शुभ-संग्रह

१. पाप और उसका फल

मनुष्य जब रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श—इन्द्रियोंके इन पाँच विषयोंमें किसी एकमें भी आसक्त हो जाता है, तब उसे राग-द्वेषके पंजेमें फँस जाना पड़ता है। फिर वह जिसमें राग होता है उसको पाना और जिसमें द्वेष होता है उसका नाश करना चाहता है। यों करते-करते वह बड़े-बड़े भयानक काम कर बैठता है और निरन्तर इन्द्रियोंके भोगोंमें ही लगा रहता है। इससे उसके हृदयमें लोभ-मोह, राग-द्वेष छा जाते हैं। इनके प्रभावसे उसकी धर्म-बुद्धि, जो समय-समयपर उसे चेतावनी देकर पापसे बचाया करती थी, नष्ट हो जाती है। तब वह छल-कपट और अन्यायसे धन कमानेमें लगता है। जब दूसरोंको धोखा देकर, अन्याय और अधर्मसे कुछ कमा लेता है, तब फिर इसी रीतिसे धन कमानेमें उसे रस आने लगता है। उसके सुहृद् और बुद्धिमान् लोग उसके इस कामको बुरा बतलाते और उसे रोकते हैं, तब वह भाँति-भाँतिकी बहानेबाजियाँ करने लगता है। इस प्रकार उसका मन सदा पापमें ही लगा रहता है, उसके शरीर और वाणीसे भी पाप ही होते हैं। वह पापजीवन होकर फिर पापियोंके साथ ही मित्रता करता है और इसके फलस्वरूप न तो इस लोकमें सुख पाता है और न परलोकमें ही उसे सुख-शान्तिकी प्राप्ति होती है। (महाभारत, शान्तिपर्व)

२. धर्म और उसका फल

धर्मपरायण मनुष्य दूसरोंका हित मनाते हुए ही अपना हित चाहते हैं। उन्हें दूसरोंके अहितमें अपना हित कभी दीखता ही नहीं। पर-हितसे ही परम गति प्राप्त होती है। धर्मशील पुरुष हिताहितका विचार करके सत्पुरुषोंका संग करता है, सत्संगसे धर्मबुद्धि बढ़ती है और उसके प्रभावसे उसका जीवन धर्ममय बन जाता है। वह धर्मसे ही धनका उपार्जन करता है। वही काम करता है, जिससे सद‍्गुणोंकी वृद्धि हो। धार्मिक पुरुषोंसे ही उसकी मित्रता होती है। वह अपने उन धर्मशील मित्रोंके तथा धर्मसे कमाये हुए धनके द्वारा इस लोक और परलोकमें सुख भोगता है। धर्मात्मा मनुष्य धर्मसम्मत इन्द्रियसुखको भी प्राप्त करता है, परंतु वह धर्मका फल सुख पाकर ही संतुष्ट नहीं हो जाता। वह सत्-असत् का विचार करके वैराग्यका अवलम्बन करता है। वैराग्यके प्रभावसे उसका चित्त विषयोंसे हट जाता है। फिर वह जगत‍्को विनाशी समझकर निष्काम कर्मके द्वारा मोक्षके लिये प्रयत्न करता है। असलमें जो मनुष्य पापोंको त्यागकर क्रमश: वैराग्यको धारण करता है, वही धर्मात्मा है और उसीको मोक्षपदकी प्राप्ति होती है।

(महाभारत, शान्तिपर्व)

३. अहिंसा-धर्म

जो पुरुष काम, क्रोध और लोभको पापोंकी खान समझकर उनका त्याग करके अहिंसा-धर्मका पालन करता है, वह मोक्षरूप सिद्धिको प्राप्त होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं। जो मनुष्य अपने आरामके लिये दीन प्राणियोंका वध करता है, वह मृत्युके बाद कभी सुखी नहीं हो सकता। मरनेके बाद परम सुख उसीको मिलता है, जो सभी प्राणियोंको अपने ही समान समझकर किसीपर भी क्रोध नहीं करता और किसीको भी चोट नहीं पहुँचाता। जो मनुष्य प्राणिमात्रको अपने ही समान सुखकी कामना और दु:खकी अनिच्छा करनेवाले जानकर सबको समान दृष्टिसे देखता है, वह महापुरुष देव-दुर्लभ ऊँची गतिको प्राप्त होता है। जिस कामको मनुष्य अपने लिये प्रतिकूल समझता है, वह काम दूसरे किसी भी प्राणीके लिये नहीं करना चाहिये। जो मनुष्य इसके विरुद्ध व्यवहार करता है वह पापका भागी होता है। मान-अपमान, सुख-दु:ख, प्रिय-अप्रिय इनमें जैसे अपनेको संतोष और असंतोष होता है, वैसे ही दूसरोंको भी होता होगा, यही समझकर व्यवहार करे। जो मनुष्य हिंसा करता है, उसकी हिंसा होती है और जो रक्षण करता है, उसकी दूसरोंके द्वारा रक्षा होती है। अतएव हिंसा न करके सबकी रक्षा करनी चाहिये। जो मनुष्य किसी भी प्राणीकी किसी प्रकार भी हिंसा नहीं करता, वह सत्पुरुषोंके बतलाये हुए धर्मके समान संसारमें प्रमाणरूप होता है।

(महाभारत)

४. संतोष

संतोष ही परम कल्याण है। संतोष ही परम सुख है। संतोषीको ही परम शान्ति प्राप्त होती है। संतोषके धनी कभी अशान्त नहीं होते। संसारका बड़े-से-बड़ा साम्राज्य-सुख भी उनके लिये एक तुच्छ तिनकेके समान है। विषम-से-विषम परिस्थितिमें भी संतोषी पुरुष क्षुब्ध नहीं होता। सांसारिक भोग-सामग्री उसे विषके समान जान पड़ती है। संतोषामृतकी मिठासके सामने स्वर्गीय अमृतका उमड़ता हुआ समुद्र भी फीका पड़ जाता है। जिसे अप्राप्तकी इच्छा नहीं है, जो कुछ प्राप्त है उसीमें जो समभावसे संतुष्ट है, जगत‍्के सुख-दु:ख उसका स्पर्श नहीं कर सकते। जबतक अन्त:करण संतोषकी सुधा-धारासे परिपूर्ण नहीं होता, तभीतक संसारकी सभी विपत्तियाँ हैं। संतोषी चित्त निरन्तर प्रफुल्लित रहता है, इसलिये उसीमें ज्ञानका उदय होता है। संतोषी पुरुषके मुखपर एक अलौकिक ज्योति जगमगाती रहती है, इससे उसको देखकर दु:खी पुरुषके मुखपर भी प्रसन्नता आ जाती है। संतोषी पुरुषकी सेवासे स्वर्गीय सम्पत्तियाँ, विभूतियाँ, देवता, पितर और ऋषि-मुनि अपनेको धन्य मानते हैं। भक्तिसे, ज्ञानसे, वैराग्यसे अथवा किसी भी प्रकारसे संतोषका सम्पादन अवश्य करना चाहिये।

(योगवासिष्ठ)

५. विचार

शास्त्रोंका अनुगमन करनेवाली शुद्ध बुद्धिसे अपने सम्बन्धमें सर्वदा विचार करना चाहिये। विचारसे तीक्ष्ण होकर बुद्धि परमात्माका अनुभव करती है। इस संसाररूपी दीर्घ रोगका सबसे श्रेष्ठ औषध विचार ही है। विचारसे विपत्तियोंका मूल अज्ञान ही नष्ट हो जाता है। यह संसार मृत्यु, संकट और भ्रमसे भरपूर है, इसपर विजय प्राप्त करनेका उपाय एकमात्र विचार है। बुरेको छोड़कर अच्छेका ग्रहण, पापको छोड़कर पुण्यका अनुष्ठान विचारके द्वारा ही होता है। विचारके द्वारा ही बल, बुद्धि, सामर्थ्य, स्फूर्ति और प्रयत्न सफल होते हैं। राज्य, सम्पत्ति और मोक्ष भी विचारसे प्राप्त होता है। विचारवान् पुरुष विपत्तिमें घबराते नहीं, सम्पत्तिमें फूल नहीं उठते। विचारहीनके लिये सम्पत्ति भी विपत्ति बन जाती है। संसारके सारे दु:ख अविवेकके कारण हैं। विवेक धधकती हुई अन्तर्ज्वालाको भी शीतल बना देता है। विचार ही दिव्य-दृष्टि है, इसीसे परमात्माका साक्षात्कार और परमानन्दकी अनुभूति होती है। यह संसार क्या है? मैं कौन हूँ? इससे मेरा क्या सम्बन्ध है? यह विचार करते ही संसारसे सम्बन्ध छूटकर परमात्माका साक्षात्कार होने लगता है। इसलिये शास्त्रानुगामिनी शान्त, शुद्ध बुद्धिसे विचार करते रहना चाहिये।

(योगवासिष्ठ)