नम्र निवेदन
श्रीभाईजी (हनुमानप्रसादजी पोद्दार)-की महनीय लेखनीसे प्रसूत स्फुट लेखोंके दो संग्रह (१) ‘तुलसीदल’ और (२) ‘नैवेद्य’ के नामसे पूर्व में प्रकाशित हुए थे। पाठकोंको वे कितने रुचिकर प्रतीत हुए इसका अनुमान इस बातसे लगाया जा सकता है कि प्रथम संग्रहकी सात और द्वितीयकी पाँच आवृत्तियाँ हो चुकी हैं। लगभग दो वर्ष हुए उक्त दोनों संग्रहोंके नवीन संस्करण ‘भगवच्चर्चा’ भाग-१-२ के नामसे प्रकाशित हुए हैं। उन दोनों ही संग्रहोंका विषय ऐसा है जो कभी पुराना तो होनेका नहीं। जिस प्रकार उनके प्रतिपाद्य श्रीभगवान् पुराणपुरुष होनेपर भी नित्य नवीन हैं, उनकी चर्चामें उनके भक्तोंको नित्य नवीन रसकी अनुभूति होती है—‘स्वादु स्वादु पदे पदे’, उसी प्रकार जबतक भगवद्विश्वासी पुरुष इस देशमें रहेंगे, तबतक इस प्रकारके ग्रन्थोंकी माँग सदा ही बनी रहेगी और इसीमें देशका और विश्वका कल्याण है।
अध्यात्म ही भारतका प्राण-सर्वस्व है, उसीके बलपर भारत अनादिकालसे जीवित है, उसीके कारण उसका मस्तक आज भी जगत्के सामने ऊँचा है। संस्कृतियाँ और राष्ट्र विश्वके रंगमंचपर आये और उसी प्रकार विलीन हो गये, जैसे जलराशिमें बुद्बुदमाला। एक भारतीय संस्कृति ही ऐसी है, जो विविध विरोधी शक्तियोंके प्रबल प्रहारोंसे जर्जरित होकर भी अरबों वर्षोंसे अक्षुण्ण बनी हुई है और वर्तमान युगमें जहाँ चारों ओर हिंसा, कलह, अशान्ति और असंतोषके बादल मँडरा रहे हैं, प्रलयंकर युद्ध-परम्पराकी विभीषिका मानवताको अहर्निश त्रस्त किये हुए है, मानव अपनी दानवी लीलासे राक्षसोंको भी अपदस्थ करनेके प्रयत्नमें है, संहारके नये-नये आविष्कारोंके प्रसारमें ही मानवीय बुद्धिकी चरितार्थता मानी जा रही है—एकमात्र भारतीय संस्कृति ही विश्वको शान्ति, परस्पर मैत्री एवं सामंजस्यका अमृतमय संदेश दे सकती है। भारतीय संस्कृतिके आधारस्तम्भ हैं—धर्म और भगवान् और उन्हींकी पावन चर्चामें विश्व-ब्रह्माण्डका परम मंगल निहित है। इसी भावनासे प्रेरित होकर भगवच्चर्चाका यह तीसरा भाग—जनतारूप जनार्दनकी सेवामें प्रस्तुत किया जा रहा है। आशा है, जिस प्रकार पूर्व-प्रकाशित दोनों भागोंका प्रेमी पाठक-पाठिकाओंने समादर किया, उसी प्रकार वर्तमान संग्रहको भी लोग चावसे पढ़ेंगे और उसमें सन्निविष्ट परमोपयोगी विषयोंका अध्ययन और प्रेमपूर्वक मनन करके अपने जीवनको समुन्नत एवं भगवान्के मार्गमें अग्रसर करनेकी चेष्टा करेंगे।
जीवनका परम लाभ इसीमें है कि जिस प्रकार भी सम्भव हो, भगवान् हमारे लक्ष्यबिन्दु बनें, जीवन उन्हींकी भावनासे ओत-प्रोत होकर उन्हींकी ओर प्रवाहित हो, जीवनकी प्रत्येक क्रिया उन्हींके लिये हो और इस प्रकार हम स्वयं तो परम धन्य और कृतकृत्य बनें ही, साथ-ही-साथ जगत्को भी सनातन सुख-शान्तिके मार्ग दिखानेमें समर्थ हों। इन पंक्तियोंके लेखकका विश्वास है कि जो भी भाई-बहिन इस अमूल्य संग्रहका श्रद्धा एवं मनोयोगपूर्वक अध्ययन और अनुशीलन करेंगे और उसमें संकलित किये हुए अनुभवपूर्ण एवं शास्त्रों तथा महात्माओंकी वाणीसे समर्थित विचारोंको जीवनमें उतारनेकी चेष्टा करेंगे, उन्हें अवश्य ही उपर्युक्त ध्येयकी प्राप्तिमें बड़ी सहायता मिलेगी।
वर्तमान संग्रहमें ध्यानयोग, (जिसमें भगवान्के विभिन्न स्वरूपोंका सुन्दर वर्णन है तथा ध्यानकी विधि बतलायी गयी है।) अवतार-तत्त्व, सगुण-निर्गुण-तत्त्व, भावराज्यकी महिमा, पुरुषोत्तम-तत्त्व एवं गुरु-तत्त्व आदि गम्भीर विषयोंके साथ-साथ प्राच्य एवं पाश्चात्य संस्कृति, हिंदू-संस्कृतिका स्वरूप एवं गो-रक्षा आदि सर्वसाधारणके समझनेयोग्य विषयोंका भी बड़ा ही मार्मिक विवेचन किया गया है। शिव, विष्णु, शक्ति, राम एवं कृष्ण एक भगवान्के ही विविध रूप हैं तथा उनमें परस्पर कैसी एकता और सामंजस्य है—इसे कई लेखोंद्वारा अत्यन्त सुन्दर ढंगसे समझाया गया है। साथ ही भक्तके लक्षण, भजनकी आवश्यकता, सदाचार-प्राप्तिके उपाय, भगवत्प्राप्तिके उपाय, धारण करनेयोग्य ५१ बातें, गृहस्थोंके लिये साधारण नियम, ग्यारह पालनीय नियम, दैवी विपत्तियाँ और उनसे बचनेके उपाय, एक उपाय, सुहृद् समझते ही मुक्ति आदि साधनोपयोगी विषयोंपर भी प्रकाश डाला गया है। भगवान् श्रीकृष्णकी अटपटी दीखनेवाली लीलाओंका रहस्य भी बड़े ही मधुर ढंगसे खोला गया है। इस प्रकार विविध दृष्टियोंसे वर्तमान संग्रह अत्यन्त उपयोगी एवं उपादेय बन गया है। स्वयं अध्ययन करनेपर ही इसकी परमोपयोगिता हृदयंगम हो सकेगी। किमधिकं विज्ञेषु—
विनीत
दोलोत्सव (चैत्र कृष्ण २)
चिम्मनलाल गोस्वामी
वि० सं० २००९ (एम० ए०, शास्त्री)