संस्कृतिके रक्षण और प्रसारमें बाधक तीन महाभ्रम

पाश्चात्य विद्वानोंने अज्ञानसे, मतिभ्रमसे, किसी कुटिल अभिसन्धिसे या अन्य किसी भी कारणसे हो—इन तीन महाभ्रमोंका प्रतिपादन, प्रचार और प्रसार किया—

(१) भारतमें आर्यजाति बाहरसे आयी है। भारतवर्ष उसका मूल निवास-स्थान नहीं है।

(२) चार हजार वर्षसे पहलेका कोई इतिहास नहीं है।

(३) जगत‍्में उत्तरोत्तर विकास—उन्नति हो रही है और भारतीय विद्वानोंके मस्तिष्कमें भी अधिकांशमें ये तीनों बातें प्रवेश कर गयीं। काल-प्रभावसे या दैवसंयोगसे उन्हीं विद्वानोंका सभी क्षेत्रोंमें प्रभाव बढ़ा, जिसका परिणाम यह हुआ कि जनतामें उत्तरोत्तर इन तीनों महाभ्रमोंका विस्तार होने लगा। इसीका यह फल है कि आज भारतीय लोगोंकी अपनी संस्कृति, अपने धर्म, अपने पूर्वज, अपने महाभारत-रामायणादि प्राचीन इतिहास, अपने धर्मग्रन्थों—श्रुति-स्मृति और पुराण-ग्रन्थोंपर अवहेलना, अश्रद्धा और अनास्था बढ़ रही है!

हमलोग जब बाहरसे आये हुए हैं, तब यहाँकी भूमिपर हमारा कोई ममत्व क्यों होना चाहिये। यद्यपि आजके जगत‍्की देशभक्तिके प्रचारसे भारतवर्षको इस समय लोग अपनी जन्मभूमि मानते हैं और इसके साथ अपनत्व भी है; परंतु जबतक इसे पूर्वजोंकी पवित्र पितृ-भूमि नहीं मानते, तबतक भावमें उतनी उच्चता नहीं आ सकती।

चार हजार वर्ष पहलेका कोई इतिहास नहीं, इसका परिणाम हुआ कि हमारे वेद, स्मृति, इतिहास, पुराण—सभी चार हजार वर्षके अंदर-अंदर बने हुए माने जाने लगे और इनमें केवल कवि-कल्पनाकी भावना होने लगी। पूर्वजोंके सच्चे गुण-गौरव कल्पनाकी आँधीमें उड़ गये। काल छोटी-सी संकुचित सीमामें आबद्ध हो गया और फलत: हमारा विशाल ज्ञानभण्डार और गौरवपूर्ण अतीत सर्वथा निष्प्रभ और व्यर्थ हो गया।

तीसरे भ्रमने तो बहुत बड़ा अनर्थ किया। सृष्टिके आदिकालसे जगत‍्में उत्तरोत्तर विकास हो रहा है—इस मान्यताने अतीतके ज्ञान, विज्ञान, सभ्यता, संस्कृति, धर्म, सदाचार, आचार-विचार, बुद्धि-विवेक, शौर्य-वीर्य, त्याग-तपस्या, वैभव-ऐश्वर्य और भाव-प्रभाव—सभीपर पानी फेर दिया। आज जितनी उन्नति है, उतनी दस हजार वर्ष पहले नहीं थी; दस हजार वर्ष पहले जितनी थी, उतनी लाख वर्ष पहले नहीं थी। लाख वर्ष पहले जितनी थी, उतनी करोड़ वर्ष पहले नहीं थी। भ्रम तो यहाँतक फैलाया जा रहा था कि सृष्टिकी उम्र ही केवल चार-पाँच हजार वर्षकी है; परंतु वह भ्रम तो अब टिक नहीं सका। इसलिये उसको तो लोग छोड़ रहे हैं, पर इस विकासवादका महाभ्रम अभी बड़े-बड़े मस्तिष्कोंमें भरा है।

इन तीन भ्रमोंने हम भारतवासियोंको सहज परमुखापेक्षी और परानुकरणपरायण बना दिया है। इसीका एक ताजा उदाहरण हमारा ‘नव-संविधान’ है। इसमें आदिसे अन्ततक केवल विदेशीय विधानोंका आश्रय लिया गया है, अपने प्राचीन ग्रन्थोंमें शासन और राजनीतिपर जो विशद विचार किया गया है, उसकी ओर देखा भी नहीं गया। इन्हीं भ्रमोंके कारण बाहरसे स्वराज्य मिल जानेपर भी हमारा मस्तिष्क अब भी परतन्त्र है। नीयत बुरी न होनेपर भी और अपने प्राचीन गौरवकी बातें प्रिय लगनेपर भी हमें यह विश्वास नहीं होता कि आजके जगत‍्की अपेक्षा हमारा प्राचीन जीवन बहुत उन्नत था और हमारा ज्ञानभण्डार बहुमूल्य रत्नोंसे भरा था। आज भी खोज करनेपर उसमें ऐसे-ऐसे रत्न मिल सकते हैं, जिनकी अन्यान्य उन्नत कहानेवाले देशोंको कल्पना भी नहीं है। यह अविश्वास इसीलिये है कि हमारे मनमें यह बात दृढ़ताके साथ जँच गयी है कि जगत‍्में उत्तरोत्तर उन्नति हो रही है। आज जितनी उन्नति है, उतनी उन्नति पहले कभी थी ही नहीं। इसीलिये हम प्रत्येक विषयमें आजकी उन्नतिकी नकल करना चाहते हैं। यह घोर आत्म-विस्मृति बड़ी ही बुरी है और इसीके कारण हमारे मस्तिष्कमें परतन्त्रताके विचारोंने अपना एक सुरक्षित स्थान बना लिया है।

भारतवासियोंको गम्भीर विचार करके अपने ज्ञानके प्रकाशसे इन तीनों भ्रमोंके अन्धकारका नाश कर देना चाहिये—नहीं तो उन्नतिके नामपर अवनतिकी प्रबल धारामें बहते जाना रुकेगा ही नहीं।