भगवत्प्रेममें महान् शक्ति
याद रखो—विशुद्ध भगवत्प्रेमके साधनमें एक महान् शक्ति है जो स्वार्थ, घृणा, भय, काम, क्रोध, लोभ, अभिमान, द्वेष और वैर आदि दुर्भावोंपर विजय प्राप्त कराकर मनुष्यके जीवनको सेवापरायण, सौहार्दमय, निर्भय, काम-क्रोध-लोभसे रहित, विनम्र, द्वेष तथा वैरभावसे शून्य एवं विभिन्न प्रकारसे प्राणी-मात्रकी सेवाके द्वारा सर्वथा भगवत्सेवामें ही नियुक्त कर देती है। फिर इन दुर्भावोंके लिये जीवनमें कोई स्थान ही नहीं रह जाता।
याद रखो—तुम कभी-कभी इन दुर्भावरूपी शत्रुओंसे अत्यन्त उत्पीड़ित होकर इनसे छुटकारा पाना तो चाहते हो, परंतु भगवान्में अविश्वासजनित मानसिक दुर्बलताके कारण, जो भोग-सुखमें विश्वास उत्पन्न करा देती है, उन शत्रुओंमेंसे ही किसीका आश्रय लेकर उसीके साथी दूसरे शत्रुओंको मारना चाहते हो। यह भूल जाते हो कि ये सभी परस्पर एक-दूसरेके सहायक, पोषक और संवर्धक हैं।
याद रखो—जैसे अन्धकारसे अन्धकारका नाश नहीं किया जा सकता और शत्रुओंसे शत्रुओंका नाश नहीं किया जा सकता, वैसे ही पापसे पापका नाश सम्भव नहीं है। इन दुर्भावोंके सेवनसे इनका परिवार और बल बढ़ता ही जायगा और परिणामस्वरूप तुम्हारा जीवन पाप-दोषमय बन जायगा।
याद रखो—इसका प्रधान कारण है—विषयानुराग—इन्द्रियभोगोंमें आसक्ति या प्रीति। इसीलिये तुम्हें जब भ्रमसे ऐसा दीखता है कि उपर्युक्त दोषोंका आश्रय छोड़ देनेसे अमुक भोग नहीं रहेगा या नहीं मिलेगा, तब तुम उन दोषोंको अपना सहायक, सुहृद् मानकर उन्हें अपनाये रखते हो तथा उन्हें छोड़नेमें विपत्ति या हानिकी सम्भावना देखते हो। यहीं तुम्हारा भ्रम और भी बढ़ जाता है।
याद रखो—भगवत्प्रेमके पथिकोंको जिस दुर्लभ परमानन्दकी प्राप्ति पथमें ही होने लगती है, उसका भोगराज्यमें कहीं अस्तित्व ही नहीं है। तथापि दूरसे देखनेवालोंको यह भ्रम हो जाता है कि इन भगवत्प्रेमके पथिक कहे जानेवाले लोगोंके सांसारिक सुखोंका नाश हो रहा है और वे भीषण दु:खसमुद्रमें डूब रहे हैं। प्रकारान्तरसे बात भी सत्य है; जैसे सूर्यके प्रकाशमें दीपकका कोई महत्त्व या प्रयोजन नहीं रहता, अन्धकार तो मर ही जाता है, वैसी ही स्थिति यहाँ भोग-सुखोंकी होती है। इसीसे भोगपरायण लोग ‘प्रेम’ के नामसे ही डर जाते हैं; क्योंकि प्रेमकी भित्ति ही भोग और भोगासक्तिका सर्वथा त्याग है, उनसे एकदम रहित हो जाना है।
याद रखो—फिर यदि भोगपरायणोंकी दृष्टिमें प्रेमियोंमें कोई भोग रहते दीखते हैं तो वे वस्तुत: भोग नहीं होते। प्रेमास्पद भगवान्के इच्छानुसार रहे हुए सेवाके साधन होते हैं। वे पूजाके उपकरण होते हैं—इन्द्रियके चरितार्थ करनेवाले विषय नहीं!
याद रखो—यह तो प्रेमराज्यमें प्रविष्ट पथिकोंकी बात है। जो वस्तुत: भगवत्प्रेमको प्राप्त कर चुके हैं, उनका जीवन तो इतना पवित्रतम उच्चातिउच्च स्तरपर पहुँचा हुआ होता है कि स्वयं पूर्णकाम आप्तकाम भगवान् उनसे मिलनेके लिये लालायित रहते हैं। सच तो यह है कि भगवान् उनसे सदा मिले ही रहते हैं। भगवान् उनके दिव्य दानके गृहीता बनते हैं और वे सहज दाता।
याद रखो—उनमें दातापनका अभिमान तो होता ही नहीं, उनके पास अपना कुछ है या वे कुछ दे सकते हैं—ऐसी कल्पना भी उनके जीवनमें कहीं नहीं रह जाती, परंतु स्वयं भगवान् ही उन परम अकिंचनोंमें इतनी दुर्लभ वस्तु देखते हैं कि वे निरन्तर उनको बिना किसी व्यवधानके अपने साथ रखनेमें अथवा उनके साथ रहनेमें—सर्वथा घुल-मिलकर रहनेमें आनन्दलाभ करते हैं। यही प्रेमका महान् चमत्कार है।