गो-मन्त्र-जापसे पापनाश
घृतक्षीरप्रदा गावो घृतयोन्यो घृतोद्भवा:।
घृतनद्यो घृतावर्तास्ता मे सन्तु सदा गृहे॥
घृतं मे हृदये नित्यं घृतं नाभ्यां प्रतिष्ठितम्।
घृतं सर्वेषु गात्रेषु घृतं मे मनसि स्थितम्॥
गावो ममाग्रतो नित्यं गाव: पृष्ठत एव च।
गावो मे सर्वतश्चैव गवां मध्ये वसाम्यहम्॥
इत्याचम्य जपेत् सायं प्रातश्च पुरुष: सदा।
यदह्ना कुरुते पापं तस्मात् स परिमुच्यते॥
(महा०, अनु० ८०। १—४)
‘गाय घृत और दूध देनेवाली हैं, घृतका उत्पत्तिस्थान, घृतको प्रकट करनेवाली, घृतकी नदी और घृतकी भँवररूप हैं, वे सदा मेरे घरमें निवास करें। घृत सदा मेरे हृदयमें रहे, मेरी नाभिमें रहे, मेरे सारे अंगोंमें रहे और मेरे मनमें स्थित रहे। गाय सदा मेरे आगे रहें, गाय सदा मेरे पीछे रहें, गाय मेरे चारों ओर रहें और मैं गायोंके बीचमें ही निवास करूँ।’
‘जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और सायंकाल आचमन करके उपर्युक्त मन्त्रका जप करता है, उसके दिनभरके पाप नष्ट हो जाते हैं।’