महाभारतमें अधर्म और धर्मका युद्ध

महाभारतके आदिपर्वमें दो श्लोक मिलते हैं—

दुर्योधनो मन्युमयो महाद्रुम:

स्कन्ध: कर्ण: शकुनिस्तस्य शाखा:।

दु:शासन: पुष्पफले समृद्धे

मूलं राजा धृतराष्ट्रोऽमनीषी॥

युधिष्ठिरो धर्ममयो महाद्रुम:

स्कन्धोऽर्जुनो भीमसेनोऽस्य शाखा:।

माद्रीसुतौ पुष्पफले समृद्धे

मूलं कृष्णो ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च॥

(अनु० १।११०-१११)

महाभारत ग्रन्थके मुख्य कथानकका केन्द्र महाभारत-युद्ध ही है। उसमें दो विरोधी शक्तियोंका प्रबल संघर्ष दृष्टिगोचर होता है। एक ओर तो अधर्म अपने पूरे दल-बलके साथ मुँह बाये खड़ा है और धर्म एवं उसके परिवारको निगल जाना चाहता है। दूसरी ओर धर्म अपनी सारी शक्ति लगाकर अधर्मको दबा देना चाहता है। इन्हीं दोनों शक्तियोंको यहाँ दो वृक्षोंके रूपमें व्यक्त किया गया है। एकके प्रतीक क्रोध एवं अभिमानकी मूर्ति, साक्षात् कलियुगके अवतार राजा दुर्योधन हैं। दुर्योधन न होते तो महाभारतका संहारकारी युद्ध कदापि न होता और भरतवंशका इतिहास दूसरी ही तरह लिखा जाता। दुर्योधनके प्रधान सहायक महारथी कर्ण थे। इन्हींके बलपर दुर्योधन नाचते थे। ये ही न्याय-अन्याय सबमें उनका समर्थन करते थे और उनके प्रत्येक पापपूर्ण प्रस्तावका अनुमोदन करते थे। ये ही उनके प्रधान सलाहकार थे। इन्हींके पराक्रम एवं अस्त्र-कौशलका उन्हें भरोसा था। महाबली अर्जुनको वे इन्हींसे लड़ाकर जीतनेकी आशा रखते थे। भीष्म और द्रोणाचार्यको तो वे पाण्डवोंका पक्षपाती समझते थे। इसीलिये कर्णको इस अधर्ममय वृक्षका स्कन्ध (तना) बताया गया। वृक्षका विस्तार उसकी शाखाओंद्वारा होता है। दुर्योधनकी पापपूर्ण नीतिको कार्यरूपमें परिणत कर उसका विस्तार करना शकुनिका ही काम था। उन्हींने दुर्योधनको द्यूत आदि पाप-कर्मके लिये प्रेरित एवं उत्साहित कर युधिष्ठिरको कपटसे जीतनेका सफल आयोजन किया था। इसीसे उन्हें दुर्योधनरूप वृक्षकी शाखा कहा गया है। वृक्षका परिपाक पुष्प-फलके रूपमें ही होता है। दुर्योधनकी नीतिका परिपाक भी द्रौपदी-चीरहरण आदिके रूपमें दु:शासनके द्वारा ही हुआ था, इसीसे उन्हें पुष्प-फल बताया गया। अधर्मका मूल अज्ञान है। धृतराष्ट्र अज्ञान एवं मोहकी साक्षात् मूर्ति थे। वे दुर्योधनकी काली करतूतोंका भयंकर परिणाम जानते हुए भी उन्हें कमजोरीके कारण रोक नहीं सकते थे और उनके प्रत्येक कार्यमें अनुमति दे दिया करते थे। दुर्योधनके पिता होनेके नाते भी इन्हें अधर्मरूपी वृक्षका मूल कहना सर्वथा संगत ही है। दुर्योधन जन्मते ही गधेकी भाँति रेंकने लगे थे और उनके जन्मके समय कई अनिष्टसूचक उत्पात भी हुए। इससे उनके द्वारा कुरुकुलके नाशकी सूचना मिली थी। उस समय विदुरने धृतराष्ट्रको इन्हें परित्याग करके कुलको सर्वनाशसे बचानेकी सलाह दी थी। उस समय धृतराष्ट्र इनका परित्याग कर देते तो इतने खून-खराबेकी नौबत ही नहीं आती। वृक्षकी जड़को काट देनेपर उसका अस्तित्व ही नहीं रहता। इस दृष्टिसे भी धृतराष्ट्रको मूल कहना उपयुक्त ही है।

इधर धर्मके प्रतीक महाराज युधिष्ठिर थे। वे साक्षात् धर्मकी मूर्ति ही थे। उनके प्रधान बल वीरवर अर्जुन थे। भीमके द्वारा इनकी धर्मपूर्ण नीतिका विस्तार होता था। नकुल-सहदेवके द्वारा उसका परिपाक होता था; और इस धर्मरूपी वृक्षकी जड़ भगवान‍् श्रीकृष्ण, वेद और ब्राह्मण थे। इन्हींके आधारपर यह धर्म-वृक्ष टिका रहा। इस प्रकार इन दो श्लोकोंमें महाभारत-युद्धके तात्पर्यका दिग्दर्शन कराया गया है।