भगवान‍्में जोड़नेवाले प्राणी-पदार्थ ही परम हितैषी हैं

याद रखो—संसारके भोग परिवर्तनशील, अपूर्ण तथा विनाशी हैं, अतएव संसार-भोगोंमें आसक्त मनुष्योंको कभी सुख नहीं मिल सकता। वे सुख-दु:ख, लाभ-हानि, मान-अपमान, स्तुति-निन्दा, प्रिय-अप्रिय, शुभ-अशुभ आदि द्वन्द्वोंके मोहमें फँसे हुए दिन-रात अशान्ति तथा चिन्तामें डूबे रहते हैं। एकमें अनुकूलताका अनुभव करते हैं, दूसरेमें प्रतिकूलताका। अनुकूलताकी प्राप्ति तथा प्रतिकूलताके विनाशके लिये अनवरत विचार और प्रयत्न करते रहते हैं और इसी मोहमें पड़े हुए वे पापकर्मोंमें संलग्न तथा पवित्र कर्मोंसे दूर रहने लगते हैं। भगवान‍्का भजन उनके लिये असम्भव-सी वस्तु बन जाता है। उनका भोगपरायण जीवन भगवद्विमुख होकर नरक-स्वरूप बन जाता है और वे नरककीटके सदृश उसीमें रचे-पचे जीवनके अमूल्य क्षणोंको पापसंचय और उसके फलस्वरूप भविष्यके घोर पतनका साधन बनानेमें ही बिता देते हैं। संसारके चाहे प्रचुर भोग उन्हें मिल जायँ अथवा वे सर्वथा भोगरहित रहें—वे सदा ही बढ़ते रहते हैं—आत्म-पतन—आत्म-विनाशकी ओर ही!

याद रखो—जिनका जीवन भगवान‍्से जुड़ जाता है, जिनके जीवनकी गति भगवान‍्के सम्मुख हो जाती है, वे इन द्वन्द्वोंके फंदेसे निकल जाते हैं। वे जान जाते हैं कि इन द्वन्द्वोंका सारा सम्बन्ध केवल नाम-रूपसे है—शरीर और नामसे है—जो दोनों ही आत्मासे पृथक् केवल इस जन्मकी यात्राके लिये मिले हैं; उनके साथ होनेवाले किसी परिणाम और व्यवहारसे आत्माका अपना जिनका वास्तविक कोई भी सम्बन्ध नहीं है। ऐसे द्वन्द्व-मोहसे मुक्त पुरुष ही वस्तुत: दृढ़ निश्चयके साथ भगवान‍्का भजन करते हैं।

याद रखो—भोगपरायण मनुष्योंको चार चीजें मिलती हैं—अपार अशान्ति, अनवरत दु:ख, पापाचरण और मरणोत्तर नरक एवं आसुरी योनियोंकी प्राप्ति। इसके विपरीत भगवत्-परायण पुरुषोंको निर्मल शान्ति, उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ सुख, पुण्यकर्मोंका आचरण और मरणोत्तर सद‍्गति या भगवत्प्राप्ति।

याद रखो—मनुष्य-जीवन यदि भगवत्प्राप्तिके साधनमें न लगकर— भगवान‍्के सम्मुख न होकर कामोपभोगपरायण हो गया तो वह पशु-जीवनसे भी अधिक बुरा है। पशु आदि योनियोंमें जीव कर्मफल भोगकर क्रमश: कर्म-ऋणसे मुक्त होता है। परंतु भोगपरायण मनुष्य तो नित्य नये पापकर्मोंका संग्रह करके अपने भविष्यका विनाश करता है। मनुष्यकी बुद्धि भोगपरायण होकर जितनी काम, क्रोध, लोभ आदि दोषोंको बढ़ाती तथा उनके फलस्वरूप पतन कराती है, उतनी और वैसी बुद्धि पशु आदिमें होती ही नहीं। मनुष्यकी बुद्धि ही तामसभावापन्न होनेपर भयंकर-से-भयंकर पापोंकी नयी-नयी योजनाएँ बनाती एवं उनके अनुसार जीवनका निर्माण करती है।

याद रखो—वह सम्पत्ति सम्पत्ति नहीं है, वह सुख सुख नहीं है, वह सौभाग्य सौभाग्य नहीं है, वह बुद्धि बुद्धि नहीं है, वह कर्म कर्म नहीं है, वह आत्मीय आत्मीय नहीं है और वह पदार्थ पदार्थ नहीं है, जो भगवान‍्से विमुख करते हैं। असलमें भगवान‍्से विमुख करनेवाली, भोगोंमें लगाकर पापपरायण बनानेवाली सम्पत्ति विपत्ति है, सुख-दु:ख है, सौभाग्य दुर्भाग्य है, बुद्धि कुबुद्धि है, कर्म कुकर्म है, आत्मीय शत्रु है और पदार्थ अपदार्थ हैं। भगवान‍्में लगानेवाले प्राणी-पदार्थ ही सर्वथा और सर्वदा हमारे हितैषी हैं। उन सारे हितैषियोंका संग्रह करो, उन्हें अपनाओ, उनका समादर करो—चाहे उनके नाम विपत्ति, दुर्भाग्य, दु:ख आदि ही क्यों न हों।