गोबरमें लक्ष्मीजीका निवास
एक बार मनोहर रूपधारिणी लक्ष्मीजीने गौओंके समूहमें प्रवेश किया। उनके सौन्दर्यको देखकर गौओंको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने उनका परिचय पूछा। लक्ष्मीजीने कहा—‘गौओ! तुम्हारा कल्याण हो। इस जगत्में सब लोग मुझे लक्ष्मी कहते हैं, सारा जगत् मुझे चाहता है। मैंने दैत्योंको छोड़ दिया, इससे वे नष्ट हो गये। इन्द्र आदि देवताओंको आश्रय दिया, तो वे सुख भोग रहे हैं। देवताओं और ऋषियोंको मेरी ही शरणमें आनेसे सिद्धि मिलती है। जिसके शरीरमें मैं प्रवेश नहीं करती, उसका नाश हो जाता है। धर्म, अर्थ और काम मेरे ही सहयोगसे सुख देनेवाले हो सकते हैं। मेरा ऐसा प्रभाव है। अब मैं तुम्हारे शरीरमें सदा निवास करना चाहती हूँ। इसके लिये स्वयं तुम्हारे पास आकर प्रार्थना करती हूँ। तुमलोग मेरा आश्रय ग्रहण करो और श्रीसम्पन्न हो जाओ।’
गौओंने कहा—‘देवि! बात तो ठीक है, पर तुम बड़ी चंचला हो। कहीं भी जमकर रहती नहीं। फिर तुम्हारा सम्बन्ध भी बहुतोंके साथ है। इसलिये हमको तुम्हारी इच्छा नहीं है। तुम्हारा कल्याण हो। हमारा शरीर तो स्वभावसे ही हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर है। हमें तुमसे कोई काम नहीं है। तुम जहाँ इच्छा हो, जा सकती हो। तुमने हमसे बातचीत की, इसीसे हम अपनेको कृतार्थ मानती हैं।’
लक्ष्मीजीने कहा—‘गौओ! तुम यह कह क्या रही हो? मैं बड़ी दुर्लभ हूँ और परम सती हूँ, पर तुम मुझे स्वीकार नहीं करतीं! आज मुझे यह पता लगा कि बिना बुलाये किसीके पास जानेसे अनादर होता है—यह कहावत सत्य है। उत्तम व्रतचारिणी धेनुओ! देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, मनुष्य और राक्षस बड़ी उग्र तपस्या करनेपर कहीं मेरी सेवाका सौभाग्य प्राप्त करते हैं। तुम मेरे इस प्रभावपर ध्यान दो और मुझे स्वीकार करो। देखो, इस चराचर जगत्में मेरा अपमान कोई भी नहीं करता।’
गौओंने कहा—‘देवि! हम तुम्हारा अपमान नहीं करतीं। हम तो केवल त्याग कर रही हैं, सो भी इसलिये कि तुम्हारा चित्त चंचल है। तुम कहीं स्थिर होकर रहती नहीं। फिर हमलोगोंका शरीर तो स्वभावसे सुन्दर है। अतएव तुम जहाँ जाना चाहो, चली जाओ।’
लक्ष्मीजीने कहा—‘गौओ! तुम दूसरोंको आदर देनेवाली हो। मुझको यों त्याग दोगी, तो फिर संसारमें सर्वत्र मेरा अनादर होने लगेगा। मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ, निर्दोष हूँ और तुम्हारी सेविका हूँ। यह जानकर मेरी रक्षा करो। मुझे अपनाओ। तुम महान् सौभाग्यशालिनी, सदा सबका कल्याण करनेवाली, सबको शरण देनेवाली, पुण्यमयी, पवित्र और सौभाग्यवती हो। मुझे बतलाओ मैं तुम्हारे शरीरके किस भागमें रहूँ?’
गौओंने कहा—‘यशस्विनी! हमें तुम्हारा सम्मान अवश्य करना चाहिये। अच्छा, तुम हमारे गोबर और मूत्रमें निवास करो। हमारी ये दोनों चीजें बड़ी पवित्र हैं।’
लक्ष्मीजीने कहा—‘सुखदायिनी गौओ! तुमलोगोंने मुझपर बड़ा अनुग्रह किया। मेरा मान रख लिया। तुम्हारा कल्याण हो। मैं ऐसा ही करूँगी।’ गौओंके साथ इस प्रकार प्रतिज्ञा करके देखते-ही-देखते लक्ष्मीजी वहाँसे अन्तर्धान हो गयीं।
(महा०, अनु०, अध्याय ८२)