प्राच्य और पाश्चात्य संस्कृति
प्राच्य और पाश्चात्य संस्कृतिके ध्येयमें और ध्येयकी प्राप्तिके साधनोंमें बड़े महत्त्वके मौलिक अन्तर हैं। जिन्होंने इस विषयपर गम्भीरतासे सोचा है वे ही इस बातको समझ सकते हैं कि भौतिकवादकी इतनी उन्नतिमें भी आजका जगत् दु:खी और अशान्त क्यों है? और भौतिक सुखोंकी परवा न करनेवाले लोगोंके प्राचीन आध्यात्मिक युगमें जगत् सुखी और शान्त क्यों था? आज पाश्चात्य संस्कृतिका प्राधान्य है, इसीसे जगत् दु:खी और अशान्त है। उस युगमें प्राच्य संस्कृतिकी प्रधानता थी, इसीसे वह सुखी और शान्त था। पाश्चात्य संस्कृतिका ध्येय है ‘भोग’ एवं प्राच्य संस्कृतिका ध्येय है ‘त्याग’। भोगका अनिवार्य परिणाम है—‘द्वेष’, द्वेषका ‘दु:ख’ और दु:खका ‘अशान्ति’! उधर त्यागका अनिवार्य परिणाम है ‘प्रेम’, प्रेमका ‘सुख’ और सुखका ‘शान्ति’। भोगी मनुष्य भोगासक्त होता है, आसक्तिकी विरोधी वस्तुओंमें द्वेष होगा, जहाँ द्वेष है वहाँ दु:ख अनिवार्य है और जहाँ दु:ख है वहाँ अशान्ति रहती है! इसी प्रकार पक्षान्तरमें जहाँ त्याग होता है, वहीं प्रेम होता है। प्रेमकी अधिष्ठान भूमि है त्याग और प्रेमकी विनाशक भूमि है स्वार्थ! यह सबका अनुभूत तथ्य है कि जहाँ प्रेम है वहीं सुख है। प्रेमीके स्मरणमात्रसे आनन्द मिलता है और जहाँ सुख है, वहीं शान्ति है।
जहाँ ध्येय ‘त्याग’ होता है वहाँ जीवनमें केवल ‘कर्तव्य’ पालनकी प्रधानता होती है और जहाँ ध्येय ‘भोग’ होता है, वहाँ भोगप्राप्तिके ‘अधिकार’ की, यही प्राच्य और पाश्चात्य संस्कृतिकी जीवन-पद्धतिका मौलिक भेद है। जहाँ एक मनुष्य अपने कर्तव्यका पालन करता है, वहाँ दूसरोंके ‘अधिकार’ की अपने-आप ही रक्षा होती है और परस्पर सौहार्द तथा प्रेम भी बना रहता है।
पिताका ‘कर्तव्य’ है पुत्रका पालन-पोषण करना, उसे शिक्षा-दीक्षा देकर सुयोग्य बनाना; उसको सुन्दर, सदाचारी और आदर्श गृहस्थ बनाना और अपनी सारी सम्पत्ति उत्तराधिकारमें उसे दे देना। पुत्रका कर्तव्य है पिताके सुखके लिये अपना तन-मन अर्पण करना, उसकी सेवामें ही अपना सौभाग्य समझना और इसीको अपनी परम सम्पत्ति मानना एवं पितृकुलके यश-गौरवको अपने आदर्श आचरणोंके द्वारा बढ़ाना। यदि पिता और पुत्र दोनों अपने-अपने कर्तव्यका पालन करते हैं तो दोनोंके अधिकार अपने-आप सुरक्षित रहते हैं।
राजाका कर्तव्य है ‘प्रजाका हित’ करना; और प्रजारंजनके लिये बड़े-से-बड़े व्यक्तिगत सुखका त्याग करना। भगवान् रामके सर्वथा दोषरहित पवित्रहृदया सीताके त्यागमें यही रहस्य छिपा है। रामको सीताके त्यागसे कम मर्मवेदना नहीं थी, परंतु दूसरी ओर उन्हें प्रजारंजनरूपी ‘कर्तव्य’ के पालनसे संतोष था। वे सीताके वियोगमें स्वयं कारण बने, जीवनभर रोते रहे, पर इस मार्मिक दु:खको वरण किया केवल प्रजारंजनके कर्तव्यके लिये!
राजा अपना ‘अधिकार’ जतानेके लिये राज्य नहीं करता; वह राज्य करता है एक ट्रस्टीकी हैसियतसे, एक निपुण व्यवस्थापक और बलवान् रक्षककी हैसियतसे। वह प्रजासे न्यायसंगत ‘कर’ वसूल करता है और उसका अधिकांश भाग प्रजाहितके कार्यमें व्यवस्थापूर्वक वितरण कर देता है और प्रजाके चुने हुए लोगोंकी सलाहसे प्रजाहितका प्रत्येक कार्य करता है। अपनी सेवाके बदलेमें उसे सुखपूर्वक जीवननिर्वाहका—परिवार-पालनका साधन प्राप्त होता है, प्रजाके दिये हुए ‘कर’ से; परंतु प्रजा इसीमें राजाके ऋणसे उऋण नहीं होती। राजा अपनी प्रजाको अपनी संतान समझकर अपना समस्त जीवन देकर उसकी जैसी अनिर्वचनीय सेवा करता है, उससे प्रजा कृतज्ञ होकर उसकी भक्त बन जाती है और उसके ‘राज्याधिकार’ के लिये उसको राज्यारूढ़ करने तथा रखनेके लिये अपना बड़े-से-बड़ा त्याग करनेको तैयार रहती है। रामके साथ प्रजाका जो व्यवहार था उससे यह सिद्ध है। प्रजाका कर्तव्य यही होता है कि वह राजाको—वस्तुत: राम-सरीखे प्रजारंजक राजाको ही—वेणु या कंस-सरीखे राजा-नामधारी राक्षस-हृदय, प्रजाशोषक हत्यारोंको नहीं—भगवान् माने और उसकी सेवा करे। यदि राजा-प्रजा दोनों अपने-अपने कर्तव्यका पालन करें तो दोनोंके अधिकार सुरक्षित रहते हैं। राजा और राजवंश अकण्टक राज्यका ‘अधिकारी’ होता है और प्रजाको अपने सुखमय जीवनयापन तथा राज्यशासनमें सलाह देनेका ही नहीं, राजाको गद्दीसे उतारनेतकका अधिकार रहता है।
इसी प्रकार ‘स्वामी-सेवक’ ‘पूँजीपति मालिक और कार्यकर्ता मजदूर’ ‘जमीदार-किसान’ ‘गुरु-शिष्य’ ‘पति-पत्नी’ ‘सास-बहू’ ‘भाई-भाई’ ‘पड़ोसी-पड़ोसी’ और विभिन्न धर्मावलम्बी अपने-अपने ‘कर्तव्य’का पालन करें, तो सबके ‘अधिकार’ अपने-आप ही सुरक्षित रह सकते हैं। ‘कर्तव्य’ का ज्ञान शास्त्रके द्वारा होता है। वेदके आधारपर त्रिकालज्ञ ऋषि-निर्मित शास्त्रोंमें प्रत्येक वर्ण, जाति और व्यक्तिके कर्तव्य और आचारका विशद वर्णन है। प्राच्य आर्यसंस्कृतिके अनुसार किसीके भी ‘कर्तव्य’—निश्चयमें प्रधान बातें ये हैं—
(१) उस ‘कर्तव्य’-पालनसे किसी दूसरे राष्ट्र, जाति या व्यक्तिका परिणाममें कोई भी अहित नहीं होना चाहिये।
(२) किसीके भी न्यायप्राप्त अधिकार, स्वत्व या पदार्थको प्राप्त करनेकी जरा भी मनमें कामना नहीं होनी चाहिये।
(३) समाजकी सशृंखल व्यवस्थामें कोई अड़चन नहीं आनी चाहिये।
(४) उसमें मनुष्यकी ही नहीं, जीवमात्रके हितकी भावना होनी चाहिये।
(५) संयम, प्रेम, सत्य, दया और हितकी भावना होनी चाहिये।
(६) मनुष्य-जीवनमें भावी संततिके लिये परम आदर्शकी स्थापना होनी चाहिये।
(७) व्यक्तिगत जीवन (Private life) शास्त्रानुकूल अत्यन्त पवित्र, सबके लिये आदर्श और सर्वथा स्पष्ट होना चाहिये और उसपर टीका-टिप्पणी करनेका सबको अधिकार होना चाहिये, परंतु अपनी ओरसे किसीकी निन्दा करके उसे गिरानेका भाव नहीं होना चाहिये।
(८) कर्तव्यपालन दूसरेके सुख, सुमति, उत्थान, अभ्युदय और लौकिक कल्याणकी प्राप्तिके साथ ही भगवत्प्राप्तिरूप परम कल्याणके मार्गमें प्रवृत्त करनेके लिये होना चाहिये।
(९) उसका निश्चित फल अभ्युदय (लौकिक परम सुख-शान्ति) और नि:श्रेयस् (भगवत्प्राप्ति) होना चाहिये।
इन नौ सिद्धान्तोंकी मूल भित्तिपर राग-द्वेषशून्य ऋषियोंके द्वारा रचित विभिन्न व्यक्तियोंके विभिन्न ‘कर्तव्य’ ही धर्म हैं। इसीलिये प्राच्य संस्कृतिके अनुसार पुरुषार्थ-चतुष्टयमें अर्थ और काम (भोग)-के साथ धर्मका नित्य और अनिवार्य संयोग है। ‘अर्थ’ धर्मयुक्त हो और ‘भोग’ भी धर्मयुक्त हो तो उसका निश्चित फल है ‘मोक्ष’—क्लेश, कर्म और कर्मबन्धनसे आत्यन्तिक मुक्ति।
कर्तव्य प्रत्येक व्यक्तिके लिये अलग-अलग परंतु फल सबके लिये एक ही—‘अभ्युदय और नि:श्रेयस्’।
आज पाश्चात्य शिक्षा-दीक्षाकी प्रधानतासे भारतीय नर-नारी ‘कर्तव्य’ से ‘अधिकार’ के लिये लड़ रहे हैं। इसीलिये राजा-प्रजा, शासक-शासित, धनी-गरीब, पूँजीपति-मजदूर, जमींदार-किसान आदि वर्ग बने हैं और इनमें परस्पर संघर्ष हो रहे हैं। इन वर्गोंमें ही नहीं—गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र, पति-पत्नी आदिमें भी कलह है। सबके अलग-अलग संघ और यूनियन बन रहे हैं और सभी अपने-अपने ‘अधिकार’ के लिये लड़ रहे हैं। आजके ‘अधिकार’ की व्याख्या यही है कि ‘सर्वथा हमारा अधिकार हो, प्रतिपक्षीका कुछ भी न हो। हमारा ही हित हो, प्रतिपक्षीका चाहे अहित ही हो जाय।’ इसी ‘अधिकार-लिप्सासे आज समष्टि-समष्टि और व्यष्टि-व्यष्टिमें भीषण विनाशकारी संग्राम छिड़ा है। सभी लेना चाहते हैं, देना कोई नहीं चाहता और इसीको उन्नति, जागृति तथा ‘कर्तव्य’ भी मान बैठे हैं। जबतक यह ‘अधिकार’ की दूषित वृत्ति रहेगी, तबतक जगत्में कभी कहीं शान्ति न होगी। शान्ति तभी होगी, जब सभी राष्ट्र, सभी जाति और सभी व्यक्ति ‘अधिकार’ के लिये उद्विग्न न होकर विश्वहित अथवा पर-हितमें ही अपना हित मानकर ‘कर्तव्य’-परायण हो जायँगे; तब सभीको अपने-अपने अधिकार भी आप ही मिल जायँगे और तब जीवनका लक्ष्य ‘याग’ होनेसे सर्वत्र प्रेम, सुख और शान्तिकी भी चिरप्रतिष्ठा होगी। और इस प्रकारके आचरणोंसे भगवत्कृपाके दर्शन होंगे एवं उसके परिणाममें परम कल्याण भी प्राप्त होगा। भारतीयोंको अपनी संस्कृतिके इस मुख्य सिद्धान्तपर शीघ्र ध्यान देना चाहिये।