अनर्थोंका मूल अहंकार

याद रखो—अहंकार ही सारे अनर्थोंका मूल है, अहंकारसे ही ममता तथा राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं। ‘मैं’ है तो ‘मेरा’ है, ‘मेरा’ है तो मेरा सुरक्षित रहे और बढ़े, जो मेरा है उसमें राग और जो मेरा नहीं उसमें द्वेष। राग-द्वेष ही काम-क्रोध-लोभ-मोहकी उत्पत्तिमें प्रधान हेतु हैं।

याद रखो—शरीरमें और नाममें ‘अहं’-बुद्धि न हो तो शरीरके रहने या न रहनेमें सुख-दु:ख क्यों होगा और क्यों निन्दा तथा स्तुतिमें सुख-दु:ख होगा। निन्दा ‘नामकी’ होती है और प्रशंसा भी ‘नामकी’। जब मनुष्य निन्दा और प्रशंसामें हानि-लाभ मानता है और दु:ख-सुखकी अनुभूति करता है तो मानना चाहिये कि वह अहंकारसे अभिभूत है। अपने आत्मस्वरूपसे वंचित है।

याद रखो—इस अहंकारके कारण ही बुद्धिमान्—वाणीसे आत्माका तत्त्व निरूपण करनेवाले बुद्धिमान् भी मूर्ख हो जाते हैं और अपने-अपने मत-वादके लिये लड़ने-झगड़ने लगते हैं। इस अहंकारजनित अज्ञानके कारण ही स्थूल शरीरकी पूजा और नामकी प्रशंसा चाहते हैं। लोग मेरा चित्र या मूर्ति रखकर पूजा-सम्मान करें, ‘मेरा नाम इतिहासमें अमर रहे’—ऐसी आकांक्षा आत्मामें तो होती ही नहीं। यह सारी अज्ञानकी क्रियाएँ होती हैं, अहंकारके कारण ही। बुद्धिमान् मनुष्य भी अपनी प्रशंसात्मक जीवनी लिखना-लिखाना चाहता है, बुद्धिमान् मनुष्य भी गुणप्रशंसाके हेतुभूत अभिनन्दनादि स्वीकार करता है, बुद्धिमान् मनुष्य भी लोकोपकारके नामपर अपने भावोंका प्रचार करता है और बुद्धिमान् मनुष्य भी धन कमाकर उसके द्वारा परोपकारके बहाने नाम-आरामकी आकांक्षा करता है, ये यथार्थ बुद्धिके लक्षण नहीं हैं। तमसाच्छन्न विपरीतदर्शी बुद्धिका ही यह स्वरूप है। इस बुद्धिवाला मनुष्य वास्तवमें बुद्धिमान् नहीं है। आत्मदर्शनकी दृष्टिसे यह वास्तवमें मूर्खता ही है। यह सब अहंकारका ही अवश्यम्भावी दुष्परिणाम है।

याद रखो—इस अहंकारका दमन हुए बिना कभी न तो त्याग होगा, न शक्ति मिलेगी और न मूर्खता ही मिटेगी। अहंकारके नाशके लिये खास तीन उपाय हैं—

(१) अपने तथा जगत‍्के स्वरूपपर विचार करके अपनी दीनता, असमर्थता और असहायताका परिचय प्राप्त करना, उसे स्वीकार करना और सर्वशक्तिमान् सर्वसमर्थ सर्वज्ञ तथा अहैतुक सुहृद् भगवान‍्के शरणापन्न होकर उनसे नित्य संयोग कर लेना। अपना सच्चा दैन्य ही अहंकार नाश करनेमें समर्थ है और इसी दैन्यसे समर्थ भगवान‍्की प्रपत्ति प्राप्त होती है।

(२) विवेक-विचारपूर्वक शरीर तथा नामोंमेंसे अहंकारको निकालकर सबके द्रष्टा आत्मामें उसे स्थिर करना। मैं शरीर नहीं हूँ, नाम नहीं हूँ। इन सबकी सारी क्रियाओंको हर समय जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिमें देखनेवाला निरपेक्ष द्रष्टा हूँ। शरीर और नामके हानि-लाभसे मेरा कोई हानि-लाभ नहीं होता और यह द्रष्टा भी एक कल्पना ही है। वास्तवमें एक परमात्मसत्ताके अतिरिक्त और कुछ भी न है, न होता है।

(३) भगवान् ही अपने-आप अपने ही खेलके लिये अपने ही संकल्पसे सृष्टिके तथा सृष्टिके समस्त कार्योंके रूपमें अभिव्यक्त हैं। वही आप नित्य अपने-आप अपनेमें लीला कर रहे हैं। सृजन-संहार, उत्पत्ति-प्रलय सभी उन लीलामयकी लीला है। यहाँ दो ही चीज हैं—लीलामय और उनकी लीला। लीलामय और लीलामें अभेद है; क्योंकि लीलामय ही लीला बने हुए हैं, मैं उनकी लीलाका उन्हींका अपनेसे ही बनाया हुआ एक खिलौना हूँ। वास्तवमें वे ही वे हैं।

याद रखो—इन तीनोंमेंसे किसी एकको अपनाकर अहंकारका नाश करनेका प्रयत्न करना चाहिये। अहंकार ही बन्धन है, अहंकारका नाश ही मुक्ति है।