अनन्त और अपार भगवत्कृपा
याद रखो—भगवत्कृपा अनन्त और अपार है। वह सभी प्राणियोंपर, सभी परिस्थितियोंमें, सभी समय बरसती रहती है। जो उसपर विश्वास करता है, वह उस सर्वथा समभावसे सबको प्राप्त होनेवाली कृपाका अनुभव कर सकता है। जिसका मन अविश्वासके तथा संदेहके अन्धकारसे ढका है, उसे उस परम रहस्यमयी अहैतुकी कृपाके दर्शन नहीं होते।
याद रखो—उस कृपाके असंख्य रूप हैं और वह आवश्यकतानुसार विभिन्न रूपोंमें प्रकट होती रहती है। भगवान्के अनुग्रहपूर्ण मंगलमय विधानमें मनुष्य जब संदेह करता है, उसके विरुद्ध निश्चय तथा आचरण करता है, तब भगवत्कृपा भयानकरूपमें प्रकट होकर विपत्ति और वेदनाके द्वारा उसके हृदयकी विशुद्धि करती है और जब मनुष्य विश्वासपूर्ण हृदयसे प्रत्येक परिस्थितिमें उसके अनुकूल आचरण करता है, तब वह कृपा बड़े सौम्यरूपमें आत्मप्रकाश करती है।
याद रखो—भगवत्कृपा किसी भी रूपमें प्रकट हो, वह सदा मंगलमयी है और मंगल ही करती है। दवा मीठी भी दी जाती है, कड़वी भी; कहीं-कहीं अंग काटकर भी चिकित्सक अंदरके मवादको निकालता है। पर इन सबमें उद्देश्य एक ही होता है—रोगनाश। रोगके अनुसार ही दवाका प्रयोग या ऑपरेशनकी क्रिया की जाती है; इसी प्रकार भगवत्कृपाके भी विविध रूप होते हैं—हमारे परम मंगलके लिये ही।
याद रखो—बाहरी वस्तुओं तथा परिस्थितियोंसे कृपाका पता नहीं लगता। अनुकूल वस्तु या परिस्थितिमें कृपा समझना और प्रतिकूलमें कृपाका अभाव मानना सर्वथा भ्रम है। कृपामय भगवान्का प्रत्येक विधान कल्याणमय है, वे जो कुछ भी करते हैं, सर्वथा निर्भ्रान्तरूपसे हमारे परम कल्याणके लिये ही करते हैं। जैसे सुख-सौभाग्यमें अत्यन्त अनुकूल दिखायी देनेवाले पदार्थ और परिस्थितिकी प्राप्तिमें उनकी कृपा रहती है, ठीक वैसी ही दु:ख, दुर्भाग्य, अत्यन्त प्रतिकूल दीखनेवाले पदार्थ और परिस्थितिकी प्राप्तिमें रहती है।
याद रखो—जब तुम विश्वासकी दृष्टि प्राप्त कर लोगे, तब तुम्हें यह प्रत्यक्ष दिखलायी देगा कि तुम्हें प्राप्त होनेवाले प्रत्येक पदार्थ और परिस्थितिमें भगवत्कृपाका मंगलमय कार्य हो रहा है। फिर तुम्हें चोटका दु:ख जरा भी न होगा; वरन् चोट करनेवाले परम प्रेमास्पद परम कल्याणमय नित्य सहज सुहृद् प्रभुके मंगलमय कोमल आनन्दमय करस्पर्शका आनन्द प्राप्त होगा।
याद रखो—भगवान् सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वथा निर्भ्रान्त, सर्वलोकमहेश्वर हैं; वे सब कुछ जानते, सब कुछ कर सकते हैं एवं सबके स्वामी हैं। उनसे कभी भूल नहीं होती। ऐसे भगवान् सतत सावधानीके साथ सहजरूपमें तुमपर कृपा-वर्षा करते रहते हैं। तुम विश्वास करो, अपनेको उनके चरणोंपर बिना किसी शर्तके डाल दो, उनके प्रत्येक विधानकी मंगलमयतामें विश्वास करके उसका हृदयसे स्वागत करो; अपनेको सम्पूर्ण समर्पण कर दो। उनके कृपामय विधानको बदलाना मत चाहो। फिर देखोगे—उनकी कृपा सीधी तुम्हारे जीवनपर बरसेगी तथा तुम्हारे वर्तमान और भविष्यको परम उज्ज्वल तथा परम आनन्दमय बना देगी।
याद रखो—तुम जो कुछ प्राप्त करना चाहते हो, जब वह नहीं होता और जब उसमें अचानक ऐसी बाधा आ जाती है जो तुम्हारे मनोरथको नष्ट कर देती है, तब वहाँ तुम भगवान्की कृपाके दर्शन करो। भगवत्कृपा ही बाधा बनकर आयी है और तुम्हें भारी दु:खसे बचानेके लिये, जिसकी तुम्हें कल्पना नहीं है और वह भलीभाँति जानती है; तुम्हारे इस कार्यको असफल कर देती है।
याद रखो—तुम भगवत्कृपासे अपने मनका काम करवाना चाहते हो, यही तुम्हारी बड़ी भूल है। यही तुम सीधी तुमपर उतरनेवाली कृपाकी धारामें बाधा देते हो। भगवत्कृपासे कह दो—मुक्तकण्ठसे विश्वासकी मौन वाणीमें स्पष्ट कह दो कि ‘तुम जो ठीक समझो, जब ठीक समझो, जैसे ठीक समझो वही, उस समय, वैसे ही करो।’ अपनेको बिना किसी शर्तके, बिना कुछ बचाये—भगवत्कृपाके समर्पण कर दो। फिर भगवत्कृपा निर्बाधरूपसे अपना मंगलमय दर्शन देकर तुम्हें कृतार्थ कर देगी।