‘लंगर मोरि गागर फोरि गयो’
सखी! जाने कहाँ सों अचक
आय मोरी गागर फोरि गयो॥ लं०॥
नई चुनरिया चीर चीर कर
निपट निडर पुनि आँखि दिखावे
देख बीर! अति कोमल बैयाँ
दोउ कर पकर मरोरि गयो॥ लं०॥
मो सों कहे सुन एरी सुंदरी
तो समान व्रज सुघर न कोऊ
नख-सिख लों छबि परख निरख मुख
सघन कुंजकी ओरि गयो॥ लं०॥
कहँ लग कहौं कुचाल ढीठकी
नाम लेत मेरो जीया काँपै
नारायन मैं घनों बरज रहि
मोतियनकी लर तोरि गयो॥ लं०॥
श्यामसुन्दर अचानक आकर गोपीकी गागर फोड़ चले। उसकी नयी चुनरीको चीर-चीरकर बाँह मरोड़ गये, उसे व्रजमें सबसे अधिक सुन्दरी बताकर उसका नख-शिख निरख-परखकर सघन कुंजकी ओर चले गये और जाते समय उसके हजार रोकते-रोकते मोतियोंका हार भी तोड़ गये। गोपी प्रणयकोपसे श्यामसुन्दरको ‘लंगर’ कहकर अपनी सखीको सब हाल सुना रही है।
धन्य हो तुम व्रजकी गोपियो! जो तुम्हारे लिये श्यामसुन्दर स्वयं पधारते हैं और अपने हाथों तुम्हारी गागर फोड़ जाते हैं। क्यों न हो? तुमने जो इसका अधिकार प्राप्त कर लिया है! इस लोक और परलोककी सारी भोग-वासनाओंके और जागतिक मोह-ममता, अभिमान-अहंकार, राग-रंग और नीति-रीति आदि समस्त विकारोंके विषभरे कु-रससे अपनी गागरको बिलकुल खाली करके और कठिन नियम-संयमकी पवित्र सुधाधारासे उसे अच्छी तरह धोकर तुमने उसमें मधुर गोरस—दिव्य प्रेम-रस भर लिया है और वह मधुर रस भरा भी है तुमने केवल श्रीश्यामसुन्दरको आप्यायित करनेके लिये ही! तभी तो प्रेमसुधाके प्यासे तुम्हारे परम प्रियतम श्यामसुन्दर नटवर-वेषमें बड़ी साधनासे संचित तुम्हारे मधुरातिमधुर प्रेमरसका पान करनेके लिये तुम्हारे समीप दौड़े आये हैं। तमाम विश्वको आनन्दित करनेवाले उस मधुर दिव्य प्रेमरसको भला वे तुम्हारी नन्ही-सी संकुचित गगरियामें कैसे रहने दें? वे तुम्हारी गागर फोड़ डालते हैं और अपनी अनन्त महिमासे तुम्हारे प्रेमरसको (परिणाम और माधुर्य—दोनोंमें) अनन्त गुना बनाकर अनन्त मुखोंसे स्वयं उसे पान करते हैं और अनन्त हाथोंसे जगत्के अनन्त जीवोंको बाँट देते हैं।* सारे जगत्को पवित्र प्रेमका दान करनेवाली गोपी! तुम धन्य हो!
अहा! श्रीकृष्ण निपट नि:शंक होकर तुम्हारी नयी चुनरी चीर-चीर कर डालते हैं। गोपी! तुम इससे नाराज क्यों होती हो? सच बताओ क्या तुमने यह चुनरी इसी कामनासे नहीं ओढ़ी थी कि श्यामसुन्दर आवें और तुम्हारी इस दुनियावी चुनरीके टुकड़े-टुकड़े कर डालें। तुम तो सच्चिदानन्दघन नित्य-नवकिशोर श्रीकृष्णकी प्रिया सदासुहागिन हो न? फिर तुम इस अनित्य सुहागका परिचय देनेवाली दुनियावी चुनरीको कैसे ओढ़े रहती? तुम्हें तो उस दिव्य चुनरीकी चाह है, जो कभी किसी भी कालमें न पुरानी होती है और न उतरती ही है। हाँ, तुम्हारा यह अनोखा नाज जरूर है कि तुम इस दुनियावी चुनरीको अपने हाथों नहीं फाड़ती। तुम्हारे प्रेमबलसे यह काम भी श्रीकृष्णको ही करना पड़ता है। तुम्हारे मार्गका अनुसरण करती हुई गिरधरगोपालकी मतवाली मीराने तो अपने ही हाथों दुनियावी चुनरीके टूक-टूक कर डाले थे। ‘चुनरीके किये टूक ओढ़ लीन्ही लोई।’
गोपीके दिलके खुले दरवाजेपर—एकमात्र श्रीकृष्णके लिये ही खुले द्वारपर श्रीकृष्णको संकोच या डर किस बातका हो? हाँ, वहाँ तो श्रीकृष्ण अवश्य सकुचा जाते हैं—बल्कि जाकर भी वापस लौट आते हैं, जहाँ भीतरी दिलका दरवाजा बंद होता है या उसमें दूसरोंको भी जानेकी इजाजत होती है, पर तुम्हारा तो सभी कुछ श्रीकृष्णका है न? तुम तो अपना तन-मन-धन, लोक-परलोक सर्वस्व श्रीकृष्णके चरणोंपर ही न्योछावर कर चुकी हो न? तुम्हारे सब कुछके एकमात्र स्वामी आत्माके भी आत्मा केवल श्रीकृष्ण ही तो हैं। फिर वे अपनी निजकी सम्पत्तिपर अधिकार करनेमें निपट निडर क्यों न हों? और क्यों न तुम्हारी प्रेमभरी विपरीत चेष्टापर प्रणयकोप करके आँखें दिखावें?
ओहो! श्रीकृष्णने अपने दोनों करकमलोंसे पकड़कर तुम्हारी अति कोमल बाँहोंको मरोड़ दिया! अरे—विषयोंकी गुलामीमें लगे हुए हम पामर प्राणियोंकी भुजाएँ न मालूम किन-किन पातकी चरणोंकी सेवामें लगी हैं! न मालूम अबतक इन हमारी भुजाओंने कैसे-कैसे दूषित हृदयोंका आलिंगन कराया है! हमारी ये असती भुजाएँ कभी प्यारे श्रीकृष्णकी सेवाके लिये नहीं ललचायीं! प्रियतम श्यामसुन्दरको अँकवारमें भरनेके लिये आकुल होकर ये कभी नहीं फैलीं। गोपी! तुम्हारी भुजाएँ तो सती हैं, वे विषयोंसे सर्वथा विमुख हैं। वे एक श्रीकृष्णको छोड़कर और किसीके लिये कभी नहीं फैलतीं। इसीसे श्रीकृष्ण आते हैं और तुम्हारी उन बाहोंको पकड़कर, अहाहा! अपने दोनों हाथोंसे पकड़कर तुम्हें अपने हृदयके एकान्त मन्दिरमें विराजित कर लेना चाहते हैं! अनादिकालसे जीवकी जीवनधारा जिस अचिन्त्यके हृदयमें प्रवेश करनेके लिये, जिस अनन्त आनन्दसागरमें अपनेको मिलाकर अनन्तरूप बन जानेके लिये ही बह रही है, क्या उस अचिन्त्य हृदयमें प्रवेश करना तुम्हें अवांछनीय है? नहीं, नहीं अवांछनीय क्यों होता? पर तुम सकुचाती हो!—यद्यपि तुम परमशुद्धा हो, इतनी पवित्र हो कि तुम्हारी चरणधूलि बड़े-से-बड़े महापातकीको पलभरमें पतितपावन बना सकती है। बड़े-बड़े देवता और ज्ञानी देवर्षि, महर्षि तुम्हारी दुर्लभ चरणरजकी कामना करते हैं; परंतु तुम इस सन्देहसे कि ‘कहीं मेरे हृदयमें अपने सुखकी वासनाका तो कोई कण छिपकर नहीं रह गया है’—सकुचा जाती हो। निज-सुखकी वासना तो प्रेममें कलंक है न? सच्चे भक्तका यही तो आदर्श है। वह सोचता है कि जरा-सी विषय-वासना हृदयमें रहते यदि भगवान् मिल गये तो भगवान्के मिलनका मूल्य ही घट जायगा। इसीलिये वह कहता है—‘ठहरो प्रभु! अभी मैं तुम्हारे दर्शन पानेके योग्य नहीं हूँ। जब मैं अपना सारा हृदय पूर्णरूपसे तुम्हारे लिये खाली कर दूँ, उसमें कुछ रहे तो बस सिर्फ तुम्हें सुख पहुँचानेवाली सामग्री ही रहे, मेरे लिये तुम्हारे सुखके सिवा और कुछ भी न रहे, तभी तुम मुझे दर्शन देना।’ गोपी! तुम प्रेमरूपा हो, प्रेमकी अधिष्ठात्री देवी हो, प्रेमकी संस्थापिका हो, शायद इसी आदर्शकी रक्षाके लिये तुम श्यामसुन्दरकी बाँहोंमें अपनेको नहीं देना चाहती, पर वस्तुत: ऐसी बात है नहीं। तुम्हारे हृदयमें भला विषय-वासनाके लेशका कलंक क्यों रहने पावेगा? तुम तो कृष्णगत-प्राणा हो, कृष्णरसभावभाविता हो। हाँ, तुम बड़ी मानिनी हो, प्रेमकी हठीली हो। भला, इसी तरह श्रीकृष्णके साथ क्यों मिलने लगी? परंतु तुम्हारे प्रेममें बड़ा आकर्षण है। सबको बरबस अपनी ओर खींचनेवाले श्रीकृष्णको भी तुम्हारा प्रेम खींच लाता है! श्रीकृष्ण आते हैं और तुम्हारी बाँहोंको पकड़कर तुम्हें अपने हृदयमें बिठा लेना चाहते हैं। तुम मान करके पीछे हटती हो, बाँहें मरोड़ खा जाती हैं और छूट जाती हैं। धन्य-धन्य! गोपी! प्रेमकी ध्वजा गोपी! तुम्हारी जय हो, जय हो!
अहा! तुम प्रेमी भक्तोंमें सर्वशिरोमणि हो। तुम्हारे प्रेममें कितना सामर्थ्य है जो सर्वशक्तिमान् अचिन्त्यबल भगवान् भी अपनी शक्ति भूलकर तुम्हारे दिव्य प्रेमसे खिंचे हुए स्वयं आतुर होकर तुमसे मिलनेको चले आते हैं। सचमुच तुम अप्रतिम सुन्दरी हो! तुम्हारी जिस सुन्दरताने मुनिमनमोहन मदनमोहन मोहनके चिन्मय मनको भी मोह लिया, उस तुम्हारी सुन्दरताका बखान सच्चे सौन्दर्यके पूरे पारखी श्रीकृष्ण क्यों न करें? वे लोग भूले हुए हैं, जो तुम्हारे इस दिव्य सौन्दर्यको पार्थिव शरीरकी बाहरी बनावट समझते हैं। तुम तो दिव्य सुन्दरतामयी ही हो। सबसे सुन्दर तो तुम्हारा वह हृदय है, जिसमें प्रकृतिजन्य अहंता-ममता, राग-द्वेष, मद-अभिमान, लोभ-मोह, ईर्ष्या-मत्सरता, काम-क्रोध, चिन्ता-विषाद और सुख-दु:ख आदिका संस्कार भी नहीं है और जो समस्त दैवी सम्पदाके परम सार एकमात्र श्रीकृष्ण-प्रेमकी महिमामयी माधुरीसे ही सुसज्जित है! तुम्हारे इस परम सुन्दर अन्तस्तलका ही आभास तुम्हारे मोहन-मोहन मुखडे़पर, तुम्हारे नचीले-नुकीले नेत्रोंपर, तुम्हारी घुँघराली काली अलकावलीपर और तुम्हारे अंग-अंगपर छाया है। इसीसे तुम विश्वमोहन-मोहिनी हो। इसीसे श्रीकृष्ण तुम्हारी नख-शिख छबि निहारनेको नित्य लालायित रहते हैं। वे बड़े पारखी हैं, इसीसे वे किसीकी बाहरी सुन्दरतापर मुग्ध नहीं होते। उन्हें तो निर्मल हृदयकी परम निर्मल माधुरी चाहिये। ऐसी सुन्दरता हो जो केवल सुन्दरतासे ही बनी हो तभी वे उसपर मोहित होते हैं। बड़े रिझवार न ठहरे, गोपी! इसीसे वे तुम्हारी मोहिनी माधुरीपर मुग्ध हैं!
सघन कुंज ही तो उनकी नित्यविहार-स्थली है। जिस कुंजमें घनता नहीं है—जहाँकी बातें बाहर दीखती-सुनती हैं और जिसमें बाहरवालोंका प्रवेश सम्भव है, वे सच्चिदानन्दघन कूटस्थ वहाँ कैसे रह सकते हैं? घनता और अनन्यतामें ही उनका निवास होता है, इसीसे तो भक्तलोग अपने हृदयको भी सघन कुंज ही बनाया करते हैं!
अहाहा! तुम जब उन्हें ‘लंगर’ और ‘ढीठ’ कहती हो, तब तुम्हारी रसनासे कैसा मधुर रस बरसता है। बलिहारी तुम्हारे प्रेमपर! तभी तो वे कुचाल करके तुम्हारे बरजते-बरजते तुम्हारी ‘मोतियनकी लर तोड़कर’ झट सघन कुंजमें जा छिपते हैं। मीराने तो अपने हाथों ‘मोती-मूँगे उतार वनमाला पोयी’ थी। हाँ, तुम्हारा गौरव इतना बढ़ा हुआ है कि तुम्हारी मोतीकी लड़ तोड़ने भी उन्हें स्वयं आना पड़ा। वह मोतीकी लड़ ही कैसी जिसके लिये श्यामसुन्दरको अपनी मनमानी करते रुकना पड़े, और फिर ऐसी प्रतिबन्धकरूप मोतीकी लड़को श्यामसुन्दर क्यों न तोड़ डालें! गोपी! तुम्हारा मोतीका हार क्या तुम्हारे शृंगारके लिये है? नहीं, तुम्हारा तो भोग-त्याग, जीवन-मरण सभी कुछ श्रीकृष्णसुखके लिये है। तब श्रीकृष्ण यदि उस मुक्ताहारको तोड़कर सुखी होना चाहते हैं तो तुम उन्हें बरजती क्यों हो? अरी, तुम बरजती नहीं, यह तो तुम्हारी नखरेबाजी है। तुम इसलिये नहीं बरजती कि मोतीके हारपर तुम्हें मोह है, तुम तो बार-बार उन्हें बरजकर अधिकाधिक रसानुभव करना-कराना चाहती हो? उनका नाम लेते तुम्हारा हृदय इसलिये नहीं काँपता कि वे तुम्हारे साथ बरजोरी करते हैं। श्यामकी बरजोरी तो तुम्हारे मनकी नित्यकी साध है। पूर्ण समर्पण कोई कर नहीं सकता, वह तो बरजोरीसे ही करा लिया जाता है। बस, समर्पणकी तैयारी भर होनी चाहिये। तुम्हारा तो हृदय सदा समर्पणकी ही माला जपता है। उसका प्रकम्पन बस वह जाप ही है, जो सघन कुंजसे उन्हें लौटानेके लिये या वहाँ स्वयं पहुँच जानेके लिये तुम कर रही हो। उनकी विरह-वेदनासे उत्पन्न होनेवाली चित्तकी विकलताभरी चंचलता—तुम्हारे हृदयका छटपटाहटभरा प्रतिपलका वह प्रेम-स्पन्दन ही तुम्हारे जीका काँपना है!
गोपी! घबराओ नहीं, श्यामसुन्दर तुम्हें अवश्य मिलेंगे। नहीं-नहीं, वे तो तुम्हें मिले ही हुए हैं। वे तुममें हैं, तुम उनमें हो! तुम्हारा-उनका बिलगाव कभी होता ही नहीं। तुमसे मिले रहनेमें ही उनकी ‘श्यामसुन्दरता’ है और उनसे मिली रहती हो, इसीसे तुम ‘गोपी’ हो। यह तो तुम्हारी लीला है जो जीवोंके कल्याणार्थ तुम अनायास ही करती हो। देवी आनन्दचिन्मय-रस-भाविता भगवती! श्रीकृष्णकी ही आनन्द-लीलामयी श्रीमूर्ति मेरी माँ! ऐसी अमोघ कृपा करो, जिससे इस पामर प्राणीको भी तुम्हारे गोपी-प्रेम-प्रासादके रासमण्डपमें एक झाड़ू देनेवाली अनुचरीका काम मिल जाय और फिर कभी श्रीकृष्णदर्शनके लिये तरसता हुआ यह भी तुम्हारी ही तरह गा उठे—
कारुण्यकर्बुरकटाक्षनिरीक्षणेन
तारुण्यसंवलितशैशववैभवेन ।
आपुष्णता भुवनमद्भुतविभ्रमेण
श्रीकृष्णचन्द्र शिशिरीकुरु लोचनं मे॥