श्रीकृष्ण और अर्जुनकी मैत्री
आत्मा हि कृष्ण: पार्थस्य कृष्णस्यात्मा धनंजय:।
यद् ब्रूयादर्जुन: कृष्णं सर्वं कुर्यादसंशयम्॥
कृष्णो धनंजयस्यार्थे स्वर्गलोकमपि त्यजेत् ।
तथैव पार्थ: कृष्णार्थे प्राणानपि परित्यजेत् ॥
(महा०, सभा० ५२। ३१,३३)
‘श्रीकृष्ण अर्जुनके आत्मा हैं और अर्जुन श्रीकृष्णके आत्मा हैं। अर्जुन श्रीकृष्णको जो कुछ करनेको कहते हैं श्रीकृष्ण निस्सन्देह वही सब करते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुनके लिये दिव्य लोकका त्याग कर सकते हैं और अर्जुन भी श्रीकृष्णके लिये प्राण परित्याग कर सकते हैं।’
ये उद्गार कुरुराज दुर्योधनके हैं, जो उन्होंने पाण्डवोंके राजसूयका वर्णन करते समय अपने पिता महाराजा धृतराष्ट्रके सामने प्रकट किये थे। मित्रताके शास्त्रवर्णित लक्षणोंका मूर्तिमान् स्वरूप श्रीकृष्णार्जुनकी मैत्री है। आहार-विहारमें साथ रहना, प्राणपणसे हित करना, सुख-दु:खमें समानरूपसे साथी होना, मित्रके हितमें ही अपना हित समझना, मित्रको विपत्तिसे बचानेके लिये पहलेसे ही सावधान रहना, लेन-देनमें किसी प्रकारका संकोच न करना, मित्रका मान बढ़ाना, मित्रकी छोटी-से-छोटी सेवा करनेमें भी आनन्द मानना, मित्रके दोष छिपाकर उसके गुण प्रकट करना, मित्रको दोषसे मुक्त करना, अपनी उत्तम-से-उत्तम वस्तु उसे देना और उसे उत्तम-से-उत्तम स्थितिपर पहुँचा देना आदि समस्त बातें श्रीकृष्णके सख्य-प्रेममें पायी जाती हैं। वृन्दावनके बालमित्र, गुरुकुलके दरिद्र सुदामा और ज्ञानी उद्धव आदिके साथ भी भगवान्ने सख्य-भावका विलक्षण बर्ताव किया है, परंतु वह थोड़े कालके लिये और सब बातोंमें पूर्ण नहीं था। मित्रताका पूर्ण परिचय तो अर्जुनके साथ किये जानेवाले सुदीर्घ सख्य-व्यवहारमें ही मिलता है। यहाँ उसीका अति संक्षेपमें कुछ दिग्दर्शन कराया जाता है।
भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन आहार-विहारमें प्राय: साथ रहते थे। उनका वनविहार, जलविहार, घूमना-फिरना साथ हुआ करता था। स्वयंवरयात्रामें श्रीकृष्ण मित्र अर्जुनको प्राय: साथ रखा करते थे। खाण्डव-वनका दाह कर चुकनेके बाद इन्द्रने स्वर्गसे आकर जब अर्जुनसे वर माँगनेको कहा, तब अर्जुनने अनेक शस्त्रास्त्र माँग लिये। तदनन्तर इन्द्रने भगवान्से भी कुछ माँगनेको कहा, तब भगवान्ने कहा—‘मेरा अर्जुनके साथ शाश्वत प्रेम बना रहे।’ भगवान् अर्जुनके प्रेमके लिये वर माँगते हैं, इसीसे उनके प्रेमका कुछ अनुमान किया जा सकता है।
(१)
द्वारिकामें एक ब्राह्मण रहता था, उसकी स्त्रीके पुत्र हुआ और होते ही मर गया। ब्राह्मण मृतपुत्रकी लाशको लेकर राजद्वारपर आया और उसे वहाँ रखकर कातरस्वरसे रोता हुआ कहने लगा—‘ब्राह्मणद्रोही, शठबुद्धि, लोभी, विषयी, क्षत्रियाधम राजाके कर्मदोषसे ही मेरा बालक मर गया है।’ क्योंकि—
हिंसाविहारं नृपतिं दु:शीलमजितेन्द्रियम्।
प्रजा भजन्त्य: सीदन्ति दरिद्रा नित्यदु:खिता:॥
(श्रीमद्भा० १०।८९।२५)
‘जब राजा हिंसामें रत, दुश्चरित्र और अजितेन्द्रिय होता है, तभी प्रजाको दरिद्रता और अनेक प्रकारके दु:खोंसे नित्य पीड़ित रहना पड़ता है।’ यों कहकर लाशको वहीं छोड़ वह ब्राह्मण चला गया। कहना नहीं होगा, ब्राह्मणपर राजद्रोहका मामला नहीं चलाया गया था। इस प्रकार उस ब्राह्मणके आठ बालक मर गये और वह उनकी लाशोंको राजद्वारपर छोड़ गया। यादवोंने अनेक उपाय भी किये, परंतु कोई भी उपाय नहीं चला। नवें पुत्रकी लाशको लेकर जिस दिन ब्राह्मण राजसभामें पहुँचा, उस दिन वहाँ दैवात् अर्जुन आये हुए थे। अर्जुनने कहा—‘देव आप क्यों रो रहे हैं? क्या यहाँ कोई भी क्षत्रिय वीर नहीं है, जो आप ब्राह्मणोंको पुत्रशोकसे बचाये? जिन राजाओंके जीवित रहते राज्यमें यज्ञ करनेवाले ब्राह्मण धन, स्त्री, पुत्र आदिके वियोगमें दु:खी रहते हैं वे राजा नहीं, वे तो पेट पालने और विषय भोगनेवाले राजवेषी भाँड़ हैं। आपके पुत्रोंकी रक्षा मैं करूँगा और यदि न कर सकूँगा तो स्वयं अग्निमें जल जाऊँगा।’ ब्राह्मणने कहा—‘भगवान् संकर्षण, भगवान् वासुदेव, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध नहीं बचा सके, तब तुम क्योंकर बचाओगे?’ अर्जुनने अभिमानसे कहा—‘मैं संकर्षण, कृष्ण, प्रद्युम्न या अनिरुद्ध नहीं हूँ।* मैं गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हूँ। मृत्युको जीतकर बालकको ले आऊँगा।’ भगवान् कुछ नहीं बोले, उन्होंने मुसकरा दिया और मन-ही-मन भविष्यकी लीलाका कार्यक्रम भी निश्चित कर लिया। ब्राह्मणीके बालक-प्रसवका समय आया। समाचार मिलते ही अर्जुनने हाथ-पैर धो, गाण्डीव-धनुषको चढ़ाकर दिव्य अस्त्रोंका स्मरण किया और बाणोंसे सूतिका-भवनको ढँक दिया। ऐसा पिंजर-सा बना दिया कि उसके अंदर किसीका भी प्रवेश नहीं हो सकता था। हरिकी लीला विचित्र है, ब्राह्मणीके बालक हुआ और बारंबार रोता हुआ वह उसी क्षण अदृश्य हो गया। ब्राह्मण दु:खित हुआ श्रीकृष्णके पास जाकर कहने लगा—‘मेरी मूर्खताका भी कोई ठिकाना है, जो मैंने उस कायर अर्जुनकी आत्मप्रशंसापूर्ण बातका विश्वास कर लिया। मिथ्यावादी और अपने ही मुखसे अपना पराक्रम और धनुषकी झूठी प्रशंसा करनेवाले अर्जुनको धिक्कार है।’ अर्जुन पास ही बैठे थे। अब भी उनमें अहंकार था। वे भगवान्से कुछ न बोले और तुरंत अपनी योगविद्यासे यमपुरी गये। वहाँ ब्राह्मणपुत्रको न देखकर इन्द्र, अग्नि, निर्ऋति, चन्द्र, वायु, वरुण आदि लोकपालोंके लोकोंमें तथा अतल, रसातल और स्वर्गके ऊपरके सब लोकोंमें तथा और अनेक स्थानोंमें घूमे, परंतु कहीं बालकका पता नहीं लगा, तब अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार वे चिता बनाकर उसमें जलनेको तैयार हो गये। अब भगवान्से नहीं रहा गया। उन्होंने जाकर अर्जुनको रोक लिया और कहने लगे—
दर्शये द्विजसूनूंस्ते मावज्ञात्मानमात्मना।
ये ते न: कीर्तिं विमलां मनुष्या: स्थापयिष्यन्ति॥
(श्रीमद्भा० १०। ८९। ४६)
‘मित्र! यों अपनेको अशक्त समझकर अपना अनादर न करो, (तुमने अभी अपनी पूरी शक्तिका उपयोग ही कहाँ किया है? मैं तुम्हारा दूसरा रूप—तुम्हारा अन्तरंग सखा तो अभी मौजूद हूँ।) चलो, मैं तुम्हें ब्राह्मणके मरे हुए दसों पुत्रोंको दिखलाऊँ। इससे समस्त विश्वमें हमारी कीर्ति छा जायगी।’
अर्जुनका दर्प चूर्ण करना उसके हितके लिये आवश्यक था, सो कर दिया, परंतु उसे मरने कैसे देते? भगवान्ने उसको साथ लिया और दिव्य रथपर सवार हो पश्चिमकी ओर चले। पर्वतोंसे युक्त सातों द्वीप और समुद्रोंको लाँघकर लोकालोक पहाड़के परली तरफ अन्धकारमय प्रदेशमें जा पहुँचे। वहाँ उनके रथके शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामक घोड़े भटकने लगे, तब ‘महायोगेश्वर’ भगवान्ने अपने सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशमय सुदर्शन चक्रको आगे कर दिया। उसके प्रकाशमें रथ आगे बढ़ा। अन्धकारके उस पार पहुँचकर अर्जुनने देखा कि अपार सूर्योंकी-सी महान् ज्योति चारों ओर फैल रही है। उस श्रेष्ठ परमज्योतिकी ओर अर्जुनकी दृष्टि नहीं ठहर सकी और उन्होंने दोनों आँखें मूँद लीं। इसके बाद वे एक अनन्त जलके समुद्रमें घुसे, वहाँ देखा कि एक अत्यन्त प्रकाशयुक्त मन्दिर है, उसमें अत्यन्त प्रकाशमयी मणियाँ जड़ी हैं और सोनेके हजारों खंभे हैं। मन्दिरके अंदर श्वेत पर्वतके समान अत्यन्त अद्भुत शेषनागजी हैं। उनके मस्तकोंपर स्थित महामणियोंकी प्रभासे प्रकाशित हुए हजारों फण फैले हुए हैं। उनके दो हजार नेत्र हैं और गले तथा जीभोंका वर्ण नीला है। उन शेषजीकी शय्यापर विभु महानुभाव पुरुषोत्तमोत्तम सुखसे लेट रहे हैं। उनके नव-नील-नीरद शरीरपर पीताम्बर बिजलीके सदृश शोभित हो रहा है। उनका मुख-मण्डल प्रसन्न, अरुण-नेत्र कमल-सदृश विशाल और दर्शनीय है। महामणियोंके गुच्छोंसे सुशोभित किरीट-मुकुट और कुण्डलोंकी शोभा छा रही है। भगवान्के सुन्दर आठ भुजाएँ हैं और वक्ष:स्थलमें श्रीवत्स लक्ष्मीके चिह्न हैं तथा गलेमें कौस्तुभमणि एवं मनोहर वनमाला सुशोभित है। सुनन्द, नन्द आदि पार्षद तथा चक्र आदि आयुध और पुष्टि, श्री, कीर्ति, माया और आठों सिद्धियाँ शरीर धारणकर भगवान्की सेवामें तत्पर हैं। श्रीकृष्ण-अर्जुनने वहाँ पहुँचकर सिर झुकाकर आदरसे आत्मरूप अच्युतको प्रणाम किया। तब विभुभगवान्ने कहा—‘हे नारायण और नर! मैंने अपने ही स्वरूप तुम लोगोंको देखनेके लिये इन ब्राह्मणोंको यहाँ मँगवा लिया था। तुम्हारा कार्य हो गया। अब तुम शीघ्र यहाँ आ जाओ। तुम पूर्णकाम हो, मर्यादा-पालनके लिये लोक-संग्रहार्थ ही धर्मका आचरण करते हो।’ तदनन्तर श्रीकृष्ण-अर्जुन ब्राह्मण-बालकोंको लेकर लौट आये। द्वारिकामें पहुँचकर अर्जुनने अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार ब्राह्मणको उसके सब बालक दे दिये। अपने पुत्रोंको पाकर ब्राह्मण अत्यन्त ही प्रसन्न और विस्मित हो गया। इस प्रकार भगवान्ने अपने मित्र अर्जुनकी प्रतिज्ञा पूर्ण की।
(२)
लाक्षागृहमें पाण्डवोंके जलनेका समाचार पाकर भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें ढूँढ़ते हुए अन्तमें द्रौपदीके स्वयंवरमें पहुँचे। वहाँ जाते ही उन्होंने ब्राह्मण-वेशधारी अर्जुनको पहचानकर बलरामजीसे कह दिया। आवश्यक सहायता कर विरोधी राजाओंको परास्त कराया और दरिद्रतासे पूर्ण पाण्डवोंको मित्रताके उपहारके नाते अपार धन देकर उन्हें महाधनी बना दिया। महाभारतकार लिखते हैं—
श्रीकृष्णने भेंटमें वैदूर्यमणियोंसे जड़े सोनेके गहने, देशी-विदेशी बहुमूल्य वस्त्र, उपवस्त्र, शाल-दुशाले, मृगछाला, चद्दरें, सुन्दर बिछौने, अनेक प्रकारके रत्न, नाना प्रकारकी बड़ी-बड़ी चौकियाँ, भाँति-भाँतिके विशाल शामियाने, पालकी आदि सवारियाँ, वैदूर्यमणियों तथा हीरेसे जड़े हुए विचित्र बरतन, सुन्दर गहनोंसे सजी हुई रूप-यौवन और चतुरतासम्पन्न दासियाँ, सुशिक्षित सुन्दर हाथी, गहनोंसे लदे हुए बढ़िया घोड़ोंसे जुते हुए ध्वजावाले सुवर्ण रथ, सोनेकी करोड़ों मोहरें और सुवर्णके ढेर-के-ढेर—इस प्रकार अनेक वस्तुएँ प्रदान कीं।
तदनन्तर राजसूय-यज्ञमें विविध प्रकारसे सहायता कर उसे सफलतापूर्वक सम्पन्न कराया। इस प्रसंगमें भगवान्ने हर तरहकी सेवा की। अतिथियोंके पैर धोये और किसी-किसीके मतमें तो जूठी पत्तलें उठाकर फेंकनेका काम भी आपने किया। यद्यपि सारा ही कार्य भगवान्की सहायता और बलसे सम्पन्न हुआ था, परंतु अपने मित्र अर्जुनकी प्रसन्नताके लिये दूसरे राजाओंकी भाँति भेंटस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने भी युधिष्ठिरको चौदह हजार बढ़िया हाथी दिये—
वासुदेवोऽपि वार्ष्णेयो मानं कुर्वन् किरीटिन:॥
अददद् गजमुख्यानां सहस्राणि चतुर्दश।
(सभापर्व ५२।३०।३१)
(३)
पाण्डवोंके पाससे लौटकर आये हुए संजयसे धृतराष्ट्रने जब वहाँके समाचार पूछे, तब अन्त:पुरके पवित्र और विशुद्ध प्रेमके संकोचरहित दृश्यके देखनेका सौभाग्य पाये हुए संजयने मुग्धचित्तसे वहाँका सारा हाल बतलाते हुए कहा—‘श्रीकृष्ण-अर्जुनका मैंने विलक्षण प्रेम-भाव देखा है। मैं उन दोनोंसे बात करनेके लिये बड़े ही विनीतभावसे उनके अन्त:पुरमें गया। मैंने जाकर देखा कि वे दोनों महात्मा उत्तम वस्त्राभूषणोंसे भूषित होकर रत्नजटित सोनेके महामूल्यवान् आसनपर बैठे थे। अर्जुनकी गोदमें श्रीकृष्णके पैर थे और द्रौपदी तथा सत्यभामाकी गोदमें अर्जुनके दोनों पैर थे। अर्जुनने अपने पैरके नीचेका सोनेका पीढ़ा सरकाकर मुझे बैठनेको कहा, मैं उसे छूकर अदबके साथ नीचे बैठ गया। तब श्रीकृष्णने अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए और उन्हें अपने ही समान बतलाते हुए मुझसे कहा—
देवासुरमनुष्येषु यक्षगन्धर्वभोगिषु।
न तं पश्याम्यहं युद्धे पाण्डवं योऽभ्ययाद् रणे॥
बलं वीर्यं च तेजश्च शीघ्रता लघुहस्तता।
अविषादश्च धैर्यं च पार्थान्नान्यत्र विद्यते॥
(उद्योगपर्व ५९। २६, २९)
‘देवता, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, मनुष्यों और नागोंमें कोई ऐसा नहीं है, जो युद्धमें अर्जुनका सामना कर सके। बल, वीर्य, तेज, शीघ्रता, लघुहस्तता, विषादहीनता और धैर्य—ये सारे गुण अर्जुनके सिवा किसी भी दूसरे मनुष्यमें एक साथ विद्यमान नहीं हैं।’ इस प्रकार अपने मित्रकी सच्ची प्रशंसासे उसे आनन्दित करते हुए श्रीकृष्णने मुझे आपलोगोंको समझा देनेके लिये कहा है।’
अर्जुन और श्रीकृष्णकी एकताका वर्णन करते हुए पितामह भीष्मने भी कहा है—
एष नारायण: कृष्ण: फाल्गुनश्च नर: स्मृत:।
नारायणो नरश्चैव सत्त्वमेकं द्विधाकृतम्॥
(उद्योग० ४९।२०)
‘श्रीकृष्ण नारायण हैं और अर्जुन नर हैं। एक ही आत्मा दो रूपोंमें प्रकट हुए हैं।’
(४)
युद्धकी सम्भावनासे जब दुर्योधन और अर्जुन दोनों ही श्रीकृष्णकी सहायता प्राप्त करनेके लिये एक ही दिन द्वारिका पहुँचे, तब वहाँ भी भगवान्ने कौशलसे दुर्योधनको सेना देकर मित्र अर्जुनका सारथि बनना स्वीकार कर लिया। अर्जुनकी विजय तो तभी हो चुकी, जब भगवान् उसका रथ हाँकनेको तैयार हो गये। द्रोणाचार्यने धर्मराजसे कहा था—
यत: कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जय:।
(भीष्म० ४३। ५९)
‘जहाँ कृष्ण हैं, वहीं धर्म है और जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।’ मित्रको विजय प्राप्त करानेके लिये सारे धर्मोंके आधार श्रीकृष्णने अर्जुनका सारथ्य स्वीकार किया।
(५)
वनमें भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवोंसे मिलने गये और वहाँ बातचीतके सिलसिलेमें उन्होंने अर्जुनसे कहा—
ममैव त्वं तवैवाहं ये मदीयास्तवैव ते।
यस्त्वां द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्त्वामनु स मामनु॥
(महा०, वन० १२। ४५)
‘हे अर्जुन! तुम मेरे हो और मैं तुम्हारा हूँ। जो मेरे हैं, वे तुम्हारे ही हैं। अर्थात् जो कुछ मेरा है, उसपर तुम्हारा अधिकार है। जो तुमसे शत्रुता रखता है, वह मेरा शत्रु है और जो तुम्हारा अनुवर्ती (साथ देनेवाला) है, वह मेरा भी है।’
(६)
भीष्मको पाण्डवसेनाका संहार करते जब नौ दिन बीत गये, तब रात्रिके समय युधिष्ठिरने बहुत ही चिन्तित होकर भगवान्से कहा—‘श्रीकृष्ण! भीष्मसे हमारा लड़ना वैसा ही है जैसा जलती हुई आगकी ज्योतिपर पतंगोंका मरनेके लिये टूट पड़ना। आप कहिये अब क्या करें। इसपर भगवान् श्रीकृष्णने युधिष्ठिरको आश्वासन देते हुए कहा—‘आप चिन्ता न करें, मुझे आज्ञा दें तो मैं भीष्मको मार डालूँ। आप निश्चय मानिये कि अर्जुन भीष्मको मार देंगे।’ फिर अर्जुनके साथ अपने प्रेमका सम्बन्ध जताते हुए भगवान्ने कहा—
तव भ्राता मम सखा सम्बन्धी शिष्य एव च।
मांसान्युत्कृत्य दास्यामि फाल्गुनार्थे महीपते॥
एष चापि नरव्याघ्रो मत्कृते जीवितं त्यजेत् ।
एष न: समयस्तात तारयेम परस्परम्॥
(महा०, भीष्म० १०७। ३३-३४)
‘हे राजन्! आपके भाई अर्जुन मेरे मित्र हैं, सम्बन्धी हैं और शिष्य हैं। मैं अर्जुनके लिये अपने शरीरका मांसतक काटकर दे सकता हूँ। पुरुषसिंह अर्जुन भी मेरे लिये प्राण दे सकते हैं। हे तात! हम दोनों मित्रोंकी यह प्रतिज्ञा है कि परस्पर एक-दूसरेको संकटसे उबारें।’
(७)
चक्रव्यूहमें वीर अभिमन्युको महारथियोंकी सहायतासे जयद्रथने मिलकर मार डाला, तब पाण्डवोंके शिविरमें गहरा शोक छा गया। सुभद्रा और उत्तराका विलाप सुनना सबके लिये असह्य हो गया। मित्र अर्जुनके अनुरोधसे भगवान् श्रीकृष्ण बहिन सुभद्राको समझाने आये। अनेक प्रकारके उपदेश देते हुए उन्होंने कहा—
दिष्ट्या महारथो धीर: पितुस्तुल्यपराक्रम:।
क्षात्रेण विधिना प्राप्तो वीराभिलषितां गतिम्॥
जित्वा सुबहुश: शत्रून् प्रेषयित्वा च मृत्यवे।
गत: पुण्यकृतां लोकान् सर्वकामदुहोऽक्षयान्॥
तपसा ब्रह्मचर्येण श्रुतेन प्रज्ञयापि च।
संतो यां गतिमिच्छन्ति तां प्राप्तस्तव पुत्रक:॥
वीरसूर्वीरपत्नी त्वं वीरजा वीरबान्धवा।
मा शुचस्तनयं भद्रे गत: स परमां गतिम्॥
(द्रोणपर्व ७७।१४—१७)
ये चान्येऽपि कुले सन्ति पुरुषा नो वरानने।
सर्वे ते तां गतिं यान्तु ह्यभिमन्योर्यशस्विन:॥
(द्रोणपर्व ७८।४१)
‘बहिन सुभद्रे! तेरा पुत्र धीर, वीर, महारथी, अपने पिताके समान बलवान् था। उसने तो वीर क्षत्रियोंकी चिरवांछित उत्तम गति प्राप्त की है। बहुत-से शत्रुओंको पराजितकर उन्हें मृत्युके मुँहमें भेजकर सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अक्षय पदको प्राप्त किया है। जिस परम गतिको संत लोग तप, ब्रह्मचर्य, वेदाध्ययन और ज्ञानके द्वारा प्राप्त करना चाहते हैं, तेरे पुत्रको वही गति मिली है। बहिन! तू वीरजननी, वीरपत्नी, वीरपुत्री और वीरकी बहिन है, शोक न कर। तेरा पुत्र रणमें मरकर परम गतिको प्राप्त हुआ है। मैं तो चाहता हूँ कि हमारे कुलमें जितने पुरुष हैं, सभी यशस्वी अभिमन्युकी-सी शुभ गतिको प्राप्त हों। तू निश्चय रख, अर्जुन कल जयद्रथको जरूर मार डालेगा।’ भगवान् समझाकर चले गये।
सुभद्रा बोली, ‘कालकी गति बड़ी विचित्र है, जिसके ऊपर श्रीकृष्ण सहायक थे, वही अभिमन्यु आज अनाथकी भाँति मारा गया। परंतु हे पुत्र! तुझे वही गति मिले जो यज्ञ करनेवाले, दानी, ज्ञानी, ब्राह्मण, ब्रह्मचर्यका आचरण करनेवाले, पुण्य तीर्थोंमें स्नान करनेवाले, उपकार माननेवाले, उदार, गुरुसेवक, हजारोंकी गुरु-दक्षिणा देनेवाले, संग्रामसे न मुड़कर वीर शत्रुओंको मारकर मरनेवाले, सहस्रों गौओंका दान करनेवाले, सामानसहित घर दान करनेवाले, ब्राह्मणोंको और शरणागतोंको धनकी निधि दे देनेवाले, सर्वत्यागी, संन्यासी, व्रतधारी मुनि, पतिव्रता स्त्रियाँ; सदाचारी राजा, चारों आश्रमोंके नियमोंको पालनेवाले, दीनोंपर दया करनेवाले, समान भाग बाँटनेवाले, चुगली न करनेवाले, धर्मशील अतिथिको निराश न लौटानेवाले, आपत्ति और संकटके समय धैर्य रखनेवाले, माता-पिताके सेवक, अपनी ही स्त्रीसे प्रेम करनेवाले, पर-स्त्रीसे बचे रहनेवाले, अपनी स्त्रीसे भी ऋतुकालमें ही समागम करनेवाले, मत्सरता न करनेवाले, क्षमाशील, दूसरोंको चुभनेवाली बात न कहनेवाले, मद्य, मांस, मद, झूठ, दम्भ और अहंकारसे दूर रहनेवाले, दूसरोंका किसी भाँति भी अनिष्ट न करनेवाले, पाप-कार्य करनेमें लज्जित होनेवाले, शास्त्रज्ञ और परमात्मज्ञानसे ही तृप्त रहनेवाले जितेन्द्रिय साधुओंको मिलती है।’ धन्य माता!
अर्जुनने भगवान्के बलपर जयद्रथको मारनेका प्रण करते हुए कहा कि ‘जयद्रथ यदि मेरी या महाराज युधिष्ठिरकी और भगवान् पुरुषोत्तमकी शरण न आया तो कल सूर्यास्तसे पूर्व मैं उसे मार डालूँगा। ऐसा न करूँ तो मुझे वीर तथा पुण्यात्माओंको प्राप्त होनेवाले लोक न मिलें। साथ ही मातृ-हत्यारे, पितृ-हत्यारे, गुरुस्त्रीगामी, चुगलखोर, साधु-निन्दा और पर-निन्दा करनेवाले, धरोहर हड़पनेवाले, विश्वासघाती, भुक्तपूर्वा स्त्रीको स्वीकार करनेवाले, ब्रह्महत्यारे, गोहत्यारे, इन पापियोंकी गति मुझे मिले। वेदाध्ययनकारी तथा पवित्र व्रतधारी पुरुषोंका अपमान करनेवाले, वृद्ध, साधु और गुरुका तिरस्कार करनेवाले, ब्राह्मण, गौ और अग्निको पैरसे छूनेवाले, जलमें थूकने और मल-मूत्र त्याग करनेवाले, नंगे नहानेवाले, अतिथिको निराश लौटानेवाले, घूसखोर, झूठ बोलनेवाले, ठग, दम्भी, दूसरोंपर दोष लगानेवाले, नौकर, स्त्री, पुत्र और आश्रितको न देकर अकेले ही मीठा खानेवाले, अपने हितकारी आश्रित साधुका पालन न करनेवाले, उपकारीकी निन्दा करनेवाले, निर्दयी, शराबखोर, मर्यादा तोड़नेवाले, कृतघ्न, भरण-पोषण करनेवालेकी निन्दा करनेवाले, बायें हाथसे गोदमें रखकर खानेवाले, धर्मत्यागी, उषाकालमें सोनेवाले, जाड़ेसे डरकर स्नान न करनेवाले, रणसे डरकर भागनेवाले क्षत्रिय, वेदध्वनिसे रहित और एक कुएँके ग्राममें छ: मासतक रहनेवाले, शास्त्रकी निन्दा करनेवाले, दिनमें मैथुन करनेवाले, दिनमें सोनेवाले, मकानमें आग लगानेवाले, विष देनेवाले, अग्नि तथा अतिथिसे रहित, गौको जल पीनेसे रोकनेवाले, रजस्वलासे मैथुन करनेवाले, कन्या बेचनेवाले और दान देनेकी प्रतिज्ञा करके लोभवश न देनेवाले आदि लोगोंको जिन नरकोंकी प्राप्ति होती है वही मुझे भी मिले।* इसके सिवा मैं यह भी प्रण करता हूँ कि यदि जयद्रथको मारे बिना ही कल सूर्यास्त हो जायगा तो मैं जलती हुई अग्निमें कूदकर जल मरूँगा।’ अर्जुनकी प्रतिज्ञा सुनकर भगवान्ने अपना पांचजन्य शंख बजाया। भगवान्के श्रीमुखकी वायुसे भरे शंखकी ध्वनि प्रलयकालके समान हुई, जिससे आकाश, पाताल—सभी दिशाएँ काँप गयीं।
भगवान्ने एकान्तमें अर्जुनसे कहा—‘भाई! मैंने गुप्तचर भेजकर कौरवोंके यहाँसे समाचार मँगवा लिये हैं, तुम्हारी प्रतिज्ञा सुनकर पहले तो जयद्रथ आदि सभी घबरा गये थे, परंतु अब तो उन्होंने निश्चय कर लिया है कि आचार्य द्रोणसहित छहों महारथी जयद्रथकी रक्षा करेंगे, उन छहोंको जीते बिना जयद्रथको पाना कठिन होगा, परंतु तुमने मेरी सम्मति लिये बिना ही ऐसी विकट प्रतिज्ञा कैसे कर ली?’ अर्जुनने उत्तरमें कहा, ‘भगवन्! मुझे महारथियोंकी कोई चिन्ता नहीं है। मैं सबको जीत सकूँगा—
तव प्रसादाद् भगवन् किन्नावाप्तं रणे मम।
(द्रोणपर्व ७६। २१)
‘हे भगवन्! आपकी कृपासे मुझे रणमें कौन-सी वस्तु अप्राप्त है?’ स्वयं जयद्रथने भी दुर्योधनसे ऐसी ही बात कही थी—
वासुदेवसहायस्य गाण्डीवं धुन्वतो धनु:।
कोऽर्जुनस्याग्रतस्तिष्ठेत् साक्षादपि शतक्रतु:॥
(द्रोणपर्व ७५। २०)
‘वासुदेव श्रीकृष्णकी सहायताप्राप्त गाण्डीवधारी अर्जुनके सामने दूसरेकी तो बात ही क्या है, साक्षात् इन्द्र भी नहीं ठहर सकता।’
बात भी यही थी। भगवान्के कारण ही पाण्डव विजयी हुए थे। वे सारी बातें पहलेसे ही सोच रखते थे। कहाँ, कैसे, क्या करनेसे उसके प्रण, प्राण तथा प्रतिष्ठाकी रक्षा होगी, इस बातकी दूरदर्शितापूर्ण जितनी चिन्ता श्रीकृष्णको रहती थी, उतनी चिन्ता अर्जुनको नहीं थी और होती भी क्यों, जब वह अपने रथकी लगाम उन्हें सौंप चुका और उनके द्वारा ‘मा शुच:’ का आश्वासन पा चुका, तब फिर उसकी चिन्ता भी वही करते। दूसरे दिन घोर युद्ध हुआ, वीरोंको मारते और सेनाके समुद्रको चीरकर छ: महारथी वीरोंसे सुरक्षित सबके बीचमें स्थित जयद्रथके पास पहुँचनेमें बहुत समय लग गया। भगवान्ने कहा, ‘भाई अर्जुन! इन सबको जीतकर संध्यासे पूर्व जयद्रथको मारना बड़ा कठिन है। देख, मैं दूसरा ही उपाय रचता हूँ।’
इतना कहकर—
योगी योगेन संयुक्तो योगिनामीश्वरो हरि:।
सृष्टे तमसि कृष्णेन गतोऽस्तमिति भास्कर:॥
(द्रोणपर्व १४६।६८)
योगयुक्त योगेश्वर भगवान् श्रीहरिने सूर्यको ढकनेके लिये अन्धकारको उत्पन्न किया। उस अन्धकारके फैलते ही सूर्य अस्त हो गया। सूर्यास्त हुआ देखकर कौरवपक्षीय लोग हर्षसे भर गये। जयद्रथ समीप आकर हर्षसे आकाशकी ओर ताकने लगा। भगवान्ने कहा, ‘अर्जुन! बस, यही अवसर है, जयद्रथका मस्तक अपने तीक्ष्ण बाणसे काटकर अपनी प्रतिज्ञा सफल कर।’ अर्जुनने बाण-सन्धान किया। जयद्रथ और उसके संरक्षकोंकी बुद्धि चकरा गयी। अर्जुनने अपनी बाणधाराओंसे सभीको स्नान करा दिया। इतनेमें भगवान्ने अन्धकारको दूर कर दिया। सूर्य अस्ताचलकी ओर जाते हुए दिखायी दिये। भगवान्ने कहा, ‘अर्जुन! अब जल्दी कर, परंतु खबरदार, जयद्रथका मस्तक जमीनपर न गिरने पावे। इसको पिताका वरदान है कि जो कोई इसके सिरको काटकर जमीनपर गिरायेगा, उसके सिरके सौ टुकड़े हो जायँगे।
धरण्यां मम पुत्रस्य पातयिष्यति य: शिर:।
तस्यापि शतधा मूर्द्धा फलिष्यति न संशय:॥
(द्रोणपर्व १४६।११२)
इसलिये तू अपने दिव्य बाणोंसे इसके सिरको काटकर बाणोंके द्वारा ऊपर-का-ऊपर उड़ाकर इसका बूढ़ा बाप जहाँ बैठा संध्यावन्दन कर रहा है, उसकी गोदीमें डाल दे।’ अर्जुनने वैसा ही किया। जयद्रथका मस्तक काटकर अर्जुनने दिव्य बाणोंद्वारा आकाशमार्गसे प्रेरितकर उसके पिताकी गोदीमें गिरा दिया। पिता झिझककर उठा तो उसके द्वारा वह सिर सहसा जमीनपर गिर पड़ा, जिससे उसी समय उसके सिरके सौ टुकड़े हो गये। भगवान्की दूरदर्शिता और सावधानीसे अर्जुनकी दोनों विपत्तियोंसे अद्भुत रूपमें प्राणरक्षा हो गयी।
(८)
इन्द्रसे वरदानमें प्राप्त एक अमोघ शक्ति कर्णके पास थी, इन्द्रका कहा हुआ था कि ‘इस शक्तिको तू प्राणसंकटमें पड़कर एक बार जिसपर भी छोड़ेगा, उसीकी मृत्यु हो जायगी, परंतु एक बारसे अधिक इसका प्रयोग नहीं हो सकेगा।’ कर्णने वह शक्ति अर्जुनको मारनेके लिये रख छोड़ी थी। उसे रोज दुर्योधनादि कहते कि तुम उस शक्तिका प्रयोग कर अर्जुनको मार क्यों नहीं देते। वह कहता कि आज अर्जुनके सामने आते ही उसे जरूर मारूँगा, पर रणमें अर्जुनके सामने आनेपर कर्ण इस बातको भूल जाता और उसका प्रयोग न करता। कारण यही था कि अर्जुनके रथमें सारथिके रूपमें भगवान् निरन्तर रहते। अर्जुनका रथ सामने आते ही कर्णको पहले भगवान्के दर्शन होते। भगवान् उसे मोहित कर लेते जिससे वह शक्ति छोड़ना भूल जाता। अर्जुनको इस शक्तिके सम्बन्धमें कोई पता नहीं था, परंतु भगवान् सारी बातें जानते थे और वे हर तरहसे अर्जुनको बचाने और जितानेके लिये सचेष्ट थे। उन्होंने स्वयं ही सात्यकिसे कहा था—
अहमेव तु राधेयं मोहयामि युधांवर।
ततो नावासृजच्छक्तिं पाण्डवे श्वेतवाहने॥
फाल्गुनस्य हि सा मृत्युरिति चिन्तयतोऽनिशम्।
न निद्रा न च मे हर्षो मनसोऽस्ति युधांवर॥
न पिता न च मे माता न यूयं भ्रातरस्तथा।
न च प्राणस्तथा रक्ष्या यथा बीभत्सुराहवे॥
त्रैलोक्यराज्याद् यत्किंचिद् भवेदन्यत्सुदुर्लभम्।
नेच्छेयं सात्वताहं तद् विना पार्थं धनंजयम्॥
अत: प्रहर्ष: सुमहान् युयुधानाद्य मेऽभवत् ।
मृतं प्रत्यागतमिव दृष्ट्वा पार्थं धनंजयम्॥
(द्रोणपर्व १८२।४०-४१,४३—४५)
‘सात्यकि! मैंने ही कर्णको मोहित कर रखा था, जिससे वह श्वेत घोड़ोंवाले अर्जुनको इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे नहीं मार सका था। इस शक्तिके निमित्त कर्णको अर्जुनका काल समझनेके कारण मुझे रातको नींद नहीं आती थी और कभी मन प्रसन्न नहीं रहता था। मैं अपने माता-पिताकी, तुमलोगोंकी, भाइयोंकी और अपने प्राणोंकी रक्षा करना भी उतना आवश्यक नहीं समझता, जितना रणमें अर्जुनकी रक्षा करना समझता हूँ। सात्यकि! तीनों लोकोंके राज्योंकी अपेक्षा भी कोई वस्तु अधिक दुर्लभ हो तो मैं उसे अर्जुनको छोड़कर नहीं चाहता। अत: युयुधान! आज अर्जुन मानो मरकर लौट आये हों, इस प्रकार इन्हें जीता-जागता देख मुझे बड़ा भारी हर्ष हो रहा है।’ धन्य है।
इसीलिये भगवान्ने भीमपुत्र घटोत्कचको रातके समय युद्धार्थ भेजा। घटोत्कचने अपनी राक्षसी मायासे कौरवसेनाका संहार करते-करते कर्णका नाकों दम कर दिया, दुर्योधन आदि सभी घबरा गये। सभीने खिन्न मनसे कर्णको पुकारकर कहा कि बस आधी रातके समय यह राक्षस हम सबको मार ही डालेगा, फिर भीम-अर्जुन हमारा क्या करेंगे। अतएव तुम इन्द्रकी शक्तिका प्रयोग कर इसे पहले मारो, जिससे हम सबके प्राण बचें। आखिर कर्णको वह शक्ति घटोत्कचपर छोड़नी पड़ी। शक्ति लगते ही घटोत्कच मर गया। वीर-पुत्र घटोत्कचकी मृत्यु देखकर सभी पाण्डवोंकी आँखोंमें आँसू भर आये, परंतु श्रीकृष्णको बड़ी प्रसन्नता हुई, वे हर्षसे प्रमत्त-से होकर बार-बार अर्जुनको हृदयसे लगाने लगे। अर्जुनने कहा—‘भगवन्! यह क्या रहस्य है? हम सबका तो धीरज छूटा जा रहा है और आप हँस रहे हैं?’ तब श्रीकृष्णने सारा भेद बताकर कहा कि ‘प्रिय पार्थ! इन्द्रने तेरे हितके लिये कर्णसे कवच-कुण्डल ले लिये थे। बदलेमें उसे एक शक्ति दी थी, वह शक्ति कर्णने तेरे मारनेके लिये रख छोड़ी थी। उस शक्तिके कर्णके पास रहते मैं सदा तुझे मरा ही समझता था। मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आज भी, शक्ति न रहनेपर भी, कर्णको तेरे सिवा दूसरा कोई नहीं मार सकता। वह ब्राह्मणोंका भक्त, सत्यवादी, तपस्वी, व्रताचारी और शत्रुओंपर भी दया करनेवाला है। मैंने घटोत्कचको इसी उद्देश्यसे भेजा था। अर्जुन! तेरे हितके लिये ही मैं यह सब किया करता हूँ। चेदिराज शिशुपाल, भील एकलव्य, जरासन्ध आदिको विविध कौशलोंसे मैंने इसीलिये मारा था, मरवाया था, जिससे वे महाभारत-समरमें कौरवका पक्ष न ले सकें। वे आज जीवित होते तो तेरी विजय बहुत ही कठिन होती। फिर यह घटोत्कच तो ब्राह्मणोंका द्वेषी, यज्ञद्वेषी, धर्मका लोप करनेवाला और पापी था। इसे तो मैं ही मार डालता, परंतु तुमलोगोंको बुरा लगेगा, इसी आशंकासे नहीं मारा। आज मैंने ही इसका नाश करवाया है—
ये हि धर्मस्य लोप्तारो वध्यास्ते मम पाण्डव।
धर्मसंस्थापनार्थं हि प्रतिज्ञैषा मया कृता॥
ब्रह्म सत्यं दम: शौचं धर्मो ह्री: श्रीर्धृति: क्षमा।
यत्र तत्र रमे नित्यमहं सत्येन ते शपे॥
(द्रोणपर्व १८१।२८,२९,३०)
‘जो पुरुष धर्मका नाश करता है, मैं उसका वध कर डालता हूँ। धर्मकी स्थापना करना ही मेरी प्रतिज्ञा है। मैं यह शपथ खाकर कहता हूँ कि जहाँ ब्रह्मभाव, सत्य, इन्द्रियदमन, शौच, धर्म, (बुरे कर्मोंमें) लज्जा, श्री, धैर्य और क्षमा हैं, वहाँ मैं नित्य निवास करता हूँ।’
अभिप्राय यह है कि तुम्हारे अंदर ये सब गुण हैं, इसीलिये मैं तुम्हारे साथ हूँ और इसीलिये मैंने कौरवोंका पक्ष त्याग रखा है, नहीं तो मेरे लिये सभी एक-से हैं। फिर तुम घटोत्कचके लिये शोक क्यों करते हो? अपना पुत्र भी हो तो क्या हुआ, जो पापी है, वह सर्वथा त्याज्य है।
इस प्रकार मित्र अर्जुनके प्राण और धर्मकी भगवान्ने रक्षा की।
(९)
जयद्रथ-वधके दिन अर्जुनके रथके घोड़ोंको बहुत ही परिश्रम करना पड़ा। घोड़े घायल हो गये। प्यासके मारे उनके प्राण घबरा उठे। जयद्रथ अभी बहुत दूर था, इससे यह निश्चय हुआ कि घोड़े खोल दिये जायँ। भगवान्ने घोड़े खोल दिये। अर्जुन रथसे उतरकर गाण्डीव धनुषको तानकर पर्वतके समान अचल हो खड़े हो गये। अर्जुनने तुरंत ही बाणोंसे पृथ्वी फोड़कर वहाँ एक सुन्दर सरोवर तैयार कर दिया। वहाँ अर्जुनने बाणोंसे ही खम्भे और सुन्दर भवन तथा परकोटा बना दिया। भगवान् घोड़ोंके बाण निकालकर उन्हें अच्छी तरह धोने लगे, नहलाने और पानी पिलाने लगे। जब घोड़े नहाकर, पानी पीकर और घास खाकर ताजे हो गये, तब श्रीकृष्णने प्रसन्न हो, उन्हें रथमें जोड़ दिया। इस तरह भगवान्ने मित्रकी किसी प्रकारकी सेवा करनेमें भी आनाकानी नहीं की।
(१०)
कर्ण और अर्जुनका घमासान युद्ध हो रहा है। कर्ण और शल्यकी बातें सुनकर अर्जुनने श्रीकृष्णसे पूछा कि ‘यदि कर्ण मुझे मार डाले तो आप क्या करेंगे?’ भगवान्ने हँसकर अर्जुनसे कहा—
पतेद् दिवाकर: स्थानाच्छुष्येदपि महोदधि:।
शैत्यमग्निरियान्न त्वां कर्णो हन्याद् धनंजय॥
यदि चैतत् कथंचित् स्याल्लोकपर्यासनं भवेत् ।
हन्यां कर्णं तथा शल्यं बाहुभ्यामेव संयुगे॥
(कर्णपर्व ८७।१०५-१०६)
‘चाहे सूर्य टूटकर गिर पड़े, समुद्र सूख जाय, अग्नि शीतल हो जाय, परंतु कर्ण तुझे नहीं मार सकता और यदि किसी प्रकार ऐसा हो ही जाय तो संसार उलट जायगा और मैं अपने बाहुओंसे कर्ण और शल्यको मार डालूँगा।’
कर्णने अर्जुनको मारनेके लिये एक सर्पमुख बाण बहुत दिनोंसे सँभालकर रख छोड़ा था, वह बाण महाभयानक, अति तीक्ष्ण, जलता हुआ तथा बड़ा ही प्रभावशाली था। कर्णके उस बाणको चढ़ाते ही दिशाओंमें और आकाशमें आग-सी लग गयी। सैकड़ों तारे दिनमें ही टूट-टूटकर गिरने लगे। इन्द्रसहित लोकपालगण हाहाकार करने लगे। खाण्डव-वन-दाहके समयका अर्जुनका वैरी अश्वसेन नामक एक महाविषधर सर्प भी वैर निकालनेके लिये उस बाणमें घुस बैठा। कर्णने अर्जुनके मस्तकको ताककर बड़ी ही फुर्तीसे बाण छोड़ दिया; परंतु भगवान्ने उससे भी अधिक फुर्तीसे बाणके अर्जुनके रथतक पहुँचनेके पहले ही अर्जुनके बड़े भारी रथको एकदम पैरसे दबाकर पृथ्वीमें धँसा दिया। चारों घोड़े घुटने टेककर जमीनपर बैठ गये। बाण आया, परंतु अर्जुनके मस्तकमें नहीं लग सका। कर्णने बड़े उत्साह और उद्योगसे अव्यर्थ सर्पबाण मारा था, परंतु रथ नीचा हो जानेसे वह व्यर्थ हो गया। बाण इन्द्रके दिये हुए अर्जुनके दिव्य मुकुटमें लगा, जिससे वह मुकुट पृथ्वीपर गिरकर जल गया। भगवान्ने अर्जुनको सचेत करके उड़ते हुए अश्वसेन नागको भी मरवा डाला। यों बड़े भारी मृत्यु-प्रसंगमें अर्जुनकी रक्षा हुई।
(११)
महाभारतमें पाण्डव विजयी हुए। छावनीके पास पहुँचनेपर श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा कि ‘भरतश्रेष्ठ! तू अपने गाण्डीव धनुष और दोनों अक्षय भाथोंको लेकर पहले रथसे नीचे उतर जा। मैं पीछे उतरूँगा, इसीमें तेरा कल्याण है।’ यह आज नयी बात थी, परंतु अर्जुन भगवान्के आज्ञानुसार नीचे उतर गया। तब बुद्धिके आधार जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण घोड़ोंकी लगाम छोड़कर रथसे उतरे, उनके उतरते ही रथकी ध्वजापर बैठा हुआ दिव्य वानर तत्काल अन्तर्धान हो गया! तदनन्तर अर्जुनका वह विशाल रथ पहिये, धुरी, डोरी और घोड़ोंसमेत बिना ही अग्निके जलने लगा और देखते-ही-देखते भस्म हो गया। इस घटनाको देखकर सभी चकित हो गये। अर्जुनने हाथ जोड़कर इसका कारण पूछा, तब भगवान् बोले—
अस्त्रैर्बहुविधैर्दग्ध: पूर्वमेवायमर्जुन:।
मदधिष्ठितत्वात् समरे न विशीर्ण: परन्तप॥
इदानीं तु विशीर्णोऽयं दग्धो ब्रह्मास्त्रतेजसा।
मया विमुक्त: कौन्तेय त्वय्यद्य कृतकर्मणि॥
(शल्यपर्व ६२।१८-१९)
‘परन्तप अर्जुन! विविध शस्त्रोंसे यह रथ तो पहले ही जल चुका था, मैं इसपर बैठा हुआ इसे रोके हुए था, इसीसे यह अबसे पूर्व रणमें भस्म नहीं हो सका। कौन्तेय! तेरा कार्य सफल करके मैंने इसे छोड़ दिया, इसीसे ब्रह्मास्त्रके तेजसे जला हुआ यह रथ इस समय खाक हो गया है। मैं पहले न रोके रखता या आज तू पहले न उतरता तो तू भी जलकर खाक हो जाता!’
भगवान्की इस लीलाको देख-सुनकर सभी पाण्डव आनन्दसे गद्गद हो गये।
(१२)
महाभारत तथा अन्य पुराणोंमें ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जिनसे अर्जुनके साथ भगवान्की अपूर्व मैत्रीका परिचय मिलता है। यहाँ तो संक्षेपमें बहुत ही थोड़ेसे उदाहरण दिये गये हैं। इस लीलाका आनन्द लेनेकी इच्छा रखनेवालोंको उपर्युक्त ग्रन्थ अवश्य पढ़ने-सुनने चाहिये।
जिस समय उत्तराके गर्भस्थ परीक्षित् को अश्वत्थामाने मार दिया था और उत्तरा भगवान्के सामने रोने लगी थी, उस समय विशुद्धात्मा भगवान्ने सारे जगत्को सुनाते हुए कहा था—
न ब्रवीम्युत्तरे मिथ्या सत्यमेतद् भविष्यति।
एष संजीवयाम्येनं पश्यतां सर्वदेहिनाम्॥
नोक्तपूर्वं मया मिथ्या स्वैरेष्वपि कदाचन।
न च युद्धात् परावृत्तस्तथा संजीवतामयम्॥
यथा मे दयितो धर्मो ब्राह्मणश्च विशेषत:।
अभिमन्यो: सुतो जातो मृतो जीवत्वयं तथा॥
यथाहं नाभिजानामि विजयेन कदाचन।
विरोधं तेन सत्येन मृतो जीवत्वयं शिशु:॥
यथा सत्यं च धर्मश्च मयि नित्यं प्रतिष्ठितौ।
तथा मृत: शिशुरयं जीवतादभिमन्युज:॥
यथा कंसश्च केशी च धर्मेण निहतौ मया।
तेन सत्येन बालोऽयं पुन: संजीवतामयम्॥
(अश्वमेधपर्व ६९। १८—२३)
‘उत्तरा! मैं कभी झूठ नहीं बोलता, मेरा कहना सत्य ही होगा। सब देहधारी देखें, मैं अभी इस बालकको जीवित करता हूँ। जैसे मैंने कभी हँसी-मजाकमें भी झूठ नहीं बोला है, जैसे युद्धमें कभी पीछे नहीं लौटा हूँ, वैसे ही इस बालकको जिलानेमें भी पीछे नहीं हटूँगा। मुझे यदि धर्म और विशेषकर ब्राह्मण प्यारे हैं तो जन्मते ही मरा हुआ अभिमन्युका बालक जीवित हो जाय। यदि कभी भी मैंने जानसे अर्जुनका विरोध नहीं किया है, यदि यह सत्य है तो यह मृत बालक जी उठे। सत्य और धर्म मेरे अंदर नित्य ही प्रतिष्ठित रहते हैं, इनके बलसे यह अभिमन्युका मरा बालक जीवित हो जाय। यदि कंस और केशीको मैंने धर्मानुसार मारा है (द्वेषसे नहीं) तो यह बालक जी उठे।’ भगवान्के ऐसा कहते ही बालक जी उठा।
इस प्रसंगमें भगवान्के सत्य, वीरत्व, धर्म, ब्रह्मण्यता, राग-द्वेषहीनता आदिकी घोषणा तो महत्त्वकी है ही, परंतु अर्जुनके अविरोधकी बात भगवान्का अर्जुनके प्रति कितना असीम प्रेम था, इसको सूचित करती है।
(१३)
अर्जुनके इस प्रेमका ही प्रभाव है कि जिसके कारण सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रीकृष्णने अपने श्रीमुखसे जगतारिणी, भव-भयहारिणी, ज्ञान-विस्तारिणी, यम-सदननिवारिणी, सर्वनिस्तारिणी गीताका अभूतपूर्व गान गाया, जो संसारके घोर अन्धकारमय अरण्यमें भटके हुए प्राणियोंके लिये दिव्य प्रकाशमय नित्य चेतन पथ-प्रदर्शक है एवं अर्जुनके इस विलक्षण प्रेमकी ही महिमा है कि जिससे भगवान्का हृदय खुल गया और उन्होंने अपने गुह्याद्गुह्यतर ज्ञानकी अपेक्षा भी अत्यन्त गुह्य—सर्वगुह्यतम अपने पुरुषोत्तमस्वरूपका रहस्य अर्जुनके सामने व्यक्त करा दिया तथा इस प्रेमका ही प्रताप है कि परम धाममें भी अर्जुनको भगवान्की अत्यन्त दुर्लभ सेवाका ही सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिसके लिये बड़े-बड़े ब्रह्मवादी महापुरुष भी ललचाते रहते हैं। स्वर्गारोहणके अनन्तर धर्मराज युधिष्ठिरने दिव्य देह धारणकर परम धाममें देखा—
ददर्श तत्र गोविन्दं ब्राह्मेण वपुषान्वितम्।
दीप्यमानं स्ववपुषा दिव्यैरस्त्रैरुपस्थितम्॥
चक्रप्रभृतिभिर्घोरैर्दिव्यै: पुरुषविग्रहै:।
उपास्यमानं वीरेण फाल्गुनेन सुवर्चसा॥
(महा०, स्वर्गा० ४। २—४)
‘भगवान् श्रीगोविन्द वहाँ अपने ब्राह्मशरीरसे युक्त हैं। उनका शरीर देदीप्यमान है। उनके समीप चक्र आदि दिव्य शस्त्र और अन्यान्य घोर अस्त्र दिव्य पुरुष-शरीर धारणकर उनकी सेवा कर रहे हैं। महान् तेजस्वी वीर अर्जुनके द्वारा भी भगवान् सेवित हो रहे हैं।’ इसीलिये भगवान् नारायणके साथ ही ‘नरं चैव नरोत्तमम्’ कहकर श्रीकृष्ण-सखा अर्जुनको नित्य प्रणाम करनेकी चिरन्तन प्रणाली है।