वैष्णवोंकी द्वादशशुद्धि
भगवान्के मन्दिरकी यात्रा करनेसे, उनकी उत्सवमूर्तिका अनुगमन करनेसे तथा प्रेमपूर्वक प्रदक्षिणा करनेसे दोनों चरणोंकी शुद्धि होती है। भगवान्की पूजाके लिये पत्र, पुष्प, गन्ध आदिका संग्रह करना दोनों हाथोंकी सर्वश्रेष्ठ शुद्धि है। भगवान्के नाम और गुणोंका प्रेमपूर्वक कीर्तन करना वाणीकी शुद्धि है। भगवान्की लीला-कथा आदिका श्रवण दोनों कानोंकी शुद्धि है और उनके उत्सवका दर्शन नेत्रोंकी शुद्धि है। भगवान्के सामने झुकना तथा उनके चरणोदक, निर्माल्य आदिका धारण करना सिरकी शुद्धि है। भगवान्के प्रसादस्वरूप निर्माल्य, पुष्प, गन्ध आदिको सूँघना दोनों नाकोंकी शुद्धि है। भगवान्के प्रसादस्वरूप जो कुछ होता है, वह तीनों लोकोंको शुद्ध कर सकता है। ललाटमें गदा, सिरमें धनुष और बाण, हृदयमें नन्दक, दोनों हाथोंमें शंख-चक्रका चिह्न करके जो निवास करता है वह कभी अशुद्ध नहीं होता, उसकी कभी दुर्गति नहीं होती। इस द्वादशशुद्धिको जानकर जो इसका अनुष्ठान करते हैं, उन्हें भगवान्की प्रसन्नता प्राप्त होती है।