हिंदू-संस्कृतिका स्वरूप

प्रधान लक्ष्य भगवत्प्राप्ति

जीवनके सभी क्षेत्रोंमें व्याप्त सनातन परम्परासे चली आती हुई अध्यात्मप्रधान धर्ममय सुसंस्कृत ‘विचार और आचारप्रणाली’ का नाम ही हिंदू-संस्कृति है। हिंदू-संस्कृतिकी यह निर्मल धारा अत्यन्त प्राचीन कालसे अविच्छिन्नरूपमें प्रवाहित है। अतएव हिंदू-संस्कृति सबसे प्राचीन और अपरिवर्तनीय सनातन भारतीय आर्य-संस्कृति है, यही वास्तवमें मानव-संस्कृति है। इस संस्कृतिमें मनुष्य-जीवनका प्रधान और एकमात्र लक्ष्य है—मोक्ष, ज्ञान अथवा भगवत्प्राप्ति। इसीसे इसमें जीवनकी प्रत्येक क्रिया और चेष्टा इसी लक्ष्यपर ध्यान रखकर की जाती है। इसीलिये हमारे पुरुषार्थ-चतुष्टयमें अन्तिम स्थान ‘मोक्ष’ को दिया गया है—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। सारांश यह कि हमारा अर्थ और काम (उपभोग) धर्मके द्वारा संयमित—नियन्त्रित होता है। धर्मरहित अर्थ और धर्मरहित उपभोग (काम) महान् अनर्थ उत्पन्न करके मनुष्यका विनाश कर देते हैं। रावण, वेन, कंस, दुर्योधन आदि इसके उदाहरण हैं। केवल ‘अर्थ’ और ‘काम’ से युक्त जीवन तो पशु-जीवन है। श्रीमद्भागवतमें कहा है कि ‘जब धर्म लुप्त हो जाता है, तब अर्थ और काममें फँसे हुए लोग कुत्तों और बंदरोंके समान वर्णसंकर हो जाते हैं।*

हिंदू-संस्कृतिमें अर्थ तथा कामका त्याग नहीं है। उनकी भी उपादेयता है, पर वे होने चाहिये धर्मके आश्रित। वाल्मीकीय रामायणमें भगवान‍् श्रीरामजी लक्ष्मणजीसे कहते हैं—

धर्मार्थकामा: खलु जीवलोके

समीक्षिता धर्मफलोदयेषु।

ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे

भार्येव वश्याभिमता सपुत्रा॥

यस्मिंतु सर्वे स्युरसंनिविष्टा

धर्मो यत: स्यात् तदुपक्रमेत।

द्वेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके

कामात्मता खल्वति न प्रशस्ता॥

(अयोध्या० २१। ५७-५८)

‘धर्मके फलस्वरूप सुख-सौभाग्यादिकी प्राप्तिमें जो धर्म, अर्थ, काम उपाय माने गये हैं, वे तीनों एक धर्ममें वर्तमान हैं। धर्मके अनुष्ठानसे इन तीनोंकी सिद्धि होती है, इसमें मुझे सन्देह नहीं है—जैसे पतिके अधीन रहनेवाली भार्या अतिथि-पूजनादि धर्ममें, मनोऽनुकूल होनेसे काममें और सुपुत्रवती होकर अर्थमें सहायिका होती है। जिस कर्ममें धर्म, अर्थ, काम—तीनों संनिविष्ट न हों, पर जिससे धर्म बनता हो, वही कर्म करना चाहिये। धर्मको छोड़कर अर्थ-परायण रहनेवालेसे लोग द्वेष करने लगते हैं और ऐसे ही कामात्मता भी प्रशंसाकी बात नहीं है।’

मनु महाराज कहते हैं कि जो अर्थ और काम धर्मके विरोधी हों, उन अर्थ और कामका त्याग कर देना चाहिये—

परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ।

(४।१७६)

और धर्म—परम धर्म वस्तुत: वही है, जो मनुष्यकी जीवनधाराका मुख श्रीभगवान‍्की ओर मोड़ दे तथा जिससे अविराम गतिसे बिना किंचित् भी इधर-उधर भटके जीवनप्रवाह निरन्तर समुद्रकी ओर बहनेवाली गंगाजीकी धाराके सदृश उसी दिशामें बहता रहे१—

मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गंगाम्भसोऽम्बुधौ।

इसी प्रकार भगवान‍्के निमित्त किये जानेवाले आसक्तिशून्य धर्मयुक्त कर्मोंका फल बन्धनमुक्ति, दिव्यलोकोंकी प्राप्ति, परमात्मरूप परम स्वातन्त्र्य (मोक्ष)-की प्राप्ति एवं शाश्वत शान्तिकी उपलब्धि होती है२। वेदमें कहा गया है—

ईशा वास्यमिद ॸ सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् ।

तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध: कस्यस्विद् धनम्॥

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत ॸ समा:।

एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥

(शुक्लयजुर्वेद ४०। १-२)

‘अखिल विश्वमें जो कुछ भी जड-चेतन जगत् है, यह सब ईश्वरसे व्याप्त है। उस ईश्वरको साथ रखते हुए, त्यागपूर्वक भोगते रहो। इसमें आसक्त मत होओ। किसीके भी धनकी इच्छा मत करो। इस जगत‍्में इस प्रकार ईश्वरप्रीत्यर्थ कर्म करते हुए सौ वर्षोंतक जीनेकी इच्छा करो। यों त्याग-भावसे किये गये कर्म तुम मनुष्यमें लिप्त नहीं होंगे। इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है।’

श्रीभगवान‍् गीतामें कहते हैं—

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:।

तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंग: समाचर॥

(३।९)

‘यज्ञ (भगवान्)-के निमित्त किये जानेवाले कर्मोंके अतिरिक्त दूसरे कर्मोंमें लगा हुआ मनुष्य कर्मोंसे बन्धनको प्राप्त होता है। अतएव अर्जुन! तुम आसक्तिरहित होकर उस यज्ञ (भगवान्)-के लिये ही भलीभाँति कर्म करो।’

श्रीमद्भागवतमें कहा है—

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा

बुद्धॺा ऽऽत्मना वानुसृतस्वभावात् ।

करोति यद् यत् सकलं परस्मै

नारायणायेति समर्पयेत् तत् ॥

(११।२।३६)

‘शरीरसे, वाणीसे, मनसे, इन्द्रियोंसे, बुद्धिसे, अहंकारसे अनेक जन्मों अथवा एक जन्मके स्वभाववश जो कुछ भी करे, सब परम पुरुष भगवान‍् श्रीनारायणके लिये ही है—इस भावसे उन्हें समर्पण कर दे।’

भगवान‍्ने स्वयं गीतामें समर्पणकी आज्ञा की है—

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥

(९। २७)

‘अर्जुन! तुम जो कर्म करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो दान देते हो और जो तप करते हो, वह सब मेरे अर्पण करो।’

इस अर्पणका फल भी भगवान‍् वहीं बतलाते हैं—

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै:।

संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥

(९।२८)

‘इस प्रकार जिसमें समस्त कर्म मुझ भगवान‍्में अर्पण हो जाते हैं—ऐसे संन्यासयोगसे युक्त चित्तवाले तुम शुभाशुभरूप कर्मबन्धनसे छूट जाओगे और उनसे छूटकर मुझको प्राप्त होओगे।’

हिंदू-संस्कृतिका प्रधान और मूल स्वरूप यही है। यह संस्कृति जीवको विषयासक्तिके नीचे स्तरसे उठाकर अध्यात्मके उच्च स्तरपर ले जाती है। इसका प्रत्येक साधन, विचार और कर्म आत्माको परमात्मातक पहुँचानेमें सहायक होता है।

धर्म और समवितरण

मोक्ष जीवनका ध्येय है। इसीलिये हिंदू-संस्कृतिमें धर्मके साथ जीवनका अविच्छिन्न सम्बन्ध है। छोटे-से-छोटे कर्मसे लेकर बड़े-से-बड़े कर्ममें धर्म सदा संलग्न है। परम धर्म तो भगवान‍्की भक्ति ही है। पर उसके साथ कुछ ऐसे लक्षण धर्मके बतलाये गये हैं, जो सभीके लिये परम उपादेय हैं। श्रीमनु महाराज कहते हैं—

वेद: स्मृति: सदाचार: स्वस्य च प्रियमात्मन:।

एतच्चतुर्विधं प्राहु: साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥

(२।१२)

‘जो वेद और स्मृतिके द्वारा प्रतिपादित, सत्पुरुषोंके द्वारा आचरित और अपनेको प्रिय लगनेवाला हो*—ऐसा चार प्रकारके धर्मका साक्षात् लक्षण बतलाया गया है।’

धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥

(मनु० ६। ९२)

‘धृति, क्षमा, दम (मनका संयम), अस्तेय, शौच, इन्द्रिय-निग्रह, धी (विज्ञान), विद्या (अध्यात्मविद्या), सत्य और अक्रोध—ये दस धर्मके लक्षण हैं।’

श्रीमद्भागवतमें इस मानवधर्मको तीस लक्षणोंसे बतलाया गया है—

सत्यं दया तप: शौचं तितिक्षेक्षा शमो दम:।

अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्याग: स्वाध्याय आर्जवम्॥

संतोष: समदृक् सेवा ग्राम्येहोपरम: शनै:।

नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम्॥

अन्नाद्यादे: संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हत:।

तेष्वात्मदेवताबुद्धि: सुतरां नृषु पाण्डव॥

श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गते:।

सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्मसमर्पणम्॥

नृणामयं परो धर्म: सर्वेषां समुदाहृत:।

त्रिंशल्लक्षणवान् राजन् सर्वात्मा येन तुष्यति॥

(७।११।८—१२)

‘सत्य, दया, तप, शौच, तितिक्षा, उचित-अनुचितका विचार, मनका संयम, इन्द्रियोंका संयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय, निष्कपटता, संतोष, समदृष्टि, महापुरुषोंकी सेवा, धीरे-धीरे सांसारिक भोगोंकी चेष्टासे निवृत्ति, मनुष्यके अभिमानपूर्ण प्रयत्नोंका फल विपरीत होता है—ऐसा विचार, मौन, आत्मचिन्तन, अन्न आदि पदार्थोंका प्राणियोंमें यथायोग्य विभाजन, उन सभी प्राणियोंको—विशेष करके मनुष्योंको अपना आत्मा और इष्टदेव ही समझना, संतोंकी परमगति, भगवान‍्के गुण-माहात्म्यादिका श्रवण, कीर्तन और स्मरण, उनकी सेवा, पूजा और नमस्कार, उनके प्रति दास्य, सख्य और आत्म-समर्पण—यह सभी मनुष्योंके लिये परम धर्म है। इस तीस लक्षणवाले धर्मके पालनसे सबके आत्मारूप भगवान‍् प्रसन्न होते हैं।’

इन लक्षणोंपर विचार करके देखिये। जिस संस्कृतिमें धर्मके ये लक्षण हों, उससे जगत‍्का कोई भी प्राणी कैसे दु:खी हो सकता है। मनुष्यमें ही नहीं, प्राणिमात्रमें आत्मबुद्धि या इष्टदेवबुद्धि रखना और अन्नादि पदार्थोंका सबमें समान भावसे यथायोग्य विभाग कर देना—इससे बढ़कर समवितरण और क्या हो सकता है?

श्रीभगवान‍्ने गीतामें तो यहाँतक कह दिया है—

यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।

भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥

(३।१३)

‘यज्ञसे बचे हुए अन्नको खानेवाले श्रेष्ठ पुरुष समस्त पापोंसे छूट जाते हैं; पर जो पापी मनुष्य अपने शरीर-पोषणके लिये ही अन्न पकाते हैं, वे तो (अन्नकी जगह) पाप ही खाते हैं।’

इसीसे हिंदू-घरमें नित्य पंचमहायज्ञ होता है। संसारमें पाँच प्रकारके प्राणी हैं और उनके परस्पर सहयोगसे सबकी पुष्टि-तुष्टि और संरक्षण-संवर्धन होता है। ये पाँच हैं—देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और इतर समस्त प्राणी। देवताओंसे (भूमि, जल, वायु, सूर्य, चन्द्रमा आदिके द्वारा) संसारको इष्टभोग प्राप्त होते हैं। ऋषि-महर्षियोंसे ज्ञान मिलता है, पितरोंसे भरण-पोषण और परम हितकी सद्भावना प्राप्त होती है। मनुष्य अपने-अपने कर्मोंके द्वारा एक-दूसरेकी सेवा करते हैं एवं पशु-पक्षी, वृक्ष-लतादि सबके सुखके लिये सदा अपनेको अर्पण किये रहते हैं। इन पाँचोंमें मनुष्य विशेषरूपसे योग्य और साधनसम्पन्न है। इसीलिये मनुष्यपर सबकी पुष्टिका दायित्व है। कर्मका उसीको अधिकार है, अत: मनुष्यका यह कर्तव्य है कि वह जो कुछ उपार्जन करे, उसमें सबका भाग समझे; क्योंकि वह सभीके सहयोगसे कमाता-खाता है—जीवन-यापन करता है। इसीसे यज्ञसे बचे हुए अन्नको अर्थात् इन पाँचोंके अपने-अपने भागोंको देनेके बाद जो बच रहता है, उस अन्नको जो खाता है, वह ‘अमृत’ खाता है। पर जो कमाईमेंसे दूसरोंका उचित भाग उन्हें न देकर सब अकेला हड़प जाता है, वह पाप खाता है।

आजकल कुछ लोग कहा करते हैं कि ‘हम तो इसीलिये ‘साम्यवाद’ चाहते हैं कि लोगोंको रोटी-कपड़ा मिले। हिंदू-संस्कृतिमें इस रोटी-कपड़ेकी कोई व्यवस्था नहीं है।’ पर ऐसा कहनेवाले हिंदू-संस्कृतिके स्वरूपसे सर्वथा अनभिज्ञ हैं। असल बात तो यह है कि रोटी-कपड़ेकी जैसी व्यवस्था हिंदू-संस्कृतिमें है, वैसी अन्यत्र कहीं नहीं है। अन्य स्थानोंमें कहीं कुछ अधूरी व्यवस्था है तो वह किसी देश-विशेषकी सीमामें ही अवरुद्ध है। वह भी केवल मनुष्योंके लिये और उन मनुष्योंके लिये है, जो अपने मतके हैं; परंतु हिंदू-संस्कृतिमें यह व्यवस्था प्राणिमात्रके लिये है। यहाँ तो प्रत्येक जीवको भगवान‍् मानकर उसकी सेवा करनेका आदेश है।

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।

मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥

व्यवहारमें सबसे अधिक ममत्वका व्यवहार संतानके प्रति होता है। देवर्षि नारदजी धर्मराज युधिष्ठिरसे कहते हैं—

मृगोष्ट्रखरमर्काखुसरीसृप्खगमक्षिका: ।

आत्मन: पुत्रवत् पश्येत् तैरेषामन्तरं कियत् ॥

(श्रीमद्भा० ७। १४। ९)

‘हरिन, ऊँट, गधा, बंदर, चूहा, साँप, पक्षी और मक्खी आदिको अपने निज पुत्रके समान समझे। उनमें और पुत्रोंमें अन्तर ही कितना है।’

कितनी उदार संस्कृति है यह, जिसमें प्राणिमात्रको अभयदान ही नहीं सच्चा स्नेहदान है और सबके लिये यथायोग्य वितरणकी सुव्यवस्था है। आजकल तो ‘अधिक अन्न उपजाओ’ की तरंगमें बंदर, हरिण और नीलगाय-जैसे पशुओंके सामूहिक संहारकी राक्षसी व्यवस्था हो रही है। आजका स्वार्थी मनुष्य किस स्तरपर आ गया है। आश्चर्य यह कि इन बंदरमार लोगोंको प्राणिमात्रको आश्रय देनेवाली समतासम्पन्न उदार हिंदू-संस्कृतिमें साम्प्रदायिकताकी बू आती है! और इसकी निन्दा करनेमें उन्हें सुख मिलता है!!

समता

यह अवश्य है कि हिंदू-संस्कृतिमें समता विवेकपूर्ण है। हिंदू इस बातको जानते हैं कि समता आत्मामें होती है; शरीरके व्यवहारमें नहीं होती। हिंदू दार्शनिकोंका यह अनुभव है कि सृष्टिकी स्थिति प्रकृतिकी विषमतामें ही है। जहाँ प्रकृतिका वैषम्य मिट जाता है, वहाँ जगत‍्का अस्तित्व ही लोप हो जाता है। वह तो महाप्रलयकी अवस्था है, जिसमें प्रकृतिदेवी परमात्माके अंदर प्रविष्ट होकर सो जाती है।

इसीलिये हिंदू विद्वान् जिन जीवोंके आकार-प्रकार, खान-पान, व्यवहार-बर्तावमें कभी समता हो ही नहीं सकती, उनमें भी ब्रह्म—परमात्माको समभावसे विराजित देखते हैं। भगवान‍् कहते हैं—

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:॥

(गीता ५।१८)

‘वे पण्डितजन विद्या-विनयसम्पन्न ब्राह्मणमें, चाण्डालमें तथा गौ, हाथी और कुत्तेमें भी समदर्शी होते हैं।’

यहाँ कोई कह सकते हैं—‘ब्राह्मण और चाण्डाल—दोनों ही मनुष्य हैं। इनमें समदर्शन ही क्यों, समान व्यवहार भी हो सकता है।’ (यद्यपि यह सम्भव नहीं) उनसे यह कहना है कि मनुष्यकी बात तो ठीक है—पर गाय, हाथी, कुत्तेके साथ भी क्या समव्यवहारकी बात कभी सोची जा सकती है? गौका दूध लोग चावसे पीते हैं, कुतियाका कोई नहीं पीता; हाथीकी सवारीमें गौरव माना जाता है, कुत्तेकी सवारी कोई नहीं करना चाहता। हाथी एक दिनमें जितना खाता है, कुत्ता उतनेसे दबकर मर जा सकता है। हाथी, कुत्ते और गायके आकार-प्रकारमें भी बड़ा भेद है। इस अवस्थामें इनमें सम-व्यवहारकी बात कहना पागलपनमात्र है। पर व्यवहारमें विषमता होते हुए भी प्राणिमात्रमें एक ही आत्मा—एक ही भगवान‍् सदा विराज रहे हैं, इस बातको हिंदू देखता है। वह ब्राह्मणके साथ ब्राह्मणोचित, चाण्डालके साथ चाण्डालोचित तथा गौ, हाथी और कुत्तेके साथ उनके योग्य व्यवहार करता है; परंतु उनमें नित्य एक ही परमात्माको देखनेके कारण किसीके साथ असद‍्व्यवहार नहीं करता और न व्यवहारकी विषमतासे उसके प्रेम और परमात्मभावमें ही न्यूनता आती है।

जिस प्रकार अपने मस्तक, हाथ, पैर आदि अंगोंमें आत्मभाव समान होनेपर भी मनुष्य उनके व्यवहारमें भेद रखता है—मस्तिष्कसे विचार करता है, मुँहसे खाता और बोलता है, हाथोंसे आदान-प्रदान करता, लिखता-पढ़ता है और पैरोंसे चलता है। एक अंगसे दूसरे अंगका काम नहीं लेता; क्योंकि वह जानता है कि यह सम्भव ही नहीं है। परंतु सबके सुख-दु:खका समानरूपसे अनुभव करता है और समस्त शरीरमें समान प्रेम करता है। उसी प्रकार व्यवहारमें भेद रखता हुआ भी हिंदू प्रत्येक प्राणीके साथ आत्माके नाते सदा समभावापन्न रहता है, और वह जैसे अपने योगक्षेम तथा कल्याणके लिये प्रयत्न करता है, वैसे ही अन्यान्य जीवोंके लिये भी करता है।

भगवान‍् गीतामें कहते हैं—

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मत:॥

(६।३२)

‘अर्जुन! जो योगी अपनी ही तरह समस्त भूतोंमें सम (आत्माको) देखता है और सुख या दु:खको भी सबमें सम देखता है, वह परम श्रेष्ठ योगी माना गया है।’

यदि कहीं किसीके साथ कभी व्यवहारमें युद्धादि-जैसी क्रूर क्रिया करनी पड़ती है तो वैसे ही जैसे मनुष्य अपने किसी सड़े अंगका विकार निकालनेके लिये शल्यक्रिया (ऑपरेशन) कराता है। गीतामें भगवान‍्ने अर्जुनको स्थान-स्थानपर युद्धके लिये आज्ञा दी है। पर साथ ही यह कहा है कि राज्यकी आशासे, कामनासे, आसक्तिसे और अहंकारके वशमें होकर युद्ध न करो। युद्ध करो मेरी आज्ञा मानकर, मेरे लिये, मेरी प्रसन्नताके लिये, मेरा कर्म मानकर। ऐसे विकट कर्ममें भी न आसक्ति रहे, न किसीके साथ वैर रहे—रहे केवल भगवत्परायणता, भगवद्भक्ति और भगवत्कर्म। इसीका नाम अनन्य भक्ति है। इसीसे भगवत्प्राप्ति हो जाती है।*

यह हिंदू-संस्कृतिकी ही विशेषता है कि इसमें विषमतामें समता देखनेका तथा क्रूर कर्मोंमें भी अनासक्त और निर्वैर रहकर उन्हें भगवत्कर्म बनाने एवं उनमें भक्ति और परायणताका संयोग करनेका कौशल प्राप्त है।

व्यावहारिक अनेकतामें तात्त्विक एकता और प्रकृतिजनित जगत‍्की विषमतामें परमात्माकी नित्य समता देखना हिंदू-संस्कृतिकी विशेषता है। इसी संस्कृतिमें यह अनुभव करके बतलाया गया है कि यह सारा जगत् एक ही भगवान‍्से निकला है; उन्हींमें स्थित है और उन्हींमें समाता है।

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि।

जीवन्ति। यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद् ब्रह्म।

(तैत्तिरीय० ३। १। १)

एवं इस सर्वगत परमात्माकी अपने-अपने कर्मोंके द्वारा पूजा करके मनुष्य-जीवनकी परम और चरम सफलताको प्राप्त कर सकता है।*

वर्णधर्म

अपने-अपने कर्मोंके अनुसार भगवान‍्के विधानसे जीवको जिस वर्णमें (या जिस योनिमें) जन्म ग्रहण करना पड़ता है, उसके जो स्वाभाविक कर्म हैं, वही उसके ‘अपने कर्म’ (स्वकर्म) हैं। यही वर्णधर्म है। वर्णधर्ममें सबके लिये पृथक्-पृथक् रूपसे कर्म नियत हैं। वर्णधर्मके अनुसार जिस वर्ण या जातिकी जो पैतृक आजीविका है, उसीको अपनाकर उसीमें संतुष्ट रहना और उससे जो कुछ उपार्जन हो, उसको यथायोग्य रीतिसे समाजमें वितरण कर देना उसका कर्तव्य है। जन्मसे ही वृत्ति नियत होनेसे न तो किसीमें कभी प्रतिस्पर्धाका भाव आता है, न कोई किसीकी वृत्ति छीननेका प्रयत्न करता है। इसके अतिरिक्त, वंशपरम्परासे आजीविकाके जो साधन चले आते हैं, स्वाभाविक ही उनमें उस वंशके लोग निपुण हो जाते हैं। उनके रक्त-मांसमें उसके भाव भरे रहते हैं। इससे उनका कार्य बहुत सुन्दर और सुचारुरूपसे सम्पन्न होता है।

वर्णोंमें न तो आत्माकी दृष्टिसे कोई भेद है और न कर्मभेदसे उनमें कोई छोटा-बड़ा है। अपने-अपने स्थानपर सभीका समान महत्त्व है। सभी अन्योन्याश्रित हैं, एक-दूसरेके पूरक और सहायक हैं तथा सभीकी अपने-अपने स्थानपर विशिष्ट उपयोगिता है। ब्राह्मण ज्ञानबलसे, क्षत्रिय बाहुबलसे, वैश्य धनबलसे और शूद्र जनबल तथा श्रमबलसे गौरवशाली है। यही इनका स्वधर्म है। इनकी उत्पत्ति भी एक ही भगवान‍्के दिव्य शरीरसे हुई है। ब्राह्मणकी भगवान‍्के श्रीमुखसे, क्षत्रियकी बाहुसे, वैश्यकी ऊरुसे और शूद्रकी चरणोंसे हुई है—

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत:।

ऊरू तदस्य यद् वैश्य: पद्भयां शूद्रो अजायत॥

(ऋग्वेद १०।९०।१२)

ये सब अपने-अपने कर्मका सुचारुरूपसे सम्पादन करते रहें तो जन्मान्तरमें वे उच्च वर्णके होते हैं। जैसे नाटक-मण्डलीमें किसी अभिनेताके द्वारा अपने जिम्मेका अभिनय सफलताके साथ सम्पन्न किये जानेपर उसे दूसरे श्रेष्ठ पात्रका अभिनय मिल जाता है, वैसे ही इस जगन्नाटकमें सफल अभिनेताको जन्मान्तरमें उच्च वर्णकी प्राप्ति होती है।

कर्म और पुनर्जन्म

हिंदू-संस्कृतिमें ‘कर्म’ और ‘पुनर्जन्म’ का सिद्धान्त अनुभव-सिद्धरूपसे मान्य है। कर्मका फल अवश्य भोगना पड़ता है और कर्मानुसार जन्मान्तरकी प्राप्ति होती रहती है एवं जबतक भगवत्प्राप्ति या मुक्ति नहीं हो जाती, तबतक यह जन्म-मरणका प्रवाह चलता ही रहता है। मरनेपर कर्मानुसार जीव आतिवाहिक देह प्राप्त करके तेज:प्रधान देव-देहसे स्वर्गादि लोकोंमें अथवा वायुप्रधान पितृ-प्रेतादि-देहसे पितृ-प्रेत-लोकोंमें जाता है; परंतु इसके सिद्धान्तमें अनन्तकालीन स्वर्ग या नरक नहीं है। स्वर्ग या नरकादिके सुख-दु:ख भोगकर जीव पुन: अपने कर्मानुसार अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेता है।

मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है और फलमें परतन्त्र है। निषिद्ध कर्माचरणसे अन्धकारमय दु:खप्रद नरकादि लोक और नीच पशु-पक्षी आदि योनियाँ प्राप्त होती हैं और पवित्र वैध कर्मोंके फलस्वरूप सुखमय स्वर्गादि लोक और उत्तम श्रेष्ठ वर्णकी मानव-योनि प्राप्त होती है। छान्दोग्योपनिषद्‍‍में कहा है—

रमणीयचरणा....रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वा....कपूयचरणा....कपूयां योनिमापद्येरञ्श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा।

(५।१०।७)

‘उन जीवोंमें जो अच्छे आचरणवाले होते हैं, वे शीघ्र ही उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं। वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनिको प्राप्त करते हैं तथा जो अशुभ आचरणवाले होते हैं, वे तत्काल अशुभ योनिको प्राप्त होते हैं। वे कुत्तेकी योनि, शूकरयोनि या चाण्डालयोनि प्राप्त करते हैं।’

आश्रम-धर्म

वर्णव्यवस्थाकी भाँति ही हिंदू-संस्कृतिमें आश्रम-व्यवस्था है। हिंदू-संस्कृतिका लक्ष्य त्याग है, भोग नहीं। संसारके तुच्छ, अल्प, सीमित और दु:खमिश्रित भोगोंमें आसक्ति न रखकर जीवनको त्यागमय बनाना इसमें महत्त्वकी बात मानी जाती है। हिंदू-संस्कृतिमें स्वाभाविक ही भोगीकी अपेक्षा त्यागीका स्थान ऊँचा है। महान् सम्राट् भी त्यागी महात्माओंकी चरणधूलि सिरपर चढ़ानेमें अपना सौभाग्य समझता है। किसके पास कितना अधिक धन-ऐश्वर्य है, इसका कोई महत्त्व नहीं है। महत्त्व है इस बातका कि कौन कितना बड़ा त्यागी है। पाश्चात्योंके संगसे जबसे भारतने इस त्यागके महत्त्वको भुलाया और अपनी संस्कृतिके सिद्धान्तोंके विरुद्ध भोगैश्वर्यके पीछे पागल हुआ, तभीसे जीवनका लक्ष्य मानकर उसकी दृष्टि केवल अर्थ और अधिकारपर टिकने लगी और तभीसे अनाचार, दुराचार, चोरी, छल, कपट, चोरबाजारी, रिश्वतखोरी आदि दोष आ गये और ये तबतक नहीं मिट सकेंगे, जबतक कि त्यागकी महत्ताका यथार्थ अनुभव न हो जायगा।

हमारे आश्रम-धर्ममें आरम्भसे ही त्यागकी शिक्षा दी जाती है। ‘ब्रह्मचर्याश्रम’ में राजकुमार भी गुरुकुलमें उसी रूपमें रहता है, जिस रूपमें एक निर्धनका बालक। और नियमत: ही वहाँ समस्त विलास-सामग्रियोंका—ऐन्द्रिय सुखोपभोगोंका त्याग और मन-इन्द्रियका संयम रखना पड़ता है। त्यागकी इस प्रथम घाटीको पार करके वह ‘गृहस्थाश्रम’ में आता है, यहाँ उसे भोगोंमें रहकर त्यागी बनना पड़ता है। धन कमाता है, पर अपने लिये नहीं, सारे समाजके लिये, विश्वके लिये—भगवान‍्के लिये। पुत्रोत्पादन करता है; पर अपने लिये नहीं; समाजके लिये, धर्मके लिये, भगवान‍्के लिये। वह संयमी और जितेन्द्रिय होता है। वह सारे समाजका सेवक होता है। तीनों आश्रमोंका और प्राणिमात्रका आश्रय होता है।* सबकी सेवा करके प्रसादरूपसे जो प्राप्त होता है, उसीको अमृतरूप जानकर वह अपना काम चलाता है। इस आश्रममें जीवनका एक महान् उत्तरदायित्वयुक्त कर्मपूर्ण अंश बिताकर और अपने सुयोग्य त्यागभावापन्न उत्तराधिकारीको घरका भार सौंपकर त्यागके पथमें और भी आगे बढ़नेके लिये वह ‘वानप्रस्थ-आश्रम’ में पहुँचता है और अन्तमें चतुर्थाश्रम—संन्यासमें सम्यक् प्रकारसे सम्पूर्ण त्याग करके परमात्माके साथ एकात्मता प्राप्त करता है। चारों आश्रम उत्तरोत्तर अधिकाधिक त्यागकी स्थितिमें ले जानेवाले हैं और अपने-अपने पूर्वाश्रमकी सुदृढ़ भित्तिके आधारपर स्थित हैं।

विवाह

हिंदू-संस्कृतिमें विवाह कभी न टूटनेवाला एक परम पवित्र धार्मिक संस्कार है; यज्ञ है। वह इन्द्रियसुखभोगके लिये नहीं, बल्कि पुत्रोत्पादनके द्वारा परलोकगत पितरोंको सुख पहुँचाने और देवताओंको तुष्ट करनेके लिये है। इसमें विवाह-विच्छेदकी बात तो दूर रही, जन्म-जन्मान्तरतक पति-पत्नीका पवित्र सम्बन्ध बना रहता है। इसीसे हिंदू-स्त्रियाँ पतिके शवके साथ हँसते-हँसते सती हो जाती हैं। इस गये-गुजरे जमानेमें भी सतियोंके चमत्कार होते ही रहते हैं।

बड़ोंकी सेवा

हिंदू-संस्कृतिमें माता-पिता, गुरु और श्रेष्ठ पुरुषोंकी वन्दना तथा सेवाका बड़ा महत्त्व है। मनु महाराज कहते हैं—

आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वज:।

नार्तेनाप्यवमन्तव्या ब्राह्मणेन विशेषत:॥

आचार्यो ब्रह्मणो मूर्ति: पिता मूर्ति: प्रजापते:।

माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता स्वो मूर्तिरात्मन:॥

यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम्।

न तस्य निष्कृति: शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि॥

त्रिष्वप्रमाद्यन्नेतेषु त्रींल्लोकान् विजयेद् गृही।

दीप्यमान: स्ववपुषा देववद् दिवि मोदते॥

(मनु० २।२२५—२२७, २३२)

‘आचार्य, पिता, माता और बड़े भाई—इनका, इनसे सताये जानेपर भी, अपमान न करे। ब्राह्मणको तो विशेषरूपसे इनका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि आचार्य ब्रह्माकी मूर्ति, पिता प्रजापतिकी मूर्ति, माता पृथ्वीकी मूर्ति और बड़ा भाई अपनी ही दूृसरी मूर्ति है (इनका अपमान करनेसे उन-उन देवताओंका अपमान करना माना जाता है)। बालकोंको जन्म देकर उनका पालन-पोषण करनेमें माता-पिताको जो दु:ख सहना पड़ता है, उसका बदला सैकड़ों वर्ष सेवा करनेपर भी नहीं चुकाया जा सकता।’

‘जो गृहस्थी (माता, पिता और गुरु) इन तीनोंकी सेवामें तत्पर रहता है, वह तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करता है और स्वर्गमें सूर्यके सदृश अपने तेजस्वी शरीरके द्वारा प्रकाश करता हुआ आनन्दमें रहता है।

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।

चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥

(मनु० २।१२१)

‘जो मनुष्य नित्य बड़ोंको प्रणाम करता है और उनकी सेवा करता है, उसके आयु, विद्या, यश और बल चारों बढ़ते हैं।’

भारतवर्षकी महिमा

हिंदू-संस्कृतिके कुछ महत्त्वपूर्ण लक्षणोंका यहाँ दिग्दर्शन कराया गया है। वस्तुत: हिंदू-संस्कृति अध्यात्मप्रधान है। व्यावहारिक लोकहितका पूरा ध्यान रखते हुए सत्य और न्यायपूर्ण साधनसे अनासक्त होकर लौकिक उन्नति करना और उसमें भी जीवनके चरम लक्ष्य भगवान‍्को कभी न भूलते हुए क्रमश: भगवान‍्की ओर बढ़ते रहना इसका प्रधान स्वरूप है। पवित्र भारतवर्षमें इस महान् संस्कृतिका उदय हुआ, इसीसे भारत धन्य है और धन्य रहेगा।

गायन्ति देवा: किल गीतकानि

धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते

भवन्ति भूय: पुरुषा: सुरत्वात् ॥

(विष्णुपुराण २। ३। २४)

‘देवतालोग भी निरन्तर यही गाया करते हैं कि जिन्होंने स्वर्ग और मोक्षके मार्गभूत भारतवर्षमें जन्म लिया है, वे पुरुष हम देवताओंकी अपेक्षा भी अधिक सौभाग्यशाली हैं।’

अहो अमीषां किमकारि शोभनं

प्रसन्न एषां स्विदुत स्वयं हरि:।

यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे

मुकुन्दसेवौपयिकं स्पृहा हि न:॥

किं दुष्करैर्न: क्रतुभिस्तपोव्रतै-

र्दानादिभिर्वा द्युजयेन फल्गुना।

न यत्र नारायणपादपंकज-

स्मृति: प्रमुष्टातिशयेन्द्रियोत्सवात् ॥

कल्पायुषां स्थानजयात् पुनर्भवात्

क्षणायुषां भारतभूजयो वरम्।

क्षणेन मर्त्येन कृतं मनस्विन:

संन्यस्य संयान्त्यभयं पदं हरे:॥

(श्रीमद्भा० ५। १९। २१—२३)

देवता भारतवर्षमें उत्पन्न हुए मनुष्योंकी इस प्रकार महिमा गाते हैं—अहा! जिन जीवोंने भारतवर्षमें भगवान‍्की सेवाके योग्य मनुष्य-जन्म प्राप्त किया है, उन्होंने ऐसा क्या पुण्य किया है? अथवा इनपर स्वयं श्रीहरि ही प्रसन्न हो गये हैं? इस परम सौभाग्यके लिये तो निरन्तर हम भी तरसते रहते हैं। हमें बड़े कठोर यज्ञ, तप, व्रत और दानादि करके जो यह तुच्छ स्वर्गका अधिकार प्राप्त हुआ है—इससे क्या लाभ है? यहाँ तो इन्द्रियोंके भोगोंकी इतनी बहुलता है कि उससे दबे रहनेके कारण कभी श्रीनारायणके चरण-कमलोंकी स्मृति होती ही नहीं। यह स्वर्ग तो क्या—जहाँके निवासियोंकी एक-एक कल्पकी आयु होती है, किंतु जहाँसे फिर संसार-चक्रमें लौटना पड़ता है, उन ब्रह्मलोकादिकी अपेक्षा भी भारत-भूमिमें थोड़ी आयुवाले होकर जन्म लेना अच्छा है; क्योंकि यहाँ धीर पुरुष एक क्षणमें ही अपने इस मर्त्यशरीरसे किये हुए सम्पूर्ण कर्म श्रीभगवान‍्को अर्पण करके उनका अभयपद प्राप्त कर सकता है।’

जगत‍्के लोग निष्पक्षभावसे इस संस्कृतिके भव्य और दिव्य स्वरूपको समझें तो उन्हें बड़ा भारी आश्वासन मिलेगा और यहाँके निवासियोंका तो यह परम कर्तव्य ही है कि ये—जो आज अपने घरकी महान् संस्कृति और उसके पावन सिद्धान्तोंसे अनभिज्ञ रहकर परमुखापेक्षी बन रहे हैं, अपनी पवित्र आर्य-संस्कृतिकी अवहेलना करके केवल ‘अर्थ’ और ‘अधिकार’ के पीछे प्रमत्त होकर ‘सनातनधर्म’ के विनाशमें ही कल्याणकी भावना कर रहे हैं एवं फलस्वरूप उत्तरोत्तर पाप-तापके मलिन और दु:खप्रद पंकमें फँसे जा रहे हैं—शीघ्र चेतें, अपनी संस्कृतिको जानें, समझें और अपनायें। भारतवर्षका सिर ऊँचा करनेके लिये उसके पास कोई वस्तु थी तो वह उसकी अध्यात्मप्रधान संस्कृति ही थी। इस अध्यात्मको अपनाकर अपना और इसे आजके अशान्त जगत‍्को देकर उसका क्लेश दूर करके ही भारत अपने पुण्य-कर्तव्यका पालन कर सकता है। भगवान‍् हमारी बुद्धिमें प्रकाश दें और अखिल विश्वका मंगल करें।