सनातन-(विश्वमानव-) धर्मके ज्ञान, ग्रहण और प्रसारकी आवश्यकता
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण।
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्॥
(मुण्डकोपनिषद् २।२।११)
‘यह अमृतस्वरूप (मृत्यु, विकार, दु:ख, शोक आदिसे रहित नित्य सत्य पूर्ण परमानन्दघन) ब्रह्म ही इस विश्वके रूपमें लीला करता हुआ हमारे सामने, पीछे, दाहिने, बायें, नीचे, ऊपर—सर्वत्र प्रसरित हो रहा है। यह ब्रह्म ही सम्पूर्ण विश्वका सर्वश्रेष्ठ वरणीय सत्य स्वरूप है।’
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध: कस्य स्विद् धनम्॥
(शुक्लयजुर्वेद ४०। १—ईशावास्योपनिषद्)
‘इस अखिल विश्वजगत्में इन्द्रिय-मन-बुद्धि-गोचर और इसका अंगीभूत जो कुछ भी जड-चेतन जगत् है, वह सब एकमात्र ईश्वरसे व्याप्त है—उसका यथार्थ स्वरूप ईश्वर ही है। उस ईश्वरको साथ रखते हुए त्यागपूर्वक भोगते रहो, कहीं भी आसक्त मत होओ; धन—भोगपदार्थ किसका है?’
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:॥
(गीता ६। २९)
‘सर्वत्र समदृष्टि रखनेवाला योगयुक्त पुरुष सब (चराचर) भूतोंमें आत्माको और आत्मामें सब भूतोंको देखता है।’
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥
(गीता १०। ३९)
(भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनसे कहते हैं—) ‘अर्जुन! जो सब भूतोंकी उत्पत्तिका कारण है, वह भी मैं ही हूँ। ऐसा चराचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित (पृथक्) हो। यह सब मेरा ही (भगवान्का ही) स्वरूप है।’
खं वायुमग्निं सलिलं महीं च
ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।
सरित् समुद्रांश्च हरे: शरीरं
यत्किंच भूतं प्रणमेदनन्य:॥
(श्रीमद्भागवत ११। २। ४१)
‘आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, जीव, दिशा, वृक्ष, नदी, समुद्र और जो कुछ भी चराचर भूत है, सब हरिका शरीर है—ऐसा मानकर अनन्य भावसे सबको प्रणाम करे।’
इस प्रकारके असंख्य वचन हमारे वेद, उपनिषद्, पुराण, शास्त्रोंमें भरे हैं। और यह है हमारे पूतप्राण ऋषियोंका ‘अनुभूत सत्य’—उनकी ‘प्रत्यक्ष उपलब्धिका स्वरूप’। यही ‘सनातनधर्म’ है। यही ‘आर्य (हिंदू) संस्कृति’ है। भारतवर्ष इस पुण्य ‘सत्यदर्शन’ का आदिक्षेत्र है। इसीसे भारतका दर्शन-विज्ञान; साहित्य-कला; उसकी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, राष्ट्रीय, व्यावहारिक और शारीरिक आदि सारी नीति-पद्धतियाँ; उसके राष्ट्रका, जातिका, समाजका, कुलका और व्यक्तिका धर्म आदि सब कुछ इस ‘सनातनधर्म’ से ही अनुप्राणित है। इस धर्मको ही जीवनका परम आदर्श मानकर सारे सिद्धान्तों, मतों तथा नीति-नियमोंका निर्माण हुआ है। यही पवित्र ‘सनातनधर्म’ या ‘हिंदू-संस्कृति’ का स्वरूप है। एक ही शरीरके विभिन्न अंग-उपांगोंमें नाम, रूप तथा व्यवहारका भेद होते हुए भी जैसे सबमें एक ही आत्माकी नित्य निश्चित प्रत्यक्ष अनुभूति है, अत: सबका हित-साधन सहज स्वाभाविक है; वैसे ही विश्वके चराचर भूतमात्रमें राग-द्वेषरहित, हिंसा-घृणा-भय-शून्य, देहेन्द्रिय-मनकी अधीनतासे मुक्त, जाति-वर्ग-सम्प्रदायके भेदाभिमानजनित संकीर्णताओंसे सहज ही अतीत, शुद्ध मन, शुद्ध बुद्धि तथा चित्तके सरल भावसे एकमात्र दिव्य सत्य आत्माकी या भगवान्की अनुभूति और उसी अनुभूतिके आधारपर नित्य भ्रमप्रमादादिसे रहित समाहित-चित्तसे सहज ही सर्वकल्याणकर विचार-चिन्तन, व्यवहार-बर्ताव तथा आचार-क्रियाका होना—‘भारतीय हिंदू-संस्कृति’ या ‘सनातनधर्म’ का जीवन-दर्शन है।
हमारे इस अनादि नित्य सनातनधर्ममें, जिसे आत्मधर्म या ‘विश्वधर्म’ कह सकते हैं—जडमें चेतन, ससीममें असीम, सादिमें अनादि, सान्तमें अनन्त, अनेकमें एक, विभक्तमें अविभक्त, भेदमें अभेद तथा परायेमें अपना—‘पर’ में ‘स्व’ का प्रत्यक्ष बोध तथा दर्शन करानेकी शक्ति है। यही विश्वजनीन विश्वमानवधर्म—सनातनधर्म सारे संसारके प्राणिमात्रका लौकिक, पारलौकिक और पारमार्थिक कल्याण-साधन करनेमें समर्थ है।
इसी सनातनधर्मके परलोक, पुनर्जन्म तथा जन्म-जन्मान्तरमें कर्म-फल-भोगका सिद्धान्त ऋषियोंद्वारा प्रत्यक्ष अनुभूत तथा मान्य है, जिसके कारण मनुष्य दुष्कर्म करनेमें डरता है।
बड़े ही दु:खका विषय है कि आज इसी ‘सनातनधर्म’ ‘भारतीय आर्य (हिंदू-) संस्कृति’ की शिक्षाका अभाव ही नहीं हो रहा है, इसकी अवांछनीय अवहेलना और घोर तिरस्कार हो रहा है! इसीसे आज सर्वत्र मानवका ‘स्व’ अत्यन्त सीमित क्षेत्रमें संकुचित हुआ जा रहा है और क्षुद्र ‘स्व’ के हितकी भ्रमपूर्ण मिथ्या धारणासे राग-द्वेषका आश्रय लेकर मनुष्य एक-दूसरेका विनाश करनेपर तुल गया है! इसीसे मोहावृत और विलास-विभ्रमरत मानव आज क्षुद्र स्वार्थके पीछे—स्वहितकी मिथ्या धारणासे पर-हित-नाशका मानो व्रत लेकर स्वयमेव ‘आत्महत्या’ कर रहा है। और इसीसे वह अनर्गल अवैध यथेच्छाचारको कर्तव्य-सा मानकर मनमाना दुराचार कर रहा है। अध्यात्मरहित भौतिक विकासने, जो घोर विनाशका पूर्वरूप है, आज विश्वमानवके ज्ञाननेत्रोंपर मोहका आवरण डालकर उसे प्राय: दृष्टिहीन या विपरीतदर्शी बना दिया है। ‘अध्यात्म’ की लीलाभूमि भारत भी आज इस मोहसे आच्छन्न है। इसीसे ‘धर्मनिरपेक्ष’ (सेक्युलर) के नामपर ‘धर्मशून्य’-सिद्धान्तका पोषण करके वह मानवको पशु, पिशाच या राक्षस बनानेके अधम कार्य करनेमें प्रवृत्त है। शिक्षालयोंमें ‘धर्म-शिक्षा’ बंद है; छोटी उम्रसे लड़कियाँ तथा लड़के शिक्षाके नामपर उन शिक्षाक्षेत्रोंमें, शिक्षामन्दिरोंमें, विद्यालयोंमें भेजे जाने लगे हैं, जहाँ धर्मका नाम नहीं है, आचार-हीनताको गौरव दिया जाता है, प्रकारान्तरसे यथेच्छाचार, उच्छृंखलता एवं उद्दण्डताको उन्नतिका चिह्न बतलाया जाता है, गुरुजनोंका अपमान तथा बिना ही समझे-सोचे अपने धर्म, अपनी संस्कृति-सभ्यताके प्रति घृणा—कम-से-कम अवहेलना या उदासीनता करना सिखलाया जाता है। जहाँके दूषित वातावरणसे और सच्ची धार्मिक शिक्षाके अभावसे ‘सफाई’ के नामपर ‘शुद्धि’ का, ‘स्वतन्त्रता’ के नामपर ‘नियमानुवर्तिता’, अनुशासन’ और ‘संयमशीलता’ का, ‘सुधार’ के नामपर कुलपरम्परागत ‘सदाचार’ का, ‘प्रगति’ के नामपर ‘भोजनकी शुद्धि’ आदि सद्गुणोंका अबाध विनाश किया जा रहा है और ‘अभक्ष्य आहार’ तथा ‘असदाचार’ में उत्साह तथा उल्लासयुक्त प्रवृत्ति करवायी जा रही है और इसे ‘विकास’ माना जाता है! यही विकासका (विनाशका) क्रम विश्वविद्यालयोंकी उच्च शिक्षातक उत्तरोत्तर उन्नत होता चलता है। धर्म तथा आचारकी शिक्षा न घरमें मिलती है, न बाहर!
इसीके साथ-साथ उन्नतिके नामपर ‘सह-भोजन’, ‘सह-शिक्षा’, होटलोंमें सब कुछ तथा सब तरहसे बने हुए पदार्थोंका ‘अनर्गल आहार’, ‘उच्छिष्ट भोजन’, ‘निर्लज्ज’ तथा ‘अमर्यादापूर्ण डान्स’ आदि चलते हैं। ‘सिनेमा’ तथा इन्द्रियोंमें ‘अनुचित उत्तेजना पैदा करनेवाला साहित्य’ अपना अलग प्रभाव डालते हैं। परिणाम यह होता है कि आज कोई ‘धर्म’ के नामसे डरता है, कोई घृणा करता है, कोई सम्प्रदाय कहकर मखौल उड़ाता है, कोई धर्मकी बात सोचकर व्यर्थ समय नष्ट करना समझता है और कोई-कोई तो धर्मको उन्नतिका सर्वथा विघातक समझते हैं। धर्महीन विचार, धर्महीन शिक्षा, धर्महीन बाहरी छोटे-बड़े आचार-व्यवहार—सब मिलकर आज मनुष्यको मानवतासे गिराकर उसे पशुता और असुरतामें परिणत कर रहे हैं! इस प्रकार द्रुतगतिसे जो ‘धर्महीन समाज’का निर्माण हो रहा है, इसका परिणाम कितना भयानक होगा, इसपर गम्भीरतासे विचार करनेकी आवश्यकता है।
भारतवर्षका यह सनातनधर्म ही था, जो विश्व-चराचरमें एक भगवान् या एक आत्माके दर्शन कराकर सबमें सहज प्रेमका विस्तार कर सकता था। प्रेम त्यागसे होता है और अपने हितके लिये मनुष्य सहज ही त्याग करता है। जब सर्वत्र आत्मदृष्टि हो जाती है तो सबका हित ही अपना हित हो जाता है; फिर कैसे कोई किसीका अहित-चिन्तन या अहित-साधन कर सकता है? इसीसे मनीषियोंका यह मत है कि ‘‘जगत्के सब मत नष्ट हो जायँ, तो हर्ज नहीं है; सबमें एक आत्माके दर्शन करनेवाला यह विश्वमानवका ‘सनातनधर्म’ जीवित रहेगा तो, सब जीवित रहेंगे—सबका कल्याण होगा। पर यही धर्म यदि नहीं रहेगा, (यद्यपि इसकी सम्भावना नहीं है; क्योंकि यह ‘सत्य’ है और ‘सत्य’ कभी मरता नहीं, वह किसी-न-किसी अंशमें रहता ही है) तो समस्त विश्वका विध्वंस हो जायगा और वर्तमानमें इसी सनातनधर्मका ह्रास हो रहा है। इस ‘सनातनधर्म’ और ‘हिंदू-संस्कृति’ के स्वरूपको जानने-माननेवालोंकी संख्या दिनो-दिन घटी जा रही है, इसकी शिक्षाका अभाव हुआ जा रहा है। सनातनधर्म तथा सनातन-हिंदू-इतिहासका अज्ञान बढ़ा जा रहा है। यह विश्वके भविष्यके लिये बड़े भारी खतरेकी चीज है। अत: यदि विश्वकल्याणके साथ ही भारतको तथा मनुष्य-मात्रको राष्ट्रका, देशका, समाजका तथा व्यक्तिगत अपना कल्याण इच्छित है, तो इस सनातनधर्मको समझना, समस्त शिक्षालयोंके शिक्षाक्रममें सनातनधर्मकी शिक्षाकी व्यवस्था करना; सनातनधर्मकी महत्ता, उदारता, सर्वजीव-हितैषिताकी सत्-शिक्षाका प्रचार-प्रसार करना, इसकी शिक्षाका ग्रहण करना, इसे जीवनमें क्रियारूपमें उतारना और समस्त विश्वको इसका मंगल-संदेश देना परम आवश्यक और अविलम्ब अनिवार्य कर्तव्य है!’’