एक उपाय
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥
(गीता ७।१९)
श्रीभगवान् कहते हैं—‘अर्जुन! बहुत जन्मोंके अन्तके जन्मोंमें ज्ञानवान् भक्त ‘यह सब कुछ वासुदेव ही है’ इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा बहुत दुर्लभ है।’
भगवान्के इन वचनोंसे यह सिद्ध है कि जो पुरुष सबको भगवान् समझकर भगवान्का भजन करता है, उसका फिर जन्म नहीं होता; क्योंकि ऐसा साधन जिस जन्ममें होता है, वही बहुत-से जन्मोंके अन्तका जन्म है। गीताका अध्ययन करनेवाले इस सिद्धान्तसे भलीभाँति परिचित हैं कि भगवान् ही इस विश्वके रूपमें प्रकट हो रहे हैं। सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि देवताओंसहित समस्त विश्वप्रपंच ही उनका स्वरूप है। वे ही जगत्के भिन्न-भिन्न रूपोंमें अपनेको प्रकट कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा है—
मत्त: परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
(गीता ७।७)
‘अर्जुन! मेरे अतिरिक्त किंचित् भी दूसरी वस्तु नहीं है। यह सारा जगत् सूतमें सूतके मणियोंकी भाँति केवल मुझमें ही गुँथा हुआ है।’ इसी परम तत्त्वको जाननेकी और जाननेवालेकी महिमा गीतामें स्थान-स्थानपर गायी गयी है। कुछ स्थल देखिये—
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
(४।२४)
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:॥
इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:॥
(५। १८-१९)
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित:।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मत:॥
(६।२९—३२)
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि × × × ×॥
(७। १२)
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
(९। ४)
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता:॥
(१०। ८)
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥
(१८। २०)
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥
(१८।४६)
‘अर्पण ब्रह्म है, हवि (हवन-सामग्री) ब्रह्म है, अग्निरूप ब्रह्ममें कर्तारूप ब्रह्मके द्वारा जो हवन किया गया है वह भी ब्रह्म ही है। अत: कर्मरूप ब्रह्ममें समाधिस्थ पुरुषरूप ब्रह्मको प्राप्त होनेयोग्य वस्तु भी ब्रह्म ही है। विद्या और विनयसे युक्त (पूजनीय) ब्राह्मणमें, (पवित्र दूध देनेवाली मातारूप) गौमें, (राजाओंके वाहन) हाथीमें, (न छूने लायक तामसी पशु) कुत्तेमें और (पापदेह) चाण्डालमें (इतने व्यावहारिक भेद होनेपर भी) जो (आत्मरूपसे) समभावसे देखनेवाले हैं, वे ही पण्डित हैं। जिनका मन (इस प्रकार) समत्वमें स्थित है, वे जीते हुए ही सम्पूर्ण संसारको जीत लेते हैं (वे ही जीवन्मुक्त हैं); क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है और वे ब्रह्ममें स्थित हैं। परमात्मारूपी योगमें युक्त सर्वत्र समभावसे देखनेवाला योगी पुरुष आत्माको (बर्फमें जलकी भाँति) समस्त भूतोंमें व्यापक और सम्पूर्ण भूतोंको (स्वप्नसे जागे हुए पुरुषकी दृष्टिमें स्वप्नके संसारकी भाँति अपने संकल्पके आधारपर) आत्मामें देखता है। (आत्मा परमात्मा ही है अतएव) जो पुरुष सर्वत्र मुझको (आत्मरूप भगवान्को व्यापक) देखता है और सब भूतोंको मुझ भगवान्में (आकाशमें वायुकी भाँति) देखता है, उससे मैं कभी अदृश्य नहीं होता और वह मुझसे कभी अदृश्य नहीं होता। इस प्रकार जो पुरुष एक परमात्माके भावमें स्थित होकर सर्व भूतोंमें स्थित मुझ भगवान्को भजता है, वह योगी सब कुछ करता हुआ भी मुझमें ही बर्तता है। अर्जुन! ऐसा जो योगी अपनी ही सदृश्यतासे सब भूतोंमें (आत्मरूप भगवान्को) सम देखता है और सुख-दु:खको भी (सम देखता है) वही योगी परमोत्तम माना गया है। (अधिक क्या) सात्त्विक, राजस और तामस सभी भाव मुझसे ही होते हैं, तू ऐसा जान। (यह सारा जगत् ) मुझ निराकार परमात्मासे परिपूर्ण है। मैं ही सबकी उत्पत्तिका कारण हूँ और मुझसे ही सारे जगत्में प्रवृत्तिचेष्टा हो रही है, इस प्रकार समझकर ही बुद्धिमान् पुरुष प्रेमसे मुझ परमात्माको भजते हैं। अतएव तू उसी ज्ञानको सात्त्विक ज्ञान समझ कि जिससे (यह मनुष्य) अलग-अलग दीखनेवाले सब भूतोंमें एक ही अविनाशी परमात्मभावको विभागरहित समभावसे देखता है। जिस परमात्मासे सब भूतोंकी उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सारा जगत् व्याप्त है, उस (सर्वत्र स्थित एक) परमात्माको अपने कर्तव्य-कर्मद्वारा पूजकर मनुष्य परम सिद्धि (मोक्ष)-को प्राप्त होता है।’
गीताके उपर्युक्त थोड़े-से अवतरणोंसे यह सिद्ध हो जाता है, भगवान् ही विश्वरूपसे प्रकट हैं और इस बातको समझकर उनकी सेवा-पूजा करनेसे बहुत ही शीघ्र परमात्माकी प्राप्ति होती है। विभिन्नतामें एकता देखना, नाना प्रकारके रंग-रूपवाले जगत्में एक ही परमात्माके स्वरूपको देखना—यही तो आर्य-ऋषियोंका परम आदर्श है। श्रीगोसाईंजी महाराज इसी आदर्शको लक्ष्य करके सब जगत्को ‘सीय राममय’ जानकर‘जुग पानी’ जोड़कर प्रणाम करते हैं। यही परमोच्च साधना है। परंतु पद-पदपर विविधताका खेल देखनेवाले हमलोग इस साधनाको कैसे करें? सिद्धान्तसे यह बात मान ली जाती है, बुद्धि स्वीकार भी कर लेती है, परंतु जबतक वस्तुत: ऐसी स्थिति नहीं हो जाती, तबतक कुछ भी नहीं है। व्यवहारमें हजार भेद होनेपर भी यह स्थिति हो सकती है और सारा बाहरी व्यवहार समान करनेकी चेष्टा करनेपर भी यह स्थिति नहीं होती। इसका सम्बन्ध तो मनसे है। जबतक चित्तकी वृत्तिमें परमात्मासे भिन्न जगत्की सत्ता बनी है, तबतक ऊपरसे कितना ही समताका ढकोसला क्यों न किया जाय, सब व्यर्थ होता है। जगत्की भिन्न सत्ताको भगवान्की एक अखण्ड सत्तामें मिला देना होगा, जो यथार्थ सत्य है। इसके लिये उपाय है बार-बार चित्तवृत्तिसे इस दृश्य जगत्की सत्ताको हटाना और उसके स्थानपर परमात्माकी सत्ताको स्थापित करना। यह अभ्यास इसमें बड़ा सहायक होगा। इसीलिये भगवान्ने कहा है—यह अस्थिर और चंचल चित्त ज्यों-ज्यों संसारकी ओर जाय त्यों-ही-त्यों इसे रोककर परमात्मामें लगावे* (६। २६)। जिस दिन चित्तसे जगत् उठ जायगा, उस दिन जगत् रहेगा नहीं। हमलोगोंका सबका यह अनुभव है कि जिस समय हम किसी महान् दु:खप्रद घटनाको चित्तसे भूल जाते हैं, उस समय वह घटना हमारे लिये नहीं रहती, इसीलिये उस समय उस दु:खका हमें कुछ भी अनुभव नहीं होता। इस प्रकार जब हम कुछ देरके लिये चित्तसे किसी बातको दूर कर सकते हैं, तब अभ्याससे सदाके लिये भी इस सारे प्रपंचको हटा सकते हैं। दृढ़तासे लगकर अभ्यास करनेकी आवश्यकता है। अभ्यास न होनेके कारण ही बुद्धिमें युक्तिसे सर्वथा ठीक जँचनेवाला यह सिद्धान्त वस्तुत: कार्यरूपमें परिणत नहीं हो पाता।
यह सिद्धान्त केवल युक्तिसंगत ही नहीं है, वास्तवमें सर्वथा सत्य है। कोई यह न समझे कि ‘बुद्धिमें युक्तिसे ऐसे जँचता है या हमारे दीर्घकालके अभ्याससे वृत्तियाँ ही परमात्माके स्वरूपमें हमें दिखायी देती हैं, इसके अतिरिक्त परमात्मा और कुछ नहीं है।’ यह समझकर परमात्माको सबमें देखनेका अभ्यास करना तो फलमें व्यर्थ ही होगा; क्योंकि इसमें परमात्मा असलमें हैं नहीं, परमात्माका आधार हमारी युक्तियाँ, भावनाएँ और वृत्तियाँ ही हैं। तब ऐसे परमात्माका गहरा अस्तित्व ही क्या है। हमारी युक्तियों, भावनाओं और वृत्तियोंके बदलते ही या उनके मिटते ही उनके आधारपर टिका हुआ परमात्मा भी बदल जायगा या नहीं रहेगा; परंतु यह बात नहीं है, हम मानें या न मानें, परमात्मा हैं ही, हमारे न माननेसे उनके अस्तित्वमें कोई बाधा नहीं पहुँचती। हमें यही समझकर अभ्यास करना चाहिये कि आज जो अज्ञानवश हम परमात्माको नहीं देख पाते, अभ्याससे—सब परमात्मा हैं, इस भावसे सर्वत्र भगवद्दर्शनके अभ्याससे, हमें यथार्थ ही सर्वत्र व्याप्त सभी रूपोंमें व्यक्त एक परमात्माका साक्षात्कार हो जायगा। जबतक ऐसा दृढ़ और व्यापक अभ्यास न हो जाय, तबतक शिथिलता न आने देकर लगातार अभ्यास करते ही रहना चाहिये। बार-बार चित्तकी वृत्तियोंसे प्रपंचको, दृश्य जगत्के बाह्यरूपको हटाकर परमात्माकी भावना करनी चाहिये। पुन:-पुन: यह दृढ़ निश्चय करना चाहिये कि श्रीपरमात्मदेव ही अनेक रूपोंमें प्रकट होकर अनेक प्रकारकी लीलाएँ कर रहे हैं। प्रात:काल नींद खुलनेसे लेकर रातको सोनेतक हमें जिनसे बोलना पड़े, व्यवहार करना पड़े, उन सबमें यही भावना करनी चाहिये कि इन सारे वेषोंमें श्रीपरमात्मा ही हमारे साथ खेल रहे हैं। जो कोई सामने आवे, जिससे भी बोलने या मिलनेका काम पड़े, सबसे पहले इस रहस्यको स्मरण कर लिया जाय कि इस स्वाँगको धारण किये श्रीपरमात्मा ही हमारे सामने खड़े हैं—यह स्मरणकर और समझकर, इस बातको याद रखते हुए ही उसके साथ मिलना, बोलना और उसके तथा अपने स्वाँगके अनुसार यथायोग्य व्यवहार करना चाहिये। नौकरके साथ मालिकका-सा, स्त्रीके साथ पतिका-सा, पिता-माताके साथ पुत्रका-सा, गुरुके साथ शिष्यका-सा, शिष्यके साथ गुरुका-सा, प्रजाके साथ राजाका-सा, राजाके साथ प्रजाका-सा, मित्रके साथ मित्रका-सा, यहाँतक कि वैरीके साथ कर्तव्यवश वैरीका-सा व्यवहार भी सब प्रकारसे दोषरहित, कल्याणका कारण और परम शुद्ध हो सकता है—यदि वह परमात्माको पहचानकर उनके आज्ञानुसार राग-द्वेषरहित होकर लीलावत् किया जाय। कम-से-कम बुरा भाव तो उसी समय मिट जायगा, जब कि हम परमात्मा समझकर किसीसे बर्ताव करेंगे। वेष बदले हुए प्रिय बन्धुको पहचान लेनेपर उसके साथ बुरा बर्ताव कैसे किया जा सकता है। परमात्मा भी वेष बदलकर नाना रूपोंमें प्रतिक्षण हमारे सामने आते हैं, हम उन्हें पहचानते नहीं, इसीलिये धोखा खाते और पाप करते हैं, पहचान लें तो फिर व्यवहारमें दोष नहीं आ सकता।
व्यवहारमें चाहे लाख भेद रहे, मनमें राग-द्वेष और अपना-पराया नहीं रहनेसे दोष या पापकी सम्भावना नहीं है, परंतु यह सिद्धान्त केवल कहने-सुनने या लिखने-पढ़नेका ही नहीं रहना चाहिये। जीवनमें यह कार्यरूपमें परिणत होना चाहिये, तभी हम इससे वास्तविक लाभ उठा सकते हैं। इसमें पहले-पहले तो केवल स्मरण ही रखनेकी बात है। कम-से-कम जिस किसीसे भी मिलने-बोलनेका काम पड़े, उसी क्षण पहले उस रूपमें भगवान् समझकर मन-ही-मन भक्ति-भावसे उसे प्रणाम कर ले और फिर इस बातको याद रखते हुए ही उससे यथायोग्य व्यवहार करे। ऐसा प्रयोग घर और बाहरमें सबके साथ किया जा सकता है। कुछ दिन करके देखिये, कितना आनन्द मिलता है, पाप-ताप कैसे हमसे दूर भागने लगते हैं, आसुरी सम्पत्ति छिपने लगती है और स्वयमेव ही दैवी सम्पत्तिका प्रादुर्भाव होकर शान्ति हमारे समीप कितनी तेजीसे आना चाहती है।
जब हमारा अपने घरके लोगोंमें और व्यवहारसे सम्बन्ध रखनेवाले मनुष्योंमें भगवद्भाव हो जायगा, तब आगे बढ़ते देर नहीं लगेगी। फिर सभी चराचर उसीका स्वरूप दीखेगा, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति और जीवन-मरण उसी नाटकके परदे होंगे। उस प्यारेके सिवा कुछ रह ही नहीं जायगा। फिर न द्रष्टा रहेगा न दृश्य। जो कुछ रहेगा, सो अनिर्वचनीय ही है।
अतएव परमानन्दकी प्राप्तिके इस एक ही महान् साधनमें सबको लगनेका प्रयत्न करना चाहिये। इस एक ही उपायसे मनुष्य-जीवन सफल हो सकता है।