पुरुषोत्तम-तत्त्व

विचार करनेपर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि श्रीमद्भगवद‍्गीताका प्रधान प्रतिपाद्य साध्यतत्त्व ‘पुरुषोत्तम’ है और उसके प्राप्त करनेका प्रधान साधन भगवान‍्की ‘अनन्य शरणागति’ या ‘पूर्ण समर्पण’ है। इसी परमतत्त्वके विवेचनमें प्रसंगानुसार गीतामें विविध अवान्तर तत्त्वोंकी और साधनोंकी आलोचना हुई है। जिस प्रकृति और पुरुषके संयोगसे भगवान‍् अपनेको अनन्त ब्रह्माण्डरूपमें प्रकाशित किये हुए हैं, वे ‘प्रकृति-पुरुष’ तत्त्व गीताके अनुसार भगवान‍्की अपनी ही ‘अपरा’ और ‘परा’ नामक दो प्रकृतियाँ हैं (गीता ७। ४-५)। ‘अपरा’ जड है और ‘परा’ चेतन है। इस चेतन परा प्रकृतिके द्वारा ही समस्त जगत् विधृत है। भगवान‍्की यह चेतन प्रकृति उनकी स्वरूपभूता महाशक्तिका ही अंश है।

तेरहवें अध्यायमें जिन प्रकृति-पुरुषका विवेचन है, वे प्रकृति-पुरुष यह अपरा और परा प्रकृति ही हैं; परंतु यह गीतोक्त पुरुष सांख्यका ‘नाना पुरुष’ नहीं है। यह भगवान‍्की जीवभूता चेतन प्रकृति है, जो लीलासे अनन्त जीवोंके रूपमें प्रतिभात होती है।

सांख्य इन दोनों तत्त्वोंको मूलत: पूर्णरूपसे पृथक् और उनके अविवेककृत संयोगके परिणामस्वरूप अनन्त विचित्र गुण-क्रियादियुक्त व्यक्त जगत‍्का उदय मानता है। सांख्यका सिद्धान्त है—पुरुष निर्विकार, निष्क्रिय, गुणातीत और चित् स्वरूप है; प्रकृति विकारशील, परिणामिनी, क्रियावती और त्रिगुणमयी है। पुरुष और प्रकृति दोनों सर्वथा विपरीत धर्मवाले दो पृथक्-पृथक् तत्त्व हैं। इनमें गुणमयी प्रकृति मूल-उपादान कारण है। उसीके परिणामसे जगत‍्के समस्त पदार्थोंकी अभिव्यक्ति हुई है, परंतु पुरुषके संयोग बिना प्रकृतिमें परिणाम नहीं होता और परिणाम हुए बिना जगत‍्की उत्पत्ति नहीं होती। व्यक्त जगत‍्में प्रकृतिका धर्म पुरुषपर और पुरुषका धर्म प्रकृतिपर आरोपित होता है। मूलत: दोनों पूर्णरूपसे पृथक् हैं। उनका संयोग अविवेकमूलक है और अनादिकालसे है। तत्त्व-विमर्शके द्वारा इनके पार्थक्यका पूर्ण ज्ञान हो जानेपर यह संयोग टूट जाता है, परंतु इससे जगत् मिट नहीं जाता। जिस पुरुषविशेषकी बुद्धिमें इस पार्थक्यकी यथार्थ अनुभूति होती है, उसके लिये जगत् नहीं रहता। वह पुरुष प्रकृतिके साथ सम्बन्धरहित होकर अपने नित्य शुद्धस्वरूपमें स्थित हो जाता है; यही मुक्ति है। अवशेष समस्त पुरुष प्रकृतिके साथ सम्बन्धयुक्त ही बने रहते हैं। इस प्रकार सांख्यदर्शन पुरुषोंकी अनन्तताका प्रतिपादन करता है।

वेदान्तका प्रचलित सिद्धान्त सांख्यकी इस तत्त्वविवेचनाको स्वीकार करता है, परंतु परमार्थत: नहीं। परमार्थकी स्थितिमें वह ब्रह्मके अतिरिक्त किसीका अस्तित्व स्वीकार नहीं करता। रज्जुमें सर्पकी भाँति समस्त विश्वको और विश्वकी सारी कर्मधाराको वह मिथ्या, अविद्या-सम्भूत और बिना हुए ही प्रतिभास होनेवाली बतलाता है। वेदान्त तीन सत्ता मानता है—१—पारमार्थिक, २—व्यावहारिक और ३—प्रातिभासिक। पारमार्थिक सत्तामें अर्थात् वास्तवमें एक ब्रह्म ही है। अन्य सबका अत्यन्ताभाव है। ब्रह्म मन-वाणीसे अतीत है। मायासे ब्रह्ममें स्पन्दन माना जाता है, इस स्पन्दनके उत्पन्न होनेपर व्यावहारिक और प्रातिभासिक सत्ताका आविर्भाव होता है। जाग्रत् में व्यावहारिक सत्ता और स्वप्नमें प्रातिभासिक सत्ता मानी जाती है। व्यावहारिक सत्तामें छ: पदार्थ हैं—ब्रह्म, ईश्वर, जीव, तीनोंका परस्पर भेद—अविद्या और अविद्याके साथ जीवका सम्बन्ध। व्यावहारिक सत्तामें ये सभी अनादि हैं। इनमें पाँच अनादि-सान्त हैं। एक ब्रह्म ही अनादि-अनन्त है। जीव और ब्रह्ममें स्वरूपत: कोई भेद नहीं है। सारा भेद उपाधिकृत है। अविद्याकी उपाधिवाला जीव, मायाकी उपाधिवाला ईश्वर और इन दोनोंसे सर्वथारहित ब्रह्म है। उपाधि अज्ञानमें है। व्यावहारिक और प्रातिभासिक सत्ता भी अज्ञानमें ही हैं।

परंतु गीता इन दोनोंसे विलक्षण कुछ नयी बात कहती है। गीताके सिद्धान्तके अनुसार जगत‍्की उत्पत्ति पुरुष-प्रकृतिके संयोगसे हुई है, यह सत्य है, परंतु गीताका वह पुरुष भगवान‍्की ही एक प्रकृति है और वह एक ही है। साथ ही ये ही (दोनों प्रकृति और पुरुष ही) परम तत्त्व भी नहीं हैं। इन दोनोंसे परे एक मूल तत्त्व और है और ये दोनों उसी तत्त्वके द्विविध प्रकाशमात्र हैं। इसीके साथ-साथ गीता स्पष्टरूपसे कहीं यह भी नहीं कहती कि ‘यह जगत् रज्जुमें सर्पकी भाँति सर्वथा अविद्याकृत है और बिना हुए ही भास रहा है। और अविद्या तथा मायाकी उपाधिसे जीव, ईश्वर तथा ब्रह्ममें व्यावहारिक भेद है।’ भगवान‍् विश्वको अपने सकाशसे अपनी अध्यक्षतामें अपनी ही प्रकृतिके द्वारा प्रादुर्भूत बतलाते हैं और अपने उसमें नित्य व्याप्त रहनेकी घोषणा करते हैं। यह नित्य परिवर्तनशील, अनन्त विचित्र शक्तियों और पदार्थोंसे तथा उनके संयोग-वियोग एवं प्रकाश-तिरोधानसे युक्त समस्त जगत् लीलामय भगवान‍्की ही अभिव्यक्ति है। जड अपरा प्रकृतिमें भगवान‍्का अक्षर और चिद्भाव पूर्णत: आवृत है और परा चेतन प्रकृतिमें वह निर्विकार, अक्षर, असंग और प्रकाशशील चित्स्वभाव पूर्णतया सुरक्षित है तथा भगवान‍्की स्वरूपभूता शक्तिके अंशरूप इसी चेतन परा प्रकृतिकी सत्ता और शक्तिद्वारा यह समस्त जगत् विधृत है। अर्थात् जगत् नहीं है ऐसा नहीं, जगत् है और वह भगवान‍्से भरा हुआ है। लीलासे अभिन्न लीलामय भगवान‍्का नित्य लीलाक्षेत्र है। अवश्य ही जो भगवान‍्को भूलकर, भगवान‍्को न मानकर केवल जगत‍्को देखते हैं, उनके लिये यह जगत् अत्यन्त भयंकर और दु:खमय है।

परंतु गीतोक्त ‘पुरुषोत्तम-तत्त्व’ केवल इस विश्वमें व्याप्त है, इतनी ही बात नहीं है, वह विश्वसे परे भी है। विश्व तो उसके ऐश्वर्ययोगके एक अंशमात्रमें है। वह अनन्त है, असीम है, अनिर्वचनीय है, अचिन्त्य है और नित्य अपनी महिमामें स्थित है। इस समस्त जगत‍्के अंदर और जगत‍्से परे जो सब तत्त्व हैं, वे समस्त तत्त्व इस पुरुषोत्तमकी ही अभिव्यक्ति हैं। सम्पूर्ण तत्त्वोंमें सर्वापेक्षा श्रेष्ठ, निर्लेप, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, चरम तत्त्व है—अक्षर ब्रह्म। गीतामें भगवान‍् पुरुषोत्तम स्पष्ट घोषणा करते हैं कि उस ‘ब्रह्म’ की प्रतिष्ठा भी मैं ही हूँ (१४।२७)। आठवें अध्यायमें जिन छ: तत्त्वोंका भगवान‍्ने विवेचन किया है और सातवें अध्यायके अन्तमें अपने समग्ररूपका प्रतिपादन करते हुए जिन तत्त्वोंके सहित अपनेको जाननेकी बात कही है, उन तत्त्वोंमें भी स्पष्टत: ‘अक्षर ब्रह्म’ का नाम आया है। भगवान‍्ने बतलाया है कि १—परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, २—मेरी अपरा प्रकृतिके साथ संलग्न निर्विकार परा प्रकृतिरूप जो मेरा भाव है वह ‘अध्यात्म’ है, ३—अपरा प्रकृति और उसके परिणामसे उत्पन्न समस्त भूतरूप मेरा क्षरभाव ही ‘अधिभूत’ है, ४—भूतोंका उद्भव और अभ्युदय—पुरुषद्वारा प्रकृतिके ईक्षणरूप अथवा संकल्परूप जिस विसर्गसे होता है, वही ‘कर्म’ है, ५—विराट् ब्रह्माण्डाभिमानी हिरण्यमय पुरुष ही ‘अधिदैव’ है, इसीको ब्रह्मा कहते हैं और ६—शरीरमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित विष्णुरूप मैं ही ‘अधियज्ञ’ हूँ। तथा अन्तकालमें भी जो पुरुष मेरे इस समग्र-स्वरूपका स्मरण करता हुआ शरीर त्यागकर जाता है, वह मेरे ही भावको प्राप्त होता है (गीता ८।३—५)।

गीताके ‘अहम्’,‘मम’,‘माम्’, ‘मे’, ‘मयि’, आदि अस्मत् पदोंसे और पूर्वापरका सारा विचार करनेसे यही सिद्ध होता है कि भगवान‍् श्रीकृष्ण ही गीताके पुरुषोत्तम तत्त्वके दिव्य मूर्तस्वरूप हैं। गीताकी सारी आलोचना इन्हींको लेकर हुई है और स्थान-स्थानपर नाना प्रकारसे इन्होंने अपनेको जगद‍्व्यापी, जगत्स्रष्टा, जगन्मय और जगत‍्से अत्यन्त अतीत परम तत्त्व घोषित किया है।

ये श्रीकृष्ण निर्गुण हैं या सगुण, निराकार हैं या साकार, ज्ञेयतत्त्व हैं या ज्ञाता, मायामय हैं या मायासे अतीत आदि प्रश्नोंका उत्तर युक्तियोंसे और प्रमाणोंसे देना तथा समझना सम्भव नहीं है। भगवान‍्की कृपासे ही भगवान‍्का कोई तत्त्व समझमें आ सकता है। गीताके अठारहवें अध्यायमें भगवान‍्ने स्पष्ट ही कहा है कि ‘ब्रह्मकी प्राप्तिके अनन्तर मेरी ‘परा भक्ति’ मिलती है और उस परा भक्तिके द्वारा मेरे यथार्थ स्वरूपका ज्ञान होता है’ (१८। ५४-५५)।

इतना होते हुए भी शास्त्रोंके और भगवान‍्के श्रीमुखसे निकले हुए वचनोंके आधारपर यह कहा जा सकता है कि वे प्रकृतिके गुणोंसे सर्वथा अतीत होनेपर भी अपने अचिन्त्यानन्त दिव्य गुणोंसे नित्य विभूषित हैं, प्राकृत क्रियाओंसे सर्वथा अतीत होनेपर भी नित्यलीलामय हैं और जड पांचभौतिक आकारसे सर्वथारहित होनेपर भी सच्चिदानन्दस्वरूप, हानोपादानरहित, देह-देहिभेदहीन, दिव्य देहसे नित्य युक्त हैं। भगवान‍् श्रीकृष्णने भगवान‍् शंकरजीसे स्वयं कहा है—

यदद्य मे त्वया दृष्टमिदं रूपमलौकिकम्।

घनीभूतामलप्रेम सच्चिदानन्दविग्रहम्॥

नीरूपं निर्गुणं व्यापि क्रियाहीनं परात्परम्।

वदन्त्युपनिषत्सङ्घा इदमेव ममानघ॥

प्रकृत्युत्थगुणाभावादनन्तत्वात् तथेश्वरम्।

असिद्धत्वान्मद‍्गुणानां निर्गुणं मां वदन्ति हि॥

अदृश्यत्वान्ममैतस्य रूपस्य चर्मचक्षुषा।

अरूपं मां वदन्त्येते वेदा: सर्वे महेश्वर॥

व्यापकत्वाच्चिदंशेन ब्रह्मेति च विदुर्बुधा:।

अकर्तृत्वात् प्रपंचस्य निष्क्रियं मां वदन्ति हि॥

मायागुणैर्यतो मेंऽशा: कुर्वन्ति सर्जनादिकम्।

न करोमि स्वयं किंचित् सृष्ट्यादिकमहं शिव॥

(पद्म०, पा० ५१।६६—७१)

‘शंकर! मेरे जिस अलौकिक रूपको आज आपने देखा है, वह विशुद्ध प्रेमकी घनमूर्ति है और सच्चिदानन्दस्वरूप है। उपनिषदोंके समुदाय मेरे इसी रूपको निराकार, निर्गुण, सर्वव्यापी, निष्क्रिय, परात्पर ब्रह्म कहते हैं। मुझमें प्रकृतिजन्य गुणोंका अभाव होनेसे और मेरे अंदर गुणोंकी सत्ताको असिद्ध मानकर वे मुझे ‘निर्गुण’ कहते हैं और अनन्त होनेसे मुझे ‘ईश्वर’ कहते हैं। और मेरा यह रूप प्राकृतिक नेत्रोंसे देखनेमें नहीं आता, इसलिये महेश्वर! ये समस्त वेद मुझे रूपरहित अर्थात् ‘निराकार’ कहते हैं। अपने चैतन्यांशसे सर्वव्यापक होनेके कारण पण्डितगण मुझे ‘ब्रह्म’ कहते हैं और इस विश्वप्रपंचका कर्ता न होनेसे वे मुझे ‘निष्क्रिय’ कहते हैं; क्योंकि शिव! स्वयं मैं सृष्टि आदि कुछ भी कार्य नहीं करता; ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररूप मेरे अंश ही मायाके गुणोंसे सृष्टि आदि कार्य करते हैं।’

यह भगवान‍्का निर्गुण, निराकार और सच्चिदानन्द स्वरूप है। इसी स्वरूपमें जो भगवान‍्की अभिन्नस्वरूपभूता महाशक्ति हैं, जिनका एक अंश परा प्रकृति है और जिनके न्यूनाधिक शक्तिसम्पन्न अनेकों छोटे-बड़े रूप हैं, जो सृष्टिके सृजन, पालन और संहारमें भगवान‍्के अंशावतार वस्तुत: अभिन्नस्वरूप त्रिदेवोंकी सहायता करती रहती हैं, वे मूलशक्ति श्रीराधाजी हैं। ये भगवान‍् श्रीकृष्णसे सर्वथा अभिन्न हैं, केवल लीलाके लिये ही एक ही भगवान‍्के इन दो रूपोंका प्रकाश है। देवर्षि नारदने श्रीराधाजीका स्तवन करते हुए कहा है—

तत्त्वं विशुद्धसत्त्वासु शक्तिर्विद्यात्मिका परा।

परमानन्दसन्दोहं दधती वैष्णवं परम्॥

कलयाश्चर्यविभवे ब्रह्मरुद्रादिदुर्गमे।

योगीन्द्राणां ध्यानपथं न त्वं स्पृशसि कर्हिचित् ॥

इच्छाशक्तिर्ज्ञानशक्ति: क्रियाशक्तिस्तवेशितु:।

तवांशमात्रमित्येवं मनीषा मे प्रवर्तते॥

माया विभूतयोऽचिन्त्यास्तन्मायार्भकमायिन:।

परेशस्य महाविष्णोस्ता: सर्वास्ते कला: कला:॥

आनन्दरूपिणी शक्तिस्त्वमीश्वरी न संशय:।

(पद्म०, पा० ४०।५३—५७)

‘आप ही तत्त्वात्मिका, विशुद्धसत्त्वमयी, भगवान‍्की स्वरूपाशक्ति एवं परा विद्या हैं। आप ही विष्णुके परमानन्दपुंजको धारण करती हैं (अर्थात् उनका आनन्दांश हैं)। आपकी एक-एक कलामें अत्याश्चर्यमय ऐश्वर्य भरा हुआ है; ब्रह्मा, रुद्र आदि महान् देवगण भी आपके स्वरूपको कठिनतासे जान सकते हैं। देवि! बड़े-बड़े योगीश्वरोंके ध्यानमें भी आप नहीं आतीं। मेरी बुद्धिमें तो यह आता है कि आप ही अखिल जगत‍्की अधीश्वरी हैं और इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति आपके ही अंश हैं। मायासे बालक बने हुए मायेश्वर भगवान‍् महाविष्णुकी जितनी भी अचिन्त्य मायाविभूतियाँ हैं, वे सब आपकी ही अंशांशरूपिणी हैं। आप ही आनन्दरूपिणी शक्ति हैं और आप ही परमेश्वरी हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।’

इस वर्णनसे यह बात भलीभाँति सिद्ध हो जाती है कि भगवान‍्की यह स्वरूपभूता शक्ति जगत‍्को अज्ञानसे ढक रखनेवाली जड ‘माया’ कदापि नहीं है। यह भगवान‍्की आनन्दस्वरूपा ह्लादिनी शक्ति है, इसीको लेकर भगवान‍् अवतरित हुआ करते हैं। यह अभिन्नशक्ति-शक्तिमान् स्वरूप ही ‘पुरुषोत्तम-तत्त्व’ है। इसी पुरुषोत्तम-तत्त्वके सम्बन्धमें देवी पार्वतीके प्रति भगवान‍् शंकरके ये वचन हैं—

यदङ्घ्रिनखचन्द्रांशुमहिमान्तो न विद्यते।

तन्माहात्म्यं कियद्देवि प्रोच्यते त्वं मुदा शृणु॥

अनन्तकोटिब्रह्माण्डे अनन्तत्रिगुणोच्छ्रये।

तत्कलाकोटिकोट्यंशा ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा:॥

सृष्टिस्थित्यादिना युक्तास्तिष्ठन्ति तस्य वैभवा:।

तद्रूपकोटिकोट्यंशा: कला: कन्दर्पविग्रहा:॥

जगन्मोहं प्रकुर्वन्ति तदण्डान्तरसंस्थिता:।

तद्देहविलसत्कान्तिकोटिकोट्यंशको विभु:॥

तत्प्रकाशस्य कोट्यंशरश्मयो रविविग्रहा:।

तस्य स्वदेहकिरणै: परानन्दरसामृतै:॥

परमामोदचिद्रूपैर्निर्गुणस्यैककारणै: ।

तदंशकोटिकोट्यंशा जीवन्ति किरणात्मका:॥

तदङ्घ्रिपंकजद्वन्द्वनखचन्द्रमणिप्रभा: ।

आहु: पूर्णब्रह्मणोऽपि कारणं वेददुर्गमम्॥

तदंशसौरभानन्तकोट्यंशो विश्वमोहन:।

तत्स्पर्शपुष्पगन्धादिनानासौरभसम्भव: ॥

तत्प्रिया प्रकृतिस्त्वाद्या राधिका कृष्णवल्लभा।

तत्कलाकोटिकोट्यंशा दुर्गाद्यास्त्रिगुणात्मिका:॥

(पद्म०, पा० ३८। ११२—१२०)

‘देवि! जिनके चरण-नखरूपी चन्द्रमाकी किरणोंकी भी अनन्त महिमा है, उन श्रीकृष्णकी अपार महिमाका कुछ अंश मैं वर्णन करता हूँ, उसे तुम प्रसन्न होकर सुनो। जिनमें त्रिगुणोंका ही अनन्त विस्तार है, ऐसे अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंमें अनन्त कोटि ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर हैं; वे सब उन्हीं परम महेश्वरकी कलाके करोड़वें अंश हैं। वे उन्हींके ऐश्वर्यांश हैं और सृष्टि, स्थिति आदि अधिकारोंसे युक्त होकर उन-उन ब्रह्माण्डोंमें स्थित हैं। उनके सौन्दर्यके करोड़ों अंश कामदेवके रूपमें उन-उन ब्रह्माण्डोंमें स्थित होकर जगत‍्को मोहित कर रहे हैं। सर्वव्यापी विभु उनके दिव्य मंगल-विग्रहकी दिव्य कान्तिका करोड़वाँ अंश है और उस ब्रह्मके प्रकाशके करोड़ों अंश उन-उन ब्रह्माण्डोंमें सूर्यमण्डलोंके रूपमें स्थित हैं, भगवान‍्के उस दिव्य प्रकाशके अंशांशरूप ये किरणमय रविमण्डल उन परम प्रकाशमय भगवान‍्के दिव्य विग्रहकी परमानन्दरूप, रसमय एवं अमृतमय, अलौकिक गन्धयुक्त, चिद्रूप एवं निर्गुण ब्रह्मके कारणभूत किरणोंसे ही जीवन धारण करते हैं और भगवान‍्के युगलचरणारविन्दके नखरूपी चन्द्रकान्तमणिकी प्रभाके समान प्रकाशवाले हैं। इन भगवान‍् श्रीकृष्णको पण्डितगण शुद्ध पूर्णब्रह्मका भी कारण और वेदोंके द्वारा भी दुष्प्राप्य कहते हैं। विश्वको मोहित करनेवाला नाना प्रकारके पुष्पोंका गन्ध तथा अन्य प्रकारके उत्तम गन्ध इन्हींके दिव्य अंगगन्धका करोड़वाँ अंश है। उनकी वल्लभा कृष्णकान्ता श्रीराधिका आद्या प्रकृति हैं। त्रिगुणमयी दुर्गादि देवियाँ उन्हीं श्रीराधाकी कलाके करोड़वें अंश हैं।’

यही परम ‘पुरुषोत्तम-तत्त्व’ है और सब धर्मोंका आश्रय छोड़कर एकमात्र इसीकी शरण ग्रहण करनी चाहिये।