गोरक्षापर कुछ स्फुट विचार
‘कल्याण’ के ‘गो-अंक’ में बड़े-बड़े अनुभवी विद्वानोंके लेख प्रकाशित हुए थे। मेरा कोई अधिकार नहीं कि मैं इस विषयमें अपनी ओरसे कुछ लिखूँ, परंतु कुछ विषय ऐसे हैं, जिनपर मत प्रकट करनेके लिये मुझे बाध्य होना पड़ा है। इसीलिये मैं नम्रताके साथ निम्नलिखित विषयोंपर अपने विचार प्रकट करनेका साहस करता हूँ। इन विषयोंमें मेरा निजी विशेष अनुभव नहीं है। मित्रोंके अनुरोध तथा कर्तव्यकी प्रेरणासे ही अपनी समझमें जो बात उचित जँची वह लिखी जा रही है। आशा है, विज्ञ पाठकगण विचार करेंगे और अनुचित विचारोंके लिये सावधान करनेकी कृपा भी करेंगे।
यूरोपका गोप्रेम
यूरोपमें गोपालन और गो-संवर्धनका जो महत्त्वपूर्ण कार्य हो रहा है, वह बहुत ही सराहनीय है एवं उसकी ओर हमारे सुशिक्षित तथा देशकी उन्नतिके सच्चे प्रयासी पुरुषोंका आकर्षित होना स्वाभाविक ही है और उससे हमें यथायोग्य लाभ अवश्य उठाना चाहिये, परंतु एक बातपर विचार करनेकी बड़ी आवश्यकता है; वह है—गौके सम्बन्धमें पाश्चात्यों और भारतीयोंके दृष्टिकोणका भेद। पाश्चात्य जगत्में गोपालन होता है, विशुद्ध आर्थिक दृष्टिसे। इसमें वहाँ उन गायोंकी संख्या बढ़ ही नहीं सकती। जो दूध न देती हों या जो कम देती हों ऐसी गायें तुरंत मार दी जाती हैं और उनका मांस लोगोंकी उदर-दरी भरनेमें लग जाता है। इसलिये वहाँ निकम्मी तथा दूध न देनेवाली गायोंका प्रश्न ही नहीं उठता। भारतमें गोपालनका उद्देश्य अर्थसम्मत होनेके साथ ही मुख्यत: धार्मिक है। हमारे गोपालन और गोसेवनका उद्देश्य केवल इहलौकिक ही नहीं, उससे परलोकका भी सम्बन्ध है। गौ अर्थकरी हो तो सर्वथा उत्तम है ही, परंतु अर्थकरी न होनेकी दशामें भी वह हमारे लिये पूजनीया माता ही है और उसका भरण-पोषण और सेवन-संरक्षण करना हमारा परम कर्तव्य है। पाश्चात्य जगत्की गोसेवा वस्तुत: अर्थ-सेवा है और उनका गौमें प्रेम नहीं है, अर्थमें प्रेम है। असलमें वह प्रेम है ही नहीं, काम है। इसका यह अर्थ नहीं कि वे गौसे प्यार नहीं करते—बहुत करते हैं, अज्ञान और दरिद्र भारतीय पशुपालकोंसे कहीं अधिक करते हैं; परंतु करते हैं—शुद्ध अर्थ-दृष्टिसे। यदि अर्थ-दृष्टिसे गोपालन हानिकर हो तो वे उसे छोड़ देंगे। यह सर्वजनविदित है कि जो गौ वहाँ आर्थिक दृष्टिसे उपयोगी नहीं होती, उसको कोई भी गोशाला (Dairy) नहीं रखती। और इसी आर्थिक दृष्टिको सामने रखकर वहाँ सारे कार्य—गौ खरीदनेसे लेकर गौके मरनेपर उसके मृतावशेष शरीरके पदार्थोंके बेचने तथा काममें लानेतक—किये जाते हैं। यह दृष्टिकोणका महान् अन्तर है। भारतीय जिस पवित्र दृष्टिसे गौको देखता है, वह उसका अनादिकालीन सांस्कृतिक स्वभाव है और उसकी रक्षा होनी ही चाहिये। तभी हिंदू-संस्कृति बचेगी। गाय हर हालतमें भारतीयके लिये पूजनीय और सेवनीय है तथा रहेगी।
इससे यह नहीं समझना चाहिये कि गौकी आर्थिक दृष्टिसे उपेक्षा की जानी उचित है। वर्तमान अर्थ प्रधान जड युगमें अर्थकी अवहेलनासे काम नहीं चलेगा। अतएव अपनी संस्कृतिके अनुरूप गोरक्षा और गोपालनकी दृष्टिको सुरक्षित रखते हुए ही आर्थिक दृष्टिसे भी गौको उपयोगी बनाना चाहिये। सफाई, स्वच्छता, संक्रामक रोगोंके आक्रमणसे बचाना, रोगपीड़ित गायोंकी उचित चिकित्सा करना, उनकी नस्लको न बिगड़ने देकर उत्तरोत्तर सुधारना, अच्छा पूरा चारा-दाना देकर तथा प्रेमका बर्ताव करके उनका दूध बढ़ाना, चमड़ेका उपयोग करनेवालोंके लिये केवल उनके मृतावशेष चमड़ेका ही उपयोग करना, उनके गोबर-गोमूत्रका एक भी कण व्यर्थ न जाने देकर उसकी खाद बनाना, उनके जन्मपत्र रखना; वे जल्दी-जल्दी ब्यायें, अपने ब्यानमें अधिक-से-अधिक दिनोंतक अधिक-से-अधिक दूध दे सकें, दूधमें मक्खन अधिक हो, उनका स्वास्थ्य न बिगड़े और वे दीर्घजीवी हों—इन सब बातोंकी आवश्यकतानुसार वर्तमान वैज्ञानिक सहायतासे व्यवस्था करना; चारे-दानेकी सस्ती व्यवस्था हो, दाबघास (Silage) तैयार हों, गोचरभूमियाँ अधिक हों, इन सबके लिये सब प्रकारसे पूरा प्रयत्न करना; और अपनी मौतसे मरनेतक गौ ऐसी दशामें आवे ही नहीं, जब-कि वह अपना खर्च अपने द्वारा किसी रूपमें न दे दे—इसका प्रयत्न करना, तथा ऐसे ही अन्यान्य साधनोंका भी उपयोग करना जिससे आर्थिक दृष्टिसे गौका महत्त्व बढ़े, अत्यन्त आवश्यक है और इस ओर प्रत्येक भारतीयका ध्यान अवश्य ही आकर्षित होना चाहिये।
विशेषज्ञोंका मत है कि यदि हमारी गौओंको पर्याप्त तथा अच्छा चारा-दाना नियमित मिले, नस्लमें सुधार हो, सुव्यवस्था हो, उन्हें अवनत होनेसे और रोगोंके आक्रमणसे बचाया जाय तो आज जो दूध होता है, उससे दूना दूध हो सकता है और फिर गायें दीर्घकालतक स्वस्थ और दुधारू होकर जी सकती हैं। हमारी गायोंमें यूरोपकी गायोंकी अपेक्षा विकास-शक्ति अधिक है।
परंतु गौकी वर्तमान स्थितिमें प्रधान कारण है भारतकी बढ़ती हुई गरीबी। गरीब भूखे गृहस्थकी गाय भरी-पूरी कहाँसे होगी? गरीबी न हो, भरपूर अनाज और चरागाह हों तो पशुपालनमें भारतीय कभी पीछे न रहें। आज जो बातें वैज्ञानिक दृष्टिसे कही जाती हैं, पशुपालनकी हमारी पुरानी रीतिमें प्राय: वे ही बातें स्वाभाविक थीं। हमारी परिस्थितिने हमें मजबूर कर दिया कि हमको अपना स्वभाव छोड़ना पड़ा और परिणामस्वरूप हमारी गायके साथ ही हम भी दु:खी हो गये!
एक बात और है। विदेशी चालाक शासकोंने विभिन्न आकर्षक हेतुओंसे हमारे अंदर एक ‘मानसिक दासता’ उत्पन्न कर दी है और उसके फलस्वरूप हम आज विदेशी शासनके फंदेसे मुक्त होकर भी विदेशी भावोंकी गुलामीसे छूटना पसंद नहीं करते। दशा यहाँतक हो गयी है कि शारीरिक या आर्थिक स्वतन्त्रता मिल जानेपर भी हमारे मनोंपर तो उन्हींका अखण्ड राज्य बना हुआ है। मनकी परतन्त्रतासे हम नहीं छूट पाये हैं। हमारी इस ‘मानसिक गुलामी’ के कारण ही हम अपनी सभी बातोंको हेय, नगण्य और उनकी प्रत्येक बातको उपादेय और आदर्श मानते हैं और सभी बातोंमें उनके मुँहकी ओर ताकते हैं। इसीसे हम उनकी अर्थप्रधान डेयरी-पद्धतिपर मुग्ध होकर उसे सीखनेके लिये प्रचुर धन, समय, शक्ति और बुद्धिका व्यय करके अपने शिक्षार्थियोंको अमेरिका और इंग्लैंड भेजते हैं। ऐसा न करके यदि हम अपनी शक्तिको घरकी भूली-बिसरी पद्धतियोंकी खोजमें लगावें और उनका समुचित प्रयोग करें तो बड़ी सुगमताके साथ बहुत कम खर्चमें आश्चर्यजनक आदर्शरूपमें अपनी गायोंकी दशा सुधार सकते हैं। पर इस माया-जालसे मुक्ति हो तब न! अभी तो मुक्तिके नामपर बन्धन ही मजबूत होता जा रहा है!
गोवध बंद होना ही चाहिये
गायको कसाईके हाथसे बचानेकी बड़ी आवश्यकता है। कहना न होगा कि गोवध महान् पाप और भारतके लिये तो बड़ा भारी कलंक है। इसमें प्रधान कारण हैं—चमड़े, हड्डी, सूखे मांस और रक्त तथा आँत-ताँत आदिका व्यापार, खास करके चमड़ेकी बेहद माँग! चमड़ेकी रफ्तनी बढ़ती जा रही है। सन् १९१३-१४ में जहाँ २९ लाख खालें गयी थीं, वहाँ सन् ३८-३९ में ४८ लाख खालें गयीं (मार्केटिंग आफ हाइड्स रिपोर्ट पृष्ठ ४०)। इसी रिपोर्टमें आगरा, बंगलोर, बरेली, बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, जबलपुर, मद्रास और पूना—इन बड़े शहरोंके कसाईखानोंमें काटी जानेवाली गाय-भैसोंकी संख्याका विवरण देते हुए लिखा है कि सन् १९३२-३३ में जितने पशु मारे गये थे, सन् १९३७-३८ में उनकी संख्यामें २१.२ प्रतिशतकी वृद्धि हो गयी। यह युद्धपूर्वका वर्णन है। सन् १९४२ में ६६ लाख गाय-भैंसें सरकारी रिपोर्टके अनुसार काटी गयी थीं। युद्धकालमें जहाँ जहाजोंकी कमीके कारण चमड़े आदिकी रफ्तनी घटी, वहाँ फौजोंके लिये गोमांसकी आवश्यकता अत्यधिक बढ़ गयी थी और उसके लिये दूध देनेवाली, गाभिन गायों और बछड़ियोंका भी अबाध वध हुआ, जो करोड़से भी ऊपर पहुँच गया था; ऐसा विशेषज्ञोंका अनुमान है। इस अबाध गोवधको बंद करानेके लिये लोकमतको जाग्रत् करके प्रबल आन्दोलन करनेकी आवश्यकता है। यह आन्दोलन केवल हिंदुओंका ही नहीं रहना चाहिये। मुसलमान, ईसाई तथा अन्य मतावलम्बी सज्जनोंमें भी सहृदयता तथा प्रेमसे इस बातका प्रचार करना चाहिये कि गौ देशके प्रत्येक मनुष्यके लिये आवश्यक है और गौके न रहनेसे हिंदू-मुसलमान सभीको समानरूपसे कष्ट होगा, जिससे वे भी इस आन्दोलनमें शामिल हों तथा सरकारको कानून बनाकर गोवध रोकनेके लिये बाध्य कर दें।
हिंदुओंमें इस बातका खूब प्रचार हो जाना चाहिये कि एक भी गाय कसाईके हाथ जाय नहीं। गाय न मिलेगी, तो कसाईखाने आप ही बंद हो जायँगे। जबतक हिंदू गाय बेचते-बिकाते हैं, तभीतक कसाईखाने चलते हैं!
जिन पशु-मेलोंमें कसाइयोंको गायें मिलती हैं, उन मेलोंको या उनमें गो-विक्रयको कानूनन चेष्टा करके बंद कराना चाहिये। लोकमत जाग्रत् करने, जनताको प्रभावपूर्ण रीतिसे समझाने तथा सरकारको बार-बार सुझानेसे ऐसा होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है।
उत्तरप्रदेशके बलिया जिलेमें गंगातटपर एक मेला होता है, उसमें हजारों गायें प्रतिवर्ष कसाइयोंके हाथ जाती थीं। श्रीराघवप्रसादजी नामक एक गो-भक्त सज्जनके विशेष उद्योग और उसीमें लग जानेसे वहाँ गौका बिकना कतई बंद हो गया। ऐसा और जगह भी हो सकता है। यह प्रयत्न भी होना चाहिये कि मेलोंमें बिकनेके लिये गौएँ आवें ही नहीं।
सरकारने पिछले दिनों भारत-रक्षा-कानूनके अनुसार उपयोगी गायोंके मारनेपर कुछ प्रतिबन्ध लगाये थे; परंतु वे अस्थायी थे। भरपूर चेष्टा करके धारासभाओंमें नये बिल लाकर उन्हें उचित और आवश्यक संशोधनके साथ स्थायी कानून बनवा लेना चाहिये और प्रत्येक प्रान्तमें उनपर ठीक-ठीक अमल होता है या नहीं, इसकी ओर गो-सेवकों तथा गोरक्षिणी संस्थाओंको एवं म्युनिसिपलिटीके सदस्योंको विशेषरूपसे नजर रखनी चाहिये। खेदकी बात है कि प्रतिबन्धोंके रहते हुए भी प्रतिबन्धके विरुद्ध गायोंकी हत्या होती है। इसमें हमारी अवहेलना और गो-हत्यारोंका स्वार्थ ही प्रधान कारण है।
जबतक स्थायी कानून न बनें, तबतक भारतके सभी प्रान्तोंमें वर्तमान कानूनके लागू करानेकी और उसपर पूरा-पूरा अमल हो—इसकी सार्वजनिक समितियों, गो-रक्षा संस्थाओं तथा जिम्मेवार पुरुषोंको व्यवस्था करनी चाहिये। पिछले भारत-रक्षा-कानूनकी धारा ८१ के अनुसार—बम्बई, मद्रास, बिहार, युक्तप्रान्त, उड़ीसा, आसाम और बंगालमें एक वर्षसे तीन वर्षतकके बछड़े-बछड़ी, पाड़े-पाड़ी, तीनसे दस वर्षतकके काममें आने लायक बैल, गाभिन होने तथा काम देने लायक गाय और सभी आयुकी दुधारू और गाभिन गाय (कुछ प्रान्तोंमें दो वर्षतककी मादा भेड़-बकरी भी) वध करनेकी आज्ञा नहीं थी। इनका वध करना, वधमें सहायता पहुँचाना और वधके लिये ले जाना अपराध माना जाता था और इस अपराधके लिये तीन सालतककी सख्त कैद और पशु जब्त करनेकी सजा नियत की गयी थी तथापि गो-वध होता ही रहा और वह अबतक भी चालू है। इसके लिये—
(क) जहाँ किसी कसाईखानेमें कानूनके विरुद्ध पशु मारे जाते हों, वहाँके इससे सम्बन्धित महकमेके स्थानीय अधिकारियोंको सूचना देनी चाहिये और समाचारपत्रोंमें घटना ठीक सत्यरूपमें जरूर प्रकाशित करानी चाहिये।
(ख) सभा करके इसका शान्तिपूर्ण विरोध करना चाहिये और सरकारके ऊँचे अधिकारियोंका भी इसकी तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहिये।
भारतके वर्तमान संविधानकी ४८ वीं धारामें गायों और बछड़े-बछड़ियोंका वध निषेध किया गया है। भारत सरकारके द्वारा बनायी हुई ‘गोरक्षण-संवर्धन-कमेटी’ ने भी सन् १९४८ में दो वर्षके अंदर-अंदर सम्पूर्ण गोवध बंद करनेकी सिफारिश की थी। तदनुसार अबतक गोवध सम्पूर्णरूपसे बंद हो जाना चाहिये था, परंतु नहीं हुआ, यह दु:खकी बात है। यद्यपि फौजको मांस देनेके लिये अब गायें नहीं काटी जातीं; परंतु चमड़ेके निर्यातके लिये काटी जाती हैं और जबतक गोवध पूर्णरूपसे कानूनके द्वारा बंद न कर दिया जाय, तबतक केवल उपयोगी पशुवध न करनेके कानूनसे कोई लाभ नहीं होता। पशु कटते ही रहते हैं। कसाईखानेमें वधके लिये स्वीकृति देनेवाले अफसरों और वहाँके चपरासियोंका अवश्य लाभ होता है। संतोषका विषय है कि इस समय देशभरमें गोवध सम्पूर्णरूपसे बंद करानेके लिये आन्दोलन हो रहे हैं। जगह-जगह देवाराधन-अनुष्ठानादि हो रहे हैं। उच्च अधिकारियोंने भी गोवध कानूनी तौरपर बंद करनेकी सम्मति दी है। इससे आशा है गोवधबंदीका कानून बन जाना चाहिये; परंतु गोवध बंद हो भी गया और आर्थिक दृष्टिसे गौका महत्त्व नहीं बढ़ा तो दूर लोग ले जाकर गायोंको छोड़ देंगे और वे भूखके मारे तड़प-तड़पकर मरेंगी। इसलिये हमें चाहिये कि गायोंकी नस्ल सुधारकर उनका दूध बढ़ावें, गो-घृतका ही व्यवहार करें, चमड़ेका व्यवहार बिलकुल त्याग दें। वनस्पतिका बहिष्कार करें, मल-मूत्रकी खाद बनावें तथा जगह-जगह गो-सदनोंकी स्थापना करें, जिनमें बिना कामके अपंग पशु रखे जायँ, उन्हें खिलाया-पिलाया जाय। उनसे संतान उत्पन्न न करायी जाय और उनके मल-मूत्र, चमड़े इत्यादिसे व्यवस्थित आमदनी की जाय तथा गाँव-गाँव गोचरभूमि छुड़वायी जाय। ऐसा होनेपर ही गोहत्या बंद होगी, जिसका बंद होना परम आवश्यक है।
पिंजरापोल-पद्धति भी रहे और नयी गोशालाएँ भी बनें
पाश्चात्य जगत्की गोशाला (Dairy) आदर्श है और उसकी बड़ी प्रशंसा है, जो उनकी व्यवस्था, उत्पादन-क्षमता और अर्थोपार्जनकी दृष्टिसे सर्वथा उचित है और हमें उससे अवश्य बहुत कुछ सीखकर तदनुसार करना भी चाहिये। उन गोशालाओंमें पलनेवाली गौएँ सुखपूर्वक रहती हैं—उनके स्वास्थ्य, सफाई, खान-पान-आराम और पोषणका बहुत अधिक तथा उपयुक्त खयाल रखा जाता है—यह भी सत्य है और हमें भी अपनी गायोंको यथासम्भव उसी प्रकारसे सुखी रखना चाहिये; परंतु वे गोशालाएँ वस्तुत: हैं कपड़े तथा चीनी बनानेवाली मिलों—कारखानोंके सदृश दुग्धोत्पादनके कारखाने! उनमें गौके प्रति पूज्यभाव नहीं है—अर्थ तथा स्वास्थ्यकी दृष्टिसे उनका पालन-पोषण होता है। हमारे पिंजरापोल-गोशालाओंके संस्थापकोंकी दृष्टिमें तथा इस प्रकारकी संस्थाओंके निर्माणके मूलमें एक पवित्र नि:स्वार्थ प्रेम तथा दयाका भाव है। वहाँ आपको प्रत्येक गोशालामें हट्टी-कट्टी मजबूत दुधारू सुन्दर सुहावनी गायें दीख पड़ेंगी और उनको देखकर चित्त प्रसन्न हो जायगा। पर बीमार, लूली-लँगड़ी गायोंको खिलाने-पिलानेवाली संस्था और उनमें ऐसी अपंग गायोंकी सेवा होती हुई आप कम देख पायेंगे। वास्तवमें हमारी संस्थाएँ दुग्धोत्पादनके उद्देश्यसे खोली जानेवाली गोशाला (Dairy Farms)-की दृष्टिसे बनी ही नहीं हैं। इनका तो पवित्र उद्देश्य ही है—अपंग गायोंकी रक्षा करना, उनकी सेवा-शुश्रूषा करना और उनके मरनेके कालतक उनके पर्याप्त खान-पान तथा आरामयुक्त निवासकी पूरी व्यवस्था कर देना। आजकी कुछ गोशाला और पिंजरापोलोंमें यदि व्यवस्था ठीक नहीं है तो उनमें व्यवस्थाका सुधार करना चाहिये, न कि उन्हें ‘विकलांग पशुओंके कारखाने’, ‘मूर्खतापूर्ण दानके निदर्शन’, ‘देशका भार बढ़ानेवाले जानवरोंके गोलघर’ कहकर उनके प्रति दुर्भाव पैदा करना, अपंग पशुओंके प्रति उपेक्षा उत्पन्न करना और उन्हें असहाय मरने देने अथवा उनकी देख-रेख किये बिना ही उन्हें अकाल-मृत्युके मुखमें ढकेलनेकी चेष्टा करना! बड़े दु:खके साथ बड़ी गम्भीर मुखमुद्रा बनाकर कहा जाता है कि ‘इन पिंजरापोलोंके पशुओंको पालनेमें देशके करोड़ों रुपयोंका कितना बुरी तरहसे अपव्यय हो रहा है।’ ऐसा कहनेवाले पुरुषोंको जानना चाहिये कि लोग शौकीनीमें तथा पतनके गहरे गड्ढोंमें गिरानेवाले पदार्थोंके उपयोगमें, सिनेमामें कितना खर्च कर देते हैं; फिर यदि अंधे, काने, लूले, लँगड़े और बूढ़े माता-पिता तथा अपंग बच्चोंके-जैसे बूढ़े गाय-बैल तथा बछड़े-बछड़ियोंके पीछे कुछ पैसे खर्च हो जाते हैं तो इसमें इतना दु:ख क्यों होना चाहिये। यह तो वस्तुत: धनका सद्व्यय है। फिर खर्च ही कितना होता है। श्रीयुत राइट महोदयने अपनी रिपोर्टकी ४४ वीं टेबलमें भारतवर्षके प्रधान सात शहरोंकी जनसंख्या देते हुए वहाँके पिंजरापोलोंके वार्षिक व्ययका हिसाब लगाकर बताया है कि प्रति मनुष्य वार्षिक लगभग पौने चार आने (लगभग २३ पैसा) अर्थात् मासिक पौने चार पाई (लगभग २ पैसा) पड़ती है। (देखिये Wright’s Report) यदि इनमें छोटे गाँवोंकी कम खर्चवाली शेष गोशालाओंको जोड़ दिया जाय तो प्रति मनुष्य मासिक दो पाई भी नहीं पड़ेगी!
अतएव धर्मादे तथा लागपर चलनेवाली ऐसी गोशालाओंको भूतदयाके पवित्र उद्देश्यसे अपने गोरक्षण-कार्यसे कभी हटना नहीं चाहिये। उन्हें घाटा सहकर ही अपना सेवा-कार्य चलाना चाहिये। हाँ, वे एक सूत्रमें बँधकर संगठित हो जायँ तो बड़ा अच्छा है। अवश्य ही इनमें जो समर्थ संस्थाएँ हैं, उन्हें अपना डेयरी-विभाग अलग खोलना और उसमें पर्याप्त पूँजी लगाकर गोसंवर्धन-कार्य भी करना चाहिये। डेयरीके ढंगकी अलग गोशालाएँ बनें, उनके लिये तो कोई बात ही नहीं है। पर यह नहीं होना चाहिये कि केवल डेयरी-ढंगकी गोशालाओंकी ओर ही हमारी पूरी दृष्टि और पूरी शक्ति लग जाय और बूढ़ी अपंग गोमाताको निराधार छोड़नेका पाप होने लगे! ‘गो-सदन’ बनानेकी वर्तमान योजना भी तो वास्तवमें अपंग, असहाय पशुओंके पालनेके लिये ही तो है। हमें पश्चिमके गुण लेने चाहिये, पर उनके गुणोंकी चकाचौंधमें पड़कर अपने पैतृक गुणोंका मूलोच्छेद नहीं कर डालना चाहिये। आजकल पिंजरापोलोंके प्रति बुद्धिमान् तथा नेता माने जानेवाले पुरुषोंकी कुछ ऐसी ही दुर्भावना होने लगी है और प्रकारान्तरसे वे अपंग गायोंको भाररूप समझकर उनका हट जाना अच्छा मानने लगे हैं! इसीलिये इतना लिखा गया है। (हम तो यहाँ पशुओंके पिंजरापोल उठाना चाहते हैं और पाश्चात्य देशोंमें मनुष्योंके पिंजरापोल बनानेकी बात सोची जा रही है! कुछ ही दिनों पूर्व सुसभ्य अमेरिकामें ऐसा प्रस्ताव आया था कि कामकाजमें अशक्त बेकार मनुष्योंकी जिम्मेवारी पार्लामेंटको ले लेनी चाहिये। अर्थात् उनकी संतानपर उनके पालनका भार कतई नहीं रहना चाहिये।)
मेरी समझसे पिंजरापोल-पद्धतिकी, उसमें उनके उद्देश्यके अनुकूल आवश्यक सुधार करके रक्षा करनी चाहिये। इनकी रक्षा और सुव्यवस्था हो गयी तो ये बने-बनाये गो-सदन हैं। साथ ही ऐसी गोशालाएँ (Dairy farm) अलग या सुविधा हो तो इनके स्वतन्त्र विभागके रूपमें खोलनी चाहिये, जिनमें हट्टी-कट्टी, सुन्दर सुहावनी मजबूत दुधारू गायें हों और जो उत्तरोत्तर गायोंकी सर्वांगीण उन्नतिमें सहायक हों।
निर्घृत (Skimmed) और सघृत (Whole) दूध
निर्घृत (Skimmed) दूधके पक्ष और विपक्षमें विशेषज्ञोंके भिन्न-भिन्न मत हैं। मेरी धारणामें दोनों ही पक्षोंके लोग ईमानदार तथा सच्चे हैं तथा दोनोंने ही अपनी-अपनी समझके अनुसार मनुष्य तथा गोजातिके कल्याणके लिये ही मत बनाये हैं। निर्घृत दूधके समर्थकोंने भी यह कहीं नहीं कहा है कि जहाँ पूरा असली दूध मिलता हो, वहाँ निर्घृत दूध पीना चाहिये। वहाँ तो उन्होंने पशुओंको तथा जो घृतयुक्त दूध नहीं पचा सकते, ऐसे बच्चों और बीमारोंको निर्घृत दूध पिलानेकी सलाह दी है। निर्घृत दूधके विरोधियोंने भी यह नहीं कहा है कि निर्घृत दूधमें प्रोटीन आदि देह-निर्माण करनेवाले तत्त्व नहीं होते। विवादास्पद प्रश्न दो हैं—१. निर्घृत दूधमें स्नेहभाग निकाल दिये जानेके कारण वह विटामिनशून्य हो जाता है; इसलिये वह स्वास्थ्यके लिये हानिकर है या नहीं? २. इसके द्वारा मनुष्यका और गोजातिका लाभ होता है या नहीं?
इस विषयमें अपनी परिमित बुद्धिसे जो कुछ समझमें आता है, वह यह है—
१. सघृत पूरा दूध मिलनेकी अवस्थामें तो निर्घृत दूध नहीं ही पीना चाहिये।
२. निर्घृत दूधमें प्रोटीन तथा क्षार पदार्थ अधिक होनेके कारण वह स्वास्थ्यके लिये हानिकर कदापि नहीं है। हाँ, स्नेहभाग न होनेपर विटामिनोंसे जो लाभ होता, वह इससे नहीं हो सकता। इसलिये जिनको असली दूध नहीं मिलता, उनके लिये निर्घृत दूध पीना लाभदायक है और आवश्यक भी है। पूरा विटामिन न मिलनेपर भी वे लोग स्नेहभागका कुछ अंश तेल खाकर प्राप्त कर सकते हैं और प्रोटीन आदि तो उन्हें निर्घृत दूधमें पूरे मिल ही जाते हैं।
३.यह भी ठीक हो सकता है कि सेपरेटर मशीनकी अपेक्षा दही मथकर मक्खन निकालनेकी क्रियामें मक्खनका अंश छाछमें कुछ अधिक रह जाता हो और इससे घीके मूल्यमें कुछ पैसे कम मिलते हों। ऐसी हालतमें यदि गोपालन करनेवाले लोग दही न बिलोकर मशीनके द्वारा मलाई निकालकर घी बनावें तो उन्हें कुछ घी अधिक मिल सकता है और उसके फलस्वरूप कुछ पैसे भी; परंतु इसमें उन्हें छाछके बदले निर्घृत दूध मिलेगा। वह दूध यदि सारा-का-सारा छाछकी जगह घरमें या अड़ोस-पड़ोसमें बरत लिया जाय, तब तो ठीक ही है, परंतु निर्घृत दूध बननेपर क्या ऐसा हो सकेगा?
यह सिद्ध हो चुका है कि निर्घृत दूध असली दूधकी अपेक्षा गाढ़ा होता है, क्योंकि मलाईके साथ पानीका अंश भी निकल जाता है। और यह भी होता ही है कि ग्वालेलोग निर्घृत गाढ़े दूधमें पानी मिलाकर उसे असली दूध-सा पतला बनाकर बेचते हैं; इससे उनको पैसे ज्यादा मिलते हैं। लोग धोखेमें पड़कर उसे असलीके भरोसे ले लेते हैं। छाछ न तो बिकती है और छाछ बेचनेमें ग्वालेको शरम भी मालूम होती है। छाछके बदले निर्घृत दूध बनेगा तो उसका परिणाम यह होगा कि गरीबीके कारण लोभवश ग्वाला—जैसे आजतक घरमें अपने और बच्चोंके लिये घी नहीं रखता, सब बेच डालता है—वैसे ही निर्घृत दूध भी सम्भव हुआ तो जल मिलाकर, नहीं तो ऐसे ही बेचनेकी चेष्टा करेगा। आप कहेंगे कि वह बिकेगा कैसे, तो इसका उत्तर यह है कि दूधकी बुकनी बनानेके व्यापारी लोग गाँवोंमें केन्द्र बनाकर अपना व्यापार खोल लेंगे और उनका निर्घृत दूध खरीद लेंगे। छाछ यों नहीं बिकती। परिणाम यह होगा कि ग्वालेके घरमें कुछ पैसे तो ज्यादा आयेंगे, जो किसी-न-किसी शहरी शौकमें उड़ जायँगे और घरके बच्चोंको तथा गाँवके गरीबोंको, हरिजनोंको जो छाछ मिलती, उससे वे वंचित हो जायँगे! गरीबोंके घरोंमें छाछ ही एक ऐसी वस्तु है, जिससे साग-तरकारीका, कढ़ी-राबड़ी बनाकर व्यंजनका काम चलता है और छाछ गाँवभरमें बाँटी जाती है। छाछ गाँवका और गरीबका बहुत बड़ा सहारा है। माना, छाछमें मक्खनका अंश अधिक रहता है; पर वह जाता तो है घरवालोंके, बच्चोंके तथा गरीब भाई-बहनोंके पेटमें ही न? फिर उसका अपव्यय कैसे हुआ? असलमें यही तो सद्व्यय है।
स्वास्थ्यकी दृष्टिसे भी छाछमें निर्घृत दूधकी अपेक्षा पौष्टिक तत्त्व कम नहीं है। कहा जाता है छाछमें पानी अधिक मिला देनेसे उसके वे तत्त्व मारे जाते हैं। माना, ऐसा ही होता है; परंतु पानी मिली हुई छाछ भी लोगोंको मिल तो जाती है न। निर्घृत दूध तो पैसेके लोभसे मिलेगा ही नहीं! फिर निर्घृत दूधमें भी पानी मिलानेसे कौन रोकेगा। इसलिये मेरी समझसे सेपरेटरसे मलाई निकालकर घी बनानेकी अपेक्षा गरीब भारतवासियोंके शरीरपोषणके लिये मथकर घी निकालना ही अच्छा है।
फिर विशेषज्ञ लोगोंका यह भी कहना है कि सेपरेटरसे निकाले हुए घीकी अपेक्षा दही बिलोकर निकाला हुआ घी क्वालिटीमें भी बढ़िया होता है। खानेपर भी ऐसा ही अनुभव होता है। इसलिये भी वही प्रणाली अच्छी मालूम होती है।
४. तथापि यह सत्य है कि इस समय ऐसा सहज सम्भव नहीं है कि मलाई निकालकर घी बनाना बिलकुल बंद हो जाय। बल्कि इसका प्रचार बढ़ रहा है। गुजरात तथा बिहारमें तो यह काम खूब ही चल रहा है। इसलिये जो निर्घृत दूध पीना चाहें, वे पीवें; पर सघृत असली दूध पीना चाहनेवालोंके साथ धोखा न हो। कानूनसे निर्घृत दूधमें पानी मिलाना बंद हो जाय और निर्घृत दूध निर्घृत दूधके रूपमें ही बेचा जाय। जिनको दूध नहीं मिलता, वे निर्घृत दूध पीवें तो उनको न पीनेकी अपेक्षा लाभ ही है। एक अच्छे निष्पक्ष विशेषज्ञ सज्जनका मत है कि निर्घृत दूधमें ५० प्रतिशत तो दूधके गुण रहते ही हैं, परंतु इसको प्रोत्साहन देकर दही बिलोकर घी निकालनेकी पुरानी घरकी पारिवारिक पद्धतिको मिटानेकी कोशिश कभी नहीं करनी चाहिये। उसमें कहीं सफाई-सँभाल न रखने आदिका दोष आ गया हो तो उसे निकाल देना चाहिये और वह दोष तो उस प्रणालीका नहीं है, वह तो हमारी आदत या भूल है, जो सेपरेटरवाली पद्धतिमें भी रह सकती है। यह मानी हुई बात है कि सेपरेटर मशीनका भी यथायोग्य उपयोग न होनेपर उसमें भी घीका अधिक अपव्यय होता है और वह बीस-तीस प्रतिशततक हो जाता है।
हाँ, विदेशी निर्घृत चूर्णका उपयोग किसी भी तरह नहीं करना चाहिये।
वनस्पति घी
जमाये हुए तेल (वनस्पति घी)-के विरोधमें देशमें बड़ा आन्दोलन हुआ है और हमलोगोंका भी यह मत है कि इससे देशकी तथा गोवंशकी हानि हो रही है। हमारे अपने कई मित्रों और सम्बन्धियोंके इसके कारखाने हैं, परंतु सत्यके अनुरोधसे अपना मत प्रकट करना ही पड़ता है और ऐसा ही होना भी चाहिये। यह कहा जाता है कि देशमें घीका अभाव है, अत: लोगोंकी आवश्यकता पूर्तिके लिये ये कारखाने खोले जा रहे हैं; परंतु यह कथन वैसा ही है, जैसे अंग्रेज कहते थे कि हम हिंदुस्थानकी भलाईके लिये यहाँ राज्य कर रहे हैं या कोई ठग यह कहे कि हम किसीके धनकी अच्छी सँभाल करनेके लिये उसे फुसलाकर उसके पाससे ले रहे हैं। छातीपर हाथ रखकर सोचनेसे यह प्रत्यक्ष दीखेगा कि वनस्पतिके कारखाने धन कमाने—केवल धन कमानेके लिये ही बने हैं। धन कमाना बुरी बात नहीं है, बशर्ते कि वह दूसरोंके लिये हानिकर न हो, उसमें अन्याय न हो। सभी जानते हैं और सरकारी रिपोर्ट भी है कि वनस्पति (जमा हुआ तेल) अधिकांश मिलावटमें बरता जाता है और शुद्ध घीके रूपमें बिकता है। इसी कारण उससे पैसे अधिक मिलते हैं। पैसा कमानेकी इच्छा मिलावटको प्रोत्साहन देती या मिलावट चाहती ही है। इसीलिये तो तेलको जमाकर दानेदार बनाया जाता और उसे गाय और भैंसके घीके-से रंगका बनानेकी कोशिश की जाती है। बस, यही बुरी बात है।
यह सच है कि भारतवर्षमें इस समय घी नहीं है। इसका एक बड़ा कारण तो भारतकी गरीबी है, जिसके कारण हम गायोंकी रक्षा और उन्नति नहीं कर सके और हमारी गायें कम दूध देने लगीं। दूसरा कारण गोवध है। पिछली लड़ाईमें हजारों अच्छी गायें-भैंसें मिलिटरी डेयरियोंमें चली गयीं। लाखों गायें गोरोंके पापी पेटोंमें समा गयीं और जहाँ जो शुद्ध घी मिला, सेनाके लिये संग्रह करनेकी चेष्टा की गयी! तब अच्छा घी कैसे मिले।
अंग्रेजी साम्राज्यके पहले तो यह सवाल ही नहीं था। पर्याप्त गोचर-भूमि थी। चारे-दानेकी कोई कमी नहीं थी। खेतीमें इतना अन्न और चारा होता था कि गृहस्थ स्वयं खाकर अपने पशुओंको भी खूब खिला सकता था। खेतोंमें पशु रहते थे, इससे उनकी खाद खेतोंको स्वाभाविक मिलती थी। हाथसे काम करनेकी आदत थी, इससे सभी कुछ सस्ता पड़ता था। गायपर कोई भी खर्च नहीं था। गाय भार नहीं, आशीर्वाद थी। नस्ल गाँवोंमें अपने-आप ठीक रहती थी। गोधन ही परम धन होनेसे उनकी सार-सँभाल पूरी होती थी। चिकित्साके घरू नुस्खे याद थे, जिनसे गायें बीमार नहीं रह पाती थीं। गायोंका अच्छे खाद्यसे पोषण होता था और सेवा-शुश्रूषासे वे रोगसे नित्य निर्मुक्त रहती थीं। संतान अच्छी होती थी, दूध बेशुमार होता था। इससे सारा परिवार दूध-दही पी-खा सकता था। वरं दूध-दही बाँटा जाता था। बढ़िया छाछके लिये खुला दरवाजा था, कोई भी ले जाय। यह सब मुफ्तमें होता था। नफेमें बच जाता था—गौका घी। उसे आवश्यकतानुसार गृहस्थ बेचते थे, पर बाध्य नहीं थे। घीकी इतनी बहुतायत थी कि घी दुहारोंसे परसा जाता था, चमचियोंसे नहीं।
यह दशा बदली, तभी आज यह कहना पड़ता है कि गृहस्थोंको ५७-५८ प्रतिशत घी बनाना पड़ता है और इस काममें वे घाटेमें रहते हैं। दूधसे जितनी कीमत आती है, उतनी घीसे नहीं आती। उस जमानेमें दूधकी तो कोई कीमत ही नहीं थी, दूध बेचना तो पाप समझा जाता था। ‘दूध-पूत’ कौन बेचे? ‘दूध-पूत’ की शपथ दिलवायी जाती थी। पानी माँगनेपर दूध मिलता था, पर आज तो वह स्थिति स्वप्न हो गयी है। इसीसे वनस्पति घीके कारखानेवालोंको और उनकी पोषक सरकारको यह कहनेका मौका मिला है कि देशकी घीकी आवश्यकताको पूरी करनेके लिये ऐसा किया जा रहा है!
इस दशामें जहाँतक मेरा खयाल है—ये कारखाने बंद होने तो बहुत कठिन हैं—देशवासी आन्दोलन करके सरकारसे इतना करा दें, या कारखानेवाले धर्मके विचारसे जितना कर सकते हों, स्वयं ही कर लें तो बहुत अच्छा है।
१. शरीरकी गरमीसे अधिक गरमी देकर जमाना पड़ता हो और उससे लोगोंके स्वास्थ्यपर बुरा प्रभाव पड़ता हो—जैसा कि डॉ० एन० एन० गोडबोले महोदयने एक लेखमें दिखाया था—तो उसमें अवश्य सुधार होना चाहिये।
२. इसमें ऐसा रंग दे देना चाहिये जो हानिकर तो न हो, परंतु जिसके कारण घीमें मिलावट न हो सके।
३. विटामिनके लिये यदि (Shark-oil) मछलीके तेल-जैसी चीज दी जाती हो तो वह कदापि नहीं दी जानी चाहिये।
४. मिलावट करनेवालोंको कड़ी सजा होनी चाहिये।
५. इसका नाम ‘घी’ न रखकर जमा हुआ तेल रखना चाहिये।
मेरी तो देशवासियोंसे यह प्रार्थना है कि जबतक स्वास्थ्यहानि, अपवित्रता और हिंसाका तथा इससे होनेवाली गोवंशकी हानिका कुछ भी संदेह है, तबतक इसे कोई खावे ही नहीं। घी न मिले तो शुद्ध तेल खाना अच्छा है, घीके नामपर बिगाड़ा हुआ तेल खानेमें (और यदि उसमें विटामिनके नामपर मछलीका तेल मिलाया हो तो) धर्म, अर्थ, स्वास्थ्य सभीकी हानि है!
बधिया-प्रथा
एक प्रश्न आया है कि बछड़ोंको बधिया किया जाय या नहीं। मेरे पास काठियावाड़, गुजरात तथा उत्तरप्रदेशके कुछ सम्भ्रान्त सज्जनोंके कई पत्र आये हैं, जिनमें इस विषयपर उन्होंने सम्मति चाही है। उनका कहना है कि भारतमें खेतीके बैलोंकी जरूरत है ही और खेती आजकल बधिया बैलोंसे ही होती है, फिर घरके बछड़ोंको उन्हें दूसरोंसे बधिया करवानेके लिये बेचें और बधिया किये बैलोंको अधिक पैसे देकर खरीदें; यह कहाँतक उचित है? प्रश्न विचारणीय है। शास्त्रानुसार नपुंसक बनाना सर्वथा पाप है! और पाप पाप ही रहेगा। कम-ज्यादाका विचार किया जा सकता है। हिंसा कृत, कारित, अनुमोदित—तीन प्रकारसे होती है। लोग बधिया नहीं करते, परंतु बधिया करानेकी आवश्यकता समझते हैं और बधिया करनेके लिये जान-बूझकर भी बछड़ेको बेचते हैं तो प्रकारान्तरसे दूसरोंसे करवाते या अनुमोदन तो करते ही हैं। ऐसी अवस्थामें उनपर भी पापकी जिम्मेवारी तो आती ही है। अवश्य ही यह सत्य है कि वे ऐसा मजबूर होकर ही करते हैं। ऐसी अवस्थामें या तो शास्त्रज्ञ और विशेषज्ञोंके द्वारा निर्णय कराकर, यदि सम्भव हो तो, बधिया-प्रथा बिलकुल उठाकर बिना बधिया कराये ही खेती करनी चाहिये। पुराने ग्रन्थोंमें, जहाँतक देखा गया है, कहीं बधिया करानेकी बात नहीं मिली। यदि ऐसा सम्भव न हो तो बड़े पापसे छोटा पाप अच्छा, इस नीतिसे पाप होते हुए भी जिनको बधिया बैलकी जरूरत है, उन्हें पुरानी क्रूर पद्धतिसे बधिया न कराकर बोर्डिजो साहेबकी सहज पद्धतिसे बधिया कराना चाहिये।