भगवान् शिवका स्वरूप

याद रखो—भगवान् शिव निजात्मस्वरूप, निरंजन, निराभास, निर्गुण, निर्विकार, निरामय, निरीह, नित्यसत्य, सर्वातीत, शब्दातीत, प्रकृतिपर, परात्पर, परतम, परमानन्दमय, परब्रह्म हैं। वे सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र, सर्वोपरि, सर्वाश्रय, सर्वव्यापी, सर्वरूप, सर्वज्ञ, सर्वलोकमहेश्वर, सर्वनियन्ता, सर्वगत, सर्वशक्तिमान् लीलाविहारी हैं।

याद रखो—भगवान् शिवजी ही वेदरूप, वेदवेद्य, वेदज्ञान हैं, वे प्रणवरूप हैं। ‘प्रणव’ उनका वाच्य है, वे वाचक हैं। उन पंचानन प्रभुके उत्तरकी ओरके मुखसे अकार, पश्चिमके मुखसे उकार, दक्षिणके मुखसे मकार, पूर्वके मुखसे विन्दु और मध्यके मुखसे नाद उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार पाँचों मुखोंसे निर्गत इन्हीं सबके समग्ररूपमें ‘ॐ’ एकाक्षर बना है। समस्त नाम-रूपात्मक जगत्, स्त्री-पुरुषादि समस्त प्राणिसमुदाय तथा चारों वेद—सभी इस ‘प्रणव’ (ॐ)-से ही व्याप्त हैं। यह ॐ शिवशक्तिका बोधक है।

याद रखो—सृष्टि, स्थिति, संहार, लय और अनुग्रह—इन पाँच प्रकारकी क्रियाओंके रूपमें भगवान् शिवकी लीला निरन्तर होती रहती है। इनमें चिद्रूपका सम्बन्ध ‘अनुग्रह’ से आनन्दरूपका ‘लय’ से और इच्छा-रूप, ज्ञानरूप तथा क्रियारूपका सम्बन्ध ‘सृष्टि’, ‘स्थिति’ और ‘संहार’ से है, इन्हीं पाँच रूपोंके प्रकाशक भगवान् शिवके—ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजात नामक पाँच मुख हैं। इनमें ईशान तथा तत्पुरुषसे तुर्यातीत तथा तुर्यदशाकी एवं सद्योजात, वामदेव तथा अघोरसे जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिकी व्याप्ति है। इसी क्रमसे पंचमहाभूतोंकी व्याप्ति इनसे मानी जाती है।

याद रखो—भगवान् शिवकी पंच मूर्तियोंमें प्रथम मूर्ति क्रीड़ा करती है, दूसरी तपस्या करती है, तीसरी लोकसंहार करती है, चौथी प्रजासृष्टि करती है और पाँचवीं सद्वस्तुयुक्त समस्त संसारको आच्छन्न करके रखती है। ईशानमूर्ति सबकी प्रभु, सबमें वर्तमान सृष्टि-प्रलय-रक्षा करनेवाली है।

याद रखो—भगवान् शिवकी ईशान नामक प्रथम मूर्ति साक्षात् प्रकृति-भोक्ता क्षेत्रज्ञ पुरुषमें अधिष्ठित है, तत्पुरुष नामक द्वितीय मूर्ति सत्त्वादि गुणोंके आश्रय भोग्य प्रकृतिमें अधिष्ठित है, तृतीय अघोर नामकी मूर्ति धर्म आदि अष्टांगयुक्त बुद्धिमें अधिष्ठित है, चतुर्थ वामदेव-मूर्ति अहंकारमें अधिष्ठित है और पंचम सद्योजात-मूर्ति मनमें अधिष्ठित है।

याद रखो—भगवान् शिवकी शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, ईशान, महादेव तथा पशुपति नामकी अष्टमूर्तियाँ क्रमश: पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और क्षेत्रज्ञ (यजमान)-में अधिष्ठित हैं। इन्हीं आठोंके रूपमें उनकी पूजा करनी चाहिये।

याद रखो—भगवान् परम शिवके तीन व्यूह हैं—और इकतीस प्रकार हैं—तीन व्यूहोंके नाम शिव, सदाशिव और महेश्वर हैं। शिव एकरूप है, सदाशिव पंच रूप और महेश्वर पंचविंशति रूप।

याद रखो—भगवान् शिवके दूसरे प्रकारसे चार व्यूह हैं, ब्रह्मा, काल, रुद्र और विष्णु। भगवान् शिव इन सबके आधार एवं शक्तिके भी आधार तथा प्रभव-स्थान हैं।

याद रखो—परात्पर परतम भगवान् शिव त्रिदेवगत रुद्र नहीं हैं। भगवान् शिवकी इच्छासे प्रकट रजोगुणरूप धारण करनेवाले ब्रह्मा, सत्त्वगुणरूप विष्णु एवं तमोगुणरूप रुद्र हैं, जो सृजन, रक्षण तथा संहारका कार्य करते हैं। ये तीनों वस्तुत: शिवकी ही अभिव्यक्ति हैं, इसलिये शिवके पृथक् भी नहीं हैं। परात्पर परतम सदाशिव, महाविष्णु आदि स्वरूपत: ही एक तत्त्व हैं। इनमें भेद-बुद्धि या ऊँच-नीचकी भावना करके राग-द्वेषयुक्त स्तुति-निन्दा करना पाप है तथा पतनका प्रत्यक्ष कारण है।

याद रखो—भगवान् शिव या रुद्र अनादिकालीन वैदिक देवता हैं; और इनकी लिंग-पूजा भी सनातन है। न तो ये आधुनिक देव हैं, न लिंग-पूजा ही आधुनिक या अनार्य-पूजा है। शिवलिंग चिन्मय है, स्थूल अंगविशेष नहीं। चिन्मय आदिपुरुषका स्वरूप ही लिंग है। जिनसे चराचर विश्वकी उत्पत्ति हुई है, वे ही सबके लिंग या कारणस्वरूप हैं। लिंग पीठ अर्थात् प्रकृति पार्वती हैं और लिंग चिन्मय परब्रह्म पुरुष हैं। पीठ अम्बामय तथा शिवलिंग चिन्मय पुरुषमय है।

याद रखो—लिंगका अर्थ है चिह्न। जैसे सींग, थूहा, पूँछ, गलकम्बल—ये गौ-जातिके लिंग हैं—

‘विषण्णी ककुद्मान् प्रान्ते बालधि: सास्नावानिति गोत्वेदष्टं लिङ्गम्।’

लिंग कहते हैं—पहचान करनेवाले चिह्नको—‘आकृतिर्जातिलिङ्गाख्या।’ मूँछ पुरुषका लिंग है—मूँछवाला पुरुष होता है, नारी नहीं; इसी प्रकार भगवान् शिवका परिचायक चिह्न है लिंग। शिवपुराणमें शिवलिंगोंके जो रूप बताये हैं, उन्हें जानकर कोई यह नहीं कह सकता—यह मनुष्यका शिश्न है। वहाँ बताया है सबसे पहला लिंग ज्योतिस्तम्भरूप है; जो प्रणव (ॐ) है। यह सूक्ष्म लिंग प्रणवरूप तथा निष्कल है। स्थूल लिंग सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है।

याद रखो—शिवलिंगकी आकृति ब्रह्माण्डकी ही आकृति है, यह मानो ब्रह्माण्डका एक मानचित्र है। चराचरात्मक सम्पूर्ण जगत् इस ब्रह्माण्डरूप शिवलिंगमें है। एक शिवलिंगके पूजनसे ही सूर्य, चन्द्र, नारायण, लक्ष्मी सबकी पूजा सम्पन्न हो जाती है।

जैसे भगवान् विष्णुके अव्यक्त ईश्वररूपकी प्रतीक शालग्रामरूप पिण्डी है, वैसे ही भगवान् शिवके अव्यक्त ईश्वररूपकी प्रतिमा लिंगरूप पिण्डी है।

याद रखो—भगवान् शिव ही समस्त विद्याओंके—योग, ज्ञान, भक्ति, कर्म आदि परम कल्याणकारिणी विद्याओंके भण्डार जगद‍्गुरु हैं। वे केवल शिक्षा देनेवाले ही गुरु नहीं हैं, सभी विषयोंमें स्वयं आदर्शरूप हैं। वे परम योगाचार्य—योगेश्वर हैं। उन्हींके शिष्य-प्रशिष्योंके द्वारा योगका प्रसार-प्रचार तथा संरक्षण हुआ तथा होता है।

याद रखो—भगवान् शिव पूर्णतम योगेश्वर, महान् गम्भीर ज्ञानस्वरूप होनेपर भी अपनी साधुताका परिचय करानेवाले महान् सरलहृदय हैं। वे बहुत लम्बी-चौड़ी पूजा-उपासनाकी प्रतीक्षा न करके बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं, इसीसे उनका ‘आशुतोष’ नाम प्रसिद्ध है और प्रसन्न होकर वे परम अलभ्य वस्तु भी सहज ही दे डालते हैं—इसीसे वे ‘औढरदानी’ कहलाते हैं। वे सहज कल्पतरु हैं; उनसे जो मनुष्य, जो कुछ भी चाहता है, भगवान् शिव उसे वही दे देते हैं। उनके औढरदानी या आशुतोष होनेका यह अभिप्राय नहीं है कि उनमें बुद्धि और विवेककी कमी है। वस्तुत: समस्त विवेक ज्ञान एवं बुद्धिके आधार ही भगवान् शिव हैं। वे ही जगद‍्गुरु-रूपमें समस्त ब्रह्माण्डके सम्पूर्ण देवर्षि-मुनि-मानवोंको ज्ञान-दान देते हैं। यह तो भगवान् शंकरकी एक विशेष दयालुता है कि वे सबके मनोरथ पूर्ण करनेमें सदा तत्पर रहते हैं।

याद रखो—भगवान् शिव सदा ही मंगलमूर्ति हैं, कल्याणमय हैं। उनका अशिव वेष विषय-वैराग्यका आदर्श है, न कि पागलपनका। जो लोग भगवान् शिवको नशेबाज, भँगेड़ी, गँजेड़ी, पागल या मसानमें रहनेवाले औघड़मात्र मानते हैं, वे अपनी ही सदाचारहीनताका शिवपर आरोप करके अपने दोषोंको ढकनेके लिये भगवान् शिवका सहारा लेकर अनर्थ करते हैं। जैसे व्यभिचारप्रिय लोग भगवान् श्रीकृष्णके परम पवित्र रासका रहस्य न समझकर प्रकारान्तरसे अपनी व्यभिचार-वृत्तिका समर्थन करते हैं, वैसे ही शिवके आचरणोंके अनुकरणका ढोंग रचकर असदाचारी लोग ऐसा कहते हैं। सच्चे शिवभक्तके लिये सदाचारी होना परम आवश्यक है। जान-बूझकर अपवित्र आचरणको जीवनमें भरे रखनेवाला कोई भी शिवभक्त नहीं हो सकता।

याद रखो—त्रिगुणमय जगत् ही बन्धनरूप है, शिवके भजनसे मनुष्य गुणातीत हो जाता है—उसके तीनों गुण भस्म हो जाते हैं; इसीसे वे ‘त्रिपुरारि’ हैं। अभिमान, क्रोध आदि दोष ही सर्प हैं, इन सबको अपने वशमें करके भगवान् शंकरने अपना भूषण बना लिया है, इसलिये वे ‘सर्पभूषण’ हैं। धर्म ही वृषभ है, वे नित्य धर्मपर आरूढ़ रहते हैं, इसीसे ‘वृषभवाहन’ हैं। भगवान् शिवकी विभूति ही जगत‍्को यथार्थ विभूति प्रदान करती है, इसीसे वे ‘विभूति’ को सदा सारे शरीरपर लगाये रहते हैं। सम्पूर्ण चराचर भूत उन्हींके आधीन हैं, इसीसे वे ‘भूतनाथ’ हैं। उनका प्रत्येक अंग, आभूषण आध्यात्मिक अर्थ रखता है।

याद रखो—भगवान् शिवका नाम परम मंगलमय, कल्याणमय, सर्वदु:खनाशक, सर्वसुखविधायक, सर्वसिद्धिदाता और भोग-मोक्ष देनेवाला है। अतएव श्रद्धापूर्वक भगवान् शिवके एक नाम या पंचाक्षर ‘नम: शिवाय’ मन्त्रका जप करो और सहज ही आशुतोष शंकरकी कृपा प्राप्त करके कृतार्थ हो जाओ।