भगवान्के स्वरूपभूत गुण
याद रखो—भगवान् नित्य, सत्य हैं, आनन्दमय हैं, सर्वशक्तिमान् हैं, सर्वज्ञ हैं, सर्वेश्वर हैं और सुहृद् हैं। ये सब चीजें उनमें गुणरूपसे पृथक् नहीं हैं, स्वरूपभूत हैं, स्वभावरूप हैं। अतएव इन सब स्वरूपभूत गुणोंको धारण किये ही भगवान् जीवमात्रके प्रति अहैतुक सौहार्द रखते हैं; क्योंकि सुहृद् रहना उनका स्वभाव है। अतएव उनकी अहैतुकी कृपा नित्य-निरन्तर अनन्तरूपसे तुमपर बरस रही है।
याद रखो—उन सर्वेश्वरके नियन्त्रणमें ही उन्हींकी शक्तिसे जीव-मात्रके लिये विधानकी रचना होती है। उन सुहृद्का कोई भी विधान ऐसा नहीं हो सकता, जिससे परिणाममें हमारा तनिक-सा भी अहित—अमंगल होनेकी सम्भावना हो। न उनसे कभी भ्रम-प्रमाद होता है, न उनकी शक्तिमें ही कभी कोई कमी आती है, जिसके कारण विधानके निर्णयमें या उसके द्वारा मंगलकी सिद्धिमें कोई भ्रान्ति या त्रुटि आ सकती हो।
याद रखो—परम सुहृद् अहैतुक कृपा-स्वभाव भगवान्के मंगल-विधानमें तुम्हें कहीं कभी जो प्रतिकूलताकी प्रतीति होती है और तुम दु:खी हो जाते हो, इसमें तुम्हारा अज्ञान तुम्हारी भ्रान्त धारणा और तुम्हारी अपना मंगल-हित सोचनेवाली बुद्धिकी विपरीतता ही प्रधान कारण है। उनकी विधान-रचना एवं उसके अनुसार उसका प्रत्येक फल वस्तुत: तुम्हारे परम हितके लिये ही है; क्योंकि वह उन्हींके द्वारा तुम्हें प्राप्त हो रहा है जो नित्य सत्य आनन्दमय सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ होनेके साथ ही तुम्हारे स्वभाव-सुहृद् हैं।
याद रखो—तुम्हारे विश्वासकी कमीसे ही तुम उनके मंगल-विधानपर संदेह करके सदा दु:खी रहते हो और उसके विरुद्ध अपने मनका विधान बनानेके लिये चिन्ता, संकल्प और प्रयत्न करते हो, जिससे परिणाममें तुम्हें उलटे निराशा, अशान्ति तथा दु:ख ही मिलते हैं, शान्ति-सुख तो कभी दिखायी ही नहीं देते।
याद रखो—तुम यदि सर्वशक्तिमान् भगवान्के इस स्वभाव-सुलभ सौहार्दपर विश्वास कर लो तो तुरंत तुम्हारे मनको आश्वासन तथा शान्ति मिल जायगी, जो सारे दु:खोंका सदाके लिये नाश करके तुम्हें सहज सुखी बना देगी। फिर, तुम्हें उन प्रियतम प्रभुके द्वारा रचित प्रत्येक विधानमें, उनके द्वारा प्रेषित प्रत्येक परिस्थितिमें उनका परम मंगलमय मधुर मनोहर स्पर्श प्राप्त होता रहेगा। प्रत्येक परिस्थितिमें तुम विक्षोभरहित आनन्दपूर्ण नेत्रोंसे इनकी परम मंगलमय मधुर मनोहर मुसकानका साक्षात्कार करोगे। प्रत्येक परिस्थितिमें सहज ही तुम्हारा परम कल्याण चाहनेवाले उनके परम मंगलमय मधुर मनोहर सच्चिदानन्दमय मनके दर्शन होंगे और तुम दिव्य आनन्दसागरमें सदाके लिये निमग्न हो जाओगे।
याद रखो—विश्वास होते ही यह सब होने लगेगा। अशान्ति, दु:खका सारा अन्धकार उसी प्रकार भागने लगेगा, जिस प्रकार सूर्योदयसे पूर्व ही समस्त अन्धकार मरनेकी तैयारी करने लगता है। अत: तुम तो बस, नित्य-निरन्तर उनके मधुर मनोहर सुहृद्-स्वभावकी ओर देखते रहो, उसीका चिन्तन-मनन करते रहो तथा मनमें बराबर यही निश्चय करते रहो कि वे मंगलमय सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ प्रभु मेरे अकारण सुहृद् हैं। अतएव कोई भी पाप-ताप, भ्रान्ति-भय, अशान्ति-दु:ख मेरे पास कभी आ ही नहीं सकते! आ ही नहीं सकते।