ग्यारह पालनीय नियम
१—गीताके अनुसार सात्त्विक जीवन बनाना।
२—भगवान्को हर समय याद रखते हुए निष्कामभावसे भगवत्प्रीत्यर्थ उत्साहपूर्वक काम करनेकी चेष्टा करना।
३—सबमें भगवान्को देखनेकी चेष्टा करना।
४—काम, क्रोध, लोभ, भय, विषाद, ईर्ष्या, द्वेष, मत्सर, वैर, हिंसा, असत्य, असूया, परनिन्दा, परदोषदर्शन—इन चौदह दोषोंसे बचना।
५—गरीबोंके साथ सहानुभूति रखना।
६—आपसमें खूब प्रेम बढ़ाना। जैसे अपने मनके प्रतिकूल होनेपर हमें दु:ख होता है, उसी प्रकार दूसरोंके प्रतिकूल होनेपर उनको होता है; अतएव अपने प्रतिकूल भले ही हो जाय, दूसरेके प्रतिकूलसे बचना चाहिये। ऐसा होगा, मनसे खयाल रखा जायगा, तो प्रेम बढ़ेगा।
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।
आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥
‘धर्मके सर्वस्वको सुनो और सुनकर धारण करो; वह यह है कि जो अपने मनके प्रतिकूल हों, वैसी बातें दूसरोंके लिये न करो।’ जैसे अपनेको अपमान, तिरस्कार, अहित, बात न मानना, शरीर-मनके आराममें बाधा पहुँचना आदि बुरा लगता है, वैसे ही दूसरोंको भी लगता है—यह समझकर किसीके साथ भी उन्हें प्रतिकूल लगे, ऐसा व्यवहार नहीं करना।
७—प्रेम बढ़ानेका एक उपाय है—सबको मान देना, स्वयं अमानी होना। सच्चे मनसे सदा सबका हित चाहना और करना।
८—दूसरेके द्वारा अच्छे बर्तावकी बाट न देखकर पहलेसे ही अपने अच्छा बर्ताव करना।
९—भगवान्के नामकी कम-से-कम २५ माला—(होनी तो चाहिये कम-से-कम ६४) रोज जरूर जपना नियमपूर्वक।
१०—अपनी भूलोंके लिये डायरी रखना।
११—रोज भगवान्की प्रार्थना करना।