परम धर्म तथा मोक्ष-मार्ग
मुनिगण बोले—जिस धर्मसे बड़ा संसारमें और कोई धर्म नहीं है, प्राणियोंके लिये जो सर्वश्रेष्ठ धर्म है, कृपया उसीको आप हमारे प्रति कहिये।
श्रीव्यासजीने कहा—मुनिश्रेष्ठगण! सुनो, मैं तुम्हारे प्रति उस प्राचीन धर्मको कहता हूँ जो ऋषियोंद्वारा प्रशंसित है और सब धर्मोंमें श्रेष्ठ है। जिस प्रकार पिता अपने बालकोंको एकत्रित कर लेता है, उसी प्रकार तत्त्वबुद्धिके द्वारा स्वच्छन्द इन्द्रियोंका संयम करके उन्हें एकाग्र करो। मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही परम तप है, यही सब धर्मोंमें श्रेष्ठ धर्म है। मन जिस समय बुद्धिके द्वारा इन्द्रियोंका निग्रह करके उनके विषयोंका चिन्तन नहीं करेगा, तब वह आत्मतृप्त हो जायगा। इन्द्रियाँ विषयोंसे निवृत्त होकर जब अपने-अपने गोलकोंमें स्थिर हो जायँगी, तभी तुम स्वयं अपने आत्मामें शाश्वत परमात्माको देख लोगे। महात्मा मनीषी ब्राह्मणगण उस सर्वात्मा परमात्माको धूम्ररहित अग्निवत् देखते हैं। जिस प्रकार पुष्प-फल-सम्पन्न बहु-शाखाशाली महावृक्ष यह नहीं जानता कि मेरे पुष्प कहाँ हैं और फल कहाँ हैं? उसी प्रकार आत्मा भी यह नहीं जानता कि मुझे कहाँ जाना है और मैं कहाँसे आया हूँ? इसका एक और अन्तरात्मा है जो यह सब कुछ अनुभव करता है। अति प्रदीप्त ज्ञान-दीपकके द्वारा वह स्वयं अपने-आपको देखता है। द्विजगण! तुम भी उस आत्माका दर्शन करके वैराग्यलाभ करो और जिस प्रकार सर्प अपनी काँचुलीको छोड़ देता है, उसी प्रकार तुम भी समस्त पापोंसे मुक्त हो जाओ तथा परा बुद्धिको प्राप्त करके निश्चिन्त और दु:खरहित हो जाओ। जिसका सब ओर प्रवाह है, जो समस्त लोकोंको बहा ले जानेवाली है, पाँचों इन्द्रियाँ ही जिसमें ग्राह हैं, मनके संकल्प ही किनारे हैं, लोभ और मोहरूपी तृणोंसे जो आच्छादित है, काम और क्रोध ही जिसमें सरीसृपादि हैं, असत्य ही तीर्थ है, मिथ्या जल क्षोभ है, क्रोध कीचड़ है, अव्यक्त उद्गम स्थान है तथा जो अजितेन्द्रियोंके लिये अति दुस्तर है, उस अति वेगवती घोर नदीको तुम बुद्धिद्वारा पार करो। उस संसार-सागर-गामिनी, पातालान्त गम्भीरा, जन्मके साथ ही उत्पन्न हुई तथा जिह्वारूपी आवर्तों (भँवरों)-के कारण दुस्तरा सरिताको बुद्धिमान् धैर्यवान् और मनस्वी महात्मागण ही तरते हैं। उसको पार करके सर्वथा मुक्त हुए निर्मलात्मा और शुद्धचेता जन उत्तम प्रज्ञामें प्रतिष्ठित होकर सम्पूर्ण क्लेशोंसे पार हुए तथा प्रसन्नात्मा और निष्पाप हुए ब्रह्मपदको प्राप्त करते हैं। उस स्थितिको प्राप्त कर लेनेपर तुम क्रोध, कृपा तथा क्रूरतासे भी रहित होकर समस्त प्राणियोंको इस प्रकारकी स्थितिमें देखोगे जिस प्रकार पर्वतारूढ़ पुरुष पृथ्वीपरके प्राणियोंको देखता है। तब तुम तटस्थ वृत्तिसे समस्त भूतोंकी उत्पत्ति और उनके विनाशको देखोगे। धार्मिक प्रधान, सत्यदर्शी बुधजन इस विभु आत्माके ज्ञानको ही समस्त धर्मोंमें विशिष्ट धर्म मानते हैं। विप्रगण! अपने संयमी, हितकारी और अनुगत शिष्योंको तुम इसी गुह्यतम आत्मज्ञानका उपदेश करो। मैंने जिस आत्मशान्तिप्रद परमात्माके विषयमें कहा है वह न पुरुष है, न स्त्री है और न नपुंसक है, वह सुख-दु:खादिसे रहित और भूत, भविष्य, वर्तमानात्मक है। उसको जान लेनेपर पुरुष हो अथवा स्त्री, फिर वह पुनर्जन्मके चक्रमें नहीं पड़ता।
मुनिगण बोले—पितामह श्रीब्रह्माजीने कहा है कि मोक्ष उपायसे ही होता है। बिना उपाय नहीं होता, अत: मुने! हम उस उपायको यथोचित सुनना चाहते हैं।
श्रीव्यासजी बोले—हे महाप्राज्ञ मुनिजन! तुमलोगोंने जिस उपायका आश्रय लिया है वह ठीक ही है। अनघ! उसीके द्वारा सम्पूर्ण पदार्थोंको प्राप्त कर सकते हो। घटकी सामग्रीमें जो बुद्धि होती है घटोत्पत्तिमें वह नहीं होती; उसी प्रकार धर्मादिके कारणोंके सम्बन्धमें समझना चाहिये। जो मार्ग पूर्वसमुद्रके लिये होता है वह पश्चिमको कभी नहीं जाता। मोक्षका भी एक ही मार्ग है, उसे अनघगण! मुझसे सुनो। धीर पुरुष क्षमासे क्रोधका उच्छेद करे, नि:संकल्पतासे कामका ध्वंस करे और सत्यसेवनके द्वारा निद्राको जय करे, अप्रमादके द्वारा भयका उच्छेद करके बुद्धि तथा चित्तकी रक्षा करे और धैर्यके द्वारा इच्छा, द्वेष और कामका वर्जन करे। निद्रा तथा चंचलताको तत्त्ववित् पुरुष ज्ञानाभ्यासके द्वारा निरस्त करे तथा योगी हित-मित और सुपाच्य भोजनके द्वारा सम्पूर्ण विघ्नोंको हटावे। लोभ और मोहको संतोषसे, विषयोंको तत्त्वदर्शनसे, अधर्मको दयासे और धर्मको उपेक्षाके द्वारा जीते। विद्वान् पुरुष अनागत भावनाके त्यागद्वारा आशाको, संगत्यागके द्वारा सामर्थ्यको, संसारके अनित्य चिन्तनके द्वारा स्नेहको और योगसिद्धिके द्वारा क्षुधाको जीते। करुणाके द्वारा स्वभावको, संतोषके द्वारा तृष्णाको, मौनके द्वारा बहु-भाषणको और शौर्यके द्वारा भयको विजय करे। वाणी और मनका बुद्धिमें; बुद्धिका ज्ञानात्मामें, ज्ञानात्माका महत्तत्त्वमें और महत्तत्त्वका शान्तात्मामें लय करे। इस प्रकार शान्तात्मासे संयुक्त होकर वह शुचिकर्मा योगी शान्तिलाभ करता है। विद्वानोंके बतलाये हुए काम, क्रोध, लोभ, भय और स्वप्न योगके इन पाँच विघ्नोंका परित्याग करके यथावत् योगसाधनके द्वारा ध्यान, स्वाध्याय, दान, सत्य, लज्जा, कोमलता, क्षमा, शौच, आचारशुद्धि और इन्द्रियसंयमका सेवन करे। इनके द्वारा तेजकी वृद्धि और पापकी क्षति होती है, संकल्प सिद्ध हो जाते हैं और विज्ञानकी प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार निष्पाप हुआ वह तेजस्वी, लघ्वाहारी और जितेन्द्रिय पुरुष काम-क्रोधादिको जीतकर परमपदकी प्राप्ति करता है। अमूढ़त्व, असंगित्व, काम-क्रोधराहित्य, अदीनत्व, उद्वेगराहित्य तथा वाक्, काया और मनका यथायोग्य संयम—यही मोक्षका प्रसादजनक विमल और विशुद्ध मार्ग है।
(ब्रह्मपुराणके आधारपर)