प्रेमयोग
(१)
श्रीकृष्ण द्वारिकामें थे। व्रजगोपियोंकी बात छिड़ते ही विह्वल हो उठते थे। पटरानियोंको इससे बहुत ईर्षा होती थी। इनकी ईर्षा भंग करनेके लिये भगवान्ने एक लीलाका अभिनय किया। नित्य निरामय भगवान् बीमार हो गये। बीमारी भी कठिन थी। वैद्यजीने ओषधिकी व्यवस्था की, अनुपान बतलाया ‘चरणरज।’ यह अनुपान कौन देता? चरणरजके लिये सभीसे पूछा गया। रुक्मिणी, सत्यभामा आदि सभी महिषियोंने नरकके डरसे चरणरज देनेकी बातपर मुँह मोड़ लिया। श्रीकृष्णको चरणरज देनेका दु:साहस कौन करता। देवर्षि नारदजीको भेजा गया विश्वके सभी देवी-देवताओंके पास। परंतु किसकी हिम्मत थी जो ऐसा दु:साहस करे। नारदजी म्लानमुख खाली हाथ लौट आये। भगवान्ने कहा, ‘एक बार व्रज जाकर तो शेष चेष्टा कर देखो।’ नारदजीको बात बहुत नहीं भायी। परंतु भगवान्का कहना था, व्रज जाना ही पड़ा। नारदजी हमारे श्यामसुन्दरके पाससे आये हैं, सुनकर पगली श्रीराधाजीके साथ व्रजांगनाएँ बासी मुँह ही दौड़ीं प्राणनाथकी कुशल पूछनेके लिये। नारदजीने श्रीकृष्णकी बीमारीकी बात सुनायी। गोपियोंके प्राण सूख गये। उन्होंने कहा—
‘क्यों, क्या वहाँ कोई वैद्य नहीं है?’
‘वैद्य भी हैं, दवा भी तैयार है; परंतु अनुपान नहीं मिलता’, नारदजीने कहा।
‘ऐसा क्या अनुपान है?’
‘अनुपान बहुत ही दुर्लभ है, तमाम जगत्में चक्कर लगा आया। है सभीके पास, पर कोई भी देना नहीं चाहता या दे नहीं सकता।’
‘कहिये, कहिये भगवन्! क्या वह अनुपान हमलोगोंके पास भी है? होगा तो हम जरूर ही देंगी,’ व्रजगोपियोंने व्याकुल होकर ऐसा कहा।
‘तुम नहीं दे सकोगी।’
‘उनको नहीं दे सकेंगी, ऐसी हमारे पास कोई वस्तु कैसे रह सकती है?’
‘अच्छा! क्या श्रीकृष्णको अपने चरणोंकी धूल दे सकोगी? इसी अनुपानके साथ दवा देनेसे उनका रोग नाश होगा।’
‘यह कौन-सी बड़ी कठिन बात हुई? लो, हम पैर बढ़ाये देती हैं, जितनी चाहिये चरणधूलि अभी ले जाओ,’ गोपियोंने सरलहृदय और उत्साहसे कहा। ‘अरी, करती क्या हो? क्या तुम यह नहीं जानती कि श्रीकृष्ण ‘भगवान्’ हैं, भगवान्को चरणधूलि दे रही हो? वे जगत्पति हैं, क्या तुम्हें नरकका भय नहीं है?’ नारदने आश्चर्यचकित होकर कहा।
‘नारदजी! हमारे मुक्ति-भुक्ति, स्वर्ग-नरक, जीवन-मरण, सुख-दु:ख, हँसी-रुलायी सब एक श्रीकृष्ण ही हैं। अनन्त नरकोंमें जाकर भी यदि हम श्यामसुन्दरकी देहको पुन: स्वस्थ और सबल पा सकें, तो हम ऐसे मनचाहे नरकका तो नित्य ही भजन करें। जानते नहीं नारदजी! हमारे लिये श्यामसुन्दरने अघासुर (अघ-असुर), नरकासुर (नरक-असुर) आदिको तो पहलेसे ही मार रखा है। हम न पाप जानती हैं और न नरक मानती हैं। हम तो जानती हैं सिर्फ हमारे श्यामसुन्दरके सुखको—लीलाविलासको। तुम्हारे सारे पापों और नरकोंको हमलोगोंने इस लीलाविलासके अंदर बदनमें मल लिया है। इसीसे तो हम जल-मर रही हैं। यह मरना ही हमारा जीवन है।’
नारदका वक्ष:स्थल पवित्र प्रेमधारासे धुल गया। नारदजीने गोपांगनाओंसहित श्रीश्रीराधारानीके चरणोंकी रज लेकर थोड़ी-सी तो अपने सब अंगोंमें लगायी और शेष बची हुईकी पोटली बाँध ली, विश्वेश्वरकी ऐश्वर्य-व्याधिके विनाशके लिये। गोपीपदरजके स्पर्शसे परमोज्ज्वल-तनु होकर जब नारदजी चरणधूलिकी पोटलीको मस्तकपर रखे द्वारिकामें पधारे, तब द्वारिकामें आनन्दकी लहर बह चली। चरणरजके अनुपानसे श्रीकृष्णने औषध ली और सहज ही निरामय हो गये। महिषियोंका मान भंग हो गया, उन्होंने आज प्रत्यक्ष प्रमाणसे गोपीप्रेमकी अपार अतलस्पर्शी गम्भीरता और मधुरिमाको देख लिया। और श्रीकृष्ण गोपियोंकी बात छिड़ते ही क्यों तन-मनकी सुधि भूल जाते हैं, इसका रहस्य भी उनकी समझमें आ गया! धन्य प्रेमयोग!
(उज्ज्वलभारत)
(२)
एक समय श्रीधाम द्वारिकामें भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजी रात्रिकालमें श्रीरुक्मिणी, सत्यभामा प्रभृति प्रधान अष्ट राजमहिषियोंके मध्य शयन कर रहे थे। स्वप्नावस्थामें आप अकस्मात् ‘हा राधे! हा राधे!’ उच्चारण करते हुए क्रन्दन करने लगे। जब अन्य किसी प्रकार प्रभुका क्रन्दन नहीं रुका तो बाध्य होकर महारानी श्रीरुक्मिणीदेवीने अपने प्राणवल्लभको चरणसंवाहनपूर्वक जाग्रत् किया। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र निद्राभंग होनेपर किंचित् लज्जित हुए और उन्होंने अति चतुराईसे अपना भाव गोपन कर लिया और पुन: निद्रित हो गये; परंतु इसका रहस्य जाननेके लिये महारानियोंके हृदयमें अत्यन्त व्यग्रता उत्पन्न हुई। सब परस्पर कहने लगीं, ‘देखो, हम सब सोलह सहस्र एक सौ आठ महिषी हैं और कुल, शील, रूप एवं गुणमें कोई भी अन्य किसी रमणीसे न्यून नहीं हैं; तथापि हमारे प्राणवल्लभ किसी अन्य रमणीके लिये इतने व्याकुल हैं, यह तो बड़े ही विस्मयकी बात है! रात्रिमें स्वप्नावस्थामें भी जिस रमणीके लिये प्रभु इतने व्याकुल होते हैं वह रमणी भी न मालूम, कितनी रूप-गुणवती होगी?’ इसपर श्रीरुक्मिणीदेवी कहने लगीं, ‘हमने सुना है कि वृन्दावनमें राधानाम्नी एक गोपकुमारी है, उसके प्रति हमारे प्राणेश्वर अत्यन्त आकृष्ट हैं; इसीलिये रूपलावण्यवैदग्ध्यपुंज नयनाभिराम श्रीप्राणनाथ हम सबके द्वारा परिसेवित होकर भी उस सर्वचित्ताकर्षक-चित्ताकर्षिणीके अलौकिक गुणग्राम भूल नहीं सके हैं।’ श्रीसत्यभामादेवी कहने लगीं, ‘सब ठीक ही है, तो भी वह एक गोप-कन्याके सिवा तो कुछ नहीं; फिर उसके प्रति हमारे प्राणकान्त इतने आसक्त क्यों हैं? अस्तु, जो कुछ भी क्यों न हो, हमारी सम्मतिमें तो इस सम्बन्धमें रोहिणीमाताको पूछनेपर ही इसका ठीक-ठीक पता लग सकेगा, क्योंकि उन्होंने स्वयं वृन्दावनमें वास किया है और उस समयकी सम्पूर्ण घटनाओंको वे भलीभाँति जानती हैं।’ यह प्रस्ताव सबको रुचा। रात्रि बीती, प्रात:काल हुआ। श्रीकृष्णचन्द्र प्रात:कृत्य समापन करके राजसभाको पधारे और यथासमय पुन: अन्त:पुर पधारकर स्नानादि करके समाधानपूर्वक भोजन करने बैठे। राजभोग सम्मुख आकर उपस्थित हुए, उद्धवादि सखावृन्दसहित प्रभुने भोजन किया और आचमन करके किंचित् विश्रामपूर्वक पुन: राजसभाको गमन किया। इस अवसरको पाकर महारानियोंने श्रीरोहिणीदेवीको पूर्वरात्रिकी घटना सुनाकर उनसे व्रज-वृत्तान्त पूछा। माताजी कहने लगीं, ‘प्यारी पुत्रियो! यद्यपि मैं व्रजलीलाकी सम्पूर्ण घटनाएँ जानती हूँ, किंतु माता होकर पुत्रकी गुप्त लीलाओंका रहस्य किस प्रकार कह सकती हूँ? यदि राम-कृष्ण यह कथा सुन लें तो फिर लज्जाकी सीमा न रहेगी।’ इसपर महिषीगण कहने लगीं, ‘माताजी! जिस किसी प्रकारसे भी हो सके, हमें व्रजलीलाकी कथा तो आपको अवश्य ही सुनानी होगी।’ माताजीने कहा—‘तब एक उपाय करो, सुभद्राको द्वारपर पहरेके लिये बैठा दो; कह दो, किसीको अंदर न आने दे; फिर मैं नि:संकोच तुम्हारे निकट व्रजलीलाका वर्णन करूँगी।’ माताजीने यह कहकर सुभद्राकी ओर देखा और कहा, ‘सुभद्रे! यदि राम-कृष्ण भी आयें तो उन्हें भी कदापि भीतर मत आने देना।’ माताजीका आदेश पालन किया गया। सुभद्रा ‘जो आज्ञा’ कहकर द्वार-रक्षा करने लगीं। महिषीवृन्द माताजीको चारों ओरसे घेरकर बैठ गयीं और माताजीने सुमधुर व्रजलीला वर्णन करना आरम्भ किया।
इधर राजसभामें राम-कृष्ण दोनों भाई चंचल हो उठे। जब किसी प्रकार भी राजसभामें नहीं ठहर सके, तब उत्कण्ठितचित्त होकर अन्त:पुरकी ओर चल पड़े। आकर देखते हैं कि सुभद्रादेवी द्वारपर खड़ी हैं। उन्होंने सुभद्रादेवीसे पूछा, ‘तुम आज यहाँ क्यों खड़ी हो? द्वार छोड़ दो, हमलोग भीतर जायँ।’ श्रीमती सुभद्रादेवीने कहा, ‘रोहिणी माँने इस समय तुम्हारा अन्त:पुरमें प्रवेश करना निषेध कर रखा है, अत: तुमलोग अभी भीतर नहीं जा सकोगे।’ यह सुनकर जब दोनों भाई आश्चर्यान्वित होकर इस निषेधका कारण ढूँढ़ने लगे, तब माताजीकी वह रहस्यपूर्ण व्रजलीलात्मक वार्ता उन्हें सुनायी दी। यह वार्ता श्रीवृन्दावनचन्द्रकी परमकल्याणमय, परमपावन, अद्भुत, मंगलरासविहारात्मक थी। सुनते-सुनते दोनों भाइयोंके मंगल श्रीअंगमें अद्भुत प्रेम-विकारके लक्षण दिखायी देने लगे। क्रमश: दोनों ही प्रेमानन्दमें विह्वल हो गये। अविश्रान्त प्रेमाश्रुकी मन्दाकिनीधारा प्रवाहित होकर दोनोंके गण्डस्थल एवं वक्ष:स्थलको प्लावित करने लगी। यह देखकर श्रीमती सुभद्रादेवी भी एक अनिर्वचनीय महाभावावस्थाको प्राप्त हो गयीं। जिस समय माताजी स्वामिनी श्रीवृन्दावनेश्वरीजीकी अद्भुत प्रेमवैचित्र्यावस्था वर्णन करने लगीं, उस समय श्रीबलरामजी किसी प्रकार भी धैर्य धारण न कर सके। उनके धैर्यका बाँध टूट गया, श्रीअंगमें इस प्रकार महाभावका प्रकाश हुआ कि उनके श्रीहस्त-पद संकुचित होने लगे और जब माताजी निभृत निगूढ़ विलास वर्णन करने लगीं तब तो श्रीकृष्णचन्द्रजीकी भी यही अवस्था हुई। दोनों भाइयोंकी यह अद्भुत अवस्था देखकर श्रीमती सुभद्रादेवीकी भी यही अवस्था हुई। तीनों मंगलस्वरूप ही महाभावस्वरूपिणी स्वामिनी श्रीवृन्दावनेश्वरीजीके अपार महाभावसिन्धुमें निमज्जित होकर ऐसी स्वसंवेद्यावस्थाको प्राप्त हो गये कि वे लोगोंके देखनेमें निश्चल स्थावर प्रतिमूर्तिस्वरूप परिलक्षित होने लगे। निश्चल, निर्वाक्, स्पन्दरहित महाभावावस्था! अतिशय मनोऽभिनिवेशपूर्वक दर्शन करनेपर भी श्रीहस्त-पदावयव किंचित् भी परिलक्षित नहीं हो सकते थे। आयुधराज श्रीसुदर्शनजीने भी विगलित होकर लम्बिताकार धारण कर लिया। पाठक! महाभावमयी, अशेषनायिकाशिरोमणि श्रीमती नित्य-निकुंजेश्वरी श्रीवृन्दावनेश्वरीजीके महाभावगौरवका तनिक विचार करें। कुछ कहनेको नहीं है, वाणी विराम प्राप्त होती है, सर्वात्मा गम्भीरतम महाभाव-जलधिमें डूब जाता है।
इसी समय स्वच्छन्दगति देवर्षि नारदजी भगवद्दर्शनके अभिप्रायसे श्रीधाम द्वारिकामें आ उपस्थित हुए। उन्होंने राजसभामें जाकर सुना कि राम, कृष्ण दोनों भाई अन्त:पुर पधारे हैं। देवर्षिजीकी सर्वत्र अबाधगति तो है ही; अन्त:पुरके द्वारपर जाकर उन्हें जो अद्भुत दर्शन हुए, उससे देवर्षिजी स्तम्भित हो गये। इस प्रकारका दर्शन उन्होंने पूर्वमें कभी नहीं किया था। निज प्राणनाथकी ऐसी अद्भुत अवस्थाके कारणका विचार करते हुए प्रेमविवश स्तम्भ-भावको प्राप्त होकर देवर्षिजी भी वहीं चुपचाप खड़े रह गये। कुछ ही क्षण पश्चात् जब माताजीने पुनर्बार किसी एक रसान्तरका प्रसंग उठाया तब उन सबको पूर्ववत् स्वास्थ्य-लाभ हुआ। सिद्धान्तत: रसान्तरद्वारा रसापत्तिका विदूरित होना संगत ही है। इसी अवसरपर महाभावविस्मित देवर्षि नारदजीने बहुविध स्तवस्तुति करना आरम्भ कर दिया। करुणावरुणालय श्रीभगवान् कृष्णचन्द्रने देवर्षिद्वारा स्तुत होकर प्रसन्नतापूर्वक कहा—‘देवर्षे! आज बड़े ही आनन्दका अवसर है, कहिये मैं आपका क्या प्रीति-सम्पादन करूँ?’ देवर्षिजीने कर जोड़ प्रार्थना की—‘प्रभो! वर्तमानमें यहाँपर उपस्थित होकर आप सबका जो एक अदृष्टाश्रुतपूर्व महाभावावेश परिलक्षित हुआ है, स्वरूपत: वह क्या पदार्थ है और किस प्रकार उस महावस्थाका प्राकट्य हुआ? कृपया सविशेष उल्लेख करके दासको कृतार्थ कीजिये। सर्वप्रथम तो सेवामें यही एकान्त निवेदन है।’ भक्तवत्सल श्रीभगवान् अमन्दहास्यचन्द्रिकापरिशोभित सुन्दर श्रीवदनचन्द्रमासे देवर्षि नारदजीके सर्वात्माको आप्यायित करते हुए इस प्रकार वचनामृतवर्षण करने लगे—‘देवर्षे! प्रात: तथा मध्याह्नकृत्यसमापनपूर्वक जिस समय हम दोनों भाई राजसभामें समासीन थे, उसी समय महिषीगणके द्वारा पूछे जानेपर माता रोहिणीदेवीने महाचित्ताकर्षिणी अपार माधुर्यमयी व्रजलीला-कथाकी अवतारणा की। महामाधुर्यशिखरिणी व्रजलीलावार्ताका ऐसा प्रभाव है कि हम जहाँ और जिस अवस्थामें भी हों, हमें वहींसे और उसी अवस्थामें ही आकर्षण करके वह कथास्थलपर खींच लाता है। हम दोनों भाई ऐसे ही आकर्षित होकर यहाँ उपस्थित हुए और देखा कि सुभद्राजी द्वारपालिकारूपमें द्वारपर खड़ी हैं। उत्कण्ठावश अन्त:प्रवेशकाम हम दोनों श्रीसुभद्राद्वारा रोके जानेपर प्रवेश-निषेधका कारण ढूँढ़ते रहे, उसी समय श्रीमाताजीके मुखारविन्दविगलित अत्यद्भुत व्रजलीलामाधुरीने कर्णगत होकर हमारे हृदय विगलित कर दिये। तत्पश्चात् जो अवस्था हुई उसका तो आपने प्रत्यक्ष दर्शन किया ही है। मेरी प्राणेश्वरी महाभावरूपिणी श्रीस्वामिनीजीके महाभावकर्तृक सम्पूर्ण भावसे ग्रसित होनेके कारण हम आपका पधारना भी नहीं जान सके।’ इतना कहकर भगवान्ने जब देवर्षिजीसे पुन: वरग्रहणका अनुरोध किया, तब देवर्षिजी प्रार्थना करने लगे—‘भगवन्! मैं और किसी वरका प्रार्थी नहीं हूँ, निजजनोंके सर्वाभीष्टप्रदाता-चरणयुगलमें केवल यही प्रार्थना है कि आप चारोंकी जो एक अत्यद्भुत महाभावावेशमूर्ति मैंने प्रत्यक्ष दर्शन की है, वही भुवनमंगल चारों स्वरूप जनसाधारणके नयनगोचरीभूत होकर सर्वदा इस पृथिवीतलपर विराजमान रहें। माया-सन्निपातमें ग्रस्त जीवसमूह एवं तद्दर्शनविरहकातर भक्तजनके लिये वह महासंजीवनीरसायन स्वरूपचतुष्टय सर्वोत्कर्षतासहित जययुक्त होवें।’ करुणायतन भक्तवांछापूर्णकारी श्रीभगवान्ने कहा—‘देवर्षे! इस विषयमें मैं पूर्वसे ही अपने दो अन्य परम भक्तोंके प्रति भी आपके प्रार्थनानुरूप ही वचनबद्ध हूँ—एक भक्तचूड़ामणि महाराज इन्द्रद्युम्न और द्वितीय परमभक्तिस्वरूपिणी श्रीविमलादेवी। निखिलप्राणिकल्याणहित भक्तचूड़ामणि महाराज इन्द्रद्युम्नकी घोरतर तपस्यासे प्रसन्न होकर मैं नीलाचल क्षेत्रमें दारुब्रह्मस्वरूपमें अवतीर्ण होकर जनसाधारणको दर्शन देनेका वर प्रदान कर चुका हूँ तथा महाविद्यास्वरूपिणी श्रीविमलादेवीद्वारा अनुष्ठित महातपस्यासे प्रसन्न होकर उनकी प्राणिमात्रको बिना विचार किये महाप्रसाद वितरण करनेकी प्रतिज्ञाको उक्त स्वरूपसे ही पूर्ण करनेकी स्वीकृति दे चुका हूँ। अतएव इन तीनों उद्देश्योंकी पूर्तिके लिये हम चारों इसी स्वरूपमें आगामी कलियुगमें लवणसमुद्रतटवर्ती नीलाचलक्षेत्रमें अवतीर्ण होकर प्रकाशमान रहेंगे।’ सर्वजीवकल्याणव्रत देवर्षि श्रीनारदजीने मनोवांछित वर प्राप्त करके प्रभुचरणारविन्दमें भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और मधुर वीणासे करुणावारिधि श्रीप्रभुके अमृतमय नामगुणमाधुरीका गान करते-करते यदृच्छागमन किया। श्रीराम-कृष्णने भी माताजीके कथांचित् संकोचकी आशंका करके उस स्थानसे प्रस्थान किया। ये ही मूर्तिचतुष्टय श्रीकृष्ण, बलराम, सुभद्रा एवं सुदर्शनरूपसे श्रीनीलाचलक्षेत्रको विभूषित करके अद्यापि विराजमान हैं।
(व्रजके एक महात्मा)
(३)
एक बार श्रीराधाजी अपनी सखियोंसहित सिद्धाश्रम नामक तीर्थमें स्नान करनेको गयीं। उसी तीर्थमें भगवान् श्रीकृष्ण भी अपनी सोलह हजार रानियों और रुक्मिणी, सत्यभामा आदि आठों पटरानियोंसहित पधारे। भगवान्की रानियाँ और पटरानियाँ भगवान्के श्रीमुखसे सदा ही श्रीराधाजी एवं श्रीगोपियोंके प्रेमकी प्रशंसा सुनती थीं। आज शुभ अवसर जानकर भगवान्की महिषियोंने श्रीराधाजीसे मिलनेकी इच्छा की और भगवान्की आज्ञा लेकर उनके साथ सब श्रीराधाजीसे मिलने गयीं। श्रीराधाजीको समस्त सखियोंसमेत भगवान्के दर्शनसे बड़ा ही सुख मिला। पश्चात् श्रीराधाजीने भगवान्की समस्त पटरानियोंका बड़ा ही सत्कार किया। बातचीतमें उन्होंने कहा, ‘बहिनो! चन्द्रमा एक होता है परंतु चकोर अनेक होते हैं, सूर्य एक होता है परंतु नेत्र अनेक होते हैं। इसी प्रकार हमारे प्रियतम भगवान् श्रीकृष्ण एक हैं और हम उनकी भक्त अनेक हैं।’
चन्द्रो यथैको बहवश्चकोरा:
सूर्यो यथैको बहवो दृश: स्यु:।
श्रीकृष्णचन्द्रो भगवांस्तथैको
भक्ता भगिन्यो बहवो वयं च॥
श्रीराधाजीके शील, स्वरूप, सौन्दर्य, गुण और व्यवहारका महिषियोंपर बड़ा ही प्रभाव पड़ा। वे आग्रह करके श्रीराधाजीको अपने डेरेपर लायीं और उनका यथासाध्य सबोंने बड़ा ही सत्कार किया। भोजनादिके उपरान्त रातको श्रीराधाजीको भगवान्की आज्ञासे श्रीरुक्मिणीजीने स्वयं दूध पिलाया। अनेक प्रकार प्रेमसंलाप होनेके अनन्तर श्रीराधाजी अपने डेरेपर पधार गयीं। भगवान् अपने शयनागारमें लेटे हुए थे। श्रीरुक्मिणीजी नित्यनियमानुसार वहाँ जाकर भगवान्के चरण दबाने बैठीं। चरणोंके दर्शन करते ही वे आश्चर्यमें डूब गयीं। उन्होंने देखा, भगवान्की तमाम चरणस्थलीपर फफोले पड़ रहे हैं। श्रीरुक्मिणीजीने अपनी संगिनी सब रानियोंको बुलाकर भगवान्के चरण दिखाये। सभी चकित और स्तम्भित हो गयीं। भगवान्से पूछनेकी हिम्मत किसीकी नहीं। तब श्रीभगवान्ने आँखें खोलकर सब रानियोंके वहाँ जमा होने और यों चकित रह जानेका कारण पूछा। श्रीरुक्मिणीजीने बड़ी ही नम्रताके साथ पैरके तलुओंमें फलोलोंकी बात कहकर भगवान्से ऐसा होनेका कारण पूछा। भगवान्ने पहले तो बातको टाल दिया, परंतु बहुत आग्रह करनेपर उन्होंने कहा—‘देखो— तुमलोगोंने श्रीराधाजीको जो दूध पिलाया था, वह गरम अधिक था। इसीलिये मेरे पैरमें फफोले पड़ गये।’ रानियोंकी समझमें बात नहीं आयी। उन्होंने पूछा, ‘दूध गरम था तो उससे श्रीमतीजीका मुँह जलता, आपके पैरके फफोलोंसे उसका क्या सम्बन्ध?’ भगवान्ने मुसकराते हुए कहा, ‘श्रीराधाजीके हृदयकी बात ही निराली है’—
श्रीराधिकाया हृदयारविन्दे
पादारविन्दं हि विराजते मे।
अहर्निशं प्रश्रयपाशबद्धं
लवं लवार्धं न चलत्यतीव॥
अद्योष्णदुग्धप्रतिपानतोऽङ्घ्रा-
वुच्छालकास्ते मम प्रोच्छलन्ति।
मन्दोष्णमेवं हि न दत्तमस्यै
युष्माभिरुष्णं तु पय: प्रदत्तम्॥
‘श्रीराधिकाके हृदयकमलमें मेरे चरणकमल दिन-रात प्रेमपाशमें बँधे विराजते हैं, एक क्षण या अर्ध क्षणको भी उस बन्धनसे छूटकर वे वहाँसे नहीं हट सकते। तुमने दूध जरा ठंडा करके नहीं दिया, बहुत गरम दे दिया और श्रीराधाजी उसे तुम्हारा दिया हुआ जानकर पी गयीं। दूध हृदयमें गया और मेरे चरण उससे जल गये, इसीसे फफोले पड़ गये।’
भगवान्के वचन सुनकर श्रीरुक्मिणीजी, सत्यभामाजी आदि सभी महारानियोंको बड़ा ही आश्चर्य हुआ और वे श्रीराधाजीके प्रेमके सामने अपने प्रेमको बहुत ही तुच्छ मानने लगीं।