भगवान् एक, साधन अनेक

याद रखो—भगवान् एक हैं, परंतु उनतक पहुँचनेके मार्ग अनेक हैं। साध्य-लक्ष्य एक है, परंतु उसे प्राप्त करनेके साधन अनन्त हैं। साध्य एक होनेपर भी साधनोंमें अनेकता अनिवार्य है। जैसे काशी एक है, पर काशी पहुँचनेके पथ विभिन्न हैं। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण—सभी दिशाओंके मनुष्य काशीको लक्ष्य बनाकर चलेंगे तो काशी पहुँच जायँगे, परंतु वे चलेंगे अपनी-अपनी दिशासे तथा अपने-अपने मार्गसे ही। मार्गोंके अनुभव भी उनके पृथक्-पृथक् होंगे। कोई यह चाहे कि पूर्वसे आनेवाला पश्चिमसे आनेवालेके पथसे ही आये तथा उत्तरसे आनेवाला दक्षिणके पथसे ही आये तो जैसे यह चाहना भ्रममूलक है, वैसे ही भगवान‍्तक—अपने परम लक्ष्यतक पहुँचनेका साधन सबका एक ही हो—यह मानना भी भ्रम है। रुचि, समझ, अन्त:करणके स्वरूप त्रिगुणोंकी न्यूनाधिकता, पूर्व-संस्कार, वातावरण आदिके अनुसार ही विभिन्न साधन होंगे। अतएव किसी भी भगवत्प्राप्तिके साधनकी न निन्दा करो, न किसीको देखकर लुभाओ। लक्ष्यपर नित्य दृष्टि रखकर अपने पथसे चलते रहो। भगवान् ही जीवनके परम साध्य हैं, इसको क्षणभरके लिये भी न भूलकर नित्य-निरन्तर अपने साधनमें लगे रहो। दूसरे क्या करते हैं, क्या कहते हैं, इसकी ओर न देखकर निरन्तर अपने मार्गपर सावधानीसे आगे बढ़ते रहो।

याद रखो—यदि तुम्हारे जीवनमें दैवी सम्पत्ति बढ़ रही है, मन विषयोंसे हट रहा है, भगवान‍्के प्रति आकर्षण अधिक हो रहा है, मनमें शान्ति तथा आनन्दकी वृद्धि हो रही है और ये धीमी या तेज जिस चालसे बढ़ रहे हैं तो समझ लो कि तुम उसी मात्रामें उत्तरोत्तर आगे बढ़ रहे हो और यदि तुम्हारे जीवनमें आसुरी सम्पत्ति बढ़ रही है, मन विषयोंकी ओर खिंच रहा है, भगवान‍्के स्मरणसे हट रहा है, मनमें अशान्ति तथा चिन्ताकी वृद्धि हो रही है और ये मन्द या तीव्र जिस गतिसे बढ़ रहे हैं तो उसी गतिसे तुम पीछे हट रहे हो, तुम्हारा पतन हो रहा है। अतएव सावधानीके साथ अपने जीवनकी भीतरी स्थितिको देखते रहो। तुम्हारा असलमें वही स्वरूप है, जैसी तुम्हारी भीतरी स्थिति है।

याद रखो—सबसे आवश्यक और सबसे प्रथम करनेयोग्य कार्य है—लक्ष्यका निश्चय। ‘भगवान् ही जीवनके परम लक्ष्य हैं’—यह निश्चय करना और फिर इसी लक्ष्यको सामने रखकर जीवनमें प्रत्येक भीतरी-बाहरी क्रिया करना। जीवनका निश्चित लक्ष्य भगवान् होंगे तो तुम्हारा मुख भगवान‍्की ओर होगा और तुम धीमी या तेज चालसे भगवान‍्की ओर ही बढ़ते रहोगे; क्योंकि जीवमात्र सब चल ही रहे हैं। कालचक्रमें पड़े हुए नित्य-निरन्तर चलते रहना ही संसारमें जीवका कार्य है। फिर वह चाहे भगवान‍्के सामने मुख करके उनकी ओर चले या विषयोंको सामने रखकर उनकी ओर!

याद रखो—हिमालयकी तपोभूमिकी ओर जानेवालेको जैसे आगे-से-आगे शीतलता (ठंडक) एकान्तभूमि, त्यागी, साधु-महात्मा तथा शान्ति-सुख आदि मिलेंगे और इसके विपरीत गरम देशमें भोगमय बड़े-बड़े नगरोंकी ओर जानेवालेको उत्तरोत्तर गरमी, भीड़-भाड़, भोगी-विषयी लोग—चोर-ठग-डाकू, अशान्ति, चिन्ता आदिकी प्राप्ति होगी, ठीक वैसे ही भगवान‍्की ओर जानेवालेको आगे-से-आगे दैवी सम्पत्ति, सत्संगति, विषय-वैराग्य, शान्ति, आत्मानन्द, पवित्र आचार-विचार आदि मिलते रहेंगे और भोगोंकी ओर जानेवालेको आसुरी सम्पदा, कुसंगति, विषयासक्ति, अशान्ति, भोगोंमें आनन्दका भ्रम अपवित्र पाप-कर्मादि, दिन-रातकी जलन आदि प्राप्त होंगे। अतएव अपने-आपको इन लक्षणोंके अनुसार देख-जाँचकर निर्णय कर लो कि तुम किस ओर जा रहे हो और यदि दु:खमय अनित्य भोगोंकी ओर जा रहे हो तो तुम्हारे लिये दु:ख तथा पतन निश्चित है, फिर भले ही तुम बुद्धिमान्, ज्ञानवान्, साधु, भक्त, महात्मा, नेता, अधिकारी, ऐश्वर्यवान्, सुखी क्यों न समझे-कहे जाते हो या अपनेको मानते हो। अत: तुरंत विषयोंकी ओर पीठ करके भगवान‍्के सामने मुख कर लो।

याद रखो—तुम मनुष्यके रूपमें इस संसारमें इसलिये नहीं भेजे गये हो कि दिन-रात भोग-लिप्सामें लगे रहकर पाप-जीवन बिताओ और पापकर्मोंका संचय बढ़ाकर रोते-कलपते मर जाओ। तुम्हें तो मानवरूप दिया गया है भगवान‍्की प्राप्तिके साधनमें लगकर पुण्यजीवन बिताते हुए भगवान‍्को प्राप्त करनेके लिये, मृत्युको मारकर दिव्य नित्य भागवत-जीवनकी प्राप्तिके लिये इस बातको याद रखो और अपनी योग्यता तथा रुचिके अनुसार निर्दोष परमार्थ-साधनको अपनाकर इधर-उधर न ताकते हुए चलते रहो और जीवनके नित्य परम साध्य भगवान‍्को प्राप्त करके सफलजीवन बन जाओ।