सदाचार

धर्मराज युधिष्ठिरके पूछनेपर पितामह भीष्मने सदाचारका वर्णन इस प्रकार किया—

दुराचारी, दुष्ट चेष्टावाला, दुष्टबुद्धि और घोर दुष्ट कामोंके करनेमें साहसी मनुष्य ‘असत् पुरुष’ कहलाता है। इसके विपरीत सदाचारमें लगे हुए पुरुषको ‘सत्पुरुष’ कहते हैं। जो पुरुष राजमार्गमें (आम रास्तोंपर), गोशालामें और अन्नके ढेरके पास या अन्नसे भरे खेतमें मल-मूत्रका त्याग नहीं करते, नित्य प्रात:काल शौचादि क्रियाके बाद मिट्टी-जलसे भलीभाँति हाथ-पैर आदि धोकर नदीमें स्नान-आचमन कर शुद्ध जलसे पितरोंका तर्पण करते हैं, वे सत्पुरुष कहलाते हैं। जहाँ नदी न हो, वहाँ सरोवर, बावड़ी या कूएँपर स्नान करके तर्पण आदि नित्य-कर्म करने चाहिये। नित्य सूर्यका उपस्थान, सूर्योदय होनेपर न सोना, प्रात:काल पूर्वाभिमुख होकर और सायंकाल पश्चिमकी ओर मुख करके दोनों समय नियमसे संध्या-वन्दन करना, भोजनके समय दोनों हाथ, दोनों पैर और मुख धोकर पूर्वकी ओर मुख करके मौन धारणकर भोजनकी निन्दा न करते हुए सात्त्विक और रुचिकर पदार्थ खाना, भोजनके बाद हाथ धोकर उठना, रात्रिमें भीगे पैर न सोना—ये सभी सदाचार हैं। कल्याण चाहनेवाले पुरुषको मार्गमें आये हुए यज्ञशालादि पवित्र स्थान, बैल, देवता और गायोंके बैठनेके स्थान, चौरास्ते, ब्राह्मण, धर्मनिष्ठ मनुष्य और पवित्र वृक्षादिकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये और अतिथि, अपने नौकर और पोष्य वर्गके लिये भोजनमें कदापि पंक्तिभेद न करना चाहिये (अर्थात् अपने लिये अच्छा और इन सबको उससे हीन भोजन न देना चाहिये)। मनुष्यको उचित है कि प्रात:काल और सायंकाल दोनों समय सन्धिकालमें भोजन न करे। हवनके समय अग्निमें हवन करनेवाला और केवल ऋतुकालमें ही स्त्री-समागम करनेवाला पुरुष ब्रह्मचारी ही माननेयोग्य होता है। ब्राह्मणोंके भोजनके बाद अवशिष्ट—बचा भोजन माताके दूधके समान हितकारी होता है, इसलिये कल्याणकामी पुरुषोंको ऐसा ही भोजन करना चाहिये। वृथा मिट्टीको खुरचनेवाले, दाँतोंसे नख काटनेवाले, तिनका तोड़नेवाले और सर्वदा हाथ जूठे रखनेवालेकी आयु कम हो जाती है। मांसत्यागी पुरुषको कोई-सा भी मांस कभी नहीं खाना चाहिये और ऐसे हिंसायुक्त कोई भी कर्म नहीं करने चाहिये। अपने देशमें या परदेशमें कहीं भी अपने स्थानपर आये हुए अतिथिको भूखा नहीं रहने देना चाहिये। जीविकाके लिये उपार्जन किया हुआ हर-एक प्रकारका द्रव्य पिता आदि बड़ोंको समर्पण कर देना चाहिये। गुरुजन जब अपने पास आवें, तब खड़े होकर उन्हें उत्तम आसन देकर प्रणाम-पूजादिद्वारा उनका यथायोग्य सत्कार करना चाहिये। ऐसा आचरण करनेवाले मनुष्य दीर्घायु, यशस्वी और लक्ष्मीवान् होते हैं। उदय होते हुए सूर्यको और नंगी पर-स्त्रीको किसी भी कालमें नहीं देखना चाहिये। अपनी स्त्रीसे भी केवल ऋतुकालमें एकान्तमें समागम करना चाहिये। इसके सिवा न तो अपनी नग्न स्त्रीको देखना चाहिये और न उसके साथ एक शय्यापर सोना चाहिये और न स्त्रीके साथ एक थालीमें भोजन ही करना चाहिये। गुरु ही सब तीर्थोंका सार है और अग्नि सब पवित्र पदार्थोंका निचोड़ है। शिष्ट पुरुषोंके आचरण पवित्र हैं और गायकी पूँछके बालोंका स्पर्श किये हुए पदार्थ पवित्र माने जाते हैं। अपने परिचितोंसे मिलनेपर उनसे कुशल-समाचार पूछना और प्रात:-सायं ब्राह्मणोंको प्रणाम करना मनुष्यमात्रका कर्तव्य है। देव-मन्दिरमें, गायोंके बीचमें, ब्राह्मणोंके कर्मोंमें, वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें और भोजन करते समय द्विजोंको दाहिना हाथ ऊपर रखना चाहिये। सबेरे-शाम नित्य ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक पूजन करनेसे व्यापारियोंकी व्यापारमें उन्नति होती है, किसानोंकी खेती उत्तम होती है, धन-धान्यकी वृद्धि होती है और इन्द्रिय-तृप्तिकारक उत्तम पदार्थ प्राप्त होते हैं। ब्राह्मणको भोजन कराते समय यजमान अन्न परोसकर पूछे कि ‘ठीक है न?’ तब भोजन करनेवाला उत्तर दे कि ‘बहुत ठीक है’ जल देकर कहे ‘तृप्तिकारक है न?’ तब पीनेवाला कहे कि ‘सुतर्पणम्’ (बड़ा तृप्तिकारक है)। पायस आदि देकर कहे कि ‘अच्छी बनी है?’ तब ब्राह्मण कहे कि ‘सशृतम्’ (अच्छी बनी है)। हर एक रोगी मनुष्य हजामत बनवानेपर, छींक आनेपर, स्नान और भोजन करनेपर (सब पुरुष) ब्राह्मणोंको प्रणाम करें, यह प्रणाम आयु देनेवाला होता है। सूर्यके सामने बैठकर लघुशंका नहीं करनी चाहिये और अपने मलको नहीं देखना चाहिये। अपनेसे बड़ोंको न तो ‘तू’ कहना चाहिये और न उनका नाम लेकर ही पुकारना चाहिये। अपनेसे छोटे या समान अवस्थावालोंका नाम लेनेमें अथवा उन्हें ‘तू’ कहनेमें दोष नहीं है। पापी मनुष्योंका हृदय ही उनके पाप-कर्मोंको बता देता है, जो अपने किये हुए पापोंको जान-बूझकर महापुरुषोंके सामने छिपाते हैं वे निस्सन्देह पतित हो जाते हैं। अपने किये हुए पापोंको मनुष्य नहीं बतलाते तो क्या है, (अन्तरिक्षचारी) देवता तो उन्हें देखते ही हैं। अपने पापोंको गुप्त रखनेसे किया हुआ पाप-कर्म उलटा पापमें और प्रवृत्त करके मनुष्यके पापोंको बढ़ाता है और धर्मको गुप्त रखनेसे धर्मकी वृद्धि होती है। इसलिये धर्मको सदा गुप्त रखनेका प्रयत्न करना चाहिये और पापको कभी नहीं छिपाना चाहिये। किये हुए पापोंको मनुष्य भूल जाता है, परंतु वह धर्मविरुद्ध पाप करनेवाला यह नहीं जानता कि उसका वह पाप उसे वैसे ही ग्रस लेगा जैसे चन्द्रमाको राहु ग्रसे बिना नहीं छोड़ता। आशासे एकत्र किया हुआ धन बड़े ही दु:खसे भोगनेमें आता है। विद्वान् ऐसे धनसंग्रहके कार्यकी प्रशंसा नहीं करते और मृत्यु भी उसकी यह राह नहीं देखती कि उसने आशापूर्वक एकत्रित किये हुए धनका उपभोग किया है या नहीं। धर्मका आचरण शुद्ध मनसे होता है इसलिये मनसे सदा सबका भला मनाना चाहिये। धर्माचरण करनेमें दूसरेकी सहायता या साथकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिये। धर्म ही मनुष्योंकी जड़ है, धर्म ही स्वर्गमें देवताओंको अमर बनाता है। जो धर्माचरण करते हैं, वे मृत्युके अनन्तर भी नित्य सुख भोगते हैं।