दूसरोंसे वैसा ही व्यवहार करो जैसा उनसे अपने लिये चाहते हो
१—कोई तुम्हें कड़ी जबान कहता है, गाली देता है, शाप देता है, बेहूदी दिल्लगी करता है या चिढ़ाता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
२—कोई तुम्हारा अपमान या तिरस्कार करता है, तुम्हें नीचा दिखाता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
३—कोई तुम्हारी निन्दा, बदनामी या चुगली करता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
४—कोई तुम्हारी बातको बार-बार काटता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
५—कोई तुम्हारी चोरी करता या छल करके तुम्हें ठगता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
६—कोई तुम्हारे निर्दोष होनेपर भी तुम्हें सताता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
७—कोई धन, जन, अधिकार आदिके बलपर तुम्हें क्लेश पहुँचाता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
८—कोई तुम्हारा अहित करता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
९—कोई तुम्हारा घर-द्वार नीलाम करके तुम्हें घरसे निकलवा देता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
१०—कोई तुम्हारे न्यायप्राप्त स्वत्वपर या तुम्हारे धनपर मन चलाता है अथवा उसे छीनने-हड़पनेका प्रयत्न करता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
११—कोई तुम्हारी रखी हुई धरोहर या जमा करायी हुई रकमको वापस देनेमें इनकार करता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
१२—कोई तुम्हारी उन्नति या प्रगतिमें बाधक होता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
१३—कोई तुम्हारी माँ-बहिन, पत्नी या पुत्री आदिको बुरी नजरसे देखता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
१४—कोई तुम्हारे धर्मपर, धार्मिक पुरुषोंपर, पूर्वपुरुषोंपर, शास्त्रोंपर और भगवान् पर किसी तरहका दोषारोपण या आक्रमण करता है तो तुम्हें अवश्य दु:ख होता है और उसपर क्रोध आता है।
बस, इसी प्रकार तुम किसीके साथ वैसा व्यवहार करते हो तो उसे भी वैसा ही दु:ख होता है, उसके मनमें भी तुमपर क्रोध आता है, वह भी तुम्हें शाप देता है। फलत: दोनों ही मन-वाणी तथा शरीरसे बुरे कर्ममें लग जाते हैं और दोनोंका ही पतन होता है। इसलिये किसीके साथ भी व्यवहार करते समय पहले अपनेको उसकी स्थितिमें ले जाकर विचार करो, तब व्यवहार करो। सदा वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम दूसरोंसे अपने लिये चाहते हो।