तीन प्रकारके यात्री
संसारमें असंख्य जीव हैं, जिनमें अधिकांश तो ऐसे हैं जो अपने कर्मोंका फल भोगनेमात्रके लिये नाना प्रकारकी पशु-पक्षी तिर्यक् आदि योनियोंमें पड़े हुए हैं। कुछ ऐसे हैं जो भगवत्कृपासे पुण्यबलके कारण देव-दुर्लभ मनुष्य-शरीरको प्राप्त हुए हैं। इन मनुष्योंमें भी अधिक संख्या उन लोगोंकी है जो इस मिथ्या दु:खदायी अनित्य, अपवित्र संसारको अविद्यासे सत्य, सुखरूप, नित्य पवित्र मानकर परम पुरुषार्थ भगवत्प्राप्तिके साधनोंसे सर्वथा विमुख हो केवल भोगविषयोंके संग्रहमें ही अपने अमूल्य जीवनका व्यय करते हुए निरन्तर भवसागरमें ही गोते खाते रहते हैं।
कुछ लोग ऐसे हैं जो स्वर्गादि लोकोंके भोगोंको ही मोक्ष मानकर दिन-रात शास्त्रीय सकाम कर्मोंमें ही लगे रहते हैं, यदि उनके कर्म सर्वांगपूर्ण होते हैं तो किसी तरहसे डूबते-तैरते हुए भवसागरमें पड़ी हुई कर्मोंके फलरूपी वायुकी सहायतासे चलनेवाली नावको पकड़ लेते हैं और उसकी सहायतासे अपनी-अपनी भावनाके अनुसार देवताओंके लोक स्वर्गादिको प्राप्त होते हैं। यही दशा सकामभावसे भिन्न-भिन्न प्रकारके देवोपासकोंकी होती है। वे लोग स्वर्गादि लोकोंमें जाकर अपने पुण्योंके अनुसार निश्चित समयतक वहाँके भोगोंको भोगते हैं; परंतु पुण्यका क्षय होते ही वे जबरदस्ती पुन: उसी मृत्युलोककी विविध योनियोंमें ढकेल दिये जाते हैं।
(गीता ७।२०—२३; ८।१६; ९।२०-२१)
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सत्संगके प्रभाव और साक्षात् नारायणस्वरूप सद्गुरुकी कृपासे इहलोक, परलोकके भोगोंकी इच्छाको काकविष्ठावत् त्यागकर केवल परमात्मप्राप्तिकी शुभेच्छाको धारणकर, साधनचतुष्टयसे सम्पन्न हो, भवसागरसे निकलकर विचार अर्थात् शुद्ध निर्मल विवेक-सागरमें जाकर अपने साधनकी दृढ़ता और एक-लक्ष्यताके कारण अति शीघ्र भगवान्के परमपदको पहुँचा देनेवाले अत्यन्त वेगवान् विशुद्ध ज्ञान या पराभक्तिके अभेद्य और अच्छेद्य जहाजपर चढ़ जाते हैं और वे शीघ्र ही परमात्माके उस परमपदको प्राप्त होते हैं कि जहाँ एक बार पहुँच जानेपर फिर दु:खपूर्ण भवसागरमें कभी लौटकर नहीं आना पड़ता।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।
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मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥
इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस जहाजमें बैठकर जानेवाले परम भाग्यवान् सत्पुरुष बहुत थोड़े ही होते हैं।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:॥
परंतु स्मरण रखना चाहिये कि यदि किसीको दु:खोंसे सदाके लिये सर्वथा छूटकर परमात्मस्वरूपमें मिलनेकी इच्छा हो तो उसके लिये एकमात्र यही उपाय है कि वह सद्गुरुकी शरण होकर विचार-(विवेक)-के द्वारा विशुद्ध ज्ञानके जहाजपर सवार होनेका प्रयत्न करे। इसके सिवा—
नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय।