ही आँखोंका फल प्राप्त हुआ है।

३८—श्रीवेणुधर श्रीकृष्णका ध्यान

करि मन नंदनंदन ध्यान।

सेइ चरन-सरोज सीतल

तजि विषय रस पान॥

जानु जंघ त्रिभंग सुंदर

कलित कंचन दंड।

काछनी कटि पीतपट द्युति

कमल केसर खंड॥

मनु मराल प्रबाल छौना

किंकिनी कलराव।

नाभिह्रद रोमावली अलि

चले ऐन सुभाव॥

कंठ मुक्तामाल मलयज

अंग उर बनमाल।

सुरसरी ससि नीर मानहु

लता स्याम तमाल॥

बाहु पानि सरोज पल्लव

गहे मुख मृदु बेनु।

अति बिराजत बदन बिधुपुर

सुरभि मंडित रेनु॥

अरुन अधर कपोल नासा

परम सुंदर नयन।

चलत कुंडल गंडमंडल

मनहुँ निर्त्तत मयन॥

कुटिल कच भ्रुव तिलक रेखा

सीस सिखी सिखंड।

मनो मदन द्वै सर सँधाने

देखि वन कोदंड॥

‘सूर’ श्रीगोपालकी छबि

दृष्टि भरि भरि लेत।

प्रानपतिकी निरखि सोभा

पलक परन न देत॥

(सूरदासजी)

हे मन! नन्दनन्दन श्रीकृष्णका ध्यान कर। विषयरसका पीना छोड़कर उनके शीतल चरणारविन्दोंका सेवन कर। उनकी सुन्दर त्रिभंगी झाँकी है। घुटने और जंघा ऐसे जान पड़ते हैं, मानो उस चरण-कमलके सुन्दर स्वर्णमय दण्ड (मृणाल) हों। कटिमें पीताम्बरकी काछनी है, जिसकी पीली-पीली कान्ति उस कमलके केसरखण्ड-सी जान पड़ती है। कमरमें जो मधुर स्वरसे किंकिनी (क्षुद्रघण्टिका) बज रही है, वही मानो उस कमलपर बैठा हुआ हंसका छोटा शिशु है, जो कलरव कर रहा है। नाभि ही सरोवर है। रोमपंक्तियाँ मानो भ्रमरावलियाँ हैं, जो स्वभावसे ही अपने आश्रयको चली हैं। कण्ठमें मोतियोंकी माला है, अंगोंमें मलयज चन्दनका लेप लगा है और वक्ष:स्थलमें वनमाला सुशोभित है। ये तीनों क्रमश: गंगा, चन्द्रमा तथा नीरका भ्रम उत्पन्न करते हैं। भुजाएँ मानो श्याम-तमाल लताएँ हैं। कमलसदृश हाथ ही उनके पल्लव हैं। उन हाथोंमें मधुर मुरली लेकर श्रीहरिने उसे अपने मुखपर लगा रखा है। उनके चन्द्रवदनपर सुगन्धित गोरजकी बड़ी शोभा हो रही है। होंठ लाल है। कपोल, नासिका तथा नेत्र अतिशय सुन्दर हैं। कपोल-मण्डलपर कुण्डल हिल रहे हैं, मानो दो कामदेव नृत्य कर रहे हों। उनके बाल घुँघराले और भौंहें तिरछी हैं। ललाटमें तिलककी दो रेखाएँ हैं। शीशपर मोरका पंख शोभा पा रहा है। मानो कामदेवने सुदृढ़ धनुष उपस्थित देख उसपर दो बाणोंका संधान कर दिया है। सूरदास श्रीगोपालकी शोभाको दृष्टिमें भर-भर लेता है। प्राणपति श्रीकृष्णकी वह छबि निहारकर अपनी पलकें नहीं गिरने देता है।

३९—गोविन्द श्रीकृष्णका ध्यान

फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवदनं

बर्हावतंसप्रियं

श्रीवत्सांकमुदारकौस्तुभधरं

पीताम्बरं सुन्दरम्।

गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं

गोगोपसंघावृतं

गोविन्दं कलवेणुवादनपरं

दिव्यांगभूषं भजे॥

प्रफुल्ल इन्दीवरके समान जिनकी देहकी कान्ति है, चन्द्रमाके समान जिनका शोभामय मुखमण्डल है, जो मस्तकपर मयूरपुच्छका मुकुट धारण किये हैं। जिनके वक्ष:स्थलपर श्रीवत्सका चिह्न, गलेमें कौस्तुभमणि है, जो पीतपट पहने हैं, जिनका दिव्य तनु गोपियोंके नयनोत्पलद्वारा चर्चित है, जो गौ और गोपोंके समूहसे घिरे हैं और हाथमें वंशी लेकर उसे बजा रहे हैं, जिनका समस्त दिव्य शरीर दिव्य अलंकारोंसे विभूषित है। हम ऐसे श्रीकृष्णको भजते हैं।

४०—श्रीकृष्णके नटवेशका ध्यान

श्यामं हिरण्यपरिधिं वनमाल्यबर्ह-

धातुप्रवालनटवेषमनुव्रतांसे ।

विन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जं

कर्णोत्पलालककपोलमुखाब्जहासम् ॥

(श्रीमद्भा० १०। २३। २२)

श्रीयमुनाके तीरपर अशोक वृक्षोंके नये-नये पत्तोंसे सुशोभित कालिन्दीकुंजमें भगवान‍् श्रीकृष्ण अपने सखाओंके साथ विराज रहे हैं। उनका नवीन मेघके समान श्याम वर्ण है, श्याम शरीरपर सुवर्णवर्ण पीतपट ऐसा जान पड़ता है मानो श्याम घनघटामें इन्द्रका धनुषमण्डल शोभित हो। गलेमें मनोहर वनमाला है। मयूरके पंख, धातुओंके अद‍्भुत-अद‍्भुत रंग और नये-नये चित्र-विचित्र पल्लवोंसे शरीरको सजाये हुए भगवान‍्का नटवर रूप देखने ही योग्य है। आप अपने एक सखाके कंधेपर दाहिना हाथ रखे बायें हाथसे कमलका फूल घुमा रहे हैं। कानोंमें कमलके फूल हैं और कपोलोंपर काली-काली अलकें शोभा पा रही हैं। प्रफुल्ल मुखकमलमें हँसीकी शोभा अवर्णनीय है।

४१—मुरलीमनोहर श्रीकृष्णका ध्यान

बर्हापीडं नटवरवपु:

कर्णयो: कर्णिकारं

बिभ्रद्वास: कनककपिशं

वैजयन्तीं च मालाम्।

रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया

पूरयन् गोपवृन्दै-

र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं

प्राविशद् गीतकीर्ति:॥

(श्रीमद्भा० १०। २१। ५)

भगवान‍् श्रीकृष्णकी वंशी-ध्वनि सुनते ही गोपबालाएँ ध्यानस्थ हो गयीं, उन्होंने देखा—मोरकी पाँखोंका मुकुट पहने, कानोंमें कनेरके फूल धारण किये, स्वर्णके समान सुन्दर पीतपट और वैजयन्ती मालासे सुशोभित गोपगणोंके द्वारा गायी हुई अपनी कीर्तिको सुनते हुए उनके साथ श्यामसुन्दर नटवर-वेषमें अपने चरणोंकी विहारभूमि वृन्दावनमें प्रवेश कर रहे हैं। आप बाँसुरीमें अपने अधरकी सुधा भरते हुए उसके छिद्रोंपर अंगुली धरकर विविध स्वर निकाल रहे हैं।

४२—व्रजनवयुवराज श्रीकृष्णका ध्यान

मुदिरमदमुदारं मर्दयन्नंगकान्त्या

वसनरुचिनिरस्ताम्भोजकिंजल्कशोभ: ।

तरुणिमतरणीक्षाविक्लवद‍्बाल्यचन्द्रो

व्रजनवयुवराज: काङ्क्षितं मे कृषीष्ट॥

(स्तवपुष्पांजलि)

जो अपनी अंगशोभाके द्वारा नवीन मेघका मदगर्व खर्व कर रहे हैं, जो अपने वस्त्रकी कान्तिद्वारा किंजल्कशोभाका तिरस्कार कर रहे हैं और जिनके नवयौवनरूपी सूर्यके दर्शनसे बाल्यावस्थारूपी चन्द्रमा क्षीणकान्ति हो रहा है, वे व्रजनवयुवराज श्रीकृष्ण हमारी आकांक्षा पूर्ण करें।

४३—वृन्दावनविहारी श्रीराधा-कृष्णका ध्यान

अंगश्यामलिमच्छटाभिरभितो

कन्दीकृतेन्दीवरं

जाड्यं जागुडरोचिषां विदधतं

पट्टाम्बरस्य श्रिया।

वृन्दारण्यविलासिनं हृदिलस-

द्दामाभिरामोदरं

राधास्कन्धनिवेशितोज्ज्वलभुजं

ध्यायेम दामोदरम्॥

(स्तवपुष्पांजलि)

जिनके श्रीअंगकी श्यामकान्तिके द्वारा इन्दीवरकी कान्ति क्षीण हो गयी है, जिनके पीतपटकी शोभासे कुंकुमकी कान्ति तिरस्कृत हो गयी है, जिनके हृदयपर विराजमान वैजयन्ती मालासे शरीरका मध्यभाग सुशोभित हो रहा है, जो श्रीराधिकाजीके कंधेपर अपना बायाँ हाथ रखे हुए हैं, मैं उन वृन्दावनविहारी श्रीदामोदरका ध्यान करता हूँ।

४४—श्रीराधा-कृष्णका ध्यान

पीताम्बरं घनश्यामं द्विभुजं वनमालिनम्।

बर्हिबर्हकृतापीडं शशिकोटिनिभाननम्॥

घूर्णायमाननयनं कर्णिकारावतंसितम्।

अभितश्चन्दनेनाथ मध्ये कुंकुमबिन्दुना॥

रचितं तिलकं भाले बिभ्रतं मण्डलाकृतिम्।

तरुणादित्यसंकाशकुण्डलाभ्यां विराजितम्॥

घर्माम्बुकणिकाराजद्दर्पणाभकपोलकम् ।

प्रियास्यन्यस्तनयनं लीलया चोन्नतभ्रुवम्॥

अग्रभागन्यस्तमुक्ताविस्फुरत्प्रोच्चनासिकम् ।

दशनज्योत्स्नया राजत्पक्वबिम्बफलाधरम्॥

केयूरांगदसद्रत्नमुद्रिकाभिर्लसत्करम् ॥

बिभ्रतं मुरलीं वामे पाणौ पद्मं तथैव च।

कांचीदामस्फुरन्मध्यं नूपुराभ्यां लसत्पदम्॥

रतिकेलिरसावेशचपलं चपलेक्षणम्।

हसन्तं प्रियया सार्द्धं हासयन्तं च तां मुहु:॥

इत्थं कल्पतरोर्मूले रत्नसिंहासनोपरि।

वृन्दारण्ये स्मरेत् कृष्णं संस्थितं प्रियया सह॥

वामपार्श्वे स्थितां तस्य राधिकां च स्मरेत्तत:।

नीलचोलकसंवीतां तप्तहेमसमप्रभाम्॥

पटांचलेनावृतार्द्धसुस्मेराननपंकजाम् ।

कान्तवक्त्रे न्यस्तनेत्रां चकोरीचपलेक्षणाम्॥

अंगुष्ठतर्जनीभ्यां च निजप्रियमुखाम्बुजे।

अर्पयन्तीं पूगफलीं पर्णचूर्णसमन्विताम्॥

मुक्ताहारस्फुरच्चारुपीनोन्नतपयोधराम् ।

क्षीणमध्यां पृथुश्रोणीं किंकिणीजालमण्डिताम्।

रत्नताटंककेयूरमुद्रावलयधारिणीम् ।

लसत्कटकमंजीररत्नपादांगुलीयकाम् ॥

लावण्यसारमुग्धांगीं सर्वावयवसुन्दरीम्।

आनन्दरससंमग्नां प्रसन्नां नवयौवनाम्॥

सख्यश्च तस्या विप्रेन्द्र तत्समानवयोगुणा:।

तत्सेवनपरा भाव्याश्चामरव्यजनादिभि:॥

भगवान‍् श्रीकृष्ण पीताम्बर पहने हैं, सुन्दर द्विभुज हैं, वनमालासे विभूषित हैं, उनका वर्ण नवजलधरके समान श्याम है, मस्तकपर मयूरपिच्छ शोभा पा रहा है, मुखमण्डल करोड़ों चन्द्रमाओंके समान मनोहर है, वे नेत्रोंको घुमा रहे हैं, कानोंमें कनेरके पुष्प खोंसे हुए हैं, भालमें गोल-गोल चन्दनका तिलक लगाये हैं, जिसके बीचमें केसरका बिन्दु सुशोभित है। दोनों कानोंमें बालसूर्यके समान कान्तिवाले कुण्डल विराजमान हैं। दर्पणके समान आभायुक्त कपोलोंपर स्वेदकण अत्यन्त शोभा पा रहे हैं। भगवान‍्की दृष्टि श्रीप्रियाजीके वदनकमलकी ओर लगी हुई है, भौंहें लीलासे ऊपरकी ओर उठी हुई हैं। उनकी नासिकाके अग्रभागमें मोती लटक रहा है। उनके पके हुए बिम्बफलके समान लाल-लाल होठ दाँतोंकी कान्तिसे प्रकाशित हो रहे हैं। भगवान‍् अपनी भुजाओंमें केयूर और अंगद आदि आभूषण धारण किये हुए हैं और उनके करकमल मुद्रिकाओंसे अलंकृत हैं। वे दाहिने हाथमें मुरली और बायेंमें नीलकमल धारण किये हुए हैं। उनकी कमरमें करधनी सुशोभित है और चरणोंमें नूपुर विराजमान है। वे प्रेमके आवेशसे चंचल हो रहे हैं और उनके नेत्रयुगल भी चलायमान हैं। वे श्रीप्रियाजीके साथ हँस रहे हैं और उन्हें भी बार-बार हँसा रहे हैं। इस प्रकार वृन्दावनमें कल्पवृक्षके नीचे रत्नसिंहासनके ऊपर श्रीप्रियाजीके साथ विराजमान भगवान‍् नन्दनन्दनका ध्यान करे। उसके अनन्तर उनके वामभागमें अवस्थित श्रीराधिकाजीका इस प्रकार ध्यान करे। श्रीप्रियाजी नीला अंगा धारण किये हुए हैं, उनके श्रीअंगोंकी कान्ति तपाये हुए सोनेके समान है। उनके मन्दहास्ययुक्त मुखारविन्दका आधा भाग उनका रेशमी साड़ीके अंचलसे ढका हुआ है। वे चंचल नेत्रोंसे चकोरीकी भाँति अपने प्रियतमके मुखचन्द्रकी ओर निहार रही हैं और अपने अँगूठे और तर्जनीसे उनके मुखमें कटे हुए पानके सहित सुपारीका चूर्ण अर्पण कर रही हैं। उनके सुन्दर पीन और उन्नत वक्ष:स्थलपर मोतियोंका हार लहरा रहा है, उनका कटिप्रदेश अत्यन्त कृश है और स्थूल नितम्बपर करधनी विराजमान है। वे रत्नजटित ताटंक (कर्णफूल), केयूर (बाजूबंद), अँगूठी और कंकण धारण किये हुए हैं। उनके चरणोंमें कड़े नूपुर और रत्नजटित छल्ले सुशोभित हैं। उनके समस्त अंग इतने सुन्दर हैं मानो वे लावण्यके सार ही हैं। वे आनन्दरसमें डूबी हुई हैं, अत्यन्त प्रसन्न हैं और उनके अंगोंमें नवयौवन झलक रहा है। हे ब्राह्मणदेव! उनकी सखियाँ उन्हींके समान गुण और अवस्थावाली हैं और उनपर चँवर डुला रही हैं तथा पंखा झल रही हैं।

४५—गीतावक्ता श्रीकृष्णका ध्यान

प्रपन्नपारिजाताय तोत्त्रवेत्रैकपाणये।

ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नम:॥

(गीताध्यान)

जो शरणागतके लिये कल्पवृक्षरूप हैं, जिनके एक हाथमें घोड़ोंकी लगाम और चाबुक है, दूसरा हाथ ज्ञानमुद्रासे सुशोभित है, ऐसे गीतामृतको दुहनेवाले श्रीकृष्णको प्रणाम है।

४६—भक्तवत्सल वीरशिरोमणि श्रीकृष्णका ध्यान

त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं

रविकरगौरवराम्बरं दधाने।

वपुरलककुलावृताननाब्जं

विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या॥

युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्-

कचलुलितश्रमवार्यलंकृतास्ये ।

मम निशितशरैर्विभिद्यमान-

त्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा॥

स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा-

मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थ:।

धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद‍्गु-

र्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीय:॥

शितविशिखहतो विशीर्णदंश:

क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे।

प्रसभमभिससार मद्वधार्थं

स भवतु मे भगवान‍् गतिर्मुकुन्द:॥

(श्रीमद्भा० १।९।३३-३४,३७-३८)

जो तीनों लोकोंमें अनुपम सौन्दर्ययुक्त, तमालके वृक्षके समान श्यामवर्ण, सूर्यकी किरणोंके समान चमकते हुए जरीके पीताम्बरको धारण किये हैं, घुँघराली अलकावलियोंसे जिनका मुखकमल सुशोभित हो रहा है, ऐसे दिव्य-विग्रह अर्जुनके सखा श्रीकृष्णमें मेरी निष्काम प्रीति हो। युद्धक्षेत्रमें घोड़ोंकी रज पड़नेसे जिनका वर्ण धूसर हो गया है, जिनके सुन्दर घुँघराले बाल इधर-उधर बिखर रहे हैं, जिनका मुखमण्डल श्रमजनित पसीनेकी बूँदोंसे अलंकृत है, मेरे तीखे बाणोंसे कवच कट जानेपर जिनकी त्वचा बिंध गयी है, ऐसे श्रीकृष्णमें मेरा मन रम जाय। महाभारतमें ‘मैं शस्त्र ग्रहण नहीं करूँगा’ अपनी इस प्रतिज्ञाको त्यागकर ‘मैं श्रीकृष्णको शस्त्र ग्रहण करवा दूँगा।’ मेरी इस प्रतिज्ञाको सत्य करनेके लिये रथसे कूदकर हाथमें रथका चक्र लेकर, जैसे हाथीको मारनेके लिये सिंह दौड़ता है, वैसे ही मुझे मारनेके लिये इस प्रकारके वेगसे दौड़े कि कंधेसे दुपट्टा गिर गया और पग-पगपर पृथ्वी डगमगाने लगी, मुझ आततायीके पैने बाणोंके प्रहारसे जिन श्यामसुन्दरका कवच टूट गया है और शरीर रुधिरसे लाल हो गया है, अर्जुनके रोकनेपर भी मुझको मारनेके लिये बड़े वेगसे दौड़नेवाले वे भक्तवत्सल भगवान‍् मेरी गति हों (ये भीष्मपितामहके वचन हैं।)

ये ध्यानके कुछ ही प्रकार लिखे गये हैं। भगवान‍्के अनन्तरूप हैं, अतएव अनन्त प्रकारसे ही ध्यान किया जा सकता है। इन सब ध्यानोंमें मन्त्रजप भी आवश्यक है। सभी स्वरूपोंके सबीज और बीजरहित मन्त्र हैं। मन्त्रके सम्बन्धमें लेखविस्तार होनेके कारण यहाँ कुछ नहीं लिखा जाता। अपने-अपने पथप्रदर्शकसे पूछना चाहिये। मन्त्रका पता सहजमें न लगे तो इष्टके नामके साथ ‘नम:’ जोड़कर जप किया जा सकता है, जैसे ‘ब्रह्मणे नम:’, ‘परमात्मने नम:’, ‘विष्णवे नम:’, ‘शिवाय नम:’, ‘रामाय नम:’, ‘कृष्णाय नम:’ आदि। ध्यानके बाद रुचि हो तो अपने ध्येय भगवान‍्की मानसपूजा भी अवश्य करनी चाहिये।*

साधकोंको एक बात जरूर स्मरण रखनी चाहिये कि जिस स्वरूपका ध्यान किया जाय, मन्त्र भी अवश्य उसीका होना चाहिये। परंतु कहीं-कहीं इसका व्यतिक्रम भी देखा जाता है। एक साधक पहले चतुर्भुज श्रीविष्णुभगवान‍्का ध्यान करता था, फिर कुछ समयतक उसने अभेदभावसे परमात्माका ध्यान करना आरम्भ किया। इस ध्यानमें भी उसे अच्छी सफलता हुई; वर्षों यह ध्यान चला। अन्तमें एकदिन वह नियमितरूपसे ध्यान करनेको बैठा कि अकस्मात् वही पहलेवाली श्रीविष्णुभगवान‍्की मूर्ति उसके सामने आ गयी। मूर्ति मानो हँस रही थी। वह कुछ देरतक तो आनन्दमें रहा, फिर उसने श्रीविष्णुकी मूर्तिसे चित्तको हटाकर अभेदभावसे निर्गुण परमात्माके ध्यानकी चेष्टा की; परंतु उसकी चेष्टा व्यर्थ हुई। दूसरे दिन, तीसरे दिन, चौथे दिन, यों लगातार उसने कई दिनोंतक प्रयत्न किया; परंतु अचिन्त्य अनिर्वचनीय ब्रह्मका ध्यान, जो वर्षोंसे सफलतापूर्वक हो रहा था, नहीं हुआ और श्रीविष्णुभगवान‍्का होता रहा। मानो भगवान‍्ने यह बतलाया कि सगुण-निर्गुण सब मैं ही हूँ। इसके बाद कई वर्षोंके बाद एक दिन अकस्मात् विष्णुभगवान‍्की जगह नन्दनन्दन आ गये। किसी तरह भी हटाये नहीं हटे! अनेकों बार चेष्टा की, परंतु वह तो मानो अड़ ही गये! ऐसी ही और भी बहुत-सी बातें हुईं, जिनका उल्लेख यहाँ अनावश्यक है। मन्त्रजप वह साधक सभी ध्यानोंमें ‘हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥’ इस षोडश नामके मन्त्रका करता था। कहा जाता है कि श्रीरामकृष्णपरमहंसको भगवान‍्ने विविध रूपोंमें प्रत्यक्ष दर्शन दिये थे। अतएव यदि दूसरी मूर्ति अपने-आप ध्यानमें आती हो तो घबराना नहीं चाहिये। उसे मंगलमय भगवान‍्की कल्याणमयी इच्छा समझकर प्रसन्न होना चाहिये। हाँ, जान-बूझकर आज एक मन्त्रका जाप, कल दूसरेका; इसी प्रकार आज एक स्वरूपका ध्यान और कल दूसरे स्वरूपका अथवा श्रीरामस्वरूपके साथ श्रीकृष्ण-मन्त्रका और श्रीकृष्णस्वरूपके साथ राम-मन्त्रका जाप नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार निर्गुण, सगुण, साकार, निराकार तथा शिव, विष्णु, शक्ति आदि भगवत्स्वरूपोंके ध्यानमें भी पंचमेला नहीं करना चाहिये। जहाँतक हो अपनी ओरसे एक ही इष्टका अनन्यभावसे मन्त्र-जपसहित ध्यान करना चाहिये। दूसरे समस्त रूपोंका उसीमें पर्यवसान कर लेना चाहिये। अवश्य ही भिन्नता और न्यूनाधिकताकी बुद्धि नहीं रखनी चाहिये। अपने इष्टके स्वरूपकी अपेक्षा अन्य स्वरूपोंको किसी अंशमें न्यून बतलानेवाले या तो विनोदसे—या किसी रूपमें भी अपने इष्टका गुण गानेकी इच्छासे अथवा रामके नामसे या कृष्णके नामसे चिढ़नेके बहाने लोगोंसे भगवान‍्का नाम उच्चारण करानेकी शुभ भावनासे—ऐसा करते हैं या वे अज्ञानपूर्वक दुराग्रह करते हैं। गोस्वामी तुलसीदासजीने श्रीकृष्णके मुक्तकण्ठसे गुण गाये, परंतु श्यामसुन्दरकी मूर्तिके सामने जाकर विनोद करने लगे। वे बोले—‘भगवन्! आज तो आपने खूब नटवर वेश बनाया। यह आपकी त्रिभंग मुरलीधारी बाँकी छवि बड़ी सुन्दर बनी। मैं आपको पहचान तो गया, आप हैं वही मेरे राम—परंतु मैं हठीला तो तभी आपके चरणोंमें माथा टेकूँगा जब आप मुरली और मोरमुकुट छिपाकर धनुषधारी बनेंगे।

कहा कहौं छवि आपकी, भले बने हो नाथ।

‘तुलसी’ मस्तक जब नवै, धनुष-बान लो हाथ॥

भगवान‍्ने भी भक्तके विनोदका उत्तर विनोदमें दिया, वे ‘मुरली मुकुट दुरायकै’ रघुनाथ बन गये।

श्रीकृष्णप्रेमरसके मतवाले व्रज-भक्त तो श्रीकृष्णको वृन्दावनसे बाहर जाने ही नहीं देते, उन्होंने तो उन्हें बाँध ही लिया—

वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति।

कोई तो ऐसे आगे बढ़े कि उन्होंने श्यामसुन्दरको समेटकर नेत्रोंकी काली कोठरीमें बंद कर लिया और कहने लगे कि अब किसकी मजाल जो तुमको कोई देख भी ले। दूसरेकी तनिक भी परवा न करनेवाले, उस व्रजके काले ठाकुरकी मोहिनीपर मचले हुए उन मतवालोंकी दो-एक वाणियाँ तो सुनिये—

(१)

मुक्ति कहत गोपालसों,

मेरी मुक्ति कराय।

ब्रजरज उड़ि मस्तक चढ़ै,

मुक्ति मुक्त ह्वै जाय॥

धनि गोपी औ ग्वाल धनि,

धनि जसुदा धनि नंद।

जिनके आगे फिरत है,

धायो परमानंद॥

ब्रजलोचन, ब्रजरमन, मनोहर,

ब्रजजीवन, ब्रजनाथ।

ब्रजउत्सव, ब्रजबल्लभ सबके

ब्रजकिसोर सुभ गाथ॥

ब्रजमोहन, ब्रजभूषन, सोहन,

ब्रजनायक, ब्रजचन्द।

ब्रजनागर, ब्रजछैल, छबीले,

ब्रजबर, श्रीनँदनंद॥

ब्रजआनँद, ब्रजदूलह, नितही

अति सुंदर ब्रजलाल।

ब्रजगौवनके पाछे आछे

सोहत ब्रज-गोपाल॥

ब्रजसम्बन्धी नाम लेत

ये ब्रजकी लीला गावै।

नागरिदासहि मुरलीवारो

ब्रजको ठाकुर भावै॥

(२)

हमारो मुरलीवारो स्याम।

बिन बंसी, बनमाल, चंद्रिका

आन न जानौं नाम॥१॥

गोपरूप बृंदाबनचारी,

पूरन जन-मन-काम।

नन्दगाँव, बरसाना, गोकुल,

कुंजगली, गिरि-धाम॥२॥

याही सों हित चित्त बढ़ौ नित,

दिन दिन पल छिन जाम।

‘नागरिदास’ द्वारिका मथुरा

रजधानीसों न काम॥३॥

(३)

चाहे तू जोग कर भृकुटि मध्य ध्यान धर,

चाहे नामरूप मिथ्या जानिके निहारि ले।

निरगुन निरंजन निराकार ज्योति ब्याप रही,

ऐसो तत्त्वग्यान निज मनमें तू धारि ले॥

‘नारायन’ अपनेको आप ही बखान कर,

मो तें वह भिन्न नहीं या बिधि पुकारि ले।

जौलों तोहि नंदको कुमार नाहिं दृष्टि परॺो,

तौलों तू बैठि भले ब्रह्मको बिचारि ले॥

अस्तु, सगुण साकार भगवान‍्का ध्यान करनेवाले साधकोंको अपने इष्टकी मूर्ति या चित्र सामने रखकर अथवा वर्णनको भलीभाँति स्मरण करके आँखें मूँदकर एक-एक अंगका ध्यान करना चाहिये। सब अंगोंका ध्यान न जमे तो मुख-मण्डल या चरणकमलोंका ही ध्यान करना चाहिये। अभ्यास दृढ़ताके साथ होगा तो ध्यान अवश्य ही हो सकता है। विश्वास, श्रद्धा, निश्चय और भगवान‍्की कृपाके आश्रय आदिका अवलम्बन लेकर अभ्यास किया जाय तो अपने इष्टकी सर्वांगपूर्ण मूर्तिका ध्यान शीघ्र ही हो सकता है। लगन होनी चाहिये। अधिक प्रयत्न करनेपर तो आगे चलकर इष्टकी कृपासे खुली आँखों ध्यान होने लगता है और वह चाहे जब, चाहे जहाँ हो सकता है। लेखक एक साधकको जानता है, जिसको छ: महीने लगातार दिनमें तीन समय नियतरूपसे आँखें मूँदकर श्रीविष्णुभगवान‍्के ध्यानका अभ्यास करनेपर खुली आँखों ध्यान होने लगा था, वह जब स्मरण करता तभी भगवान‍् श्रीविष्णु उसे अपने सामने मुसकराते हुए खड़े दिखायी देते। यह ध्यान उसको ऊपर-नीचे, सब दिशाओंमें, सब समय हो सकता था। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि उसको कोई अलौकिक शक्ति प्राप्त हो गयी थी; चित्तकी वृत्तियोंको किसी एक वस्तुके आकारका बना देनेका अभ्यास सिद्ध होनेपर जब उसके चित्तमें उस वस्तुका स्मरण होता है, तभी वह चित्त उसी रूपमें परिणत होकर उसके ध्यानमें आ जाता है; परंतु यह है बहुत ही अच्छा साधन। इसीसे समाधि होती है और समाधिकी सिद्धि होनेपर भगवान‍्का साक्षात्कार हो जाता है।

सगुण साकारका ध्यान करनेवाले पुरुषको एक बात और ध्यानमें रखनी चाहिये कि उसके इष्ट भगवान‍् ही सर्वशक्तिमान् सर्वोपरि हैं, वही निर्गुण, सगुण, साकार, निराकार सब कुछ हैं, अन्य सब रूप केवल उन्हींके हैं, उनसे बढ़कर और उनसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। यदि साधकने भूलसे अपने इष्टकी अपेक्षा किसी दूसरेको ऊँचा मान लिया तो उसको ऊँचा फल नहीं मिलेगा। दूसरे एक सत्य तत्त्व यह भी है कि परमात्माका सगुण साकाररूप उस मायासे निर्मित नहीं है, जो जगत‍्का प्रसव करती है और जीवोंको मोहसे आच्छादित करती है। उनका प्रत्येक अंग और प्रत्येक आयुध, आभूषण सभी कुछ दिव्य, नित्य, शुद्ध, चिन्मय और भगवत्स्वरूप है। इसीसे उस दिव्य आनन्दरसमय निखिलसौन्दर्य-माधुर्यनिधि भगवान‍्के सामने आते ही निर्ग्रन्थ मुनिगण भी मोहित हो जाते हैं। भगवान‍्के स्वरूपको मायिक मानना तो उसका प्रत्यक्ष तिरस्कार करना है। जो उसे मायिक मानता है, उसे मायिक ही मिलता भी है।

इष्टमें सर्वोपरि परमात्मबुद्धि और ध्यानके समय दीखनेवाली भगवान‍्की मूर्तिमें दिव्य और सत्य साक्षात्कारबुद्धि रखनेसे शीघ्र सफलता मिलती है। चित्त ज्यों-ज्यों ध्येयाकार होता है, त्यों-त्यों ध्यानकी प्रगाढ़ता होती है और त्यों-ही-त्यों कार्य करते समय भी इष्टकी मूर्ति सामने दीखा करती है। श्रीगोपियोंकी तो यह योगधारणा इतनी बढ़ी हुई थी कि उन्हें हर समय, हर जगह श्रीकृष्ण ही दीखते थे। एक गोपी सुबह उठकर घरमें झाड़ू दे रही थी कि उसे अपने सामने श्रीकृष्ण दिखायी दिये। वह झाड़ू देना भूल गयी। उसके नेत्र मानो उसी क्षण भगवान‍्के मुखकमल-मकरन्दका पान करनेके लिये भ्रमर बनकर उसमें गड़ गये। एक दूसरी दही मथ रही थी, देखती है प्राणधन श्यामसुन्दर सामने खड़े हैं। मन्थन बंद हो गया, वह उस अनूप रूपराशिपर मुग्ध हुई स्तम्भित-सी रह गयी। एक गोपी अपने बच्चेको पालनेमें झुला रही थी, लोरी दे रही थी, इतनेमें ही प्रियतम श्रीकृष्ण दिखायी दिये। माँ अपने बच्चेको भूल गयी और अतृप्त नेत्रोंसे भगवान‍्का रूपरस पान करने लगी। चौथी एक गोपी बैठी थी भोजन करने। मदनमोहन बालकृष्ण हँसते हुए उसकी थालीके समीप आ बैठे, वह अपना खाना भूल गयी और आनन्दमें भरकर श्रीकृष्णको ही भोजन कराने लगी। कैसी अनुपम आनन्दमयी स्थिति है।

श्रीसीताजी अशोकवाटिकामें सदा अपने सामने श्रीरामकी मनोहर मूर्तिको देखती थीं। नन्दिग्राममें श्रीरामपद-पद्म-मकरन्दके भ्रमर बड़भागी भरतजी नित्य श्रीचरणपादुकाके ऊपर श्रीसीतारामजीकी मनोहर झाँकी देखा करते थे। पतिव्रताशिरोमणि शंकरप्रिया भगवती सतीने योगाग्निसे शरीर जलाते समय ध्याननेत्रोंसे अपने चारों ओर भगवान‍् शिवके दर्शन किये थे।

ध्यानकी अमित महिमा है। पतंजलि महर्षिने अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—ये पाँच महान् क्लेश बताये हैं। संयमादि क्रियायोगसे ये क्षीण होते हैं, इनका दमन होता है, परंतु समूल नाश नहीं होता। बीजरूपसे ये छिपे रह जाते हैं और अनुकूल अवसर और संग पाकर पुन: अंकुरित और फुल्लित-फलित हो जाते हैं, परंतु ध्यानयोग तो क्रमश: पूर्ण समाधिमें परिणत होकर उनके बीजतकको नष्ट कर देता है। ध्यानका आनन्द कोई लिखकर नहीं बता सकता। इसके महत्त्व और आनन्दका पता तो साधना करनेपर ही लगता है।

इस लेखमें ध्यानके सम्बन्धमें जो कुछ लिखा गया है, उसमें लेखकका स्वानुभव बहुत थोड़ा और संकलन ही अधिक है। सुधी पाठक भूल-चूकके लिये क्षमा करेंगे।