श्रीकृष्ण और द्रौपदी
पाण्डव-महिषी सती द्रौपदी भगवान् श्रीकृष्णको परम बन्धुभावसे पूजती थी। भगवान् भी द्रौपदीके साथ असाधारण स्नेह रखते और उसकी प्रत्येक पुकारका तुरंत उत्तर देते थे। भगवान्के अन्त:पुरमें द्रौपदीका और द्रौपदीके महलोंमें भगवान्का जाना-आना अबाध था। जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनकी मैत्री बहुत ही गहरी और विलक्षण थी, उसी प्रकार द्रौपदी और भगवान्का दिव्य प्रेम भी अलौकिक था। द्रौपदी श्रीकृष्णको पूर्णब्रह्म सच्चिदानन्दघन ईश्वर समझती थी और भगवान् भी उसके सामने अपनी किसी भी अन्तरंग लीलाको छिपाकर नहीं रखते थे। जिस वृन्दावनके पवित्र गोपी-प्रेमकी दिव्य बातें गोप-रमणियोंके पति-पुत्रोंतकको मालूम नहीं थीं, उन सारी ईश्वरीय लीलाओंका द्रौपदीको पता था, इसीलिये चीर-हरणके समय द्रौपदीने भगवान्को ‘गोपीजन-प्रिय’ कहकर पुकारा था।
द्रौपदीके चीर-हरणका प्रसंग बड़ा ही मार्मिक है, जब दुष्ट दु:शासन दुर्योधनकी आज्ञासे एकवस्त्रा द्रौपदीको सभामें लाकर बलपूर्वक उसकी साड़ी खींचने लगा और किसीसे भी रक्षा पानेका कोई भी लक्षण न देख द्रौपदीने अपनेको सर्वथा असहाय समझकर अपने परम सहायक, परम बन्धु परमात्मा श्रीकृष्णका स्मरण किया। उसे यह दृढ़ विश्वास था कि मेरे स्मरण करते ही भगवान् अवश्य आवेंगे। वे द्वारकामें हैं तो क्या हुआ, अव्यक्तरूपसे सर्वव्यापी भी तो हैं। मेरी कातर पुकार सुननेपर उनसे कभी रहा नहीं जायगा। द्रौपदीने भगवान्का स्मरण करके कहा—
गोविन्द! द्वारिकावासिन्! कृष्ण गोपीजनप्रिय।
कौरवै: परिभूतां मां किं न जानासि केशव?॥
हे नाथ! हे रमानाथ! व्रजनाथार्तिनाशन।
कौरवार्णवमग्नां मामुद्धरस्व जनार्दन॥
कृष्ण! कृष्ण! महायोगिन्! विश्वात्मन् विश्वभावन।
प्रपन्नां पाहि गोविन्द! कुरुमध्येऽवसीदतीम्॥
(महा०, सभा० ६७। ४१—४४)
‘हे गोविन्द! हे द्वारिकावासिन्! हे गोपीजनप्रिय! हे केशव! क्या तुम नहीं जान रहे हो कि कौरव मेरा तिरस्कार कर रहे हैं? हे नाथ! हे लक्ष्मीनाथ! हे व्रजनाथ! हे दु:खनाशन! हे जनार्दन! कौरव-समुद्रमें डूबती हुई इस द्रौपदीको बचाओ। हे कृष्ण! हे कृष्ण! हे महायोगिन्! हे विश्वात्मन्! हे गोविन्द! हे विश्वभावन! कौरवोंके हाथमें पड़ी हुई इस दु:खिनीकी रक्षा करो।’
द्रौपदीकी पुकार सुनते ही जगदीश्वर भगवान्का हृदय द्रवित हो गया और वे—
‘त्यक्त्वा शय्यासनं पद्भॺां कृपालु: कृपयाभ्यगात् ’
—कृपालु शय्या छोड़कर पैदल ही दौड़ पड़े। कौरवोंकी दानवी सभामें भगवान्का वस्त्रावतार हो गया। द्रौपदीके एक वस्त्रसे दूसरा और दूसरेसे तीसरा इस प्रकार भिन्न-भिन्न रंगोंके वस्त्र निकलने लगे, वस्त्रोंका वहाँ ढेर लग गया। ठीक समयपर प्रियबन्धुने पहुँचकर अपनी सखी द्रौपदीकी लाज बचा ली; दु:शासन थककर जमीनपर बैठ गया, वह धरती कुचरने लगा—
‘दस हजार गज-बल थक्यो, घट्यो न दस गज चीर।’
(२)
जूएमें हारकर जब द्रौपदीसहित पाण्डव वनमें जाकर रहने लगे, तब कुछ दिनों बाद भगवान् श्रीकृष्ण उनसे मिलनेके लिये वहाँ गये। पाण्डवोंके कपट-द्यूतके सारे समाचार सुनकर श्रीकृष्ण उन्हें आश्वासन देते हुए भाँति-भाँतिसे समझाने लगे। द्रौपदीको अपने अपमानित किये जानेका बड़ा ही दु:ख था। आज भगवान् श्रीकृष्णको—परम सखा श्रीकृष्णको अपने पास बैठे देखकर उसका दु:ख-सागर उमड़ पड़ा। द्रौपदी आँसुओंकी धारा बहाती हुई कहने लगी—‘प्यारे कृष्ण! मुझको देवल ऋषिने कहा है कि तुम ही समस्त लोकोंके रचनेवाले हो, तुम ही विष्णु हो और तुम ही यज्ञस्वरूप हो। इसी प्रकार जमदग्नि, कश्यप और नारदने भी तुम्हारा महत्त्व मुझे बतलाया है। उनका कहना है कि ‘जिस प्रकार बालक खिलौने बनाकर खेला करते हैं, उसी प्रकार तुम भी बार-बार ब्रह्मा, शिव और इन्द्रादिको रचकर उनके साथ खेला करते हो, तुम्हारे सिरसे आकाश और चरणोंसे पृथ्वी व्याप्त है। यह समस्त लोक तुम्हारे पेटमें व्याप्त है। तुम्हीं सनातन पुरुष हो, तुम विभु हो, सब प्राणियोंके स्वामी हो, लोकपाल, नक्षत्र, दसों दिशाएँ, आकाश, सूर्य और चन्द्रमा—ये सब तुम्हींमें प्रतिष्ठित हैं। तुम देवता और मनुष्य सबके एकमात्र ईश्वर हो, इतना होनेपर भी मेरी आज यह दुर्दशा है। हे कृष्ण! मैं पाण्डवोंकी स्त्री और धृष्टद्युम्नकी बहिन हूँ और तुम साक्षात् सच्चिदानन्दघन परमेश्वर मुझको अपनी ‘प्यारी सखी’ कहते हो, वही मैं एकवस्त्रा, रजस्वला काँपती हुई दु:शासनके द्वारा खींची जाकर राजसभामें लायी गयी और मुझे रुधिरसे भीगी देखकर धृतराष्ट्रके पुत्र हँसने लगे।
मधुसूदन! आज मैं अपनी साससे अलग वनवासिनी होकर रहती हूँ। केशव! आज मेरा कौन है? मेरे न पति हैं, न पुत्र हैं, न बान्धव हैं, न भाई हैं, न पिता हैं। और श्रीकृष्ण! आज तुम भी मेरे नहीं रहे, जो मेरे दु:खकी उपेक्षा कर रहे हो। पाण्डवोंकी स्त्री और तुम्हारी सखीका इतना अपमान हो, कर्ण और शकुनि मनमानी दिल्लगी उड़ावें और तुम उसका कुछ भी प्रतीकार न करो, इससे अधिक दु:ख क्या मेरे लिये होगा?
चतुर्भि: कारणै: कृष्ण त्वया रक्ष्यास्मि नित्यश:।
सम्बन्धाद् गौरवात् सख्यात् प्रभुत्वेन च केशव॥
(महा०, वन० १२। १२७)
‘श्रीकृष्ण! मैं तो चारों हेतुओंसे तुम्हारे द्वारा रक्षा करनेयोग्य हूँ। प्रथम तो तुम्हारा-हमारा सम्बन्ध है, दूसरे मैं यज्ञ-कुण्डसे उत्पन्न होनेके कारण गौरवशालिनी हूँ, तीसरे तुम मेरे सखा हो और चौथे तुम प्रभु हो—मेरी रक्षा करनेमें समर्थ हो।
दु:खिनी द्रौपदीके तप्त अश्रुबिन्दुओंने भगवान् श्रीकृष्णके हृदयको हिला दिया। सखीका दु:ख श्रीकृष्णके लिये असह्य हो गया। यहाँपर श्रीकृष्णके मुखसे जो शब्द निकले, उन्हींसे कौरवोंका विनाश निश्चित हो गया। भगवान्ने कहा—
रोदिष्यन्ति स्त्रियो ह्येवं येषां क्रुद्धासि भाविनि।
बीभत्सुशरसञ्च्छन्नाञ्छोणितौघपरिप्लुतान् ॥
निहतान् वल्लभान् वीक्ष्य शयानान् वसुधातले।
यत्समर्थं पाण्डवानां तत्करिष्यामि मा शुच:॥
सत्यं ते प्रति जानामि राज्ञां राज्ञी भविष्यसि।
पतेद् द्यौर्हिमवाञ्छीर्येत् पृथ्वी शकलीभवेत् ॥
शुष्येत् तोयनिधि: कृष्णे न मे मोघं वचो भवेत् ।
(महा०, वन० १२।१२८—१३०)
‘हे कृष्णे! हे कल्याणि! तू चिन्ता न कर। जिन राजाओंपर तू कुपित हुई है, उनकी रानियाँ भी अर्जुनके बाणोंसे छिदकर और मरकर जमीनपर पड़े हुए अपने पतियोंको देखकर ऐसे ही रोयेंगी। पाण्डवोंको जो काम करना चाहिये, वह मैं करूँगा। मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ कि तू पाण्डवोंकी राजरानी होगी। चाहे आकाश टूटकर जमीनपर गिर पड़े, भूमिके टुकड़े-टुकड़े हो जायँ, हिमालय फट जाय और समुद्र सूख जाय, परंतु मेरे वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकते।’ अर्जुनने भी भगवान्के इन वाक्योंका समर्थन किया, द्रौपदीके सख्य-प्रेमने कौरव-कुल-ध्वंसके लिये भगवान्के श्रीमुखसे भीष्म-प्रतिज्ञा करवा ली!
(३)
पाण्डव वनमें रहकर अपने दु:खके दिन काट रहे थे, परंतु दुर्योधनकी खल-मण्डली अपनी दुष्टताके कारण उनके विनाशकी ही बात सोच रही थी। दुर्योधनने एक बार दुर्वासा मुनिको प्रसन्न करके उनसे यह वर माँगा कि—‘हमारे धर्मात्मा बड़े भाई महात्मा युधिष्ठिर अपने भाइयोंसहित वनमें रहते हैं। एक दिन आप अपने दस हजार शिष्योंसहित उनके यहाँ भी जाकर अतिथि होइये; परंतु इतनी प्रार्थना है कि वहाँ सब लोगोंके भोजन कर चुकनेपर जब यशस्विनी द्रौपदी खा-पीकर सुखसे आराम कर रही हो, उसी समय जाइयेगा। दुर्योधनने कुचक्रियोंकी सलाहसे यह सोचा था कि द्रौपदीके खा चुकनेपर उस दिनके लिये सूर्यके दिये हुए पात्रसे अन्न मिलेगा नहीं, इससे कोपन-स्वभाव दुर्वासा पाण्डवोंको शाप देकर भस्म कर डालेंगे और इस प्रकार अपना काम सहज ही बन जायगा। सरलहृदय दुर्वासा दुर्योधनके इस कपटको नहीं समझे, इसलिये वे उसकी बात मानकर पाण्डवोंके यहाँ काम्यक-वनमें जा पहुँचे। पाण्डव द्रौपदीसहित भोजनादि कार्योंसे निवृत्त होकर सुखसे बैठे वार्तालाप कर रहे थे। इतनेमें ही दस हजार शिष्योंसहित दुर्वासाजी वहाँ जा पहुँचे। युधिष्ठिरने भाइयोंसहित उठकर ऋषिका स्वागत-सत्कार किया और भोजनके लिये प्रार्थना की। दुर्वासाजीने प्रार्थना स्वीकार की और वे नहानेके लिये नदी-तीरपर चले गये। इधर द्रौपदीको बड़ी चिन्ता हुई, परंतु इस विपत्तिसे प्रिय बन्धु श्रीकृष्णके सिवा उनकी सखी कृष्णाको और कौन बचाता? उसने भगवान्का स्मरण करते हुए कहा—‘हे कृष्ण! हे गोपाल! हेअशरणशरण! हे शरणागतवत्सल! अब इस विपत्तिसे तुम्हीं बचाओ—
दु:शासनादहं पूर्वं सभायां मोचिता यथा।
तथैव संकटादस्मान्मामुद्धर्तुमिहार्हसि॥
(महा०, वन०२६३।१६)
‘तुमने कौरवोंकी राजसभामें जैसे दुष्ट दु:शासनके हाथसे मुझे बचाया था, वैसे ही इस विपत्तिसे भी बचाओ।’ इस समय भगवान् द्वारिकामें रुक्मिणीजीके पास महलमें थे। द्रौपदीकी स्तुति सुनते ही उसे संकटमें जान भक्तवत्सल भगवान् रुक्मिणीको त्यागकर बड़ी ही तीव्रतासे द्रौपदीकी ओर दौड़े। अचिन्त्यगति ईश्वरको आते क्या देर लगती? वे द्रौपदीके पास आ पहुँचे। द्रौपदीके मानो प्राण आ गये! उसने प्रणाम करके सारी विपत्ति भगवान्को कह सुनायी। भगवान्ने कहा—‘यह सब बात पीछे करना, मुझे बड़ी भूख लगी है, मैं घबरा रहा हूँ, मुझे कुछ खानेको दो।’ द्रौपदीने कहा—‘भगवन्! खानेके फेरमें पड़कर तो मैंने तुम्हें याद ही किया है। मैं भोजन कर चुकी हूँ, अब उस पात्रमें कुछ भी नहीं है।’ भगवान् बड़े विनोदी हैं, कहने लगे—‘अरी कृष्णे! मैं तो भूखों मर रहा हूँ और तू दिल्लगी कर रही है? दौड़कर स्थाली तो इधर ला, मैं देखूँ उसमें कुछ है या नहीं’—
कृष्णे न नर्मकालोऽयं क्षुच्छ्रेमेणातुरे मयि।
शीघ्रं गच्छ मम स्थालीमानयित्वा प्रदर्शय॥
(महा०,वन० २६३।२३)
बेचारी द्रौपदी क्या करती! पात्र लाकर सामने रख दिया। भगवान्ने तीक्ष्ण दृष्टिसे देखा और एक शाकका पत्ता ढूँढ़ निकाला। भगवान् बोले—‘तू कह रही थी न कि कुछ भी नहीं है, इस पत्तेसे तो त्रिभुवन तृप्त हो जायगा।’ यज्ञभोक्ता भगवान्ने पत्ता उठाया और मुँहमें डालकर कहा—
‘विश्वात्मा प्रीयतां देवस्तुष्टश्चास्त्विति यज्ञभुक्॥’
(महा०, वन० २६३।२५)
‘इस पत्तेसे सारे विश्वके आत्मा यज्ञभोक्ता भगवान् तृप्त हो जायँ।’ साथ ही सहदेवसे कहा कि ‘जाओ, ऋषियोंको भोजनके लिये बुला लाओ।’ उधर नदी-तटपर दूसरा ही गुल खिल रहा था, संध्या करते-करते ही ऋषियोंके पेट फूल गये और डकारें आने लगी थीं। शिष्योंने दुर्वासासे कहा—‘महाराज! हमारा तो गलेतक पेट भर गया है, वहाँ जाकर हम खायेंगे क्या?’ दुर्वासाकी भी यही दशा थी। वे बोले—‘भैया! भगो यहाँसे जल्दी! ये पाण्डव बड़े ही धर्मात्मा, विद्वान् और सदाचारी हैं तथा भगवान् श्रीकृष्णके अनन्य भक्त हैं। वे चाहें तो हमें वैसे ही भस्म कर सकते हैं, जैसे रूईके ढेरको आग! मैं अभी अम्बरीषवाली घटना भूला नहीं हूँ, श्रीकृष्णके शरणागतोंसे मुझे बड़ा भारी डर लगता है।’ दुर्वासाके यह वचन सुन शिष्य-मण्डली यत्र-तत्र भाग गयी। सहदेवको कहीं कोई न मिला।
अब भगवान्ने पाण्डवोंसे और द्रौपदीसे कहा, ‘लो, अब तो मुझे द्वारिका जाने दो। तुमलोग धर्मात्मा हो, धर्म करनेवालेको कभी दु:ख नहीं होता।’
‘धर्मनित्यास्तु ये केचिन्न ते सीदन्ति कर्हिचित् ।’
(महा०, वन० २६३। ४४)
(४)
भगवान् श्रीकृष्ण दूत बनकर हस्तिनापुरको जाने लगे। द्रौपदीने एकान्तमें जाकर श्रीकृष्णसे कहा—‘श्रीकृष्ण! मैं तुम्हारी सखी हूँ, तुम मेरे दु:ख और क्लेशोंको भलीभाँति जानते हो, सन्धि कराने जा रहे हो? जाओ, किंतु—
अयं ते पुण्डरीकाक्ष दु:शासनकरोद्धृत:।
स्मर्तव्य: सर्वकार्येषु परेषां सन्धिमिच्छता॥
(महा०, उद्योग० ८२। ३६)
‘दु:शासनके हाथोंसे खींचे हुए इन खुले केशोंकी बातको याद रखना।’ विशाललोचना द्रौपदीको काँपती हुई और रोती हुई देखकर भगवान्का हृदय भर आया। उन्होंने फिर उसी प्रतिज्ञाको दोहराकर कहा—द्रौपदी! धृतराष्ट्रके पुत्र यदि मेरी बात न मानेंगे तो उन सबको मरकर जमीनपर लुढ़कना पड़ेगा और कुत्ते तथा सियार उनके शरीरको खायेंगे—
चलेद्धि हिमवाञ्छैलो मेदिनी शतधा फलेत् ।
द्यौ: पतेच्च सनक्षत्रा न मे मोघं वचो भवेत् ॥
सत्यं ते प्रतिजानामि कृष्णे वाष्पो निगृह्यताम्।
हतामित्राञ्छ्रिया युक्तान्न चिराद् द्रक्ष्यसे पतीन्॥
(महा०, उद्योग० ८२।४८-४९)
‘कृष्णे! हिमालय चलायमान हो जाय, पृथ्वीके सैकड़ों टुकड़े हो जायँ, नक्षत्रोंसहित आकाश गिर पड़े, परंतु मेरा वचन कभी झूठा नहीं हो सकता। मैं सत्य प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि तू शीघ्र अपने पतियोंको शत्रुओंसे रहित और लक्ष्मीके सहित देखोगी, तू रो मत।’
भगवान्ने दूतत्वका अभिनय किया, परंतु बात सखीकी ही रही।
इस प्रकार महाभारत, जैमिनीय अश्वमेधपुराण और बहुत जगह द्रौपदी और श्रीकृष्णके सम्बन्धमें ऐसी अनेक घटनाओंका वर्णन है, जिनसे श्रीकृष्णका द्रौपदीके पवित्र प्रेमसे आकर्षित होकर उसके कथनानुसार लीला करनेका उल्लेख है। लेख बढ़ जानेके भयसे विशेष नहीं लिखा गया।