सद‍्गुरु

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:॥

भारतीय साधनामें गुरु-शरणागति सर्वप्रथम है। सद‍्गुरुकी कृपा-बिना साधनाका यथार्थ रहस्य समझमें नहीं आ सकता। केवल शास्त्रों और तर्कोंसे लक्ष्यतक नहीं पहुँचा जा सकता। अनुभवी सद‍्गुरु साधन-पथके अन्तराय, उनसे बचनेके उपाय और साधनमार्गका उपादेय पाथेय बतलाकर शिष्यको लक्ष्यतक अनायास ही पहुँचा देते हैं। इसलिये श्रुतियोंसे लेकर वर्तमान समयके संतोंकी वाणीतक सभीमें एक स्वरसे सद‍्गुरुकी शरणमें उपस्थित होकर अपने अधिकारके अनुसार उनसे उपदेश प्राप्तकर तदनुकूल आचरण करनेका आदेश दिया है। सभी संतोंने मुक्तकण्ठसे गुरु-महिमाका गान किया है। यहाँतक कि गुरु और गोविन्द दोनोंके एक साथ मिलनेपर पहले गुरुको ही प्रणाम करनेकी विधि बतलायी गयी है; क्योंकि गुरुकी कृपासे ही गोविन्दके दर्शन प्राप्त करनेका सौभाग्य मिलता है। गुरुकी महिमा अवर्णनीय है। वे पुरुष धन्य हैं—बड़े ही सौभाग्यवान् हैं जिन्हें सद‍्गुरु मिले हैं और जिन्होंने अपना जीवन उनके आज्ञापालनके लिये सहर्ष उत्सर्ग कर दिया है।

वास्तवमें यथार्थ पारमार्थिक साधन सद‍्गुरुकी सन्निधिमें ही सम्भव है। कृपालु गुरुके कर्णधार हुए बिना साधन-तरुणीका विषय-समुद्रकी नभोव्यापिनी उत्ताल-तरंगोंसे बचकर उस पारतक पहुँच जाना नितान्त असम्भव है। इसलिये प्रत्येक साधकको सद‍्गुरुकी खोज करनी चाहिये और ईश्वरसे आर्तभावसे प्रार्थना करनी चाहिये कि जिसमें ईश्वरानुग्रहसे सद‍्गुरुकी प्राप्ति हो जाय; क्योंकि वास्तविक संत-महात्मा भगवत्कृपासे ही प्राप्त होते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि यदि सद‍्गुरुप्राप्तिकी अति तीव्र इच्छा हो तो स्वयं परमात्मा सद‍्गुरुरूपसे प्रकट होकर मुमुक्षु साधकको साधनपथ प्रदर्शितकर कृतार्थ कर सकते हैं। खोज मनसे होनी चाहिये और होनी चाहिये केवल तत्त्वज्ञ पुरुषको प्राप्तकर स्वयं तत्त्व समझनेके पवित्र उद्देश्यसे; परीक्षा या कौतूहलके लिये नहीं; क्योंकि सच्चे संत न तो परीक्षा दिया करते हैं, न परीक्षामें उत्तीर्ण होकर जगत‍्में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करने या प्रतिभाशाली व्यक्तियोंपर प्रभाव डालकर उन्हें शिष्य बनानेकी ही इच्छा रखते हैं। जो श्रद्धासे उनकी शरण होता है, उसीके सामने वे उसके अधिकारानुसार रहस्य प्रकट किया करते हैं। गोपनीय रहस्य अतपस्क, अश्रद्धालु, तार्किक, दोषान्वेषणकारी, नास्तिक और कौतूहलप्रिय मनुष्यके सम्मुख प्रकट करनेमें न तो कोई लाभ है और न संत-सुधीजन प्रकट किया ही करते हैं। भगवान‍्ने स्वयं श्रीमुखसे अधिकारकी मीमांसा कर दी है—

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥

‘यह जो परम गुप्त रहस्य तुझ अत्यन्त प्रिय मित्रको मैंने बतलाया है इसे तपरहित, भक्तिरहित, सुनना न चाहनेवाले और मेरी (भगवान‍्की) निन्दा करनेवाले लोगोंको भूलकर भी न बतलाना।’ इससे यह सिद्ध होता है कि यथार्थ संत-महात्मा पुरुष अधिकारीकी परीक्षा किये बिना गुह्य रहस्य प्रकट नहीं करते। अपनेको साधारण मनुष्य बतलाकर ही पिण्ड छुड़ा लिया करते हैं। लोग उन्हें असाधारण मानें, यह तो उनकी चाह होती नहीं और असली बात बतलानेका वे अधिकारी पाते नहीं, इसलिये स्वयं अनजान-से बन जाते हैं और वास्तवमें यह सत्य ही है कि ईश्वरका यथार्थ तथ्य ईश्वरके अतिरिक्त दूसरा जानता भी कौन है? अतएव तीव्र मुमुक्षा और श्रद्धाको साथ रखकर सद‍्गुरुका अन्वेषण करनेसे सद‍्गुरुकी प्राप्ति अवश्य हो सकती है, इसमें कोई सन्देह नहीं। संन्यासियों और गृहस्थोंमें आज भी अनेक सच्चे साधक और महात्मा हैं। सच्चे ऋषियोंका आज भी अभाव नहीं है, परंतु वे प्राय: अप्रकट रहते हैं। प्रकट रहनेवालोंको पहचानना भी बड़ा कठिन होता है; क्योंकि उनका बाहरी वेष तो कोई विलक्षण होता नहीं, जिससे लोग कुछ अनुमान कर सकें।

यह सब होते हुए भी श्रद्धाको मनमें पूरा स्थान देते हुए भी, आजकलके समयमें बहुत ही सावधानीकी आवश्यकता है। आज अवतारों, जगत्-गुरुओं, विश्वोपदेशकों (World-teachers), सद‍्गुरुओं, ज्ञानियों, योगिराजों और भक्तोंकी देशमें हाट लग रही है। ये सब दुर्लभ पद मोहवश आज बहुत ही सस्ते हो रहे हैं। ऐसे कई व्यक्तियोंके नाम तो यह लेखक ही जानता है, जिनकी खुल्लमखुल्ला अवतार कहकर पूजा की जाती है और वे उसको स्वीकार करते हैं। पता नहीं, ईश्वरके इतने अवतार एक ही साथ देशमें कैसे हो गये? आश्चर्य तो यह कि एक अवतार दूसरे अवतारको माननेके लिये तैयार नहीं है। ऐसी स्थितिमें ये अवतार वास्तवमें क्या वस्तु हैं? इस बातको प्रत्येक विचारशील पुरुष सोच सकते हैं। गुरु तो गाँव-गाँव और गली-गलीमें मिल सकते हैं, सब कुछ गुरुचरणोंमें अर्पण करनेमात्रसे ही ईश्वर-प्राप्तिकी गैरंटी देनेवाले गुरुओंकी कमी नहीं है; ऐसे हजारों नहीं, लाखों गुरु होंगे; परंतु दु:ख है कि इन गुरुओंकी जमातसे उद्धार शायद ही किसीका होता है। सद‍्गुरु तो वह है जो शिष्यके मनका अनन्त कोटिजन्म-संचित अज्ञान हरण करता है, जो शिष्यको सन्मार्गपर लगाता है, जो उसके हृदयमें परमात्माके प्रति सच्चे प्रेमके भावोंका विकास करवा देता है। जो अपनी नहीं, परंतु परमात्माकी—सर्वव्यापी सर्वभूतस्थित परमात्माकी पूजाका पाठ पढ़ाता है, जो शिष्यको यथार्थमें दैवी सम्पत्तिके गुणोंसे विभूषित देखना चाहता है, जो निरन्तर इस प्रयत्नमें लगा रहता है कि शिष्य किसी प्रकारसे भी कुमार्गमें न जाने पावे, जो पद-पदपर उसे सावधान करता है और कुपथसे बचाता है, जो त्याग और सदाचार सिखाता है, जो निर्भय होकर विश्वरूप भगवान‍्की सेवा करना बतलाता है, जो स्वयं अमानी होकर शिष्यको मानरहित होना और स्वयं काम, क्रोध, लोभसे छूटकर शिष्यको उनसे बचना सिखाता है एवं जो अपने बाहर और भीतरके सभी आचरणोंको ऐसा स्वाभाविक पवित्र रखता है, जिसका अनुकरणकर शिष्यका हृदय पवित्रतम बन जाता है। वास्तवमें ऐसा ही पुरुष परमात्माको पा सकता है और दूसरोंको भी परमात्माकी प्राप्तिके पथपर आरूढ़ करवा सकता है। भगवान‍्ने कहा है—

निर्मानमोहा जितसंगदोषा

अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा:।

द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु:खसंज्ञै-

र्गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत् ॥

(गीता १५।५)

तद‍्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा: ।

गच्छन्त्यपुनरावृतिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा:॥

(गीता ५।१७)

‘जिनके हृदयमें मान-मोह नहीं है, जिन्होंने आसक्तिके दोषपर विजय प्राप्त कर ली है, जो नित्य परमात्माके स्वरूपमें स्थित रहते हैं, जिनकी लौकिक-पारलौकिक कामनाएँ भलीभाँति नष्ट हो गयी हैं, जो सुख-दु:ख नामक द्वन्द्वोंसे सर्वथा छूट गये हैं, ऐसे बुद्धिमान् पुरुष ही उस अव्यय परमपदको प्राप्त होते हैं।’

‘जिनकी बुद्धि परमात्मरूप हो गयी है, जिनका मन परमात्मरूप है, जिनकी निष्ठा केवल परमात्मामें ही है, जो केवल परमात्माके ही परायण हैं, ऐसे ज्ञानके द्वारा पापरहित हुए पुरुष ही अपुनरावृत्तिरूप परमगतिको प्राप्त होते हैं।’

भगवान‍्ने इसी प्रकारके तत्त्वदर्शी ज्ञानियोंकी शरणमें जाकर प्रणिपात, सेवा और निष्कपट प्रश्नोंद्वारा ज्ञान प्राप्त करनेके लिये उपदेश दिया है।

इसके विपरीत जो कुछ भी नहीं जाननेपर भी ‘सब जाननेवाले’ बननेका दम भरते हैं, जो ‘सोनेकी चिड़िया’ फाँसनेके लिये सदा-सर्वदा ही मिथ्या मधुर भाषण और व्यवहारका जाल बिछाये रखते हैं, जो पूजा करानेके लिये पैर फैलाते तनिक भी संकुचित नहीं होते, जो धन लेकर कानमें मन्त्र फूँकते और ईश्वर-प्राप्तिकी गैरंटी देते हैं, ‘बहुत ऊँचे आकाशमें उड़नेपर भी बाजकी दृष्टि सड़े मांसपर होती है’ इसी तरह जो बहुत ऊँची-ऊँची वेदान्त और भक्तिकी बातें बनाते रहनेपर भी अपनी पैनी नजर भक्तोंके धनपर रखते हैं, जो पापदृष्टिसे शिष्यकी माता, बहिन या स्त्रीकी ओर घूरते हैं, जो युवती शिष्याओंके कानोंमें मन्त्र देते, उनसे एकान्तमें मिलते और उनसे पूजा करवाते हैं, जो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण बतलाते हैं, जो चमत्कार दिखलाते हैं, जो अपने विरुद्ध मतवादियों और स्वार्थमें बाधा पहुँचानेवालोंको धमकाने, मारने या उनका अनिष्ट करनेका उपदेश करते हैं और जो सत्ताके लिये आचार्यका पद ग्रहण किये रहते हैं; ऐसे गुरुओंसे तो यथासाध्य बचना ही चाहिये। ऐसे लोग गुरुके वेषमें शिष्य और संसारको धोखा देनेवाले प्राय: पाखण्डी ही होते हैं, स्वयं नरकगामी होते और अनुयायियोंके लिये नरकका पथ साफ करते हैं। यों तो बाहरसे अच्छे बने हुए दम्भी मनुष्यकी भी सहजमें कोई पहचान नहीं हो सकती, दम्भी चालाक आदमी जीवनभर दम्भ रचकर लोगोंको धोखेमें डाले रख सकता है; परंतु यदि उसके पास रहने और उसकी बात मानने, सुननेसे अपने अंदर कोई बुरा भाव नहीं पैदा हो तो उससे इतना अनिष्ट नहीं हो सकता; यद्यपि उसके संगसे भी गिरनेका भय रहता है। सन्मार्ग मिलना तो असम्भव-सा ही है, परंतु यदि कोई मनुष्य सच्ची ईश्वर-प्राप्तिकी लालसासे ऐसे मनुष्यके फंदेमें फँस जाय, जो दम्भी हो और जिसके आचरण बाहरसे पवित्र हों और जिसके संगसे प्रकाश्यमें कोई बुराई न उत्पन्न होती हो तो परमात्मा उस सच्चे मनुष्यकी तबतक रक्षा करता है, जबतक कि वह आसक्तिके वश होकर दम्भमें सम्मिलित नहीं हो जाता।

जो लोग अपनी पूजा करवाते हैं, पूजा करनेको कहते हैं, पूजा करनेवालोंको अच्छा और न करनेवालोंको बुरा समझते हैं, अपनी पूजाके लिये उपदेश करते हैं, ‘गोविन्दसे गुरु’ ‘रामसे रामके दास’ बड़ेका उदाहरण देकर अपनेको भगवान‍्से बड़ा बतलाकर शिष्योंकी भक्ति खरीदना चाहते हैं, उनसे अवश्य सावधान रहना उचित है। सद‍्गुरु वास्तवमें अपनी पूजा नहीं चाहते। अवश्य ही उनके उच्च चरित्र, महान् त्याग और विलक्षण सद‍्गुणोंको देखकर लोगोंके मनमें उनके प्रति स्वयमेव पूज्यभाव उत्पन्न होता है, उनकी पूजा या भक्ति साधनमें सहायक होती है, शिष्य उनसे उपकृत होकर, उनके उपदेशोंसे और चरित्रानुकरणसे विशुद्ध-हृदय होकर कृतज्ञतासे उनके चरणोंमें लुट पड़नेकी इच्छा करता है, उन्हें भगवान‍् कहकर पुकारता है, परंतु वास्तवमें सद‍्गुरुकी यथार्थ पूजा बाहरी उपकरणोंसे कभी नहीं हो सकती, उनकी सच्ची पूजा उनके आज्ञापालन और उनके त्याग, प्रेम, भक्ति, ज्ञान, सद‍्गुण आदिके अनुकरणसे होती है। सद‍्गुरु शिष्यके द्वारा यदि कोई पूजन चाहता है तो वह यही चाहता है। इसके विपरीत शिष्यकी आत्मिक उन्नतिका कुछ भी खयाल न रख जो मान, बड़ाई, प्रतिष्ठाके भूखे रहते हैं, केवल अपने पैर पुजवाने और आरती उतरवानेमें ही जिनको प्रसन्नता होती है, वे कदापि सद‍्गुरु नहीं हैं। विशेषकर जो गुरुके आसनपर बैठकर धन और स्त्रीकी इच्छा करते हैं उनसे तो बहुत ही सावधान रहना चाहिये। भागवतमें कहा है कि सत्पुरुष धन और स्त्रियोंके संगियोंका संग भी दूरसे ही त्याग दें। इसके विपरीत, जो अपनेको सत्पुरुष मानते और कहलाते हुए भी कामिनी-कांचनमें आसक्त रहते हैं, उनको साधु मानना बहुत ही जोखिमका काम है। कुछ वर्षों पूर्व गोरखपुरमें एक विद्वान् संन्यासी आये थे, वे आठ सालसे सद‍्गुरुकी खोजमें थे। खेदकी बात है कि भाग्यवश उन्हें आरम्भसे ही बहुत कटु अनुभव होते गये, जिससे वे उस समय बहुत ही शंकाशील बन गये थे और ‘दूधका जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीता है’ इस कहावतके अनुसार वे हर जगह केवल सन्देह करते और श्रद्धा छोड़कर केवल परीक्षाके लिये ही जाते थे जिससे उनको यथार्थ सत्पुरुषका मिलना एक प्रकारसे कठिन-सा हो गया था, यहाँतक कि दैवी सम्पत्तिके गुणोंको भी वे कुछ-कुछ अव्यावहारिक मानने लगे थे। तथापि वे यथार्थमें बहुत ही सच्चे, सद‍्गुणी साधु प्रतीत होते थे। उन्होंने अपना कुछ अनुभव इस प्रकार सुनाया था—

पहले उन्हें एक त्यागी संन्यासी मिले, संन्यासीजी बड़े विद्वान् थे, बहुत-सी भाषाओंके जानकार थे, भारतवर्षमें भी उनकी जोड़ीके विद्वान् अँगुलियोंपर गिनने लायक होंगे। पढ़े-लिखे समुदायपर उनका बड़ा भारी प्रभाव था, संन्यासीजी बड़े भक्त मालूम होते थे, नारद-भक्तिसूत्र या श्रीभागवतका श्लोक पढ़ते-पढ़ते उनकी आँखोंसे आँसुओंकी अजस्र धारा बहने लगती थी और सचमुच उनकी भाव-समाधि हो जाया करती थी; परंतु यह सब कुछ होनेपर भी अन्तमें वे व्यभिचारी सिद्ध हुए। सम्भव है, वे पहले अच्छे साधक रहे हों, परंतु पीछेसे पूजा आरम्भ हुई, खानेको खूब माल-मलीदे मिलने लगे, स्त्रियोंका अबाधित संग हुआ, जिससे उनका पतन हो गया।

एक दूसरी जगह एक साधु, जो बाहरसे बड़े ही त्यागी मालूम होते थे, बड़े-बड़े लोग उनके पास जाया करते। वे अपनी झोलीमेंसे भस्मकी चुटकी सबको दिया करते। एक दिन चाय बनी। शिष्यने कहा, ‘महाराज! चीनी नहीं है।’ गुरुजी बोले, ‘नहीं सही, यह भस्मकी चुटकी ही डाल दो।’ झोलीमेंसे चुटकी भरकर चायमें डाल दी, चाय वास्तवमें मीठी हो गयी। स्वामीजीका चमत्कार देखकर सब मुग्ध हो गये। पीछेसे पता लगा—वे अपनी झोलीके एक भागमें भस्म और दूसरे भागमें ‘सैकेरिन’ (जिसमें चीनीसे कई सौ गुना मिठास होता है) रखते थे और राखकी जगह उसको डाल चमत्कार बतलाकर लोगोंको ठगा करते थे।

एक आश्रममें एक बड़े त्यागीके रूपमें रहनेवाले संन्यासी उपदंशके रोगसे पीड़ित मिले, ऊपरसे उनका व्यवहार देखकर उन्हें सभी लोग महात्मा समझते थे।

बंबईके एक प्रसिद्ध ज्ञानी भक्त कहलानेवाले महाराज, जो अपनेको एक बहुत बड़े आदमीका गुरु बतलाते थे, श्रद्धाके साथ अपने घर ले जानेवाले भक्तकी पत्नीका सतीत्व नाश करते पकड़े गये।

ऐसे अनेक उदाहरण उन्होंने दिये। बात भी यही है, आज कहीं ज्ञान और कहीं भक्तिके नामपर धन लूटा जाता है, तो कहीं सतीत्व हरण होता है; कहीं पूजा-प्रतिष्ठा करवायी जाती है, तो कहीं भोग-विलासकी सामग्री इकट्ठी की जाती है; सारांश यह कि आजके इन ज्ञानी भक्त कहलानेवाले रँगे सियार गुरुओंने धर्म-कर्मको चौपट कर दिया है। ऐसे पाखण्डी गुरुओं, भक्तों और ज्ञानियोंसे बचकर ही रहना चाहिये। एक ज्ञानी बने हुए व्यक्तिने मुझसे एक दिन कहा था, ‘भाई! काम-क्रोध तो इन्द्रियोंके धर्म हैं, जैसे मूत्र-त्यागका वेग आता है ऐसे ही शुक्र-त्यागका भी नैसर्गिक वेग आता है। जब वह वेग आवे, तब किसी भी स्त्रीके प्रति उस वेगको निवारण कर ले, इससे ज्ञानमें क्या हानि होती है? इन्द्रियोंका धर्म तो इन्द्रियोंमें रहेगा ही।’ एक भक्त ने एक सज्जनसे कहा था, ‘भाई! चलो वृन्दावनमें रहो, वहाँ रहकर चोरी, व्यभिचार भले ही करो, कोई हर्ज नहीं, वहाँ रहनेमात्रसे ही उद्धार हो जायगा।’ सम्भव है, यह उनकी शुद्ध भावना हो, परंतु ऐसे विचार और भावनाओंने ज्ञान और भक्तिको कलंकित अवश्य ही कर दिया! विचारसागरके दो-चार दोहे याद करने या श्रीराम-कृष्णके नामपर दम्भसे दो-चार बूँद आँसू बहा देनेसे ही ज्ञानी या भक्त नहीं हुआ जाता। ज्ञानी और भक्त बनना बहुत ही टेढ़ी खीर है। ब्रह्मज्ञानकी तीक्ष्णधार तलवारसे जो आसक्ति और वासनाका समूलोच्छेदन कर डालता है, वह ज्ञानी हो सकता है और जो भगवत्-प्रेमकी धधकती हुई अग्निमें कूदकर अहंकारसहित अपना सर्वस्व फूँक डालता है, वह भक्त बन सकता है। ज्ञानी और भक्तमें दैवी सम्पत्तिके गुण स्वाभाविक ही प्रकट हो जाते हैं। ज्ञानी और भक्त होकर दैवी सम्पत्तिके गुणोंसे शून्य रहना वैसे ही असम्भव है जैसे मध्याह्नसूर्यके प्रचण्ड प्रकाशमें खुले मैदानमें अन्धकारका रहना। भगवान‍् श्रीकृष्ण ज्ञानके बीस साधन इस प्रकार बतलाते हैं—

अपनेमें श्रेष्ठताका अभिमान न रखना, दम्भका सर्वथा त्याग करना; अहिंसाका पालन करना; अपना अनिष्ट करनेवालेका भी दोष क्षमा कर देना; मन, वाणी, शरीरसे सरल रहना; श्रद्धा-भक्तिसहित आचार्यकी सेवा करना, बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना, मनको स्थिर रखना; बुद्धि, मन, इन्द्रिय और शरीरको वशमें रखना; इस लोक और परलोकके सभी भोगोंसे वैराग्य हो जाना, अहंकार न रहना, जन्म-जरा-रोग-मृत्यु आदि दु:ख तथा दोषोंको ध्यानमें रखना; स्त्री, पुत्र, धन, भवन आदिमें मनका न फँसना; किसी भी वस्तुमें ‘मेरापन’ न रहना, प्रिय-अप्रियकी प्राप्तिमें चित्तका सदा सम रहना, परमात्माकी अनन्य भक्ति करना, शुद्ध एकान्त देशमें साधनके लिये रहना, सांसारिक जनसमुदायसे रागरहित होना, परमात्मा-सम्बन्धी ज्ञानमें नित्य संलग्न रहना, तत्त्व-ज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सदा-सर्वत्र देखना। (गीता अ० १३। ७—११)

ये तो ज्ञानके साधन हैं, इन साधनोंमें लगे रहनेसे तत्त्व-ज्ञानकी प्राप्ति होती है। जब साधनोंमें ही पापका विनाश और दैवी सम्पत्तिका विकास है, तब सिद्ध ज्ञानीमें तो पाप, दुराचार या कामिनी-कांचनके प्रलोभनकी सम्भावना ही कहाँ है? ज्ञानके साधकके सम्बन्धमें भगवान‍्ने कहा है—

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।

सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धय:।

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:॥

(गीता १२। ३-४)

‘जो ज्ञानके साधक इन्द्रियोंके समुदायको भलीभाँति वशमें करके अचिन्त्य, सर्वव्यापी, अनिर्देश्य, कूटस्थ, ध्रुव, अचल, अव्यक्त, अक्षर ब्रह्मकी भलीभाँति उपासना करते हैं और सबमें सर्वत्र सम-भावयुक्त होकर प्राणिमात्रका हित करते रहते हैं, वे मुझको (ब्रह्मको) प्राप्त होते हैं।’

ज्ञानके साधकके लिये ही जब इन्द्रियसमुदायको वशमें कर लेना, हानि-लाभ, जय-पराजय, मान-अपमान, जीवन-मृत्यु, देवता-मनुष्य, सबमें सर्वत्र समबुद्धि होना और सर्वभूतोंके हितमें रत रहना अनिवार्य है, तब ज्ञानस्वरूप सिद्धकी तो बात ही क्या है? उसमें वे सद‍्गुण स्वाभाविक ही होने चाहिये। इसी प्रकार साधक भक्तके उद्धारका जिम्मा लेते हुए भगवान‍् कहते हैं—

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परा:।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।

भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥

(गीता १२। ६-७)

‘जो साधक मुझ भगवान‍्के परायण होकर सारे कर्म मुझमें अर्पण करके अनन्ययोगसे केवल मेरा ही ध्यान-भजन करते हैं, हे अर्जुन! उन मुझमें भलीभाँति चित्त लगानेवाले भक्तोंका मैं इस मृत्युरूप संसार-सागरसे शीघ्र ही उद्धार कर देता हूँ।’

यह भक्तिके साधककी बात है, प्रेमी भक्तके लक्षण तो भगवान‍् इस प्रकार बतलाते हैं—

जो किसी भी प्राणीसे द्वेष नहीं करता, जो सबके साथ मित्रताका व्यवहार करता है, जो बिना किसी भेदभावके दु:खी जीवोंपर सदा दया करता है, जो परमात्माके सिवा किसी भी वस्तुमें ‘मेरापन’ नहीं रखता, जो ‘मैं’पनको त्याग देता है, जो सुख-दु:ख दोनोंमें परमात्माको समभावसे देखता है, जो अपना बुरा करनेवालेका भी भगवान‍्से भला मनाता है, जो लाभ-हानि, जय-पराजय, सफलता-विफलतामें सदा संतुष्ट रहता है, जो अपने मनको परमात्मामें लगाये रखता है, जो मन-इन्द्रियोंको जीत चुका है, जो परमात्मामें या अपने ध्येयमें ढृढ़ निश्चय रखता है, जो अपने मन-बुद्धिको परमात्माके अर्पण कर देता है, जो किसीके भी उद्वेगका कारण नहीं बनता, जो किसीसे भी उद्वेगको प्राप्त नहीं होता, जो सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्तिमें कोई आनन्द नहीं मानता, जो दूसरेकी उन्नति देखकर नहीं जलता, जो सदा सर्वत्र निर्भय रहता है, जो किसी भी स्थितिमें उद्विग्न नहीं होता, जो किसी भी वस्तुकी आकांक्षा नहीं करता, जो बाहर-भीतरसे सदा पवित्र रहता है, जो भगवान‍्की भक्ति करने और अपने दोषोंका त्याग करनेमें दक्ष है, जो पक्षपातरहित है, जो किसी भी अवस्थामें व्यथित नहीं होता, जो सब कर्मोंका आरम्भ परमात्माकी लीलासे ही होता है—ऐसा मानता है, जो भोगोंको पाकर फूलता नहीं, जो भोगोंके नाश हो जानेपर रोता नहीं, जो अप्राप्त या नष्ट भोगोंको पुन: प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं करता, जो शुभाशुभ कर्मोंका फल नहीं चाहता, जो शत्रु-मित्रमें समभाव रखता है, जो मानापमानको एक-सा समझता है, जो सर्दी-गरमीमें सम रहता है, जो सुख-दु:खको समान समझता है, जो किसी भी वस्तुमें आसक्ति नहीं रखता, जो निन्दा-स्तुतिको समान समझता है, जो परमात्माकी चर्चाके सिवा दूसरी बात नहीं करना चाहता, जो परमात्माके प्रेममें मस्त होकर अपनी स्थितिमें संतुष्ट रहता है, जो घर-द्वारमें ममता नहीं रखता, जो अपनी बुद्धिको परमात्मामें स्थिर कर देता है, जो भागवत-धर्मरूपी अमृतका सदा सेवन करता है, जो परमात्मामें पूर्ण श्रद्धा-सम्पन्न है और जो केवल परमात्माके ही परायण है (गीता अ० १२। १३ से २०) ऐसा पुरुष ही वास्तवमें भक्त है।

उपर्युक्त कसौटीमें जो खरे उतरते हैं, वे ही पूर्णज्ञानी या भक्त हैं, जो अधूरे हैं, पर आगे बढ़नेका प्रयत्न कर रहे हैं और इन लक्षणोंका विकास अपने अंदर बढ़ा रहे हैं, वे ही सच्चे साधक हैं। अन्यथा ‘अन्धेनैव नीयमाना यथान्धा:’ इस श्रुतिके अनुसार अन्धे गुरु अन्धे चेलोंकी जमातको साथ लेकर पापोंके गड़हेमें गिरते हैं।

यद्यपि इन सारे लक्षणोंसे युक्त पुरुषका मिलना परम दुर्लभ है और ऊपरके भावोंसे किसीको पहचानना भी अत्यन्त कठिन है, तथापि अपनी बुद्धिके अनुसार इतना ध्यान अवश्य रखना चाहिये कि जहाँ मान-बड़ाई और कामिनी-कांचनका लोभ नहीं है, वहाँ रहने और वैसे पुरुषका उपदेश माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। हर किसीको गुरु कभी नहीं बनाना चाहिये। गुरुको तो एक प्रकारसे अपना जीवन अर्पण कर दिया जाता है। जीवन-अर्पण बहुत ही सोच-समझकर करना कर्तव्य है। नाममात्रके गुरु-चेलोंसे कोई लाभ नहीं, हानि तो प्रत्यक्ष ही है।

इस बातसे निराश कभी नहीं होना चाहिये कि इस युगमें सद‍्गुरु हैं ही नहीं, सद‍्गुरुकी वास्तविक खोज ही कहाँ होती है? हमारे हृदयोंमें तीव्रतम पिपासा ही कहाँ है? तीव्र पिपासा हो तो लेखकका विश्वास है कि प्यास बुझानेवाले अमृत-समुद्र सद‍्गुरुकी प्राप्ति अवश्य ही हो सकती है।