पिंजरापोल और गोशाला
परे वा बन्धुवर्गे वा मित्रे द्वेष्टरि वा सदा।
आपन्ने रक्षितव्यं तु दयैषा परिकीर्तिता॥
(अत्रिसंहिता ४१)
‘अपना, पराया, मित्र, द्वेषी और वैरी कोई भी हो, विपत्तिमें पड़े हुएकी सदा रक्षा करनेको ही दया कहा जाता है।’
दया उपयोगिताकी अपेक्षा नहीं करती। वह तो मानवस्वभावका एक सात्त्विक गुण है, जो बिना किसी भेदभावके पीड़ित प्राणिमात्रकी पीड़ा दूर करनेके लिये मानव-हृदयमें सहानुभूति, परदु:खकातरता, सात्त्विक उत्साह और उत्तेजन तथा उत्कृष्ट उत्सर्गकी भावना उत्पन्न करता है और मनुष्यको दु:खियोंके दु:ख दूर करनेके पवित्र कार्यमें बरबस लगा देता है। फिर, असहाय और अशक्त गायका पालन-पोषण करने और उसे सुख पहुँचानेकी चेष्टा करनेमें तो दयाका प्रश्न ही नहीं है। इसमें तो कृतज्ञताजनित विशुद्ध कर्तव्यपालन है। जिस गोमाताने अपनी अच्छी हालतमें हमारी अपार सेवा की, जिसका जन्म ही हमारी भलाईके लिये हुआ और जिसकी उदारतापर ही हमारा जीवन निर्भर रहता है। जिसने हमें अमृत-सा दूध दिया, खेतीके लिये बैल दिये, खेतके लिये खाद दी और अब भी दे रही है, उसका दूध सूख जानेपर या उसके लूली-लँगड़ी, बीमार और असहाय हो जानेपर उसका पालन-पोषण करनेसे मुँह मोड़ लेना तो एक प्रकारकी घोर कृतघ्नता और कर्तव्यसे विच्युति है। आजकल उपयोगितावादकी लहर बह रही है, इस कारण महत्त्वपूर्ण दयावृत्ति और कर्तव्यपालनके प्रति लोगोंकी उपेक्षा होने लगी है। वे कहते हैं—‘जो प्राणी हमारे किसी उपयोगमें नहीं आते, जो न दूध दे सकते हैं और न खेती-बारीके ही काम आते हैं ऐसे निकम्मे पशुओंके पेटका गड्ढा भरते रहना मूर्खता नहीं तो और क्या है। प्रकृति स्वयं निरुपयोगी बनाकर जिनका अन्त कर देना चाहती है, उनको बचानेमें अपनी शक्ति, समय और धनका उपयोग करना उनका दुरुपयोग ही तो है।’ मतलब यह कि आजके इस जडयुगमें मनुष्यकी दृष्टि सब ओरसे हटकर केवल अर्थपर ही आकर टिक गयी है। इसीसे प्रत्येक काममें उसके सामने केवल उपयोगिताका प्रश्न रहता है और इसीसे वह आज अपने वृद्ध और बीमार सगे माता-पिता एवं आत्मीय स्वजनोंकी भी उपेक्षा—उनसे घृणा करने लगा है और उनके भरण-पोषणमें समय, शक्ति और अर्थका अपव्यय मानकर उससे अपनेको बचाने लगा है। अर्थपरायणताने उपयोगिताके नामपर आज मनुष्यको केवल देवत्वकी ओर जानेसे ही नहीं रोक दिया है, वरं मानवतासे भी उतारकर उसे दया-मयाशून्य असुर बना दिया है। इसीसे आज वह सहानुभूति, सेवा और दूसरोंकी सुख-शान्तिकी कुछ भी परवा न करके अपनी पवित्र सात्त्विकी वृत्तियोंको मारकर केवल अर्थके पीछे उन्मत्त हो रहा है और उन्नतिके नामपर दिनोदिन पतनके गहरे गड्ढेमें गिरता जा रहा है। मनुष्यके जीवनका ध्येय जब एकमात्र धन ही बन जाता है, तब उसमें एक ऐसा मोह पैदा होता है जो उसे अपने सुख-शान्तिके साधनोंसे भी विमुख कर देता है; यहाँतक कि उससे वह ऐसे कर्म करवाता है जिनसे उसके अपने ही इहलौकिक और पारलौकिक जीवनकी सुख-शान्तिका स्रोत भी चिरकालके लिये सूख जाता है और जब मनुष्य अपनी सुख-शान्तिको ही नहीं देखता, तब दूसरेकी सुख-शान्तिकी चिन्ता तो उसे क्यों होने लगी?
यही कारण है कि आजके धनकामी लोग ‘व्यर्थ अर्थनाश’ बताकर असहाय पशुओंका भरण-पोषण करनेवाली उपयोगी संस्थाओंकी ओरसे उदासीन होते चले जा रहे हैं और उनका विरोध करनेमें ही अपने कर्तव्यका पालन समझते हैं। दु:ख तो इस बातका है कि केवल आर्थिक दृष्टिकोणसे गो-पालन करनेवाले पाश्चात्य देशोंकी पद्धतिपर मुग्ध होकर हमारे सम्मान्य अर्थशास्त्री विद्वान् भी आज वृद्ध और अपंग पशुओंको पृथ्वीका भार बताकर उन्हें न पालनेकी सलाह देने और प्रकारान्तरसे उनको कत्ल कर डालनेके लिये प्रोत्साहित करने लगे हैं। ऐसी हालतमें इस प्रकारके विचारवाले लोगोंके द्वारा पिंजरापोल और गोशालाओंकी अनुपयोगिता दिखलाया जाना कुछ भी आश्चर्यकी बात नहीं है। अवश्य ही ऐसी संस्थाओंका विरोध मनुष्यकी एक पवित्र, कोमल और मधुर वृत्तिको मारना ही है!
पिंजरापोलोंकी स्थापना वस्तुत: उन सहृदय पुरुषोंकी विशुद्ध धार्मिक भावनासे हुई थी जिनके हृदयमें बड़ी सुकोमल—सुमधुर दयाकी वृत्ति थी और जो वृद्ध माँ-बापकी सेवा करनेकी भाँति ही बूढ़ी गो-माताकी सेवाको भी अपना परम कर्तव्य मानते थे। पिंजरापोल नयी संस्था नहीं है। जैन और बौद्धोंके समयमें भी ऐसी संस्थाएँ थीं। मुसलमानी कालमें भी थीं और उनमें केवल गायोंका ही नहीं, बीमार और असहाय अन्यान्य पशु-पक्षियोंका भी इलाज और भरण-पोषण किया जाता था। यह एक ऐसा पवित्र धर्म समझा जाता रहा है कि सारा समाज इसमें हाथ बँटाता है और व्यापारी लोग अपने व्यापारपर ‘लाग’ लगाकर इस कार्यमें सहायता करते हैं। अपंग प्राणीकी सेवामें एक परम पुण्यकी और पवित्र कर्तव्य-पालनकी श्रद्धा थी और वह सच्ची थी। इसीसे लोग अपने-अपने घरोंमें भी अशक्त प्राणियोंकी सेवा अपने हाथों करते थे। जब कोई गृहस्थ ऐसी परिस्थितिमें पड़ जाता कि खुद तन और धनसे सेवा नहीं कर सकता था, तब उसके पशुको सँभालना पिंजरापोलका काम था। इस प्रकार पिंजरापोल न केवल पशु-पीड़ाका निवारण करता था वरं धार्मिक-भावसम्पन्न असमर्थ गृहस्थका बोझ भी हलका करके उसे इस योग्य बना देता था कि वह नया उपयोगी पशु लाकर उससे लाभ उठा सके। आज भी प्राय: ऐसा ही होता है। पिंजरापोलोंमें इस समय सरकारी अनुमानसे लगभग तीन करोड़ रुपये वार्षिक खर्च होते हैं। हिंदुओंकी संख्या २४ करोड़ मानी जाय तो प्रत्येक हिंदूके हिस्सेमें महीनेभरमें सिर्फ दो पाई (एक पैसेका भी दो तिहाई भाग) आती है। बूढ़ी और असहाय गो-माताके लिये हिंदुओंका यह नन्हा-सा दान क्या अनुपयोगी है? क्या हेय और घृणित है?
इसमें कोई संदेह नहीं कि विभिन्न कारणोंसे आज सभी पिंजरापोलोंकी दशा संतोषजनक नहीं है और यह भी सत्य है कि युग-परिवर्तनके साथ-साथ पिंजरापोलोंकी कार्य-पद्धतिमें भी उचित परिवर्तनकी आवश्यकता हो गयी है। पर यह कहना सर्वथा असंगत है कि पिंजरापोल और गोशालाएँ सर्वथा व्यर्थ और हानिकारक संस्थाएँ हैं। हाँ, मूल उद्देश्यकी रक्षा करते हुए उनको आर्थिक दृष्टिसे भी जितना उपयोगी और जितना स्वावलम्बी बनाया जा सके, उतना बनाना चाहिये। सुधारके लिये सदा ही तैयार रहना चाहिये; परंतु सुधारके नामपर संहार न हो जाय, इसकी सावधानी रखनी चाहिये। अवश्य ही नवीनताके मोह-मदमें अंधे होकर प्राचीनतामात्रकी जड़ उखाड़ने जाना जैसे बड़ी भूल है, वैसे ही प्राचीनताके नामपर अड़कर, धर्मसे अविरुद्ध नवीन उपयोगी पद्धतिको स्वीकार न करना भी कम भूल नहीं है।
कहते हैं भारतवर्षमें छोटे-बड़े सब मिलाकर लगभग २,५०० या ३,००० पिंजरापोल और गोशालाएँ हैं। इनको मुख्यत: तीन श्रेणियोंमें विभक्त किया जा सकता है। १—जिनके पास पर्याप्त संगृहीत धन और काफी आमदनी है, जिनका संचालन नियमितरूपसे सम्भ्रान्त सज्जनोंकी कमेटीद्वारा होता है और जिनमें कुछका रेजिस्ट्रेशन भी हो चुका है। २—जो आरम्भमें कुछ लोगोंके उत्साहसे स्थापित हो चुकी हैं; पर जिनके पास न तो धन है, न काफी आय है और न उत्तरदायी कार्यकर्ता ही हैं और ३—जिनकी पेशेवर लोगोंके द्वारा, पैसा कमानेके साधनके रूपमें स्थापना हुई है और इसी उद्देश्यसे जिनका येन-केन प्रकारेण संचालन भी हो रहा है।
इनमें तीसरी श्रेणीकी संस्थाएँ तो सभी दृष्टियोंसे सर्वथा अनुपयोगी और हानिकारक हैं। दूसरी श्रेणीकी संस्थाओंके लिये कहा जा सकता है कि सुयोग्य कार्यकर्ता मिलें और आमदनी हो तो उनका सुधार हो सकता है। वर्तमान स्थितिमें तो वे बहुत उपयोगी नहीं हैं। ऐसी संस्थाओंमें इस प्रकारकी हालत देखी जाती है कि जिस समय किसी अच्छे कार्यकर्ताके हाथमें काम हो और व्यापारीवर्गकी स्थिति अच्छी हो, उस समय तो काम ठीक-ठीक चलता है, पर जिन दिनों अच्छे कार्यकर्ता नहीं होते या व्यापार मंदा होता है और आवश्यक चंदा नहीं हो पाता, उन दिनों इनके पशु या तो भूखों मरते हैं या आधे पेट रहते हैं। पिछले अकालके समय कितनी ही गोशालाओंकी ऐसी दशा देखनेमें आयी थीं। परंतु पहली श्रेणीकी संस्थाओंके लिये भी यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें सभीका काम सुचारुरूपसे संचालित होता है। लोग पैसा तो दे देते हैं, पर समय नहीं दे पाते। जो सभापति, मन्त्री और कार्यकारिणीके सदस्य होते हैं, वे प्राय: केवल नामके ही होते हैं। समयके अभाव, दिलचस्पी न होने तथा गोपालनकी पद्धतिके अज्ञानसे वे कुछ भी नहीं कर पाते। बहुत-से तो जाते ही नहीं। जिनके जिम्मे प्रबन्धका भार रहता है, वे भी न तो अनुभवी होते हैं न क्रियाशील। इससे प्रबन्धमें त्रुटियाँ बनी ही रहती हैं। नयी उन्नतिकी बात तो सोचे ही कौन। पर्याप्त वेतन देकर सुयोग्य अनुभवी पुरुषोंको प्राय: नियुक्त किया नहीं जाता। कहीं कोई अनुभवी पुरुष रखे भी जाते हैं तो एक संस्थामें बीसों मालिक होनेसे उन्हें कार्य करनेका उचित अवसर या पर्याप्त सुभीता नहीं मिलता। नियम तथा प्रणालीमें भी समय तथा पशुपालन-विज्ञानकी जानकारीके अभावसे कोई खास सुधार नहीं किया जाता। ऐसी और भी कई बातें होती हैं, जिनके कारण व्यवस्था ठीक नहीं हो पाती और जितना लाभ होना चाहिये, उतना नहीं होता।
कसाइयोंके हाथोंसे गाय बचाना, अपंग और असहाय गायोंके जीवन-निर्वाहकी सुन्दर व्यवस्था करना और दूधवाली गायोंकी हत्या रोकनेके लिये सब प्रकारके उचित प्रयास करना आदि सभी आवश्यक कार्य हैं और धर्म हैं। परंतु सार्वजनिकरूपसे सच्ची गोरक्षा तो तभी सम्भव है, जब गौका दूध पर्याप्तमात्रामें बढ़ जायगा और गौमें बहुत मजबूत और बलवान् बछड़ा पैदा करनेकी शक्ति आ जायगी। पिंजरापोल और गोशालाएँ—इस दिशामें भी बहुत कुछ कार्य कर सकती हैं। मेरी समझसे पिंजरापोलों और गोशालाओंको अपनी-अपनी परिस्थितिके अनुसार नीचे लिखे कार्य करनेका प्रयत्न करना चाहिये—
(१) वृद्ध, अपंग, बीमार, दुर्बल और ठाँठ गाय, असहाय बैल और ऐसे ही बछड़े-बछड़ी आदिके पालन-पोषणकी पूरी व्यवस्था हो, जिसमें वे जीवनके अन्तिम श्वासतक सुखपूर्वक खा-पीकर रह सकें। गोजातिका ऋण तो उतर ही नहीं सकता, परंतु सच्ची कृतज्ञता प्रकट करने और मानव-हृदयकी बड़ी कोमल दयावृत्तिकी रक्षा करनेके लिये इसकी बड़ी आवश्यकता है।
(२) अच्छी जातिकी ऐसी गायोंको, जो चारे-दानेकी कमी और देख-रेखके अभावसे कमजोर होकर बिसुक गयी हों, चुनकर और उन्हें अलग रखकर अच्छी तरह खिलाया-पिलाया जाय और उनकी पूरी-पूरी देखभाल की जाय, जिससे वे बहुत उपयोगी और बड़े परिमाणमें दूध देनेवाली बन सकें। (राजस्थानके पिछले अकालके समय पाँच-पाँच रुपयोंमें अच्छी जातिकी बिसुकी हुई मरणासन्न गायें बिकी थीं, जो अच्छी तरह खिलाने-पिलानेपर प्रतिदिन १२ से १५ सेर दूध देने लगी थीं। ऐसी कुछ घटनाएँ मैंने स्वयं देखी-सुनी हैं।)
(३) एक अलग दुग्धालय-विभाग हो, जिसमें अच्छी जातिकी दुधार गायोंका—अपनी गायोंमें चुनकर, खरीदकर, बछड़ियोंको उत्तम गाय बनाकर—संग्रह किया जाय। घास-चारे और हवा-पानीके उचित उपयोग तथा अच्छे बलवान् साँड़ोंके संयोगसे उनमें और उनकी संततिमें दूध बढ़ानेका प्रयत्न किया जाय। वैज्ञानिक रीतिसे दूधके दुहनेसे लेकर उसके रूपान्तर करनेतक सावधानी रखी जाय। इन गायोंका दूध जनताको—खास करके बीमारों और बच्चोंके लिये उचित मूल्यपर बेचा जाय। जब गौओंकी संख्या अधिक हो जाय, तब उन्हें विश्वासी सद्गृहस्थोंको पालन करनेके लिये उचित मूल्यपर बेचा जाय; पर शर्त यह रहे कि जब गाय दूध देना बंद कर देगी, तब वे उसका पालन करेंगे और असमर्थताकी हालतमें हर किसीके हाथ न बेचकर पिंजरापोलको वापस दे देंगे।
(४) विश्वासी सद्गृहस्थोंको बैल बनानेके लिये बछड़े देकर बदलेमें बछड़ियाँ ले ली जायँ और उन्हें अच्छी दुधार गायें बनाया जाय।
(५) पिंजरापोलों और गोशालाओंमें अच्छी-बुरी सभी जातियोंके मजबूत और कमजोर गाय, बछड़े और साँड़ आदि प्राय: साथ-साथ रहा करते हैं। इससे बिलकुल कमजोर और अनुपयोगी गायें भी बरधायी जाती हैं और बहुत कमजोर निकम्मे साँड़ बरधानेका काम करते हैं। इसका फल यह होता है कि उनके बछड़े और बछड़ी बहुत ही कमजोर पैदा होते हैं। जो अच्छा चारा-दाना मिलनेपर भी रज-वीर्यके दोषके कारण अपनी हालत नहीं सुधार सकते, ऐसी बछड़ियाँ बहुत देरसे गाभिन होती हैं और ब्यानेपर थोड़े-से दिनोंतक बहुत थोड़ा दूध देती हैं और बछड़े इतने दुर्बल होते हैं कि वे साँड़ बननेयोग्य तो रहते ही नहीं—अच्छे बैल भी नहीं बन सकते। इस प्रकार, दोनों गृहस्थके लिये भाररूप होकर जीते हैं और दु:ख भोगते हैं। ऐसे कमजोर गाय-बैलोंसे दूधके उत्पादनकी शक्ति घटती है और तमाम संतति खराब हो जाती है। इसलिये ऐसी गायोंका और साँड़ोंका संयोग कभी हो ही नहीं—इस बातका पूरा खयाल रखना चाहिये।
(६) देशमें अच्छे साँड़ोंकी बहुत कमी हो गयी है। सरकारी अनुमान है कि जहाँ अच्छे ढाई सौ साँड़ चाहिये, वहाँ एक साँड़ है। इसलिये अच्छे-से-अच्छे साँड़ बनाये जायँ और पाले जायँ। उनमेंसे कुछको अपने इलाकेकी अच्छी गायोंके बरधानेके लिये सुरक्षित रखा जाय, जिससे उनकी नस्लमें सुधार हो। यदि प्रत्येक पिंजरापोल दस-बीस अच्छे-से-अच्छे साँड़ बनाकर जनताके उपयोगके लिये उन्हें समर्पित कर दे तो गो-जातिकी बहुत बड़ी सेवा हो सकती है।
(७) ऐसे असमर्थ सद्गृहस्थोंकी अच्छी जातिकी गाभिन गायोंको, जिन्होंने दूध देना बंद कर दिया है, पालन करनेके लिये कम खर्चपर पिंजरापोलोंमें ले लिया जाय और ब्यानेके बाद उन्हें वापस दे दिया जाय। इसी प्रकार असमर्थ गृहस्थोंके छोटे बछड़े-बछड़ियोंका भी पालन किया जाय। ऐसे गाय-बछड़ोंको कोई मालिक बेचना चाहें तो उन्हें पिंजरापोल अच्छी दुधार गाय और मजबूत बैल बनानेके लिये खरीद ले।
(८) पिंजरापोलोंके पास प्राय: जमीन होती ही है। नहीं तो, जमीनका प्रबन्ध किया जाय और उसमें उपयोगी घास-चारेकी खेती की जाय और प्रचुरमात्रामें घास-चारा उपजाया जाय।
(९) प्रतिवर्ष हरे घास-चारेको ठीक पद्धतिके अनुसार गड्ढोंमें दबाकर या कुप्पोंमें भरकर रखा जाय—Silage बनाये जायँ जिनसे सूखी मौसममें पशुओंको पुष्टिकर चीज खानेको मिल सके।
(१०) सूखे और हरे चारेका स्टाक किया जाय और काफी स्टाक होनेपर कम-से-कम दो वर्षके लिये अपनी आवश्यकताका सामान रखकर शेष उचित मूल्यपर गृहस्थोंको बेचा जाय।
(११) पर्याप्त गोचरभूमि हो, जिसमें संस्थाकी गायें तो चरें ही, उचित कीमतपर दूसरे लोगोंकी भी बिसुकी हुई गायें और बछड़ी-बछड़े वहाँ चर सकें।
(१२) गोबरको जलानेके काममें न लेकर वैज्ञानिक रीतिसे उसकी खाद बनायी जाय। इसी प्रकार गोमूत्रका भी खादके काममें उपयोग किया जाय। पिंजरापोलकी परती जमीनमें इस खादसे बहुमूल्य घास-चारा पैदा हो सकता है।
(१३) कृषि-सुधारके आवश्यक और सुविधासे काममें लेने लायक तरीकोंसे फल-फूल और साग भी उपजाया जाय और उसे बेचा जाय। गोबर-गोमूत्रकी खादसे इस खेतीमें भी बहुत लाभ हो सकता है।
(१४) पशुओंकी सफाई तथा स्वास्थ्यका, उनके शरीरपर किलनी—जूँ आदि कीड़े घर न कर सकें, इसका पूरा ध्यान रखा जाय। अंगहीन, बीमार, निर्बल, बलवान् पशुओंके लिये रहने और चरनेके अलग-अलग स्थान हों। ताकि न तो परस्पर रोग संक्रमण कर सके, न बलवान् पशुकी मारके डरसे निर्बल पशु भूखा रहकर मृत्युकी ओर अग्रसर हो। उन्हें धोने, नहलाने, पोंछने, उनमें जानवर न पैदा होने देने इत्यादिकी पूरी व्यवस्था रहनी चाहिये। इमारतें, मकान इस ढंगके बनाने चाहिये, जिनमें हवा और प्रकाश आता हो तथा जिनकी अच्छी तरह सफाई की जा सकती हो। कुएँ तथा सिंचाई आदिकी व्यवस्था लाभप्रद वैज्ञानिक ढंगसे हो।
(१५) अच्छे गोचिकित्सक (Veterinary Doctor)-को रखा जाय और साथ ही एक अस्पताल या दवाखाना रहे। बीमार पशुओंका सावधानीसे इलाज हो, जिस समय पशुओंमें कोई संक्रामक रोग फैलने लगे, उस समय यदि उन्हें दवाके जलसे नहलाने, प्रतिषेधक दवा या इंजेक्शन देनेकी पूरी व्यवस्था हो तो रोगका विस्तार सहज ही रुक जाय और बहुत-से पशुओंके प्राण अनायास ही बच जायँ।
कोई खास संक्रामक रोगसे पीड़ित गाय पिंजरापोलमें आवे तो उसे अलग रखकर इलाज कराना चाहिये, जिससे दूसरी गायोंपर उसका असर न हो। गायोंको भर्ती करते समय यदि गोशालाके डॉक्टर गायकी परीक्षा कर लिया करें तो सर्वोत्तम है।
(१६) प्रत्येक संस्थामें एक पशु-पालन-विज्ञानमें पारंगत जिम्मेवार वैतनिक पुरुष रहने चाहिये। पशुओंकी पहचान, उनके रखने और खिलाने-पिलानेकी व्यवस्था, सफल खेतीका प्रबन्ध, घास-चारेका संग्रह, हरे चारेके Silage बनानेकी व्यवस्था, स्वच्छता और सफाईका प्रबन्ध, सब चीजोंका अलग-अलग हिसाब और रजिस्टर रखने आदि सारे काम उन्हींके नियन्त्रण और देख-रेखमें होने चाहिये। वे पशु-चिकित्सामें भी दक्ष हों तो सबसे अच्छी बात है। वैसी हालतमें पशु-चिकित्साके लिये अलग डॉक्टर न रखकर एक सुयोग्य सहकारी रखनेसे भी काम चल सकता है।
(१७) पशु, घास-चारा, दुग्धालय, पशुओंकी जाति और उनके माता-पिता, पशुओंके जन्मपत्र और संस्थाके आय-व्यय आदिका ब्योरेवार विवरण रखना चाहिये।
(१८) नये पिंजरापोल, गोशालाएँ बनाये जायँ तो उनको शहरोंमें न बनाकर ऐसे स्थानोंमें बनाना चाहिये जहाँ खुली जगह हो। चारों ओर विस्तृत खेत हों। नदी-तट हो तो बहुत अच्छा है। नहीं तो, जलका पूरा प्रबन्ध तो अवश्य हो।