गोरक्षाका सर्वोत्तम साधन—भगवत्प्रार्थना
भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।
करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जग जाल॥
गोसाधुदेवताविप्रवेदानां रक्षणाय वै।
तनुं धत्ते हरि: साक्षाद् भगवानात्मलीलया॥
गौकी दुर्दशा और इस दुर्दशासे गौको उबारनेके साधनोंपर विशिष्ट विद्वानों और सूक्ष्मदर्शी विशेषज्ञोंके द्वारा भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणसे बहुत विचार किया गया है और अपने-अपने स्थानमें वे सभी विचार महत्त्वपूर्ण हैं और उनसे यथायोग्य लाभ उठानेकी बड़ी आवश्यकता है। यहाँ एक और साधन भी बतलाया जाता है और वह लेखककी अल्पमतिमें सर्वशिरोमणि है। वह है—भगवान्से कातर प्रार्थना। जब-जब पृथ्वीपर संकट आया (पृथ्वीपर संकट आनेका अर्थ ही है—गो-ब्राह्मणपर संकट आना) तभी तब ऋषि-देवताओंने गोरूपधारिणी या गोरूपा पृथ्वीके पीछे-पीछे जाकर भगवान्से करुण प्रार्थना की, भगवान्को पुकारा और फलत: उनका संकट टला। भगवान् अवतीर्ण हुए।‘बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।’
भगवान्की कृपा और भगवान्के बलसे असम्भव भी सम्भव हो जाता है। जर्मनीके वीर हिटलरने एक योजना बनायी थी कि सन् १९३९ में ही इंग्लैंडको जीत लिया जायगा। जापानकी भी तैयारी कम नहीं थी, परंतु भगवान्को उनका विजयी होना स्वीकार नहीं था। लाखों सुसज्जित सैन्य तथा अपार सामग्री तैयार रहते भी वे दोनों हार गये और ऐसे हारे कि जीतनेवाले देशोंने भी उनकी ऐसी हारकी कल्पना नहीं की थी। वैसे ही विजयीलोग भी अब विजयगर्वमें मतवाले होकर यह समझते हैं कि हमने अपने बल-कौशलसे विजय पायी है और वर्तमान राक्षसी आणविक बमने तो उनके इस गर्वको हजारों गुना बढ़ा दिया है एवं इस गर्वमें भरकर ही वे आज पराजित राष्ट्रोंका बहुत बुरी तरहसे सर्वनाश करनेपर तुले हुए हैं, पर कौन कह सकता है कि भगवान्के विधानसे अगले बीस-पचीस वर्षोंमें क्या होगा। भगवान् गर्वहारी हैं। हिटलर वीर होते हुए भी हार गये, खास करके इसीलिये कि उनमें अत्यन्त गर्व बढ़ गया था। जापानमें भी गर्वकी कमी नहीं थी। अब इन विजयी राष्ट्रोंमें तो उन सबका सारा गर्व इकट्ठा होकर आ गया है। पता नहीं इनके लिये भगवान्के विधानने क्या रच रखा है। यह तो भविष्य ही बतायेगा। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि पराजितोंके प्रति सद्व्यवहार करनेसे ही वैरका नाश होता है और जगत्में सुख-शान्ति सुप्रतिष्ठित होती है। असहाय परिस्थितिमें पड़ा हुआ मनुष्य बुरे बर्तावसे दब जाता है, पर उसके मनका परिवर्तन नहीं होता; वरं उसमें और भी जोरसे आग लगती है और वह अंदर-ही-अंदर फैलती है एवं मौका पाते ही जन्म-जन्मान्तरतक भयानकरूपमें भड़कती रहती है; पर यह बात कौन समझावे और कौन समझे? भगवान्के अनिवार्य विधानकी व्यवस्था ही समय आनेपर इस तत्त्वको समझाती है और फिर बाध्य होकर समझना भी पड़ता है।
मनुष्यके हृदयकी कालिमाने विज्ञानका दुरुपयोग कराया और आणविक बमकी सृष्टि की। एक हीरोशिमा नगरके ढाई लाख नर-नारियोंमेंसे दो लाख चौवालीस हजार एक ही घंटेमें जल-भुनकर खाक हो गये! इसपर सुसभ्य अमेरिकाको बड़ा गर्व है। जहरीली गैस तैयार करनेवाले राष्ट्र तो बर्बर थे, पर सुसंस्कृत अमेरिका आणविक बम बरसाकर भी सुसंस्कृत और निर्दोष है! सफलताका समय है न? इस सम्बन्धमें डॉ० महेन्द्रनाथ सरकारने बहुत ही ठीक लिखा था कि ‘विज्ञानकी शक्तिका अपव्यवहार करके सभ्यताकी गति इतनी तेज हो चली है कि उसकी यह क्रम-वर्धमान शक्ति उसे कहाँ ले जायगी, इसपर विचार करनेसे भी क्लेश होता है। मनुष्यको इस यान्त्रिक सभ्यताने पिष्ट किया है—पीसा है, पुष्ट नहीं किया! अभी जो पुष्टि दीखती है, वह भी यथार्थमें पुष्टि नहीं है। यह मनुष्यकी नीच सत्ताकी शक्तिको जगाकर, उसे क्रमश: उसकी तेजोमय स्वच्छ दृष्टिसे उतारकर तमिस्राके गम्भीर गहनमें ले जा रही है....। मनुष्य मानो क्रमश: अपनी चेतनाके दीप्त और उद्बुद्ध प्रकाशसे स्तिमित अचेतनमें उतरकर प्राणशक्तिकी उद्दाम तथा कुटिल शक्तिकी ओर दौड़ रहा है। आणविक बमकी प्रस्तुत प्रणालीके अंदर, अणुके तनु-त्यागके भीतर चाहे जितना गोपनीय तथ्य भरा हो, उसमें जो प्रेरणा है, उसकी उत्पत्ति तमसाच्छन्न हृदयसे है और उसकी गति है ध्वंसकी ओर....’ इसपर टीका-टिप्पणी व्यर्थ है।
असलमें इन देशोंकी विजय हुई है भगवान्के विधानसे और वह विधान ही सर्वशक्तिमान् है। विधान बनता है—भगवदिच्छासे, परंतु उस इच्छाके मूलमें रहते हैं हमारे कर्म। सम्भव है इन देशोंमें ऐसे पुण्यकर्मा पुरुष हों, जिनका पुण्यबल बढ़ा हुआ था और उन देशोंमें पुण्यके बलसे बलवान् इतने पुरुष न हों! रूस-जैसे अनीश्वरवादी देशमें भी छिपे पुण्यात्मा हो सकते हैं। कौन जानता है कहाँ कैसे कर्मवाले पुरुषोंकी अधिकता है। हमारा तो ऐसा विश्वास है कि भारतपर आता हुआ संकट टला, इसके मूलमें भी भगवान्का मंगल-विधान ही काम करता रहा है। अतएव सबसे अधिक आवश्यक है—‘भगवान्के मंगलमय विधानकी मंगलमय व्यवस्थाके नीचे आना, अपनेको भगवान्के कल्याणमय चरणोंमें पूर्णतया समर्पित कर देना। इसमें प्रधान साधन है हृदयकी सच्ची, अनन्य, करुण प्रार्थना। गौकी रक्षाके लिये भी सबसे बढ़कर यही साधन है। जिनका इसमें विश्वास है, उनको चाहिये, वे श्रद्धापूर्वक नित्य भगवान्से कातर प्रार्थना किया करें। यदि प्रार्थना सत्य होगी और हृदयसे होगी तो ऐसे संयोग अपने-आप बनेंगे जिनसे गोरक्षाका मार्ग सुगम हो जायगा।