भगवान्की स्मृतिकी महत्ता
याद रखो—श्रीभगवान्की ‘स्मृति’ ही महान् पुण्य, परम सौभाग्य, अतुलनीय बुद्धिमत्ता, आदर्श सद्गुण, दिव्य सम्पत्ति है और समस्त सद्वृत्तियोंकी जननी है तथा भगवान्की ‘विस्मृति’ ही घोर पाप, दु:सह दुर्भाग्य, महामूर्खता, जघन्य दुर्गुण, दारुण विपत्ति है और समस्त असत् वृत्तियोंको उत्पन्न करती है।
याद रखो—रजोगुण तथा तमोगुणकी प्रबलता भगवान्की विस्मृतिसे ही होती है और उसीसे अहंकार, अभिमान, द्वेष, क्रोध, हिंसा, मिथ्या आचार आदि बढ़कर मनुष्यके इहलोक और परलोकको घोर दु:खमय बना देते हैं। इन दुर्गुणों, दुराचारों तथा दुष्ट वृत्तियोंसे बचना चाहते हो तो निरन्तर भगवान्का स्मरण करो। भगवान्का स्मरण करते हुए समस्त वैध कार्य भगवत्-सेवाके रूपमें करने लगो, तब ये सारी असत् वृत्तियाँ नष्ट हो जायँगी, जीवमात्रमें निरन्तर भगवान्के दर्शन होंगे और तुम्हारा प्रत्येक कार्य भगवान्की पूजा बन जायगा।
याद रखो—प्रत्येक जीवमें भगवान् बस रहे हैं, प्रत्येक जीव भगवान्का शरीर है अथवा भगवान् ही प्रत्येक जीवके रूपमें प्रकट हो रहे हैं। यह निश्चय करके प्रत्येक जीवका सम्मान करो, प्रत्येक जीवको सुख पहुँचाओ और प्रत्येक जीवका हित-साधन करो। किसीको हीन मत समझो, किसीको नीचा मत समझो। हीनता, दीनता, नीचापन समझना चाहो तो अपनेमें समझो और है भी सचमुच यही बात।
याद रखो—जो भगवान्के सामने अपनेमें हीनता-दीनता समझकर सदा नत रहता है, उसीपर भगवान्की कृपा-वर्षा होती है। भगवान्को दैन्य प्रिय है और अभिमान अप्रिय। वे अभिमानको चूर्ण करते हैं और दीनको अपनाते हैं। भगवान् जिसको अपनाते हैं, वही वास्तवमें महान् भाग्यशाली और शुभ चरित्रवान् है। जो भोगोंका गुलाम है, जिसपर अनित्य तथा दु:खयोनि भोगोंका आधिपत्य है, वह अत्यन्त अभागा तथा पापजीवन है। वह यहाँ और वहाँ केवल दु:ख ही पैदा करता है और दु:ख ही भोगता है।
याद रखो—जो स्वयं अभिमानसे रहित और दूसरोंको मान देनेवाला है, स्वयं आशासे रहित और दूसरोंकी आशाओंको यथासाध्य पूर्ण करनेवाला, अपने दु:खको दु:ख न मानकर दूसरेके सुखके लिये सब प्रकारके दु:खोंको वरण करनेवाला है और अपने अधिकारका त्याग करके दूसरोंके अधिकारकी रक्षा करनेवाला है; वही वस्तुत: सबमें भगवान्को देखकर सबकी सेवा करनेवाला है। ‘सबमें भगवान् ही हैं’—यों केवल मुँहसे कहनेवाला नहीं।
याद रखो—जो सबमें भगवान् जानकर, भगवान्का नित्य अखण्ड स्मरण करते हुए भगवान्की सेवाके लिये ही सब काम करता है, वही वास्तवमें परम पुण्यवान्, महान् सौभाग्यशाली, यथार्थ बुद्धिमान्, सर्वसद्गुण-विभूषित, सदा सुसम्पन्न और सम्पूर्ण सद्वृत्तियोंका समुद्र बन जाता है। वह प्रतिक्षण, अपने जीवनके प्रत्येक स्तरसे और प्रत्येक चेष्टासे समस्त जगत्में दैवी सम्पत्तिका, भगवद्भावोंका, स्वयं भगवान्का ही वितरण करता रहता है। उसीका जीवन सफल है, वही धन्यजीवन है।
याद रखो—ऐसा आदर्श पुरुष स्वयं ही धन्यजीवन नहीं होता, वह अपने जन्म और जीवनसे अपने देशको, धर्मको जातिको तथा माता-पिताको भी धन्य कर देता है और युगोंतक वह जन-जनके जीवनको उच्च स्तरपर पहुँचानेवाला परम आदर्श बन जाता है।