भगवान् ही एकमात्र रस हैं
याद रखो—एकमात्र भगवान् ही ‘रस’ हैं। इसी रसका जगत् में सर्वत्र विस्तार है, पर प्रकृतिके संयोगसे मूल तत्त्वके रूपमें नित्य एक-रस रहते हुए ही सृजन-पालन-संहार-लीलाके लिये इसके नौ रस हो जाते हैं—शृंगार, हास्य, करुण, वीर, रौद्र, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शान्त।
याद रखो—इन्हीं नौ रसोंमें सृजन-पालन-संहारके सारे कार्य चलते रहते हैं। जो समष्टिमें है, वही व्यष्टिमें—इस दृष्टिसे प्रत्येक मानवका जीवन भी इन्हीं नौ रसोंसे ओत-प्रोत है।
याद रखो—इस विश्वमें नित्य-निरन्तर रसमय भगवान्की रसमयी लीला हो रही है। भगवान् ही नटवर नटराजके रूपमें यहाँ लीलानृत्य कर रहे हैं। इस लीलानृत्यके दो प्रधान भेद हैं—लास्य और ताण्डव। नौ रसोंमें पहले चार लास्य नृत्यके रस हैं और दूसरे चार ताण्डवके। जहाँ इन दोनों नृत्योंका समरस ग्रहण है, वहाँ शान्त-रस है। यह शान्त-रस रसमय भगवान्की ओर ले जानेवाला है।
याद रखो—शान्त-रसके दो भेद हैं—साधन-शान्त-रस और साध्य-शान्त-रस। इस साधन-शान्त-रससे ही भगवद्भक्तिके रसोंका—रतिका प्रारम्भ होता है। ये पाँच रस या रति हैं—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर। दास्यसे लेकर मधुरतक चारों ही रसोंमें शान्त-रसकी भूमिका अत्यावश्यक और अनिवार्य है। शान्त-रसमें साधक इन्द्रियदमन, मनकी शान्ति, विषय-वैराग्य, स्व-सुखवासनाजनित विषयासक्ति तथा विषयकामनासे रहित त्यागभाव एवं भगवान्के अनुकूल सदाचार-सद्विचार-सद्भाव आदिको न्यूनाधिकरूपसे प्राप्त कर लेता है। इस साधन-शान्त-रसकी, वेदान्त-साधनके साधन-चतुष्टयकी तीसरी स्थिति—षट्सम्पत्ति (शम, दम, तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा और समाधानरूपा छ: सम्पत्ति, वैराग्य तो इनके पहले ही हो जाता है)-से तुलना की जा सकती है।
याद रखो—जबतक मनुष्य अपनी अलग किसी प्रकारके सुखकी स्थितिकी कल्पना करके उसको चाहता रहता है, तबतक वह भगवान्के ‘अनन्य दासत्व’ में अपनेको नियुक्त नहीं करा सकता। भक्तराज श्रीहनुमान्जीकी भाँति अपनेको भूल जानेपर ही यथार्थ ‘सेवक’ भावका प्रकाश होता है। जबतक सेवक एकमात्र अपने स्वामीके अनन्य सेवा-सुखके अतिरिक्त अन्य कहीं किसी प्राणी-पदार्थमें सुखकी कल्पना करता है, तबतक वह सच्चा सेवक—‘दास्य-रति’ वाला दास नहीं बन सकता।
याद रखो—जब दास्य-रति उत्तरोत्तर प्रगति करती हुई मधुर रतिमें परिणत हो जाती है या भगवत्कृपासे बिना ही क्रमोन्नतिके मधुर रतिका विकास हो जाता है, तब उसमें एक महान् मधुरतम दिव्य उच्छलन आता है, जो परम प्रियतम भगवान्के सुखके लिये जीवनके कण-कणको, अणु-अणुको नचा देता है। इसका परिणाम होता है—महाभाव, जिससे एक दिव्य अनिर्वचनीय—अचिन्त्य मधुरतम शान्त-रसका प्रादुर्भाव होता है, जो प्रेमी-प्रेमास्पदका भेद मिटाकर परस्पर परम और चरम एकत्व-सुखैकत्व तथा स्वरूपैकत्व रूपमें प्रकट होता है और नित्य-निरन्तर परस्पर-सुखसम्पादनमें निरत मधुरतम प्रेमानन्दमय, लीलातरंगमय होनेपर भी परम विलक्षण अपूर्व शान्त-स्वरूपमें परिणत हो जाता है। यही है—साध्य-शान्त-रस। यही प्रियतम भगवान्का दिव्य सेवालाभ है। यही भक्तका परम ज्ञान है। यही साक्षात्कार है। यही ज्ञानोत्तर कालमें प्राप्त प्रेम है और यही दिव्यातिदिव्य भगवत्सेवा-सुख है।