भगवान् सर्वत्र, सदा और सबके
याद रखो—ऐसा कोई स्थान नहीं है और ऐसा कोई समय नहीं है, जिसमें भगवान् न हों एवं ऐसा कोई प्राणी नहीं है, जिसपर भगवान्की कृपा न हो, जिसको भगवान् अपनानेसे कभी इनकार करते हों।
याद रखो—भगवान् स्वभावसे ही सुहृद् हैं, वे कृपाके ही मूर्तिमान् स्वरूप हैं। उनमें किसी भी पापीके प्रति कभी घृणा नहीं होती। किसने पहले क्या किया है, कौन कैसा रहा है, किस देश-वेषका है, किस जाति-कुलका है, किस धर्म-सम्प्रदायका है—यह कुछ भी वे नहीं देखते। वे देखते हैं—केवल उसके वर्तमान मनको, उसके मनकी वर्तमान परिस्थितिको, उसकी सच्ची चाहको। कोई भी, कहीं भी, किसी भी समय अनन्य मनसे उनकी चाह करता है; उनकी कृपा, प्रीति या दर्शन पानेके लिये एकान्त लालायित हो जाता है, भगवान् उसके इच्छानुसार उसपर कृपा करते, उसे प्रीतिदान करते या दर्शन देकर कृतार्थ कर देते हैं।
याद रखो—संसारके भोग पहले तो इच्छानुसार प्राप्त नहीं होते, प्राप्त भी अधूरे ही होते हैं और प्राप्त होकर निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं; परंतु अनन्य इच्छा करनेपर भगवान् निश्चय ही प्राप्त होते हैं, इच्छानुसार कृपा, प्रेम या दर्शन देकर कृतार्थ करते हैं। वे सर्वत्र सदा पूर्णतासे परिपूर्ण हैं तथा प्राप्त होकर कभी बिछुड़ना उनके स्वभावसे विरुद्ध है।
याद रखो—मानव-शरीर भोगोंके लिये नहीं मिला है। भोगोंके लिये तो अन्यान्य समस्त योनियाँ हैं ही। यह तो मिला है केवल परमशान्तिमय परमानन्दमय नित्य शाश्वत अखण्ड चिदानन्दमय भागवत-जीवनकी प्राप्तिके लिये। यह जीवन ही दिव्य जीवन है—भगवत्प्राप्ति है। इसीको जीवनका परम लक्ष्य—एकमात्र लक्ष्य बनाकर इसीकी प्राप्तिके प्रयासमें सदा संलग्न रहना मानव-जीवनका परम कर्तव्य है। इस कर्तव्यसे विमुख मनुष्यका भविष्य निश्चय ही अत्यन्त अन्धकारमय है, भले ही वह (तथा जिस समाजमें वह रहता है—वह समाज भी) अपनेको समुन्नत, सुखी तथा ज्ञानोज्ज्वल स्थितिको प्राप्त समझे। पर उसकी यह समझ सर्वथा भ्रान्त है। उसकी बुद्धि उसे धोखा दे रही है।
याद रखो—जब तुम्हारे जीवनका लक्ष्य भोग होगा भगवान् नहीं; विषय-सुख होगा भागवत-सुख नहीं; लौकिक विषयोंकी प्राप्ति होगी भगवान्की प्राप्ति नहीं—तब सहज ही भोगासक्ति, भोग-कामना, कामना-सिद्धिजनित लोभ, कामना-असिद्धिजनित क्रोध, ममता, अभिमान आदि दोष उत्पन्न होकर तुम्हारे सारे जीवनको भ्रान्त और अशान्त कर देंगे। तुम्हारी बुद्धि विपरीत निर्णय करनेवाली बन जायगी और भोगपरायण मन-इन्द्रियके इच्छानुसार विषयोंकी ओर तुम्हें प्रेरित करने लगेगा। उस समय तुम अधर्मको धर्म, अकर्तव्यको कर्तव्य, बुरेको भला, विपत्तिको सम्पत्ति और अन्धकारको प्रकाश मानने लगोगे और इसके परिणामस्वरूप तुम्हारा जीवन तपोमय, अशान्तिमय, दु:खमय, चिन्तामय, ज्वालामय बन जायगा। परलोक भी बिगड़ जायगा, भगवान्की प्राप्ति तो होगी ही नहीं। तुम अशान्तिमय जीवन बिताते हुए अशान्तिमें ही मरोगे और आगे भी दु:खमय स्थितिको ही प्राप्त होते रहोगे।
याद रखो—मानव-जीवनके असली लक्ष्यका परित्याग करनेपर तुम्हारी यही दुर्दशा होगी। अतएव तुम तुरंत अपने जीवनका लक्ष्य स्थिर कर लो। वह परम और चरम लक्ष्य भगवान् हैं और बड़ी सावधानीके साथ अपनी विचारधाराको, अपनी प्रत्येक चेष्टा और क्रियाको उसीकी सिद्धिके लिये जोड़ दो। तुम्हारा मानव-जीवन निश्चय ही सफल हो जायगा। जबतक जीओगे, बाहरी परिस्थिति कैसी भी हो, तुम सदा शान्तिसुखका अनुभव करते रहोगे, सुखसे मरोगे और भगवान्को प्राप्त करके कृतार्थ हो जाओगे।